सोमवार, 20 जनवरी 2014

शुभम अग्रवाल की लघुकथाएँ

खुशी

10 साल में पहली बार आज उसके चेहरे पर खुशी थी। क्‍योंकिे उसके दादा ने उसे साईकिल लाकर दी थी। वह रोज खिड़की से बच्‍चों को साईकल चलाते देख मन ही मन खुश होता था। लेकिन यह खुशी आज उसके चेहरे पर थी।

दर्द

बापू की पेंशन के लिए वह आज उसे कंधे पर बैठाकर बैंक लेकर जा रहा था। यह देख उसके पड़ोसियों ने उसकी बहुत तारीफ की। लेकिन बैंक में नजारा कुछ और ही था। बापू से पेंशन के पैसे लेकर उसे 10रूपए का नोट थमाकर यह कहकर आफिस के लिए रवाना हो गया कि रिक्‍शा से घर चले जाना।

1 blogger-facebook:

  1. आज का पुत्र दिल यहीं तक ही सीमित है.पर यह सच है.

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