सोमवार, 27 जनवरी 2014

विजय वर्मा की भोजपुरी लोककथा - भाई भुहुर्-भुहुर् ,भाई भुहुर् -भुहुर्

एक भोजपुरी लोककथा       -  भाई भुहुर्-भुहुर् ,भाई भुहुर् -भुहुर्

लोककथाएं अब विलुप्त होती जा रही है ,बच्चों के लिए प्रस्तुत है एक लोककथा जिसके कथाकार के बारे में पता नहीं है।

----एगो गाँव में मछेन्द्र नाम के एगो आदमी रहे। शादी-बिआह हो गइल रहे ,बाकी गौना बाकी रहे।

गौना करावे खातिर पहिला बार ससुराल जात रहले। दोस्त-इयार कहलन सन कि ससुराल त जा ताड़ ,बाकी लड़िका सब किस्सा-कहानी सुनावे के कहियन सन त का करब ,कौनो किस्सा-कहानी आवे ला ? अब त ई पर गइलन  फेर में। मने-मन सोचलन कि जे होई देखल जाई।

           त ई चल देलन ससुराल, रास्ता में  का देख ताड़न कि एगो मूस एगो माटी के टीला पर चढ़ के कुछो कुतरत रहे।

त उनका मूँह से निकल गइल -" भाई भुहुर्-भुहुर्। भाई भुहुर्-भुहुर्। [ माटी भूरभूरा के गिरत रहे]

उनकर आवाज़ सुनके मूस जे बा वोहिजे लेट गइल।

तब उ का कह तारे -' भाई बाड़ तू पटाइल ,भाई बाड़ तू  पटाइल '

अबकी मूसवा  भागे लागल।

तब उ का कह ताड़े -काहे भागे ल पड़ाइल ,काहे भागे ल पड़ाइल। '

                                   अब त मछेन्द्र बहुत खुश कि लड़िका सन किस्सा कहे खातिर ज़िद करिहन सन त इहे सुना देब। ससुराल पहुँचत -पहुँचत सांझ हो गइल। गाँव देहात के घर ,माटी-फूस के घर।

उनकर सास रोटी बना के झाड़त रही आ संगे-संगे गिनत भी रहली कि कै गो रोटी बनल । त मछेन्द्र भाई त देख लेलन।  रात में खाना खाये के बेरा जब उनकर सास पूछली कि पाहुन और रोटी लेब त उ

कहलन कि सभ रोटी त बाँट देनी ,अब काहाँ से देब।  उनकर सास मने-मने सोचे लागली कि दामादजी बड़का जोतिष बुझा  ताड़न । 

अब रात में भोजन पत्तर के बाद लईका सन मछेन्द्र  जी से अझुरा गैलन सन कि ' पाहून एगो किस्सा सुनाई '

मछेन्द्र  त  तैयारे  रहलैं।  बाकिर एगो संजोग के बात ई भइल कि जब उ कहानी सुनावे के शुरू कइलन ओहि  समय एगो चोर घर में सेंध मारे के शुरू कइले  रहे।  धीरे-धीरे सेंध काटे के शुरू कईलस  त माटी भर-भरा के

गिरे लागल। 

अब ई शुरू कइलन ,' भाई भुहुर्-भुहुर् ,भाई भुहुर्-भुहुर् '

चोर समझलस कि ई आदमी हमारा के देख लेलेबा ,वोही से कह ता कि भाई भुहुर्-भुहुर् ,भाई भुहुर् भुहुर्। 

अब उ चोर वहिजे पटा गईल। सोचलस कि अब नज़र ना आएब । 

मछेन्द्र  कहानी आगे  बढ़ईलन ,'' काहे बाड़ तू पटाईल ,काहे बाड़ तू पटाईल।  

चोर समझलस कि अबहिवो  हमारा के देखा ता लोग। अब उ  भागे  खातिर तैयार हो गइल।  

मछेन्द्र आगे कहलन ,'' काहे भागे ल पड़ाइल ,काहे भागे ल पड़ाइल '' . 

अब चोर जान-परान त्याग के भागे लागल ,त कवनो चीज से टकरा गइल। लोग देख लेहलस कि एगो चोर भाग ता। 

अब त चारो तरफ हल्ला हो गइल कि गाँव के नयका दामाद बड़ा भारी  जोतिष  हउअन।    जोतिष विद्या से चोर के भगा देलन  

भोरे -भोरे मछेंद्रजी हाथ में लोटा लेके खेत के तरफ चल देलन ।  रास्ता में एगो गदहा मिलल,वोकरा के ताड़ के पेड़ से बाँध देलन । 

जब घरे लौट के अईलन त का देखलन कि गाँव के धोबी उनकर ससुर से फ़रियाद करत रहे कि तनी आपन  दामाद से से कही कि आपन जोतिष विद्या से मालूम करस कि हमार गधा केने बा। अब मछेन्द्र खातिर ई कवन बड़का बात रहे। ऊ तनी घेरा बाँध के बता देलन कि पूरब दिशा में एगो ताड़ के पेड़ बा वोकरे आस-पास राउर गधा मिल जाई। धोबी गइल त ठीके वोकर जानवर मिल गईल। 

अब ई बात कि  गाँव के नयका दामाद जोतिष  हउअन फइलत -फइलत मुखिआ जी तक पहूँच गईल। मुखिआ एकर परीक्षा  लेवे के सोचलन।

मछेन्द्र के बोलाहट भेजल गइल दरबार में हाज़िर होखे ला। अब त मछेन्द्र के जान-परान सूखे लागल। अब त भेद खुले के बेरा आ गइल, इ सोच के उनकर हालत खराब होखे लागल। 

मुखिया जी मुट्ठी में एगो मच्छर के बंद कर लेलन आ जइसे मछेन्द्र दरबार में अइलन।,मुखियाजी उनका से पूछलन कि मछेन्द्र बताव कि हमारा मुट्ठी में का बा ?  अगर सही होई ता दस बीघा खेत तहरा मिली ,गलत होई त तहरा के लोग के गुमराह करे के कारण फांसी पर लटका दिहल जाइ।  जल्दी बोल अ  ,हमरा मुट्ठी में का बा ?

मछेन्द्र त डर  के मारे केहूं ग घिघिया के कहलन- '' ए  मालिक ! का मछेन्द्र के जान लेले बानी।  वोकरा पर रहम करीं ,आ आज़ाद कर दी। 

मुखियाजी बुझलन  कि उ मुट्ठी में बंद मच्छर के बारे में कहता ,बा बहुत खुश भइलन। आ ढेर सारा ईनाम आ दस बीघा खेत दे के बिदा कइलन। 

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------