सोमवार, 27 जनवरी 2014

पुस्तक समीक्षा - प्रिये...!

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पुस्‍तक समीक्षा

पुस्‍तक ः प्रिये․․․․․․․!

कवि ः मनोज कुमार पाठक

प्रकाशक ः प्रभा प्रकाशनी, जोन-5, होल्‍ंडिग-5

बिरसानगर, जमशेदपुर-04

कीमत ः 50 रूपए

मनोज कुमार पाठक जीवन से जुड़े कवि हैं․ उनकी कविताएं जीवन के राग-विराग की कविताएं है और समकालीन कविता की शब्‍दावली पर उपयुक्‍त बैठती है․ इन कविताओं में खास यह है कि उससे गुजर कर आप वो नहीं रहते जो कि पहले थे․ ये कविताएं पाठक के अंतर्मन को झिंझोड़ती है और आपसे विशेष संलग्‍नता और सहयात्रा की मांग करती है․

कवि मनोज कुमार पाठक ने बहुत वेदना के साथ इस पुस्‍तक की रचना की है इसलिए इसमें साहित्‍य का भी रस है․ एक बानगी देखिए,

कोई परीकथा

या कोई गाथा

मेरा जी नहीं भरता

कौन भरता है जी,, जानते हो

तुम्‍हारा बिन देखे भी, देख लेना

परम श्रद्धेय गुरूवर डा․ बच्‍चन पाठक ‘सलिल' जी का कवि को सानिध्‍य मिला हुआ है, आपने इस कृति का हिन्‍दी संसार में स्‍वागत करते हुए कामना की है कि ‘‘यदि कवि के लेखन में सातत्‍य बना रहा, वह अध्‍ययन और मनन के साथ रचनाधर्मिता निभाता रहा तो उसका भविष्‍य निश्‍चित रूप से प्रशंसनीय होगा․ कवि को डा․ सलिल जी ने उगता हुआ सूरज कहा है जिसमें उन्‍होंने अपरिमित संभावनाएं देखीं है․

प्रिये․․․․․! के माध्‍यम से मनोज कुमार पाठक एक ऐसे कवि के रूप में उभरकर आते है जिसका भाववोध आपने समकालीनों से इतर और अनोखा है जिसके माध्‍यम से वे पाठकों के समक्ष उस संसार की पुर्नरचना करते है जो बजारू होते जीवन में बचपन की मासूमियत की तरह कहीं बहुत पीछे छूट गयी है․ जब कवि कहता है,

मुझे उस पार ले चल प्रिये

जहां जल रहे निरंतर दिये

बजारू बनते जीवन की त्रासदी को कवि इन शब्‍दों में व्‍यक्‍त करता है,

विषाक्‍त हो गया है जग सारा

कुछ नहीं गर्व करने को

वह दिन पास है जब लोग

उत्‍सुक होंगे मरने को

कवि ने पुस्‍तक के निवेदन में लिखा है कि संग्रह की कविताएं 2003 से 2012 के बीच लिखी गयी चंचल मन और स्‍फूर्त ह्‌दय के उद्‌गार है जो कागज पर उतर आए है․

यद्यपि कवि ने छन्‍दस्‍वच्‍छंद कविता कही है फिर भी जहां भी उद्‌गार किसी भी नियमित गति के अनुकूल चलता है वहां छंद आ ही जाता है․ गति ही छंद का प्रमाण है और गति कविता के लिए भी अनिवार्य है․ व्‍याकरण के नियमों की अवहेलना या उसका त्‍याग जहां पर भी गति के लिए किया जाय वहां हमें छंद की सत्‍ता माननी पड़ेगी․ कवि मनोज ने वस्‍तुओं, वास्‍तविकताओं और अनुभूतियों के कल्‍पनागत रूपों का चित्रण करते हुए अपनी कविताओं के माध्‍यम से ऐसा चित्र प्रस्‍तुत किया है जो पाठकों की कल्‍पना और यथार्थ दोनों को संतुष्‍ट करता है․

गणमान्‍य समालोचक चर्नीशेव्‍स्‍की ने ठीक कहा है कि सत्‍य बुद्धि की उपज नहीं है वह जीवन की वास्‍तविकता की देन है․ वास्‍तविकता का कल्‍पना से अधिक महत्‍वपूर्ण स्‍थान है․ वास्‍तविकता ही कल्‍पना को प्रेरित करती है और शक्‍ति देती है․ कवि मनोज की कविताओं में गूंथी कल्‍पना वास्‍तविकता से ही प्रेरित है और उसे शक्‍ति प्रदान करती है․

पाठकों की कल्‍पना और यथार्थ दोनों को संतुष्‍ट करता ये कविता संग्रह प्रिये․․․․! पाठकों को इन कविताओं से गुजरना प्रिय लेगेगा․

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा

गिरिडीह-815301

झारखंड़

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