गुरुवार, 16 जनवरी 2014

गोवर्धन यादव का आलेख - ऋषि परंपरा के प्रतीक-पुरुष डॉ. श्री रामनिवास “मानव”

ऋषि परंपरा के प्रतीक-पुरुष

डा.श्री रामनिवास मानव

गोवर्धन यादव

समय के इस निर्दयस्त दौर में बाजारवाद ने आदमी के संवेदना जगत को क्षत-विक्षत करते हुए उसे एक खण्डहर के रुप में तब्दील कर दिया है. खुदगर्जी, फ़रेब, दिखावा और महज औपचारिकताएँ ही अब उसकी पहचान बनती जा रही है. अपने लाभ-लोभ, व्यक्तिगत स्वार्थ,संबंधों के सिमटते दायरे में वह कैद होकर रह गया है. उसके शास्वत मूल्यों की जमीन लगातार छॊटी होती जा रही है. रुप-रस-तथा गंध के संवेदनों, भाव-जगत के मूलवर्ती अहसासों और क्रिया-कलापों से वह लगातार अजनबी बनता जा रहा है. बात यहाँ आकर रुकती नहीं है. पैसा कमाने की अंधी दौड़ में आदमी के परिवार की दीवारों में दरारें पड़ने लगी है. आज पैसा ही भगवान बन चुका है. आज आदमी के पास सब कुछ है,लेकिन समय की कमी है. इन विचित्रताओं ने अब बच्चॊं को घेरना शुरु कर दिया है. बच्चॊं का बचपन कैद होकर रह गया है. एक प्यारा सा बचपन, भोला सा बचपन जो हमारा- आप सब का वर्तमान है और हमारा भविष्य भी. समय के इस तेढे-मेढ़े और भयावह दौर में डा.रामनिवास मानव की साहित्य-जगत में उपस्थिति इस बात का अहसास कराती है कि अभी कुछ बिगड़ा नहीं है. आपकी रचनाएं काफ़ी कम और सरलतम शब्दों में, ओढ़े हुए अभिजात्य से काफ़ी अलग, अपने पास-पडौस के परिवेश और एक तरह से तमाम जाने-बूझे-भोगे का अहसास कराने वाली कविताओं का अनूठा संसार है, जिन्हें पढ़कर बच्चों को नया आकाश मिलता है.

किसी भी कविता को अच्छी कविता बनाने वाला तत्व, उसका जीवन होता है. सहजता-सरलता-तरलता और निश्छल भावुकता को अपने में समेटती आपकी कविताएँ, शब्दों के माध्यम से हमारे सामने आती है. निःसंदेह आपका यह श्लाघनीय प्रयास है. पाब्लो नेरुदा ने एक जगह कहा है-“कविता में दरवाजे होना जरुरी है, ऎसे रास्ते, जिनमे से होकर निकला जा सके”.निश्चित ही आपकी रचनाएँ पाठकों को इस बात का अहसास दिलाती है.

हार्वडफ़ास्ट ने कहा है-“ ऎसे और अखण्ड समय में, एक और अविछिन्न काल प्रवाह में एक प्राणी रहता है,जिसका नाम मनुष्य है( इसे”मानव” भी कह सकते हैं), जो सर्वहारा मूर्तक्षमा,पृथ्वी का पुत्र है, तेज पुंज, दृढव्रती, धीमान, सत्याश्रमी, अक्रोधी, अशेष, धैर्यवान, जो सब जानता है, समझता है, सब सहता है और सीमा का अतिक्रमण होने पर फ़ट भी पड़ता है”. उपरोक्त तमाम गुणॊं का समुच्चय हम डा. “मानव” में पाते है. जहाँ तक फ़ट पड़ने की बात है, हमने किसी ने भी उन्हें गुस्से में आविष्टित होते नहीं देखा है.

डा. मानवजी से मेरा परिचय ज्यादा पुराना नहीं है और न ही उसे नया ही कहा जा सकता है.. संभवतः आपसे मेरी पहली मुलाकात “बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केंद्र, भोपाल में हुई थी. तब से लेकर अब तक उनसे मेरी मुलाकातें होती रही है. बाल साहित्य शोध केंद्र में भीलवाडा(राज) से डा. भैंरुलाल गर्गजी, खटीमा से डा राज सक्सेना”राज: अहमदाबाद से डा.हुन्दराज बलवाणीजी, संगरिया(राज) से भाई गोविन्द शर्मा तथा अन्य बालसाहित्यकारों से भेंट हुई थी. हमारे पास समय की कोई कमी नहीं थी, सो हम भारत-भवन देखने चल पडॆ. रास्ते में मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन अवस्थित है. मैंने उन सब का परिचय, डा.सुनीता खत्रीजी से करवाया जो हिन्दी भवन से प्रकाशित होने वाली द्वैमासिक पत्रिका “अक्षरा” की सम्पादिका है. आप सभी ने इस पत्रिका की आजीवन सदस्यता ग्रहण की. यह मेरे लिए प्रसन्नता का विषय था. जैसा कि आप सभी जानते ही है कि डा.मानव कुशल कवि,लेखक, शिक्षाविद, सफ़ल शोध-निर्देशक,निष्पक्ष पत्रकार, समाजसेवी तथा कुशल आयोजक-संयोजक के रुप में प्रतिष्ठित है एम.ए.(हिन्दी) पी-एच. डी. और डीलिट तक आप शिक्षित हैं. आपकी.विभिन्न विधाओं में चालीस महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं जिनमे चौदह काव्यकृतियां, सात बालकाव्य-संग्रह, चार लघुकथाओं के संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. इनके अलावा चार शोध-प्रबन्ध और नौ सम्पादित ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं सबसे प्रमुख कार्य तो यह भी हुआ है कि देश-विदेश की अड़सठ प्रमुख बोलियों में आपकी रचनाओं का अनुवाद हो चुका है. पाठ्यक्रम में भी आप सादर समादृत किए गए हैं. आपने हरियाणवी भाषा पर दो ग्रंथ लिखे हैं. आपने इसके अलावा बहुत कुछ किया है. सबसे खास और सबसे अहम बात तो यह कि आपने ऋषि दधिचि की परंपरा को आगे बढाकर, अपने मरनधर्मा शरीर का अवसान हो जाने के बाद दान कर दिया है, ताकि आने वाली पीढी शरीर विज्ञान में शोधादि कर सकें. आदमी अपनी अन्तिम सांस तक धन संग्रह करने का लोभ छोड़ नहीं पाता,लेकिन इस निर्मोही-अनासक्त ऋषि ने उसका भी दान कर देने की अग्रिम वसीयत लिख दी है. उस राशि का उपयोग साहित्य और समाजसेवा में हो सकेगा. यह जानकर मुझे इस बात का सहज ही अंदाजा हो जाता है कि श्रीमद्भगवत्गीता के उपदेशों का आप पर गहरा प्रभाव है. इन तमाम खूबियों और उपलब्धि के बावजूद आपको घमण्ड नाम की चीज छू नहीं पायी है. आपकी सहजता और सरलता देखते ही बन पडती है. किसी ने कहा है इस संसार में सब कुछ होना बड़ा आसान है, लेकिन सरल और सहज होना उतना ही कठिन होता है. सारे मित्र डा.मानव के इन गुणॊं से भली-भांति परिचित है. बालसाहित्यकार एवं व्यंग्य-शिल्पी भाई गोविन्द शर्माजी ने फ़ेसबुक पर खबर प्रसारित की कि डा. मानव के सुपुत्र श्री मनुमुक्त” मानव” ने भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में सफ़लता प्राप्त कर ली है. इस खबर को पाकर प्रसन्न होना स्वभाविक ही था. मैंने तत्काल फ़ोन पर आपको बधाइयाँ –शुभकामनाएँ दीं. डा. शिवनाथ रायजी के पत्र ने इस बात का उल्लेख किया है कि आपकी होनहार बेटी डा.अनुकृति भी बी.सी.यूनिवर्सिटी, बोस्टन(अमेरिका) में अर्थशास्त्र की प्राध्यापक है. निश्चय ही डा, मानव को इन तमाम तरह की गौरवमयी उपलब्धियाँ प्राप्य है, हमें भी इस बात का गर्व है कि हम आपके साथ है और आपके मित्र भी है. हमें आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास कि आप लगातार साहित्यकोष में श्रीवृद्धि करते रहेंगे.

अंत में मैं परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि

“ पश्येम शरदः शतम / जीवेम शरदः शतम श्रृणुयाम शरदः शतम / प्र ब्रवाम शरदः शतम अदीनाः स्याम शरदः शतम/ मूयश्च शरदः शतात (यजुर्वेद अ.36/24)

“आप देखें सौ वसन्त, जिएं सौ वसन्त, सुने सौ वसन्त,

मुखरित रहें सौ वसन्त, स्व निर्भर बने रहें सौ वसन्त

और ऎसा ही जिएं शत्तोतर जीवन भी”

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