बुधवार, 15 जनवरी 2014

स्वास्थ्य सेवाओं में भ्रष्टाचार और बाज़ारीकरण

रचनाकार के पाठकों के लिए प्रस्तुत है, साहित्य से इतर परंतु एक बेहद जरूरी और दिलचस्प आलेख.

भगवान न करे आप कभी बीमार पड़ें, और यदि बीमार पड़ें भी तो भगवान न करे, किसी ऐसे वैसे डॉक्टर या अस्पताल के चक्कर में न पड़ जाएं. नहीं तो तबीयत उल्टी बिगड़ने के पूरे आसार तो होंगे ही, आपकी जेब से अच्छा खासा रोकड़ा भी निकल जाएगा.

डॉ. सुनील दीपक ने इस संबंध में एक बेहद दिलचस्प और विस्तृत आलेख लिखा है. उन्होंने लिखा है कि भारत में किस तरह से डॉक्टर और दवाई निर्माता कंपनियाँ मिलकर मरीजों को बेवकूफ बनाते हैं और न केवल अनावश्यक दवाईयाँ देते हैं, अनावश्यक जांच और ऑपरेशन तक करते हैं. 

एक स्थान पर वे कहते हैं -

 

"...इलाज करवाने वाले मित्र व परिवारजन जब अपने मेडिकल के कागज़ पत्र दिखा कर सलाह माँगते हैं तो कई बार बहुत हैरानी होती है कि कितने बेज़रूरत टेस्ट कराये जाते हैं, बेतुकी दवाएँ दी जाती हैं और अनावश्यक आपरेशन किये जाते हैं. स्टीरायड जैसी दवाएँ जिनसे तबियत बेहतर लगती है लेकिन शरीर के अन्दर लम्बा असर बुरा होता है, कितनी आसानी और लापरवाही से दे दी जाती हैं.


एक मित्र ने बताया कि उसकी बेटी को कुछ दिनों से बुखार था और उसका प्रिस्कृपशन दिखाया, जिसे पढ़ कर मैं दंग रह गया कि डाक्टर ने मलेरिया व टाइफाइड की दवा के साथ एक अन्य एन्टीबायटिक भी जोड़ दिया था, यानि हमें मालूम नहीं कि मरीज को क्या बीमारी है तो उसे एक साथ हर तरह की दवा दे दो!


एक डाक्टर मित्र जो पाँच सितारा अस्पताल में काम करते थे, उसने बताया कि उनके यहाँ हर एक को महीने का कोटा पूरा करना होता है, कितने लेबोरेटरी टेस्ट, कितने स्केन, कितने अल्ट्रासाउँड, तो कुछ अनावश्यक टेस्ट करवाने ही पड़ते हैं. पर वह यह भी बोले कि बात केवल कोटे की नहीं, अगर बहुत से टेस्ट व दवाएँ न हों तो लोग मानते नहीं कि डाक्टर अच्छे हैं."

डॉ. सुनील दीपक का पूरा आलेख पढ़ने के लिये उनके ब्लॉग पर यहाँ जाएं - http://jonakehsake.blogspot.in/2014/01/blog-post.html

प्रसंगवश बताता चलूं कि, मप्र (भारत के अन्य राज्यों में भी यह संभव है) में चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में पिछले वर्षों में हुए घोटालों और भ्रष्ट तरीके से प्रवेश के मामलों का खुलासा हुआ है जिसमें मेडिकल कॉलेजों में बहुत से छात्रों ने भारी भरकम घूस की राशि - 25-30 लाख रुपए एमबीबीएस के लिए तथा 75 लाख रुपए तक पीजी सीटों के लिए घूस देकर एडमीशन हासिल किए. साथ ही प्रवेश लेने के बाद मेडिकल व डेंटल कक्षाओं की परीक्षाओं में पैसे देकर पास हुए. ऐसे फर्जी और मुन्नाभाई किस्म के डॉक्टर मरीजों को हर प्रकार से - इलाज के नाम पर दर्जन भर दवाईयाँ, जांच और अनावश्यक ऑपरेशन आदि के जरिए - लूटने के अलावा भला और क्या कर सकते हैं?

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------