सोमवार, 27 जनवरी 2014

सुरेश सर्वेद की कहानियाँ

छटपटाहट

राजेश्वरी आज एक नहीं दोनों पुत्रों पर बिफर पड़ी. उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनके पुत्र इतने स्वार्थी हो जायेगे. सामने पिता की लाश पड़ी थी. पुत्रों को पिता के मरने की दुख नहीं अपितु धन बांटने की चिंता खायी जा रही थी. गांव वाले समझाते रहे पर दोनों पुत्र लड़ते अड़े रहे कि धन का बंटवारा हो जाये तो पिता के खात खवाई में कौन क्या खर्च करेगा इसका निश्चय कर लिया जायेगा. गांव वालों ने उन्हें समझाने का प्रयास किया - लाश का अग्नि संस्कार कर दो फिर बैठ कर बांटा - हिस्सा के साथ कौन क्या करेगा इसका निर्णय कर लेना. पर दोनों पुत्र गांव वालों की भी बात मानने को तैयार नहीं थे. राजेश्वरी से रहा नहीं गया. वह बौखला गयी. घर के भीतर से कुल्हाड़ी उठा लायी. दोनों पुत्रों पर चिल्लाकर बोली - लो कुल्हाड़ी और मेरा दो भाग कर एक एक भाग बांट लो. . . ।

राजेश्वरी के तेवर को देखकर न केवल दोनों पुत्र अपितु गांव वाले भी सन्न रह गये. आज तक राजेश्वरी का ऐसा रुप किसी ने नहीं देखा था. राजेश्वरी तो साक्षात त्याग की मूरत थी. कभी किसी से कोई गिला शिकवा नहीं की. जैसे मिला उसने जीवन जीया. गांव वालों को यह जरा भी भनक नहीं होने दिया कि उसके परिवार में भी वाद विवाद होते रहता है. कभी उसके पुत्रों ने उससे अदावटी की या फिर बहुओं ने उसे सताया. उसने कभी महिलाओं की चौपाल में बैठकर बुराई नहीं की. जब कभी कोई महिला अपने घर की बुराई चौपाल में करती तो वह कहती - घर की बात घर में ही रहने देना चाहिए. दूसरों के घर के महाभारत में सबको मजा आता है. . . ।

इस पर महिलाएं कहती - बहन, कभी तुम्हारे घर भी महाभारत होगा न तो तुम भी हमारे बीच रोकर बताओगी. तुम्हारे घर खटपट होती ही नहीं तो फिर क्यों किसी की पीड़ा को समझोगी.

घर में खटपट होती भी थी या नहीं यह तो राजेश्वरी ही जानती थी. वह हंस कर कह देती - चार बर्तन घर में रहे और आपस में न टकराये यह संभव है क्या ? लेकिन ध्यान रखना चाहिए उसकी खनक बाहर नहीं जाना चाहिए.

महिलाओं को राजेश्वरी की यह बात किसी उपदेश से कम नहीं लगती थी. एक तो वह चारी - चुगली में रहती नहीं थी और कभी इत्फाकन सुनना पड़ जाता तो वह एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देती थी.

अभी कुछ दिनों से उसके घर का वातावरण बिगड़ गया था. दिन भर घर में तनाव की स्थिति निर्मित रहती. बहुएं मुंह फुलाएं रहती. बेटे सीधे मुंह बातें नहीं करते थे. बात - बात पर विवाद होने लगता. राजेश्वरी समझाने का प्रयास करती तो दोनों लड़के उस पर भड़क उठते - अब बहुत हो गया. तुम अपनी सीख अपने पास रखो. तुमने अपने जीवन जी लिया अब हमें अपनी तरह से अपना जीवन जीने दो. हमें बंटवारा चाहिए मतलब चाहिए.

जिन पुत्रों को उसने आंचल मे छिपाकर दूध पिलाया था. उनके मुंह से ऐसे शब्द सुनकर राजेश्वरी आहत हो जाती. वह अपने पति रामधन से कहती - सुना जी, क्या कहा आपके लड़के ने. . . ?

- मैं तो रोज सुन रहा हूं. तुम नहीं सुनी हो तो सुनो. . . । राजेश्वरी को सांत्वना के स्थान पर ताना सुनना पड़ता. रामधन कहता - बेटा. . बेटा. . बेटा. . खूब मनौतियां की थी न. बच्चे उद्दण्ड न हो जाये सोचकर डांटता था तो तुम्हें मैं बच्चों का दुश्मन लगता था. अब आंसू बहाने से मतलब नहीं. वे समझदार हो गये हैं. अब रोने धोने से काम नहीं बनेगा. इनका मुंह खुल गया है. उसे पूरा करा कर ही दम लेगे. उन्हें तुम्हारी जज्बातों की नहीं बंटवारे की चिंता है. अपनी - अपनी संपत्ति पाना चाहते हैं. बंटवारा पाये बगैर उन्हें चैन नहीं.

- कौन मां अपने पुत्रों को नहीं पालती. उसके पुत कपूत निकलेगा ऐसा क्या कोई मां जानती है. मैंने तो मां का फर्ज निभाया है.

- तुमने बहुत अच्छी तरह मां का फर्ज अदा किया है. अरी, तुमने मां का फर्ज अदा करते समय उन्हें पुत्रों का भी दायित्व मां - पिता के लिए होता क्या है क्यों नहीं समझायी ?

- तुम तो सदैव मुझे ताने ही देते हो. अपनी पीड़ा कम करने तुमसे सहानुभूति बटोरने आती हूं तो उल्टा पीड़ित कर देते हो.

राजेश्वरी रो पड़ती. रामधन कहता - अब रोने के अलावा है ही क्या तुम्हारे पास. . . . । इतना कह कर रामधन निकल जाता. राजेश्वरी आखिरी आंसू तक रोती पर उसे न कोई चुप कराने आता और न ही कोई उसके आंसू को सहेजने. . . . ।

घर में कदम रखते ही पुत्र अपने पिता से जमीन जायजाद के बंटवारे की बात शुरु कर देते. रामधन इससे उब गया था. वह अक्सर अब घर से गायब रहने लगा था. खास कर उस समय घर से गायब रहता जब उनके दोनों पुत्र के काम से वापस आने का समय होता. देर रात तक वह घर लौटता और राजेश्वरी उसके हिस्से का जो भी खाना बचा होता उसे दे देती. उसे खा कर वह सो जाता. उस दिन दोनों लड़कों ने चिल्लाकर कहा - हमारे घर आने के समय घर से गायब होकर हमें अपने अधिकार से वंचित रखा जा रहा है. यह उचित नहीं. मां, आज संध्या हम काम से लौटे तो उन्हें कह दीजियेगा कि वे घर पर ही रहे वरना हम बर्दाश्त नहीं करेंगे.

राजेश्वरी ने चुप सुना, पुत्रों के कटु वाक्यों से रामधन की भी नींद उजड़ चुकी थी. उसने भी पुत्रों की बातों को भरपूर कान भर सुना. वह पुत्रों के सामने नहीं आया. दोनों लड़के काम पर चले गये. रामधन उठा तो बहुओं ने उसे हिकारत की द्य्ष्टि से देखकर नाक भौहें सिकोड़ी. रामधन से सहा नहीं गया. कहा - पराये घर से आयी हो तो तुम लोग ऐसे व्यवहार करोगी ही. अरे, जब घर बच्चा जिसे हमने जन्म दिया. पाला - पोंसा वही हमारा सम्मान नहीं कर सकते तो तुम लोगों से भला कैसे और क्यों कर आशा किया जाये. गलती तुम लोगों की नहीं. गलती के अधिकार तो हमारे सुपुत्र है. उन सुपुत्रों की जिसे हमने अपने बुढ़ापे का लाठी समझ बैठे थे.

बहुएं क ो जब रामधन खरी - खोटी सुना रहा था. राजेश्वरी बीच बचाव के लिए आ गयी. बोली - तुम बहुओं को क्यों सुनाते हो ? क्यों नहीं समझाते अपने लड़कों को ? ये तो वही करेंगी जो लड़के करेंगे. . . ।

इतना कुछ होने के बाद भी तुम इनके हितैषी बनना चाहती हो. तुम्हारी इच्छा लातें खाने की ही है तो खाते रहो. मैं तो बर्दाश्त नहीं कर सकता. . . ।

इतना कहकर रामधन घर से निकल गया. राजेश्वरी फफक कर रोने लगी. बहुएं आयी. नाक मुंह सिकोड़कर चली गयी. दोनों बहुओं में से किसी ने भी हमदर्दी के दो शब्द कहने की आवश्यकता नहीं समझी. राजेश्वरी आखिरी आंसू तक रोती रही फिर चुप हो गई.

राजेश्वरी का छोटा लड़का महेश आया. उसने पूछा - पिता जी कहां हैं. . । राजेश्वरी चुप रही. वह झल्लाकर अपने कमरे में चला गया. बड़ा लड़का शिशुपाल आया. उसने भी पूछा पर राजेश्वरी निरुत्तर रही. वह भी अपने कमरे में चला गया.

संघ्या रात्रि में बदलने लगी. धीरे - धीरे रात गहराने लगी. रामधन के आने का समय गुजरा जा रहा था पर रामधन के आगमन का कहीं कोई चिन्ह नहीं था. राजेश्वरी अब तक भोजन नहीं करी थी. वह अक्सर रामधन के आने के बाद ही भोजन किया करती थी पर रात अधिक होने के बावजूद रामधन नहीं आया तो उसके मानस पटल में तरह - तरह के विचार उठने लगे. वह चाह तो रही थी कि पुत्रों के कमरे में जाकर अब तक रामधन के नहीं आने के कारणों का पता लगाने जाने कहे, पर वह जानती थी - पुत्रों को इससे कोई मतलब नहीं. वह मनमसोस कर रह गयी. रात गहराती गयी और राजेश्वरी का मन भयाक्रांत होता गया. पिता के अब तक न आने की चिंता न बड़का को थी और न छोटका को. इधर राजेश्वरी करवटें बदलती छटपटा रही थी उधर बच्चे नींद में खर्राटे भर रहे थे.

पूस की रात. कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. जैसे - जैसे रात गहरा रही थी. ठण्ड अपनी यौवन पर आती गयी. सारी रात गुजर गयी. पहट का समय आया पर रामधन न आया और न ही राजेश्वरी की आंखों में नींद आयी. वह बार बार बच्चों के कमरे की ओर झांक कर इसलिए देखती थी कि किसी के कमरे का दरवाजा खुलेगा. उसे वह रामधन के रात भर नहीं आने की खबर देगी. सूर्य चढ़ने लगा था. लेकिन न बड़े लड़के के कमरे का दरवाजा खुला न छोटे लड़के का. अब राजेश्वरी से रह नहीं गया. उसने बड़े लड़के के दरवाजे की कुण्डी खटखटा दिया. बड़ी बहू आंख मलती दरवाजा खोली. सामने अपनी सास को देखकर बोली - क्या बात है. . . ?

-शिशुपाल जागा नहीं है क्या ?

- अगर नींद में नहीं होते तो पलंग पर पड़े रहते क्या ? बहू ने कर्कश आवाज में कहा.

- बात यह नहीं है बहू. . . ।

- तो और क्या बात है, सुबह - सुबह नींद में दखल देने आ गयी ?

- दरअसल तुम्हारे ससुर अब तक घर नहीं आये है.

- तो इसमें वे क्या करेंगे. रात भर नहीं आये तो दिन में आ जायेगें.

शिशुपाल की नींद टूट चुकी थी. उसने सास - बहू में हो रही बात को सुन लिया. वह बाहर आया. पूछा - क्या रात भर पिता घर नहीं आये ?

- हां रे, इतनी ठण्ड पड़ रही है, पता नहीं कहां गये होंगे. . पता तो करो. . ।

- उन्हें किसने कहा, रात भर घर से गायब रहे. उन्हें स्वयं की चिंता नहीं तो फिर हम क्यों करें ? वे जैसे गये हैं आ भी जायेंगे.

पुत्र शिशुपाल ने बड़ी निर्ममता पूर्वक कहा. दूसरे पुत्र से भी उसे कोई आशा नहीं थी. वह स्वयं अपने पति की खोज में निकलने लगी कि हांफते हुए कैलाश आया. सुबह - सुबह कैलाश को अपने घर देखकर राजेश्वरी के भीतर शंकाएं सिपचने लगी. उसने कैलाश से पूछा - कैलाश, तुम कहां से दौड़ लगाते आ रहे हो ?

- चाची, शिशुपाल कहां है. . ।

- क्या बात है, तुम मुझे तो बताओ.

- मैं शिशुपाल से मिलना चाहता हूं.

- वह अपने कमरे में है. . . . ।

कैलाश शिशुपाल के कमरे की ओर दौड़ा. राजेश्वरी पति को खोजने जाने वाली थी पर कैलाश के आगमन ने उसे आगे जाने से रोक दिया. उसका ध्यान शिशुपाल के कमरे की ओर बंट गया. शिशुपाल कैलाश के साथ महेश के कमरे की ओर दौड़ा. महेश अभी तक सो कर नहीं उठा था. कुण्डी खटखटाने से उसकी नींद उचट गयी. उसने अपनी पत्नी को देखने के लिए कहा. उसकी पत्नी ने दरवाजा खोल दी. सामने शिशुपाल को देखकर इसकी सूचना महेश को दी. महेश ने सोचा - सुबह - सुबह लड़ाई करने आ रहा है. वह पूरी मुस्तैदी के साथ उठा. शिशुपाल केा भीतर बुलाया. शिशुपाल कैलाश के साथ भीतर आया. महेश ने शिशुपाल से कहा - सुबह - सुबह लड़ाई करने का विचार है क्या ?

- मैं लड़ाई करने नहीं, यह बताने आया हूं. . . . . ।

- क्या बताने आये हो, यही न कि तुम्हें बहेरानार वाली खेत चाहिए. पर याद रखो मैं उस जमीन को अपने हिस्से में लूंगा.

- तुमसे बांटा हिस्सा की बात करने नहीं, यह बताने आया हूं कि पिता जी का स्वर्गवास हो गया. . . . ।

क्षण भर महेश शून्य हो गया फिर पूछा - कैसे . . . ?

- कैलाश बता रहा है कि उनकी लाश खेत में पड़ी है.

दोनों लड़के खेत की ओर दौड़े. राजेश्वरी उनसे पूछती रही - आखिर बात क्या है, मुझे कोई कुछ बताते क्यों नहीं ? पर उसकी बात को किसी ने नहीं सुनी.

जब दोनों पुत्र गांव वालों के साथ घर आये तब सारा माजरा राजेश्वरी को समझ आया. वह अपने पति के शव से लिपटकर फफककर रो पड़ी.

रामधन के शव का अंतिम संस्कार किया गया. उसके मृत कार्यक्रम में मेहमान आने लगे. अभी कार्यक्रम का दूसरा ही दिन था कि दोनों भाइयों में बंटवारे को लेकर फिर विवाद शुरु हो गया. मेहमानों ने समझाने का प्रयास किया कि कार्यक्रम को निपटने दो फिर एक साथ बैठकर बांटे हिस्से की बात कर लेना. पर दोनों बेसब्र थे. उन्हें दुख इस बात का नहीं था कि उनके पिता जी स्वर्ग सिधार गये अपितु उन्हें चिंता इस बात की थी - वे जिस जमीन को चाह रहे हैं उनके हिस्से में वह जमीन आयेगी कि नहीं. राजेश्वरी ने भी समझाने का प्रयास किया. वह चाह रही थी कि शांति पूर्वक उनके पति के कार्यक्रम निपट जाये. जिससे उनकी आत्मा को शांति मिले. पर उसके बेटे तो अशांति पैदा करने में माहिर थे. वे बात - बात पर उलझ जाते.

तीसरे दिन रामधन की अस्थि को घर लाया गया. उनकी अस्थि को विसर्जन करने गंगा ले जाने की चर्चा चलने लगी. बड़े लड़के ने मुखाग्नि दिया था अतः गंगा जाने के लिए छोटे लड़के से कहा गया. इसी बात को लेकर दोनों भइयों में तकरार हो गयी. बड़ा लड़का चाहता था कि वही गंगा जाये पर समाज के कहने पर वह रुक गया. वाद - विवाद के मध्य रामधन का कार्यक्रम निपटा. किसने कितना खर्चा किया इसका हिसाब किताब किया गया और इसी बात को लेकर दोनों भइयों में एक बार फिर लड़ाई शुरु हो गई. पूरे तेरह दिनों से राजेश्वरी पुत्रों के कृत्यों को समोखती आ रही थी पर आज उसका गुस्सा उससे रोके नहीं रोका गया. वह कुल्हाड़ी उठा लायी. पुत्रों की ओर बढ़ाती बोली - तुम्हें बंटवारा चाहिए न, कल कर लेना बंटवारा. पहले इस कुल्हाड़ी से मेरा दो भाग करके एक - एक भाग का बंटवारा कर लो. फिर जमीन जायजाद का जैसे चाहे बंटवारा कर लेना. . . . ।

अचानक शांति स्वरुपा राजेश्वरी का बदला रुप देखकर दोनों लड़के सकपका गये. बहुएं सन्न रह गयी. उनसे कुछ कहते नहीं बन रहा था. राजेश्वरी ने कहा - मैंने बहुत किया, घर की खनक बाहर न जाये. तुम लोग हो कि यही चाहते हो. तुम लोग जो करना चाहो करते रहना, पर मुझे पहले मुक्ति दो. . . हां, मुझे मुक्ति दे दो. . . . ।

और राजेश्वरी फफक कर रो पड़ी. दोनों लड़के सिर झुकाकर खड़े हो गये. गांव - समाज के लोग थूं - थूं करते चले गये. किसी ने कहा - कहते हैं पुत्र बिना मोक्ष संभव नहीं पर यह गलत लगता है. मोक्ष की अभिलाषा में व्यक्ति पुत्र पैदा करने उतावले होते हैं पर उन्हें क्या मालूम कि वह पुत्र उसे मोक्ष नहीं दिला सकता सिवाय नरक में ढकेलने के. . . . . . ।

पीड़ा

त्नप्रकाश और एकांत की मित्रता शीघ्र ही गाढ़ी हो गई । रत्नप्रकाश इस शहर में पूर्व से रहता था । एकांत पहली बार इस शहर में आया था । रत्नप्रकाश और एकांत एक ही स्थान पर काम करते थे । लेकिन आज तक एकांत ने कभी रत्नप्रकाश को आभास नहीं होने दिया था कि उसका भी भरा पूरा परिवार था । अतः रत्नप्रकाश ही नहीं अपितु उसकी पत्नी क्षमा भी यही समझती थी कि एकांत अभी तक अविवाहित है ।

जिस दिन उनकी छुट्टी रहती दोनों मित्र बैठकर घंटों गप्पें उड़ाते ।क्षमा अक्सर मजाक कर बैठती । पूछती - एकांत, तुम शादी कब कर रहे हो ?

क्षमा का प्रश्न एकांत पर वज्रपात करता लेकिन वह सफेद मुस्कान ओठ पर लाता, कह देता - इतनी जल्दी भी क्या है ?

- क्या वृद्धावस्था में करोगे ?

क्षमा के प्रश्न का उत्तर एकांत के पास रहता पर वह कुछ नहीं कहता था । वह चुपचाप वहां से खिसक लेता ।

जब भी क्षमा उससे प्रश्न करती तो उसकी आँखों के सामने उसकी पत्नी जाहनवी का चेहरा घूम जाता । जाहनवी उससे बहुत प्यार करती थी । घर का कार्य तो पलक झपकते ही कर लेती । ऊपर से खेती बाड़ी में हाथ बंटाती । समय पड़े मजदूरी करने भी चली जाती । एकांत जाहनवी की याद में सारा जीवन जी लेना चाहता था ।

आज छुट्टी थी । एकांत, रत्नप्रकाश के घर आया । क्षमा अपने कार्य में व्यस्त थी । एकांत के पैर क्षमा के पास ठिठके फिर आगे बढ़ गये ।बैठक में रत्नप्रकाश अखबार पढ़ रहा था । एकांत को सामने देखकर उसने खाली कुर्सी की ओर संकेत किया । एकांत उस खाली कुर्सी में बैठ गया । रत्नप्रकाश ने अखबार टेबिल पर रखा । कहा - क्या बताऊं यार, मैं तो नून - तेल - लकड़ी को लेकर हताश हूं । मंहगाई आसमान छू रही है ।

- ओहो, बंद भी करो अपना रोना - धोना . . . . ? एकांत ने कहा ।

- तुम समझते क्यों नहीं ?

- क्या समझूं . . . ?

- हां, समझकर करोगे भी क्या ?अगर तुम पर भी दो - चार लोगों का भार होता तो समझ आ जाता । पारिवारिक झंझट क्या होती है ? रत्नप्रकाश थोड़ा रुका और फिर आगे कहा - कभी - कभी मन में आता है - तुम्हारे समान अकेला होता । हंसता - मुस्कुराता मगर ये विचार व्यर्थ जाता है । मैं सदैव उलझन में उलझा रहता हूं । तुम सदैंव मुस्कराते रहते हो । आखिर तुम्हारे आगे - पीछे उलझनें जो नहीं है ।

रत्नप्रकाश अपने माथे को टटोलने लगा , मानो चिंताएं गिनने का प्रयास कर रहा हो ।

एकांत को पुरानी घटना याद हो आयी । उसकी मां को कैंसर हो गया था । चिकित्सा कराते - कराते गहने बिक चुके थे । शेष रह गयी थी तो मां की गले में पड़ी चांदी की सुतिया । एक दिन मां उसे भी उतार दी । एकांत ने सुतिया को न बेचने की सलाह दी। मां ने कहा -एकांत जरा सोच, घर में खाने को दाना नहीं । मेरा उपचार की बात छोड़। मैं तो मर ही रही हूं । तुम जीवित लोगों को जीने के लिए तो दाना चाहिए ही न ? अंततः एकांत को मां की बात माननी पड़ी । उसने सुतिया को व्यापारी छलशत्रु के पास रेहन रख दिया । पैसा लाया उससे घर का आवश्यक सामान लाया । शेष बचे रुपए से मां का उपचार करवाया । जितनी सेवा वह अपनी मां क ा कर रहा था उससे कहीं अधिक सेवा उसकी पत्नी जाहनवी कर रही थी । दुर्भाग्य ऐसा था कि उस वर्ष पानी भी नहीं गिरा । अकाल की स्थिति निर्मित हो गई ।

वह शाम मां की जिन्दगी की आखिरी शाम थी । सूर्य पहाड़ की ओट में विलीन हो गया था । अंधेरे का जाल चारों ओर बिछ चुका था ।रात गहरा चुकी थी । आवारा कुत्ता भौंककर रात्रि को और भी भयावह बनाने उतारु थे ।

घर की घोर कालिमा को भगाने का प्रयास टिमटिमाती लालटेन कर रही थी ।अचानक हवा का एक झोंका आया और उसने लालटेन को बुझा दिया । एकांत माचिस की तीली जलाता कि एक हिचकी के साथ मां की आत्मा शरीर से मुक्त हो गई । मां के क्रिया कर्म के लिए रुपयों की आवश्यकता थी । उसने खेत को गिरवी रख दिया ।

बहुत दिनों तक घर सूना - सूना लगता रहा, हरा भरा तो तब लगने लगा जब जाहनवी गर्भवती हुई ।

जाहनवी के प्रसव का समय आया । जाहनवी प्रसव पीड़ा से व्याकुल थी । दाई उसे हिम्मत बंधवा रही थी । उसकी तकलीफ बढ़ती गयी ।पड़ोसी औरतें आयी । उनमें से कुछ ने सलाह दी कि डाक्टर बुला लाओ । पुनः वित्त समस्या आ खड़ी हुई ।एकांत व्यापारी छलशत्रु के पास गया । कहा - सेठजी, मुझे कुछ रुपए और दे दीजिए, वरना पत्नी भी मर जायेगी ।

- मैंने कब अस्वीकारा है . . . . । व्यापारी छलशत्रु ने कहा ।

- जल्दी कीजिए न, डाक्टर को बुला लाने में भी समय लगेगा ।

- क्या लाये हो ?

- वो मां की सुतिया आपके पास गिरवी है न, उसे खरीद ले ।

- वह तो कब की डूब चुकी है ।

- क्या ?

एकांत ने आश्चर्य के साथ प्रश्न किया । लेकिन उसे तत्काल अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया । उसने सुतिया छह माह में छुड़ाने का वचन दिया था । जबकि पूरे दस माह हो चुके थे । अंततः उसे जमीन बेचनी पड़ी ।

एकांत डाक्टर के पास गया ।उसे लेकर वापस आया ।घर के बाहर औरतें खड़ी थी ।सभी शांत थीं ।स्थिति ने स्पष्ट कर दिया था कि अप्रिय घटना घटी है । एकांत ने घर भीतर प्रवेश किया । पत्नी की लाश जमीन पर पड़ी थी । उसके ठीक बाजू में एक बच्चा था । दृश्य देख एकांत व्यथा से छटपटा कर चीख उठा - नहीं . . . . ।

एकांत के चीखने से रत्नप्रकाश हड़बड़ा गया । आवाज क्षमा तक पहुंची । वह भी दौड़कर आ गयी । रत्नप्रकाश ने पूछा - क्या हुआ एकांत . . . . ?

एकांत निःशब्द हो गया । वह कभी रत्नप्रकाश को तो कभी उसकी पत्नी क्षमा को देखता रहा . . . . ।

 

भ्रम यात्रा

मैं पुस्तक पढ़ते बैठा था कि एक काला बिच्छू पैर पर गिरा. मैं चीख उठा - अरे बाप रे, मुझे बिच्छू ने डंक मार दिया. खूब जलन हो रही है. विष चढ़ रहा है. शरीर में शून्यता छाने लगी है. आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा है. . . अब क्या करुं. किसे आवाज दूं. कंठ अवरुद्ध. अरे, सर्वांग पसीने से सराबोर. लगता है विष प्रभावशील हो रहा है.

मैं चीखने - चिल्लाने लगा. मेरी आवाज सुन अमित दौड़ा चला आया. पूछा - तुम्हें क्या हुआ. तुम कांप क्यों रहे हो. . . ?

- मुझे बिच्छू ने डंक मार दिया.

- तुम्हारी स्थिति स्पष्ट करती है कि तुम्हें भंयकर विषैला बिच्छू ने डंक मारा. मैं गजेन्द्र को बुला लाता हूं. . . ।

अमित चला गया. मैं खाट तक पहुंचने का प्रयास करने लगा पर पग बढ़ाना संभव नहीं हो पा रहा था. मेरी शक्ति क्षीण होती जा रही थी.

अमित, गजेन्द्र को बुला ले आया. उनके साथ और भी लोग थे. गजेन्द्र तो मुझसे अधिक घबराया हुआ था. उसने पूछा - बिच्छू का डंक कहां पर लगा है. . . . ?

मैंने पैर की ओर इशारा कर दिया. गजेन्द्र मंत्रोच्चार के साथ पैर का मालिश करने लगा. थोड़ी देर बाद उसने पूछा - विष कहां तक चढ़ा है. घुटने तक तो नहीं. . . ?

उससे से भी ऊपर, कमर तक चढ़ गया है. मैंने कहा.

गजेन्द्र पुनः मालिश करने लगा. उसने फिर पूछा -अब तो विष उतर रहा है न ! घुटने तक तो उतर ही गया होगा ?

- हां, उतर गया है. . ।

- सच - सच बताओ, विष उतर रहा है न ?

- खाक उतर रहा है. यहां तो पूरे शरीर में आग लगी है. मैं झल्ला गया.

- तब तो मुझसे सुधर पाना संभव नहीं. काला बिच्छू खतरनाक होता है. तुम डॉक्टर को बुला लाओ.

गजेन्द्र भी पसीने से तरबतर हो गया. वीरेन्द्र डॉक्टर को बुलाने गया.

गांव का डॉक्टर आया. उसने मुझे सिर से पांव तक देखा. कहा - तुम लोगों को किसी के जीवन की चिंता कतई नहीं. केस बहुत सीरियस है. मैं बचा पाने में असमर्थ हूं. इसे तत्काल जिला चिकित्सालय ले जाओ. देर करोगे तो डॉक्टर क्या, ईश्वर भी नहीं बचा पायेगा.

हां, डॉक्टर ने सत्य ही कहा है. वास्तव में मेरा बचना मुश्किल है. अब मेरी पत्नी श्वेता विधवा हो जायेगी. वह माथे पर सिन्दूर और हाथ में चूड़ियां नहीं पहन पायेगी. मरने से पूर्व उसे कुछ समझा देना मेरा फर्ज है.

मैंने श्वेता को बुलाया. कहा - श्वेता, अब मैं बच नहीं पाऊंगा. इन छोटे - छोटे बच्चों का भार तुम्हें सौंपता हूं. तुम चाहो तो दूसरा विवाह कर लेना मगर इन बच्चों को अपने साथ रखना. इन्हें पढ़ाना - लिखाना योग्य व्यक्ति बनाना.

पास ही उमेश खड़ा था. कुछ दिन पूर्व उससे मेरी लड़ाई हुई थी. मैंने कहा - उमेश, मुझे तुमसे बैर करने का दंड मिल गया. तुमने कहा था न कि सांप - बिच्छू काटे लो तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो गयी. तुम्हारी आत्मा को शांति मिलेगी.

- शशांक, तुम मुझ पर दोषारोपण न करो. तुम्हें कुछ नहीं होगा. हम तुम्हें अभी मुख्य चिकित्सालय राजनांदगांव ले जायेंगे. तुम्हारा उपचार करायेंगे. फिर देखना, भले चंगे हो जाओगे. . . . । उमेश ने सांत्वना दी.

- यह मात्र सांत्वना है. शत्रु इसे तुम भी जानते हो. मेरा मरना लगभग तय है. जब डॉक्टर ने मुझे बचाने असमर्थता जाहिर कर दिया है तो फिर बचूंगा कैसे ? अब तो तुम भी मुझे श्रद्धाजंलि दोगे. मेरी तेरहवीं पर पूड़ी बड़ा खाओगे. . . ।

अरे, यमदूत आ ही गये. ये मोटे - ताजे और काले हैं. ये रस्सी का फंदा मेरे गले में डाल रहे हैं. ये मेरे प्राण लेकर ही दम लेंगे. . ।

नहीं. . नहीं, अरे, यमदूत कहां अदृश्य हो गये. मेरे सामने तो उमेश ही खड़ा है. यह मुझसे मोटर साइकिल में बैठने का आग्रह कर रहा है.

तो मुझे राजनांदगांव मोटर साइकिल से ले जायेंगे. पर क्या उस पर बैठ पाऊंगा. मोटर साइकिल में हिचकोले पड़ेंगे. उससे शरीर हिलेगा और जहर फैलेगा. हे प्रभु, मैं क्या करुं ?

उमेश मुझे पकड़कर मोटर साइकिल तक ले गया. इतने में पिता जी आये. मैंने कहा - पिता जी,अब बच पाना मुश्किल है. मैं आपको कंधा देता पर अब आप मुझे कंधा देंगे. कैसा विपरीत समय आ गया है ?

- अपने कंठ से अशुभ वाक्य क्यों निकालता है. तुम्हें कुछ नहीं होगा. पिता जी ने कहा.

- खाक कुछ नहीं होगा. अपनी आंखों से मेरी हालात देख रहे हो. फिर भी कुछ न होने का आश्वासन ? मेरी मृत्यु के समय भी मजाक कर रहे हो. मां बीमार थी तो तुमने कहा था - अनुराधा, मैं यमदूतों से भी लड़कर तुम्हें बचाऊंगा. पर क्या वह बच सकी. तुम सब चाहते हो मैं मर जाऊं. . . . ?

दो - तीन लोगों ने मुझे पकड़ा. दीपक ने मोटर साइकिल की हैंडल सम्हाली. मुझे मोटर साइकिल पर लोगों ने बिठाया. मेरे पीछे उमेश बैठा. वह मुझे कंसकर पकड़ा था. गाड़ी चलने हुई कि खाली गुंडी दिख पड़ी. . . ।

हाय राम,यह अपशगुन. अब निश्चय ही बीच रास्ते में मेरे प्राणांत होंगे. नहीं. . नहीं, लोग करैत के काटने से बच जाते हैं तो फिर मैं एक बिच्छू के काटने से कैसे मर जाऊंगा ?

मोटर साइकिल चल पड़ी. मुझे लगा - गाड़ी भाग रही नहीं बल्कि मैं उड़ रहा हूं. स्वयं को सम्हालने असमर्थ हूं. उमेश की पकड़ और जोरदार हो गई है. कहीं मैं उछलकर गिर न जाऊं. मुझे डॉक्टर के पास पहुंचने की जल्दी है पर रास्ता लंबा लग रहा है.

सामने नीलकंठ दिखा. यानी शुभ. अब मुझ पर बम भी गिर जाये या कोई रायफल से दाग दे मगर मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा. . . . ।

हम राजनांदगांव पहुंचे. अस्पताल में मुझे टेबल पर लिटाया गया. मैं हड़बड़ा न जाऊं अतः मुझे पांच युवकों ने दबोच रखा था. डॉक्टर को देखा तो वह यमदूत से कम नहीं दिख रहा था. यमदूत ने कहीं डॉक्टर का रुप तो नहीं ले लिया. . उसने इंजेक्शन लगा दिया.

अरे, अब तो मुझे अच्छा लग रहा है. मैं बिलकुल स्वस्थ हूं. बिच्छू का विष उतर चुका है. यानी मृत्यु से मैंने बाजी मार ली. वास्तव में डॉक्टर प्रशंसा के लायक हैं. इसने मुझे जीवनदान दिया है.

हम वापस होने लगे कि संदीप दिखा. वह पत्रकार था. उसने कहा -अरे यार शशांक, तुम यहां. . . ?

- हां, मैं यह कहने आया हूं कि तुम अपने कार्यालय में बैठकर गांव के विकास से संबंधित झूठी रिपोर्ट छापो. पुरस्कार हथियाओ । शशांक, संदीप पर बरस पड़ा.

- तुम तो नाराज हो गये. . . ।

- और नहीं तो क्या ? तुम्हें पता है कि हम ग्रामीणों पर क्या बीतती है. कैसी - कैसी मुसीबतें आती है. वहां हमें सांप डंसते हैं. बिच्छू डंक मारते है. ग्रामीण बेमौत मरते हैं. वहां उपचार का कोई प्रबंध नहीं. क्या इस पर कभी तुम्हारी कलम ने क्रांति की. जाओ मित्र जाओं, ग्रामीण रिर्पोटिंग पर कोई पुरस्कार हड़पने कोई तिकड़म भिड़ाओ.

हम वहां से चल पड़े. गाड़ी तेज दौड़ने लगी. ठंडी हवा बह रही थी. इससे मेरे शरीर को ठंडक मिल रही थी. हम घर पहुंचे. घर में अब तक भीड़ है. वहां पहुंचते ही लोग हमारे इर्द गिर्द मंडराने लगे. सहारा देकर मुझे गाड़ी से उतारने का प्रयास किया गया मगर मैं तो स्वयं को पूर्ण स्वस्थ महसूस रहा था मैं गाड़ी से बिना सहारा के उतर गया.

विष्णु आगे आया. उसने मेरे शरीर को स्पर्श किया. कहा - अरे, तुम्हारा शरीर तो बर्फ के समान ठेडा है. लगता है तुम्हें सन्निपात हो गया. . . ?

मैं हड़बड़ाया - क्या मुझे सन्निपात हो गया. सन्निपात है या डॉक्टर की सुई का रियेक्शन ?अब क्या होगा. एक काल से बचा तो महाकाल ने दबोच लिया. हे प्रभु, अब तुम ही रक्षक हो. . ।

विष्णु ने श्वेता से कहा - श्वेता इसे कंबल उढ़ाओ,गुड़ - नारियल खिलाओ. इसके शरीर को गर्मी मिलनी चाहिए.

मैंने अपने शरीर को छूआ - हां. . . हां, मुझे सन्निपात हो गया है. तभी तो अभी तक ठंड लग रही है. अभी भी तो मैं कांप रहा हूं. नाक से पानी निकल रहा है.

श्वेता कंबल ले आयी. उसे ओढ़कर मैंने कहा - अलमारी में रखा नारियल तो ले आओ. . . ।

- पर उसे मैंने संतोषी मां के लिए रखा है. . . । श्वेता ने कहा.

यहां मेरा प्राणांत होने जा रहा है और तुम्हें संतोषी मां की भक्ति की पड़ी है. अच्छा,रहने दो. मुझे नारियल नहीं चाहिए. . । मैं नाराज हो गया.

श्वेता सकपका गयी. वह गुड़ और नारियल ले आयी. मैंने उन्हें खाया और चाय भी पी.

अब मुझे अच्छा लगने लगा है. भीड़ छंट चुकी है. मैं मृत्यु से एक बार फिर जीत गया हूं.

मैं निश्चिंत टहल रहा था कि मेरी पुत्री पिंकी आयी. उसने कहा - पापा, मेरा काला बिच्छू कहां है. . ?

बिच्छू का नाम सुनते ही भय के कारण मैं कूद पड़ा. मेरे हृदय की धड़कन बढ़ गयी. घबराहट में पूछा - कैसा बिच्छू, कौन सा बिच्छू. . . ।

पिंकी ने कहा - आप पुस्तक पढ़ रहे थे न,उसमें ही मैंने काले बिच्छू को दबा कर रख दिया था. वह तो प्लास्टिक का था.

मैं उछल पड़ा - ऐं. . . , तो क्या वह नकली बिच्छू था. उसे तो मैंने असली ही बिच्छू समझा था.

मैं वहां पर जाकर देखा जहां पर मुझे बिच्छू काटा था. वहां पर अब तक बिच्छू पड़ा था. पिंकी ने उसे दौड़ कर उठा लिया. इसका मतलब न ही मुझे बिच्छू ने काटा था और न ही मुझे सन्निपात हुआ था. मैं पूर्व में स्वस्थ और अब भी स्वस्थ हूं. . . ।

 

वृद्धावस्था

म्र की ढलान के साथ ही उसका शरीर कमान की तरह हो गया. अस्सी बरस की उस बुढ़िया का नाम था सुनयना. एक मात्र लाठी ही उसके शरीर का सहारा बनी हुई थी. जब से बुढ़ापे ने उसके शरीर का ग्रहण किया था. बिना लाठी के वह कहीं नहीं जाती थी. उसने घुटनों पर बल देकर छपरी में बैठ गयी. अपनी उस लाठी को दीवाल से सटा कर रख दी जो एक प्रकार से उसका एक अंग का रुप धारण कर ली थी. टूटा चश्मा नाक के ऊपर था. उसने चश्मे के भीतर धंसी कमजोर पड़ गयी आंखों में बल दिया और आंगन पर उतर आयी धूप को देखा. उसने अनुमान लगाया - ग्यारह साढ़े ग्यारह बज गये होंगे.

छपरी से लगी थी रसोई. वहां उसकी पुत्रवधू प्रियंका भोजन बनाने व्यस्त थी. मसाले की गंध उड़ रही थी. गंध इतनी जर्बदस्त थी कि सुनयना उससे ही सब्जी का स्वाद लेने लगी. बूढ़ापे की लालची प्रवृत्ति उसे छू गयी थी. वह चाह रही थी - उसे थोड़ी सब्जी मिल जाये तो वह चटखारे ले कर खा ले मगर सब्जी तो अभी अधपकी थी और फिर वह सब्जी उसे नहीं मिलेगी ऐसी भी बात नहीं थी पर सब्र नहीं था उस बुढ़िया को. अभी उसे बैठे क्षण दो क्षण हुआ था मगर उसे ऐसा लग रहा था मानों घण्टों से वह बैठी हो. अब वह सब्जी का चटखारा ले ही लेना चाहती थी. उसने कहा - बहू, भोजन तैयार हो गया हो तो मुझे परोस देती. . . . ।

- कुछ समय और लगेगा मां जी. . . . . . । बहू का जवाब था.

प्रियंका की बात से सुनयना को तो लगा कि वह बहाना बना रही है मगर सच क्या था यह वह भी जानती थी. अब उससे वहां बैठे रहना नहीं हो पा रहा था. वह लाठी उठायी. उसके सहारे अपने शरीर को उठाकर आंगन से होते हुए अपने कमरे में आ गयी. प्रियंका अपने काम में ही व्यस्त रही. जब भोजन तैयार हो गया तो प्रियंका पाकगृह से बाहर आयी. उसने देखा, छपरी में उसकी सासू मां नहीं है. वह उसके कमरे की ओर गयी. उसकी सासू मां खाट पर पड़ी थी. सुनयना ने कहा - मां जी, चलो भोजन तैयार हो चुका है .

सुनयना चुप रही. प्रियंका को लगा उसकी नींद लग गयी होगी. उसने पुनः कहा - मां जी, ऐ मां जी. . . चलो, भोजन तैयार हो चुका है.

अब बुढ़िया कसमसायी. बोली - अभी मुझे भूख नहीं है.

- अभी तो आप भोजन मांग रही थी . बहू ने प्रश्न किया.

- तब भूख थी, अब मर गयी.

बहू समझ गयी उसकी नाराजगी. उसने कहा - अभी तो साढ़े ग्यारह ही बजे हैं . और फिर सुबह नास्ता भी तो की थी. रोज तो इसी समय भोजन करती है. चलिए. . . . . ।

- तो क्या नास्ता अब तक पेट मे पड़ा रहेगा. मुझे नहीं करना है अभी भोजन. . . . . . ।

बुढ़िया उठी. लाठी पकड़ी और टेकती बाहर की ओर निकल गयी. प्रियंका पुनः अपने काम में लग गयी.

जब से सुनयना वृद्धावस्था में पहुंची थी. वह चिड़चिड़ी बन गयी थी. वह जो मांग करती तत्काल मिल गया तब तो ठीक नहीं तो पूरा घर सिर पर उठा लेती थी. लाख विनय अनुनय का उस पर कोई असर नहीं होता था. यह एक दिन की बात होती तो अलग बात थी. ऐसा तो रोज रोज होता था इसलिए बहू भी मनाते तक मनाती नहीं मानने पर वह अपने काम में लग जाती थी.

सुनयना भी कभी - कभी स्वयं कोसती. कहती - उसे मौत क्यों नहीं आती ? लेकिन खाट पकड़ते ही बवाल मचा देती. चिल्लाने लगती - मुझ पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. मेरा उपचार कराने से सब कतरा रहे हैं. सबकी चाहत यही है कि मैं मर जाऊं. . . . . । उसके मुंह में जो आता कहती चली जाती.

जब भी वह रुष्ट होती. अपने मन की भड़ास निकालने पहुंच जाती पड़ोसन दीपिका के घर. दीपिका एक ऐसी महिला थी जिसे अपने घर की कम पड़ोसियों के घर की चिंता अधिक रहती थी. उसके पास जहां पड़ोसी की बड़ी बूढ़ी सांसे अपनी बहुओं की भर्त्सना करती वहीं बहुएं सास की. दीपिका दोनों पक्षों में साझी बनती. ऐसी पचड़े में रहने की वह आदी हो चुकी थी. उसे उसके पति देवेश ने कई बार ऐसा करने से रोका मगर वह अपनी आदत से बाज नहीं आयी. चुगलखोरी की इस आदत ने उसकी कई से दोस्ती करायी तो कई से दुश्मनी. बिना झमेले में पड़े उसका भोजन नहीं पचता था.

दीपिका में एक खूबी यह थी कि वह पीड़ित को बातों का मरहम तो लगाती साथ ही कभी कभार भोजन भी परोस देती मगर वसूल भी लेती सूद समेत कभी दूध तो कभी शक्कर मांग कर. सुनयना भी कई बार उसके घर भोजन कर चुकी है और सूद समेत उतार भी चुकी है. आज भी सुनयना इसी विश्वास के साथ दीपिका के घर गयी कि दीपिका उसके दुख में सहभागी बनेगी और उसे भोजन परोस देगी. सुनयना को आयी देखकर दीपिका ने खाट डालते हुए कहा - आओ बुआ,आओ बैठो. भोजन तो हो गया होगा ?

खाट पर बैठती सुनयना ने कहा - अरी बहू, मेरी किस्मत ही कहां कि इतनी जल्दी भोजन मिल जाये. मेरी बहू प्रियंका ने समय पर भोजन न देने की कसम खा रखी है. सुनयना ने अपनी बहू की शिकायत कर दी. दीपिका को तो आग लगाने के लिए अवसर मिलना चाहिए था. उसे अवसर मिल गया था. उसने कहा - बारह बज गये, अब तक भोजन नहीं. नास्ता तो किया होगा बुआ ?

- ऊंहूक, नास्ता तो दूर अब तक चाय नहीं मिली है.

सुनयना सफेद झूठ बोल गयी. उसने सोचा था कि दीपिका उसे भोजन के लिए कहेगी. लेकिन वह कहने लगी - बुआ, आपकी बहू बड़ी मुंह चढ़ी औरत है. बूढ़ी और असक्त सास को सताते उसे जरा भी दया नहीं आती. देख लेना बुआ- इसका फल उसे उसके बहू के आने के बाद मिलेगा ही ? मैं तो कामना करती हूं ऐसी बहू किसी और को न मिले. . . . . । उसने बात पल्टी कहा -अरी बुआ, इस मंहगाई के युग का कहना ही क्या ? ऊपर से समय पर वेतन नहीं मिलता. हम पर तो पहाड़ ही टूट पड़ा है. . . . आज बीस तारीख है अब तक वेतन नहीं मिला है. व्यापारी उधारी देने से कतरा रहा है. हाथ तंग है. अमरौती से दस रुपये मांग लाये थे सो सब्जी में ही स्वाहा हो गया. मुझे तो चांवल चटनी के साथ खाना पड़ा. . . . चांवल रखा है. यदि नमक मिर्च की चटनी के साथ खाना हो तो बोलो. परोस देती हूं. . . . . ।

सुनयना कुढ़ गयी. उसके मन में तो आया कह दें - भेड़ बकरी तो नहीं , जो मिला खा लिया.

वह अभी - अभी आलू गोभी की सब्जी छोड़कर आयी थी. उसकी सुगंध अब भी उसके नाक में भरी थी. प्रियंका अगर यह कहती तो सुनयना उसके सिर चढ़ जाती. यह दीपिका थी. मुंहफट महिला. यद्यपि सुनयना चिढ़ गयी थी लेकिन उसने शांत स्वर में कहा - नहीं दीपिका, घर जाकर खा लूंगी. अभी भूख नहीं है. . . ।

- कैसी बातें करती हैं बुआ,सूर्य सीधे हो आये है और आपको भूख नहीं. स्पष्ट क्यों नहीं कहती सूखा भोजन गले के नीचे नहीं उतरेगा.

दीपिका ने व्यंग्य कसा. सुनयना तिलमिला कर रह गयी. कहना तो बहुत कुछ चाहती थी मगर कह नहीं सकी.

अभी कुछ क्षण ही सरका था कि अमित आया. वह वह प्रियंका का पुत्र था. उसने कहा - दादी, मां खाना खाने बुला रही है.

- जा अपनी मां से कहना - पहले वह पेट भर खा ले फिर बच जाए तब मुझे बुलाये.

- दादी, चना चबाओगी. . . . ?

अमित ने चने से भरी मुठ्ठी उसके सामने खोल दी. सुनयना कुढ़ गयी कि यह मेरे पोपले मुंह की हंसी उड़ा रहा है. उसके मन तो एक बार आया कि वह उसके हाथ को मार दे ताकि सारे चने धरती में बिखर जाये लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. उसने अमित को गोद में ले लिया. अमित चना चबा चबा कर खाने लगा. सुनयना ने उसके बाल पर हाथ फेरा फिर उसके कोमल गाल को छुआ. उसे उस दिन का स्मरण हो आया. . . . . . . . ।

रसगुल्ले बन रहे थे. उसके सुगंध सुनयना के नाक तक पहुंच रही थी. उसके लार टपक गयी. उसने मन ही मन रसगुल्लों के स्वाद का आनंद लिया पर उसका मन नहीं भरा.

प्रियंका ने उसे भोजन के पूर्व तीन रसगुल्ले दिये. उन्हें सुनयना ने बचा - बचा कर खाया ताकि देर तक यह कार्यक्रम चले. पर तीन रसगुल्ले चले तो कब तक ! उसने फिर प्रियंका से रसगुल्ले मांगे. प्रियंका ने कहा - मां जी, मैंने अधिक नहीं बनाये है.

फिर क्या था सुनयना कुढ़ गयी. उसके सामने दाल भात रोटी परोसी गयी. भोजन छोड़ देने की उसकी इच्छा हुई लेकिन भूख तो लगी थी उसने रोटी खायी और आकर अपने कमरे तें लेट गयी.

उसका दिमाग अब तक रसगुल्लों में अटका था. तीन रसगुल्लों से उसका मन तृप्त नहीं हो पाया था. उसने प्रियंका से पुनः रसगुल्ले मांगने चाहे लेकिन नकारात्मक शब्द सुनने की आशंका ने उसे रोक दिया.

सुनयना कामना करने लगी - प्रियंका कहीं बैठने जाये और वह रसगुल्ले चुराकर खाये . लेकिन प्रियंका अपने काम में व्यस्त थी. रसोई से निकलने का नाम नहीं ले रही थी. कुछ समय बाद वैभव आया. वह उसका पुत्र था. उसे प्रियंका ने भोजन दिया. वह भोजन कर अपने काम पर पुनः चला गया. प्रियंका गृहकार्य से निवृत होकर पड़ोसन के घर चली गयी. सुनयना जिस अवसर की तलाश में था वह सामने खड़ा था. वह शीघ्रता से खाट से जमीन पर उतर आयी. लाठी सम्हाली और अमित को ढूंढ लायी. वह इस कार्य में अमित को सहभागी बनाना चाहती थी. उसने अमित के कान में कुछ कहा जिसे अमित ने स्वीकृति दे दी.

प्रियंका को रसगुल्लों को आलमारी में रख दिया था. अमित ने इधर रसोई मे प्रवेश किया उधर सुनयना अपने कमरे में चली गयी.

अमित रसगुल्लों से भरे बर्तन को उतार ही रहा था कि प्रियंका पहुंच गयी. उसने दरवाजा खुला देखा तो रसोई की ओर लपकी. अमित ने मां को आया देखा तो भय से थर्रथर्र कांपने लगा. भयभीत अमित के हाथ से रसगुल्लों का पात्र धरती पर गिर पड़ा. प्रियंका ने अमित की शरारत को पकड़ ली. उसने अमित को पकड़ा बिना पूछताछ के उसके गाल पर कई थप्पड़ जड़ दिये.

सुनयना भीतर से भयभीत थी कि अमित यह न बता दें कि दादी के कहने पर उसने ऐसा किया. लेकिन रोते सिसकते अमित ने क्या क्या कहा किसी की समझ में नहीं आया. रोते - रोते ही अमित सो गया.

जब नींद से जागा तो अमित सब भूल चुका था. वह मित्रों के संग खेलने लगा. सुनयना ने उसे अपने पास बुलाया. उसके गाल को देखा - थप्पड़ के निशान अब तक शेष थे. अमित पर सुनयना को स्नेह हो आया. उसने साड़ी की पल्लू से एक रुपये का सिक्का निकाला. और अमित की हथेली पर रख दिया. . . . . ।

सुनयना अतीत से निकली. अमित से कहा - चलो बेटा अमित, घर चलें. . . ।

- अरी बुआ, इतनी जल्दी भी क्या है , थोड़ा समय और बैठो न ?

दीपिका ने रोका मगर सुनयना ने लाठी सम्हाली और अपने घर जाने अमित के साथ निकल गयी.

घर में प्रवेश किया तो उसकी बहू प्रियंका ने कहा - आप कहां चली गयी थी. कब से भोजन तैयार है , चलो, बैठ जाओ भोजन करने. . . . ।

सुनयना ने मुंह बिचकाकर कहा - मुझे नहीं करना है भोजन. . . . . ।

प्रियंका फटे कपड़े सीने बैठ गयी. सुनयना अपने कमरे तक आयी. भूख तो लगी थी वह वापस हो गयी. रसोई में गयी. भोजन निकाली और लगी खाने. प्रियंका मुस्करा पड़ी.

 

उसी बिंदु पर लौटते हुए

लाजवंती बैठी रही. सोचती रही - महीना पूरा हो गया है. आज मेहनताना मिल जायेगा. घड़ी की सुई घूम रही थी. घंटी बजी. लाजवंती पढ़ी - लिखी तो थी नहीं. उसने घड़ी की घंटी सुनी. गिनती की - एक . . दो. . तीन. . आठ . . । यानी आठ बज गये. घर की याद सताने लगी. बच्चों के चेहरे आंखों के सामने नाचने लगे. वह दो रुपये छोड़ आयी थी. कुल दो रुपये ही बच पाये थे. कह आयी थी बड़की से सब्जी खरीद कर रख लेना. मैं आऊंगी तब बनाऊंगी. सोचा था -जल्दी मेहनताना मिल जायेगा. मगर प्रतिमाह का यही हाल था. लाजवंती रोज छह बजे लौट जाती थी. लेट - लतीफ तब होती जब उसे मेहनताना लेना होता.

मोटी मालकिन की इस आदत से लाजवंती को चिढ़ थी पर कह नहीं पाती थी. देर से आने पर मालकिन चिल्लाती लाजवंती तब का क्रोध चेहरे पर आ जाता. कहना चाहती - महीना खत्म होता है तब मुझे भी तो मेहनताना कि लिए घंटों बिठाती हो. . . पर जीभ मुंह में लपलपाकर रह जाती. मस्तिष्क में विचार कौंधते पर शब्द रुप में प्रकट करने का साहस नहीं कर पाती.

लाजवंती के मौन का पूरा - पूरा लाभ मालकिन उठाती. जब जी में आता सुना देती. कई बार लाजवंती की इच्छा हुई - कह दें, आप मुझे ज्यादा न सुनायें. मेहनताना लेने जब देर रात तक बैठती तब सोचती - मेहनताना लेकर कह दूंगी - कल से काम पर नहीं आऊंगी. सौ - सौ के पांच नोट हाथ में आते ही उसके विचार में परिवर्तन आ जाता. वह सब कुछ भूल काम में तैनात हो जाती.

मोटी मालकिन आयी देखा - लाजवंती अब तक बैठी है. लाजवंती के बैठने का उद्देश्य वह समझ चुकी थी. आज उसे लाजवंती के मेहनताना का हिसाब भी करना था. बावजूद उसने कहा - अरी, तुम अब तक बैठी हो.

यह उसकी आदत थी. लाजवंती न चाहते हुए भी मुस्कराती. भारी - भरकम देह वाली मालकिन ने ऐसे कहा मानो उसे यह पता ही न हो कि महीना पूरा हो गया है. उसने कहा - अरी,आज तुम्हारा महीना पूरा हो गया न ?

लाजवंती ने कुछ नहीं कहा. मौन स्वीकृति पर्याप्त थी. मोटी भीतर गयी. लौटी तो उसके हाथ में सौ - सौ के पांच नोट थे. लाजवंती की ओर बढ़ाते हुए बोली - मैं तो भूल ही गयी थी. तुम नाहक परेशान होती बैठी रही. मुझसे कह दिया होता.

क्या कहती ? क्यों कहती ? वह भुक्तभोगी थी. एक - दो बार उसने मेहनताना मांगा था, तब भी उसे इंतजार करना पड़ा था.

न जाने ये उच्च वर्ग क्यों कामवाली की विवशता नहीं समझता ? क्या मिलता है किसी को व्यर्थ इंतजार करवाने में ? शायद यह उच्चता की निशानी है. . . ओछी उच्चता की. . ।

रुपये ले लाजवंती जाने हुई. मोटी ने कहा - अरी, चार जूठे बर्तन निकल आये हैं. उन्हें मल दें. फिर चली जाना. महीना भर का मेहनताना हाथ में था. कल से फिर गिनती शुरु होती मगर आज ही उसे बर्तन मलना पड़े. यानी यह काम मुफ्त खाते में जायेगा.

कोई महीना ऐसा नहीं गया होगा जब मोटी ने मेहनताना देने के बाद काम न सौंपा हो. रुपये देकर वह अहसास दिलाना चाहती है कि उसने कामवाली पर एहसान किया है. लाजवंती ने जल्दी - जल्दी काम समाप्त किया और घर की ओर भागने लगी कि मोटी ने कहा - कल थोड़ा जल्दी आ जाना. . . ।

लाजवंती ने सिर हिला दिया और घर की ओर दौड़ पड़ी. घर पहुंची तो बड़की जाग रही थी. मां को देखते ही कह उठी - मां पप्पू रोते - रोते ही सो गया है.

लाजवंती जानती थी - पप्पू भूख से रोया होगा. थकान में सोया होगा. बड़की से तो उम्मीद नहीं की जा सकती. वह खाना पकाकर पप्पू को खिला दे. अभी उसकी उमर ही क्या थी - छह वर्ष. . बच्ची ही तो है वह. . . . ।

बिजली कौंधने के साथ ही बड़की के पिता का चेहरा आंखों के सामने झूल गया - शराब पीने में उसने थोड़ी भी कोताही नहीं बरती. कितनी बार लाजवंती ने उसे शराब पीने से मना किया लेकिन पत्नी की बात नहीं माननी थी , नहीं मानी. अंतिम समय मे उसे पत्नी के निवेदन का महत्व समझ आया. तब तक बहुत समय हो चुका था. मृत्यु उसे निगलने के लिए तैयार थी. वह मृत्यु से छुटकारा नहीं पा सका.

उन दिनों लाजवंती गर्भावस्था में थी. परिवार वालों ने गर्भपात करा कर पुर्नविवाह की सलाह दी. उसने न गर्भपात कराया न ही पुर्नविवाह को स्वीकार किया. यहीं से पारिवारिक तनाव शुरु हुआ और उसने पेट के बच्चे के साथ बड़की को लेकर अलग घर बसा लिया, जहां उसने पप्पू को जन्म दिया.

बच्चे की सूरत - शक्ल पिता पर गयी थी. लाजवंती को संतोष था कि पति ही पुत्र के रुप में अवतरित हुआ है .

वह विचारों से मुक्त हुई और कपड़े बदले बिना रसोई में जुट गई. बड़की ने भी सहयोग दिया. भोजन तैयार कर सोये हुए पुत्र को जगाने लगी. भूख और रोने से बच्चा पस्त हो चुका था. मां ने कहा - उठ पप्पू बेटा, खाना तैयार हो चुका है. खाना खा ले .

उसने आज निश्चय किया - चाहे कुछ भी हो जाये, वह मजदूरी करेगी. बर्तन मलने नहीं जायेगी. भवन बनाने का काम कर लेगी, सड़क बनाने का काम कर लेगी.

उस रात उसे ढंग से नींद नहीं आयी. सुबह उठते ही बच्चों के लिए निवाला तैयार करने लगी. निवाला बनाकर वह चौक में जाकर खड़ी हो गई. शाम को लौटी तो उसे संतोष था. यद्यपि हाथ में फफोले पड़ गये थे मगर उसे आज का काम पसंद था. एक तो समय पर लौट आयी थी. ऊपर से मेहनताना भी दुगुना मिला था.

पूरे आठ दिन बीत गये. लाजवंती, मोटी के घर काम पर नहीं गयी थी. परेशान मोटी लाजवंती के घर की ओर दौड़ी. लाजवंती घर पर ही थी. उसे देख समझ गई कि यह क्यों आयी है ? मोटी ने कहा - लाजवंती तुम काम पर क्यों नहीं आ रही हो ? कहीं तुम्हारी तबीयत तो खराब नहीं ?

- मेरी तबीयत भला क्यों खराब होगी. . ? लाजवंती ने कहा.

पप्पू वहीं जमीन पर लेटा था. उसकी नाक - मुंह से बह रही त्रिवेणी को देखकर मोटी का मन घृणा से भर गया पर घृणा करने से उसका काम बिगड़ सकता था. उसने पप्पू को उठाया और महंगी साड़ी के आंचल से बच्चे की गंदगी को पोंछते हुए बोली - बच्चे को साफ - सफाई से रखना चाहिए. . . ।

मोटी के मन में स्वार्थीपन था पर लाजवंती का मन भर आया,मोटी के कर्म को देखकर. उसके विचार में परिवर्तन आया और वह पुनः शोषित होने मोटी के घर काम पर जाने लगी. . . . . ।

 

बहू का व्यवहार

हलीज पर कदम धरते ही गोमती ने कुलेन्द्र की मां मालती से कहा - बुआ, आप कुलेन्द्र का विवाह कर ही डालो । समय खराब चल रहा है पता नहीं कब उसकी कदम भटक जाये ?

मालती चांवल साफ कर रही थी । उसके हाथ से गोमती ने सूपे ले लिया । सूपे पर हाथ चलाती बोली - इस उम्र में आंखें गढ़ाकर काम करो यह मुझे पसंद नहीं ।

मालती ने गोमती पर स्नेह की द्य्ष्टि डाली । कहा - सच कहूं बहू, मैं तुम्हारी ही तरह बहू चाहती हूं । ऐसी बहू जो आते ही चौंका सम्हाल ले । मुझे आभास न होने दे कि मैं सास हूं । वह मुझे मां ही माने, सिर्फ मां । कहते - कहते मालती की आंखों में चमक आ गई ।

गोमती ने कहा - बुआ, मैं एक ऐसी ही बहू दिलाऊंगी . . . . ।

मालती जानती थी । गोमती यही कहेगी । गोमती ने आगे कहा - मगर एक समस्या है ?

- समस्या . . . कैसी समस्या ?

- वे लोग दहेज नहीं दे सकते । वैसे मैं जिस लड़की की बात कर रही हूं । उसका नाम कुमुदनी है ।गृह कार्य में दक्ष, रुप रंग में सुन्दर, ग्यारहवीं तक पढ़ी है । पढ़ - लिखकर भी आधुनिकता से परहेज करती है । अभी तीज में गई थी तो कुमुदनी के पिता रामेश्वर से मैंने कुलेन्द्र के विषय में चर्चा चलायी ।वे कुमुदनी का विवाह कुलेन्द्र से करने तैयार है ।

- बहू,एक बात तुम भी गांठ मे बांध लो । हमें दहेज नहीं, सुन्दर, सुशील, गृहकार्य में निपुण बहू चाहिए । कुमुदनी के बारे में मैं आज ही कुलेन्द्र के पिता से बात करुंगी . . . . ।

संध्या को कुलेन्द्र के पिता अवध आये। खाने पीने से निपटने में रात हो गई थी । मालती ने जल्दी - जल्दी चौका का काम निपटाया ।अवध के पास आयी ।उसने खाट पर बैठते हुए कहा - सो गये क्या ?

- नहीं तो, आज बहुत जल्दी काम निपटा आयी, क्या विचार है . . . ? कहते हुए अवध उठ बैठे ।अपना हाथ मालती की ओर बढ़ाया ।उसके हाथों ने मालती के गाल का स्पर्श किया । एक बार मालती शर्म से लाल हो गयी ।अवध का हाथ आगे बढ़ता इसके पूर्व उसे परे ढकेलते हुए कहा - दो शब्द प्रेम के बोल क्या बोले । तैयार हो जाते हो अपने में समेटने । कभी अपनी उम्र का भी ख्याल किया करो ।

अवध के होठों पर मुस्कान तैर आयी । कहा - अच्छा, तुम क्या कहना चाहती हो, कहो ।

- बहू गोमती आयी थी ।बता रही थी, उसके मायका में एक लड़की है - कुमुदनी । उसके माता - पिता कुलेन्द्र के साथ कुमुदनी को भंवरा देने तैयार है ।

- अच्छा, तो बात यह है । मैं और कुलेन्द्र कल ही चले जाते हैं कुमुदनी के घर ।

दूसरे ही दिन अवध कुलेन्द्र के साथ कुमुदनी को देखने चले गये ।उन्होंने लड़की देखी । लड़का - लड़की भी एक - दूसरे को पसंद कर लिए ।फलदान के साथ विवाह का मुहूर्त भी निकाल लिया गया ।

नियत दिन से विवाह कार्यक्रम प्रारंभ हुए और कुमुदनी ससुराल चली गयी ।

नयी - नवेली बहू सबकी चहेती होती है ।जैसे - जैसे पुरानी होती जाती है उसकी आदतें व व्यवहार सामने आता जाता है । फिर वह किसी की चहेती बन जाती है तो किसी का दुश्मन, मगर कुमुदनी को ससुराल आये दो वर्ष बीत गये मगर उसने अपने आदत व्यवहार से किसी को नाराज होने का अवसर ही नहीं दिया ।इसी बीच कुलेन्द्र की नौकरी भी लग गई । उसकी नियुक्ति लिपिक के पद पर हुई थी । शहर में उसे नौकरी करनी पड़ती थी और शहर गांव से पचास किलोमीटर की दूरी पर स्थित था । प्रतिदिन आना - जाना संभव नहीं था । अतः वहीं किराया का मकान लेकर रहता था । वह आठ पन्द्रह दिनों में गांव आया करता था ।

ग्यारह बजे उसे आफिस जाना होता और लौटने का समय निश्चित नहीं था । वह कुमुदनी को अपने साथ शहर ले आना चाहता था । उसने अपनी बात कुमुदनी के समक्ष रखी । कुमुदनी ने कहा - आप कैसी बातें करते हैं, मां की तबीयत अक्सर खराब रहती है । बाबूजी कुछ कर नहीं सकते । अगर मैं यहां नहीं रहूंगी तो इनको समय पर कौन खाना देगा ।

- और मुझे वहां तकलीफ उठाना पड़ता है उसका क्या ?

- हम अभी तकलीफ झेल सकते हैं, मगर ये तो बूढ़े हो चुके हैं । अपना शरीर भी इनसे सम्हाला नहीं जाता ।

कुमुदनी ने बात टालने की कोशिश की मगर कुलेन्द्र नहीं माना और आखिरकार कुमुदनी को कुलेन्द्र के साथ शहर जाना ही पड़ा ।

पूरे तीन वर्ष बीत गये मगर न कुलेन्द्र स्वयं गांव गया और न ही कुमुदनी को गांव जाने दिया । जब कुलेन्द्र का पुत्र हुआ तो उसने मां बाबूजी को पत्र अवश्य लिखा था कि आपका नाती आया है । आप लोग अपने नाती को देखने आओ । पत्र के जवाब में उसके बाबूजी का पत्र आया था कि इन दिनों मालती की तबीयत खराब चल रही है । तुम लोग यहां आ जाओ ।

कुलेन्द्र ने बाबूजी का पत्र आया इसकी जानकारी भी उसने अपनी पत्नी कुमुदनी को नहीं दिया ।कुछ दिनों तक पत्र व्यवहार चलता रहा उसके बाद अवध का तो पत्र आता मगर कुलेन्द्र पत्र देना बंद कर दिया । जब कुमुदनी पूछती तो कह देता - उसने पत्र भेजा है । पुत्र के पत्र आना बंद होने के कारण अवध और मालती समझने लगे कि यह सब कुमुदनी के कारण हो रहा है मगर सच्चाई और कुछ थी ।

काफी दिन निकलने के बाद भी कुलेन्द्र ने जब गांव जाने का नाम नहीं लिया तो कुमुदनी एक दिन जिद्द पर अड़ गयी । बोली - मैं तुमसे जब भी गांव जाने कहती हूं , तुम बहाना बना देते हो । तुम यहीं रहो । मैं मुन्ना को लेकर कुछ दिनों के लिए गांव जाऊंगी । इधर अवध पत्र लिख - लिखकर बहू बेटे को बुला बुलाकर थक गया था । जब एक दिन फिर मालती ने कहा तो अवध भड़क उठा - तुम बहू - बहू की रट लगायी रहती हो और तुम्हारी बहू के कारण पुत्र ने गांव आना तो क्या पत्र लिखना भी छोड़ दिया । यह सब उसी का सिखाया धराया है वरना हमारा कुलेन्द्र ऐसा कहां था ।अब तुम अपने दिमाग से बेटा बहू का नाम निकाल दो और यदि नहीं निकलता तो कल गाड़ी में बिठा देता हूं, तुम वहीं चली जाओ । जब लताड़ पड़ेगी तब बुद्धि ठिकाने आयेगी । आजकल की बहुंए परिवार को जोड़ती नहीं, तोड़ती हैं ।

कुमुदनी की जिद्द के सामने कुलेन्द्र को झुकना ही पड़ा । वे गांव आये । बातों ही बातों में सच्चाई खुली कि सारी गलती पुत्र की है न की बहू की तो अवध का सीना गर्व से तन गया । उसके मन में कुमुदनी के प्रति जो दुर्भावना जगी थी वह खत्म हो गई । वह मन ही मन बड़बड़ा उठा - कुछ बहुएं ऐसी भी होती है जो घर को जोड़ती है ।परिवार में सामंजस्य स्थापित करती है ।

मालती जो दिन रात खाट में पड़ी रहती वह उठकर कुमुदनी के साथ काम में हाथ बंटाने का प्रयास करने लगी । कुमुदनी ने साफ शब्दों में मना करते हुए कहा - अब आपका आराम करने का दिन है ।

कुमुदनी के ही कहने पर कुलेन्द्र ने अपना तबादला गांव के ही पास शहर में करवा लिया और अब वह गांव से ही आना जाना कर नौकरी करने लगा ।

 

चरण

ता नहीं चरण को क्या हो गया था कि सुबह से ही सिर पर हाथ देकर आंगन में बैठ जाता. मास्टरनी चिल्लाई - झुंझलाई पर चरण पर कोई असर नहीं पड़ा. मास्टर , मास्टरनी पर बिफरा. मास्टरनी चुप होने के बजाय और चिल्लाने लगी -न मालूम किस जनम का बदला ले रहा यह निकम्मा. अरे, तुम मुझ पर क्यों नाराज होते हो. अगर भड़कना ही है तो भड़को अपने सिर चढ़ाये नौकर पर तब जानूंगी सचमुच तुम सत्य के लिए लड़ते हो. इसे हुआ ही क्या है ? ठीक तो दिखता है .

- तुम चुप होती हो कि नहीं, बुढ़ापा आ गया है बेचारे का. शरीर थक गया होगा. . . ।

- हां. . हां. . . , तुम तो ब्रम्हृा लगते हो. ऐसी बात कर रहे हो मानो सब समझ गये. आ गया होगा बुढ़ापा बेचारे का. . . . ।

जब बातचीत जोर पकड़ने लगती तब मास्टर की आठ वर्षीय बिटिया चरण के हाथ को पकड़कर बाहर ले जाती. वह अबोध बालिका क्या - क्या सोचती रही होगी, अपनी मां के बारे में. जरुर बुरा ही सोचती होगी. उस बालिका की आत्मा में आशंका सिपचती होगी - चरण को मार न दे. . . ?

आज भी मास्टरनी चिल्लाती रही. मास्टर हताश हो टहलने निकल गया. चरण को लेकर मुनियां बाहर चली गई. पाकगृह में प्रवेश करते ही मास्टरनी का क्रोध दुगुना हो गया. वह भभक उठी - चरण ने लकड़ी नहीं काटी है. किसे जलाकर खाना बनाऊंगी. ठीक है, मास्टरजी उसके पक्ष में बोलते हैं. पता लग जायेगा जब खाना नहीं मिलेगा. . . ।

मास्टरनी की सारी आशाएं व्यर्थ गयी. मास्टर आ कर तैयार होकर स्कूल चला गया. मास्टरनी उल्टी गंगा बहती देखकर भीतर ही भीतर जलकर राख हो गयी. वह स्वयं से कुड़ गयी. लकड़ी धम्म से आंगन में पटक काटने लग गयी. पर परेशानी के सिवा कुछ हासिल नहीं कर सकी.

ठक् - ठक् की आवाज सुनकर चरण भीतर आया. मास्टरनी लकड़ी काटती वैसी ही झुकी रही. उसने यह दिखाने का प्रयास किया कि उसे चरण के आने की कोई खबर ही नहीं. चरण उसी पैर वापस हो गया. तब मास्टरनी लकड़ी काटना छोड़कर जाते हुए चरण को देखती रही. चरण धीरे - धीरे कमान की तरह शरीर लिए निकल गया था.

वापस आया तो चरण के हाथ में फटी लकड़ियां थीं. उन्हें मास्टरनी से कुछ दूर जमीन पर रख दिया. मास्टरनी पसीना पोंछती रह गयी. हंफरने लग गयी पर लकड़ी कटी नहीं थी. चरण बाहर निकल कर दरवाजे के बाजू में बने चौरे पर जाकर बैठ गया सिर पर हाथ देकर.

दोपहर खाना खाने की छुट्टी हुई. दो बज गये थे. मुनिया आकर उससे लिपट गयी. चरण चिंता मग्न था. मुनिया के अचानक आकर लिपटने से एक बार उसका अशक्त शरीर ने अपना संयम तोड़ दिया. वह सम्हलते - सम्हलते सम्हल पाया. उसने मुनियां को अपनी गोद में ले लिया.

मास्टर आकर चरण के पास कुछ पल ठहर गया. फिर घर के अंदर प्रवेश किया. मास्टरनी का क्रोध शांत हो चुका था. मास्टर ने आवाज दी - खाना - खुराक देना है कि नहीं श्रीमती जी. . . ?

पाकगृह से निकलती हुई मास्टरनी ने कहा - क्यों नहीं. . । अरे, मुनियां कहां है,वह नहीं आयी ?

-बाहर है. . । मास्टर ने कहा.

- बाहर. . . ! किसके साथ है ?

- तुम जाकर देख सकती हो.

मास्टरनी ने बाहर आकर देखा - चरण उकड़ू बैठा था. मुनियां उसकी गोद में बैठी उसकी दाढ़ी को छूकर कह रही थी - बाबा. . . बाबा, ये बाल क्यों उगते हैं ?तुम रोज - रोज नहीं काटते. पापा तो रोज सुबह काटते हैं ?

चरण धीरे - धीरे कहने लगा - मुझे कहां जाना होता है बिटिया कि रोज - रोज दाढ़ी बनाऊं. ये क्यों उगते है. . यह तो आदिमकाल से बढ़ती आ रही है. इसे समूल नष्ट करना असंभव है. अगर बाल नहीं उगेंगे. नाखून नहीं बढ़ेंगे तो पशुता ही खत्म हो जायेगी. यही तो प्रमाण है कि आज भी पशुता जीवित है. . . ।

- मुन्नी. . . । मास्टरनी ने धीरे से आवाज दी. चरण की गोद पर पड़े ही पड़े मुनिया ने मम्मी की ओर देखा. मास्टरनी चरण के समीप आकर बोली - क्यों चरण, कसम खा ली है क्या,यहां से नहीं उठने की. भीतर जाने का विचार नहीं है क्या ?

- नहीं मास्टरनी बाई, मैं क्यों कसम खाने लगा. जहां उमर बीत गई वहां जाने के लिए . चल मुनियां बेटी.

चरण की गोद से मुनिया उठ खड़ी हुई. चरण धरती को थेम कर उठा. धीरे - धीरे पग बढ़ाकर घर में प्रवेश किया. छपरी में पहुंच कर मास्टर से थोड़ी दूर में बैठ गया. मास्टरनी मास्टर को पाकगृह से खाना लाकर दिया. उसने देखा - चरण अपने भोजन करने के स्थान पर न बैठकर दूर बैठा है. उसने कहा - क्यों चरण, वहां क्यों बैठा है. भोजन नहीं करना है क्या ? क्या सोचता रहता है दिन भर. हू. . . चल इधर आ. . . ।

चरण अपने भोजन करने के स्थान पर जा बैठा. उसके सामने मास्टरनी ने भोजन की थाली और लोटा भर पानी ला कर रखा. चरण ने लोटा उठाया और गटागट पानी पी गया फिर भोजन करना शुरु किया.

कुछ दिनों से मास्टरनी परखती आ रही थी - चरण के हर कार्य को. वह धीरे - धीरे खाने लगा था. वह भी एक ही परोसा खा कर उठ जाता था. पहले तो यूं खाना खाता कि समय ही नहीं लगता था वह भी दो - तीन बार ले - लेकर. मास्टरनी चरण को परखने की खूब कोशिश करती. वह जानना चाहती थी कि चरण को आखिर हुआ क्या है. क्यों खाना टूट गया है. क्यों स्मरण शक्ति क्षीण होती जा रही है. मगर उसकी जिज्ञासा पूरी नहीं हो पा रही थी. वह चाह कर भी चरण से कुछ नहीं पूछ पाती थी.

मास्टरनी को इतना समझ तो आ गया था कि उम्र ढलने के साथ चरण का शरीर शिकस्त हो चुका है. पर वह अक्सर तब चीखने - चिल्लाने लगती जबकि उसका काम अधूरा रह जाता. उस पर एक काम का बोझ और आ जाता. . . . ।

संध्या हो चुकी थी. गायें वापस आ रही थी. गायों के गले में बंधी घंटियां टन् - टन् बज रही थी. चरण आंगन में बैठा था. मास्टर छपरी में बैठा अखबार पढ़ रहा था. मुनियां पुस्तक के पन्ने उलट - पलट कर चित्र देख रही थी. मास्टरनी ने कोठे को झांककर देखा -वहां जानवरों के लिए घास नहीं डली थी. फिर क्या था वह तमतमा गई . वह चरण पर बिफर पड़ी - चरण तुम दिनोंदिन क्यों लापरवाह बनते जा रहे हो. अगर जानवर भूखे मरेंगे तो पाप हमें लगेगा, तुम्हें क्या है. अगर तुमसे कोई काम नहीं हो पाता तो हमसे क्यों नहीं कह देते. हम कर लेते. . . . ।

चरण निर्विकार बैठा रहा. मास्टरनी, मास्टर पर सवार हो गई - और तुम जो हो यह सब होते हुए चुप्पी साधे देखते रहते हो. मैं कल मायका चली जाती हूं. रोज - रोज के झंझट में मैं पड़ना नहीं चाहती. तुम सम्हालना अपना घर और नौकर.

मास्टर चरण के पास आया. कहा - क्यों चरण, आखिर बात क्या है. काम क्यों नहीं करते. रोज सुबह शाम ये विवाद क्यों. . . ।

- मुझे लगता है मास्टरजी मेरी मति फिरती जा रही है.

- तुम्हारी मति नहीं फिर रही है. एक दिन इस झंझट में मेरी मति जरुर फिर जायेगी. मुझे तो लगता है - अब तुम मुफ्त की रोटियां तोड़ना चाहते हो. . . ।

चरण ने कभी सोचा भी नहीं था कि मास्टर उसके लिए कभी ऐसे शब्द का भी प्रयोग कर सकता है. मुनियां को लगा - विवाद बढ़ने को आमादा है. वह चरण के पास आ उसे उठाने लगा कि मास्टर ने मुनिया को अपनी ओर खींचा. कहा - खबरदार, आज के बाद चरण के पास गया तो. . . चरण चलो उठो और अब यहां से चलता करो. बर्दाश्त की भी हद होती. तुमने तो सारी सीमाएं ही लांघ दिया है. . . ।

चरण को कुछ समझ नहीं आ रहा था. मास्टर ने आगे कहना जारी रखा - तुम उठते हो कि उठाकर बाहर फेंकू. . . . ।

चरण सकपका गया. पर उसने हिम्मत नहीं हारी अशक्त शरीर को उठाने का प्रयास करते हुए सशक्त जुबान से कहा - नहीं मास्टर, नहीं. मुझे उठाकर फेंकने की जरुरत नहीं. मेरा नाम चरण है और मेरे चरण में इतनी शक्ति है कि वह चल सकती है. . . ।

- खूब बोलने लगे हो चरण. . . ।

- समय है मास्टर. . . समय आदमी को गूंगा और वाचाल बना देता है. . . . ।

मास्टर का क्रोध फनफना गया. उसने चरण को एक लात मार दी . चरण उठ रहा था मगर लात पड़ते ही वह लड़खड़ाकर फिर से गिर गया. चरण की आंखें छलछला आयी. उसकी आंखें तो तब भी नम नहीं हुई थी जब उसका इकलौता पुत्र देश की सेवा में शहीद हो गया था. चरण ने कहा - अब मुझे सब समझ आ गया मास्टर लोग आम खाने से मतलब रखते हैं और गुठलियां फेंक देते हैं.

इतना कह चरण उठा और चलता बना.

मुनियां पलंग पर गिरकर सुबकने लगी.

रात होने लगी. चरण लौटा नहीं. मास्टर पलंग पर करवटें बदलने लगा. नींद आंखों से दूर चली गयी थी. उसे चरण के शब्द बार - बार सुनाई दे रहे थे - समय के सब साथी. . सबसे बड़ा वक्त है. लोगों को आम के रस से मतलब होता है, गुठलियों से नहीं. . . . . ।

सचमुच में चरण पथ प्रदर्शक का काम बखूबी करता था. उसके ही अनुभव ने मुझे आज हर चीज दी. एक मात्र पुत्र था उसका. वह देश को न्यौछार हो गया. तब भी चरण ने रोया नहीं. कहता फिरता रहा - यदि मेरा दस पुत्र होते तो देश की सेवा में लगा देता. . . । चरण ने मुझे अपना पुत्र के समान ही माना. . . पर मैंने क्या किया उसके साथ ? अभद्रता, अव्यवहार. . . नहीं ,नहीं मुझे ऐसा नहीं करना था. . . . ।

इसी उधेड़ बुन में मास्टर की आंख लग गयी.

सुबह हो चुकी थी. चरण रात भर नहीं लौटा. मास्टर के मन में आशंका सिपचने लगी - अब चरण गांव के लोगों को लेकर आयेगा. मेरे विरुद्ध पंचायत जुड़ेगी. लोग मुझे भला बुरा कहेंगे. मेरे व्यवहार पर थूकेंगे. . .

समय सरकता जा रहा था मास्टर का मन विचलित होते जा रहा था. दस बजने को जा रहा था पर मास्टर अब तक स्नान नहीं किया था. उसकी पत्नी ने कहा - क्यों जी, आज नहीं नहाना है क्या ? स्कूल नहीं जाना है क्या ? ठंड अधिक लग रही है क्या ?

सचमुच आज ठंड कुछ अधिक ही थी. पूस महीना जो ठहरा. कुछ क्षण मास्टर दुसाले में दुबका पड़ा रहा फिर अचानक उठा और दरवाजे की ओर बढ़ा. मास्टरनी ने कहा - कहां जा रहे हो. . . . ?

- मैं चरण को देखने जा रहा हूं. वह रात भर नहीं आया. पता नहीं कहां होगा. किस हाल में होगा. . . ।

-मगर. . . ।

- मगर वगर कुछ नहीं. . . . ।

और चरण अपने घर से निकल गया. जैसे ही उसने बाहर कदम रखा कि देखा - चरण को उठाये कुछ लोग खड़े हैं. मास्टर दौड़कर उन लोगों के पास गया. वे लोग चरण को लेकर भीतर आये. मास्टर ने उन लोगों से पूछा - क्या हुआ चरण को. . . ।

वे लोग चरण को नीचे लिटा दिए. एक ने कहा -मास्टर जी, यह मुनियां - मुनियां कह रहा था. हमने आवाज सुनकर इसके पास गये. इसका शरीर ठंड से कांप रहा था. कुछ ही देर बाद इसके मुंह से आवाज निकलना बंद हो गया और शरीर की हरकत भी रुक गयी. लगता है - कल रात की ठंड यह सह नहीं सका. . . ।

मास्टर सन्न रह गया. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें क्या न करे. . . उसे आत्मग्लानि हो रही थी कि उसे ऐसा नहीं करना था पर समय सरक चुका था और चरण का मृत देह उसकी आंगन में पड़ा था. मास्टर की आंखें भर आयी. वह चरण के मृतदेह से लिपटकर कहना चाहता था - कितनी ठंड लगी होगी चरण तुम्हें, इतनी ठंड तो नहीं लगी होगी न जितनी तेरे जाने के बाद से मुझे लगने लगी है. तेरी आत्मा तो नहीं कांपी होगी न ! देख, मेरी आत्मा कल से कांप रही है. . . . क्या तू कभी लौटकर नहीं आयेगा. . . क्या मेरा चरण सदैव के लिए मुझसे बिछड़ गया. . . ?

पर मास्टर कुछ नहीं कह सका. मास्टरनी अहिल्यारुपी शिलाखंड बन गयी. मुनियां दूर खड़ी सुबकती रही. . . सुबकती रही. . . ।

 

अपनत्व

-कश खींचकर धुआं उड़ाओ. खो-खो करो . मेरी नींद खराब हो,यह मुझे जरा भी पसंद नहीं. बु ढ़ऊ,मेरी सलाह मान धुआं उड़ाना छोड़ शान्ति से सोओ और मुझे भी चैन की नींद सोने दो।

रामदीन का माथा चकरा गया फूट भर का छोकरा,उसके द्वारा ऐसी हिदायत ? उसने सोचा भी नहीं था-सड़क का यह नटखट,सिर चढ़कर बोलेगा. तिलमिला कर उसने कहा-धुआं उड़ा रहा हूं तो अपनी कमाई का. तुम पर दया मरा इसका मतलब यह नहीं कि तुम मुझे समझाओ ?

-बुढ़ऊ,मैं तुम्हारे हित की बात कर रहा हूं. धुंआ तुम्हारे जीने के दिनों में बढ़ोतरी नहीं कटौती ही करेगी.

-मेरे जीवन से तुम्हें क्या ? एक दिन जिऊं या एक हजार साल?

-तुम्हारे जीने मरने से मुझे क्या ? पर मेरा तो ख्याल करो . धुआं और खांसी-खोखली मेरी नींद खराब कर रही है.

-चुपचाप आंख बंद कर सो जा नहीं तो धक्का मार कर बाहर कर दूंगा.

-तुमसे और क्या उम्मीद की जा सकती है. मैंने पहले ही मना किया-बुढ़ऊ,मुझे अपने साथ मत ले चलो,परेशानी में पड़ोगे पर बन गये थे न मेरे हितैषी. अब अपने कर्मों का सुनो भाषण ।

रामदीन को लगा वास्तव में उससे भूल हुई. इस शैतान को तो फूटपाथ में ही मरने देना था. कड़ाके की सर्दी जब शरीर में घुसती तब नानी याद आ जाती. चपर-चपर चल रहा मुंह नहीं चलता . ठण्ड से शरीर ठिठूरता और दांत किटकिटाता.

रामदीन ने एक कश खींच कर फिर धुआं फूंका. बालक ने नाक भौं सिकोड़ा. कहा-तुम पर मेरी बात का जरा भी असर नहीं हुई.

-तुम सो क्यों नहीं जाते ?

-तुम सोने दोगे तब न ? धुएं से आंख जल रही है और खांसी से नींद उड़ रही है.

रामदीन जितना अपने आपको समझा रहा था. बालक उसे उतना ही गुस्सा करने उकसा रहा था. उसने कहा-तू चुपचाप सो जा नहीं तो तुम्हें धक्का देकर घर से निकाल दूंगा या फिर मैं खुद निकल जाऊंगा.

बालक को हंसी आ गयी. उसको हंसते देख रामदीन का क्रोध फनफना गया. वह गुस्से से बालक की ओर देखने लगा. बालक की हंसी थमी नहीं . वह लगातार हांसे जा रहा था. उसकी लगातार हंसी से रामदीन झेंप सा गया. उसने पूछा- क्यों रे, मैंने ऐसा क्या कह दिया कि बत्तीसा दिखाने लगा.

बालक ने हंसते हुए कहा-बुढ़ऊं,तुम मुझे बाहर निकालने की धमकी दे रहे हो. मैं तो बाहर निकलूंगा नहीं . रही बात तुम्हारी,तो शौक से बाहर का दरवाजा खोले देता हूं. . . ।

रामदीन तैश में आ गया-दरवाजा तुम्हें खोलने की जरुरत नहीं , मैं चला जाता हूं । रामदीन दरवाजे की ओर बढ़ने लगा. बालक ने कहा-सड़क में रात काटने का मन है तो जाओ काटो,मुझे परवाह नहीं पर याद रखो बाहर की ठण्ड तुम्हें बर्फ के समान जमा देगी. अब तुम्हारे शरीर में वह क्षमता नहीं कि बाहर का ठण्ड सह सको. संभव है -कल तुम्हारा शरीर अकड़े पड़े मिले और मुझे तुम्हारे अन्तिम संस्कार की व्यवस्था करनी पड़े ।

रामदीन का पैर रुक गया. बाहर पड़ रही सर्दी का अंदाजा वह बंद कमरे में ही लगा लिया था. गर्म कपड़ा पहनने के बाद भी उसे ठण्ड सा लग रहा था. रामदीन वापस अपनी जगह पर आ गया. बालक ने कहा -क्यों बुढ़ऊं,साहस जवाब दे गया?देगा भी क्यों नहीं . कभी आकाश तले जीना सीखे ही नहीं हो .

रामदीन चुप रहा. वह चाह रहा था-बालक मुंह बंद करे. चुपचाप सो जाएं. बालक चाह रहा था -बुढ़ऊं कश खींचना बंद करे धुंआ उड़ना बंद हो और उसकी खांसी-खोखली रुक जाएं ताकि वह शान्ति की नींद सो सके. स्थिति विपरीत थी. न रामदीन चोंगा छोड़ पा रहा था नहीं बालक अपना मुह बंद कर पा रहा था.

रामदीन ने विचार भी नहीं किया था कि जिस बालक को सड़क से उठाकर ले जा रहा है,वह उसका सिरदर्द बन जाएगा. उसे अकेला सड़क पर भटकते देखा. उसे दया आ गयी. वह दयावान बन गया. रामदीन उसे रात भर अपने घर में पनह देने की नियत से ले आया था उसे क्या पता था कि जिसे वह उठाकर ले जा रहा है वह ताना देदेकर उसकी शान्ति में खलल पैदा कर देगा. उसकी स्वतंत्रता पर पाबंद लगायेंगा. उसके जीवन में ऐसा एक भी अवसर नहीं आया था कि उसके कार्यप्रणाली पर अवरोध हो. मगर यह बालक तो न सिर्फ अवरोध पैदा कर रहा था अपितु चोंगा पीने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रहा था.

रामदीन वापस अपने चारपाई में आ चुका था. उसने बालक की ओर देखा,कहा- क्यों रे,तुम्हें खूब हंसी आ रही है ?

-हंसी आयेगी भी क्यों नहीं ? कभी खुले आकाश तले सपने में भी जीवन जीये हो?सड़क की जिन्दगी कभी जिए होते तो गुमान कर सकते थे पर सदैव चारदीवारी का जीवनयापन कर कड़कती ठण्ड में सड़क की जिन्दगी जीने की बात करोगे तो हंसी नहीं आयेंगी तो और क्या आयेगी ?

-हां-हां,मैं तुम्हें खूब समझ गया,तुम्हें सड़क पर ही मरने देना था.

-तुम गलत हो. जिस सड़क पर मेरी अवस्था बढ़ी. वहां मृत्यु कैसे ! बुढ़ऊ मैं तो बचपने से अब तक सड़क पर ही जीवन जीया है. ठण्ड,गर्मी,बरसात सबमें.

-ठीक है ठीक है,सुबह मेरी आंख खुलने से पहले अपना मुंह लेकर चला जाना.

-बुढ़ऊं,यदि मेरी बात बुरी लगी हो तो क्षमा चाहता हूं मगर तुम्हें चोंगा बंद करवाकर मैं तुम्हारा ही हित करना चाहता हूं । बालक उठ खड़ा हुआ. वह दरवाजे की ओर बढ़ने लगा. रामदीन ने कहा-तुम कहां चले !

-जहां मेरा जीवन है वहां जा रहा हूं ।

-अब चपर करेगा तो एक थप्पड़ लगाऊंगा. मैने तुम्हें सुबह नौ दो ग्यारह होने कहा है, न कि अभी. अब तुम कहते हो न कि मैं चोंगा बंद कर दूं तो लो मैं बंद कर दिया. रात भर इसे हाथ भी लगाया तो चोंगा की कसम ?

रामदीन की भावना वह बालक पढ़ गया. रामदीन ने चोंगा पीना बंद कर दिया और बालक ने बोलना. बालक यह अच्छी तरह समझ चुका था कि रामदीन अभी तो सुबह से ही भाग जाने कह रहा है मगर सुबह कुछ और कहेगा. वह अब सचमुच सो जाना चाहता था. रात गहरा चुकी थी. बाहर ठण्ड बढ़ती जा रही थी. वह अनुभव कर रहा था-बाहर कितनी ठण्ड पड़ रही होगी उसे. हालांकि रामदीन ने चोंगा पीना बंद कर दिया था पर उसकी नीयत बार बार चोंगे की ओर जा रही थी. पर वह चोंगा सिपचा नहीं पा रहा था. दोनों की आंखें कब लगी दोनों समझ नहीं पाएं.

सुबह आंख खुलते ही रामदीन का ध्यान जिधर बालक सोया था उधर ही गया. उसने देखा- बालक बिस्तर से गोल है. रामदीन हड़बड़ा गया. रामदीन की नजर दरवाजे की ओर दौड़ी. दरवाजा खुला था. रामदीन दरवाजे के पास आया. बाहर देखा बालक नजर नहीं आया. रामदीन का मन बेचैन हो गया. उसकी आंखें इधर-उधर दौड़ने लगी. बालक दूर -दूर तक दिखाई नहीं दिया. वह अपने को धिक्कारने लगा कि उसने रात में बालक से क्यों कहा कि वह सुबह चले जाएं . अचानक उसने देखा -बालक सामने से चला आ रहा है. रामदीन अपने को रोक नहीं पाया. वह बालक की ओर लपका . पूछा- कहां चला गया था .

-इतनी बेचैनी क्यों ? मैं कहीं जाऊं.

-अच्छा. . . . ।

- और नहीं तो क्या?मगर तुम्हें बताऐ बिना जाना मैंने उचित नहीं समझा इसलिए वापिस आ गया.

-तो मुझे बताने ही आए हो .

-हां,मैं बताने ही आया हूं. . . . ।

बालक जाने उद्धत हुआ. रामदीन ने कहा-ऐ बालक. . . । बालक रुक गया. रामदीन ने कहा-कहां जाएगा !

बालक की हंसी छूट गयी. रामदीन को कुछ समझ नहीं आया. पूछा-हंसने का मतलब. . . . ?

-हंसूंगा नहीं तो और क्या करुंगा. . तुम्हारा प्रश्न ही हंसी के लायक है.

-हंसी के लायक. . . ?

-और नहीं तो क्या?सूर्य उगने से पहले नहीं सोचता कि उसके किरणें कहां कहां बिखरेंगे. हवा चलने से पहले नहीं सोचता कि उसकी गति कहां पर जाकर ठहरेगी. बारिस होने से पहले नहीं सोचती कि उसका बहाव कहां तक रहेगी. मैं तो ठहरा एक आदमी उन्हीं का बनाया हुआ. जहां दिन ढलेगा वहीं रहा जाऊंगा. . . . ।

रामदीन का माथा चकरा गया. इस सड़क छाप छोकरा का इतना उच्च विचार?उसकी मासूमियत पर रामदीन को प्यार आने लगा. उसने कहा-ऐसा नहीं हो सकता कि हम आज भर और एक साथ रहे. . . . ?

- ऐसा नहीं हो सकता.

-क्यों. . . . ?

-तुम चोंगा छोड़ नहीं सकते . तुम्हारी खांसी-खोखली रुक नहीं सकती. मैं नींद में खलल बर्दाश्त नहीं कर सकता.

-ऐसा करते है-तुम बड़बड़ाओ और मैं चोंगा सिपचाता रहूं. हम वाद -विवाद करते एक साथ रहे.

-यह संभव नहीं । बालक आगे बढ़ने हुआ.

रामदीन ने कहा-अच्छा,तो मैं यह चोंगा ही फेंक देता हूं. . . . . ।

बालक ठहर गया. उसने रामदीन की ओर देखकर जोरदार हंसा. कहा-बुढ़ऊ,तुमसे मेरा क्या रिश्ता. . तुम भला उस चोंगे को क्यों फेंकने लगे जो तुम्हारे एकांत का साथी रहा.

रामदीन ,बालक के पास आया. उसके गाल में प्यार की चपत लगा कर कहा-बहुत बोलता है रे. . . . । और उसने चोंगा को पटक दिया. . . . . . ।

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