शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - नेताजी! आई लव यू

व्यंग्य

नेताजी! आई लव यू

रामवृक्ष सिंह

जब हमारे प्यार करने की वैधता थी, यानी प्यार की उपयुक्त उम्र में वैलेण्टाइन डे प्रचलन में नहीं आया था। और जब मुआ आया, तब तक हम फिफ्टी प्लस हो चले। हमारे साथ हर बार यही होता है। जब हमारा दौर निकल जाता है, तब अच्छी-अच्छी चीज़ें सामने आती हैं। दिल की दिल में रह गई, क्या-क्या जवानी सह गई। अब वैलेण्टाइन डे आया है तो सोचते हैं कि किसी से तो प्यार का इजहार करें। पहले हमने पत्नी पर ट्राई मारी, तो वह बिदक गईं- ‘पचास के हो चले, लेकिन छिछोरापन नहीं गया। ज़रा जवान लड़कों का तो खयाल करो।‘ मन में आया कि कह दें कि लड़कों का खयाल हम क्या करें, उनका खयाल तो लड़कियाँ कर ही रही होंगी। हम तो तुम्हारा खयाल कर सकते हैं और तुम हो कि किसी तौर खयाल करने नहीं देतीं। शादी के लगभग सत्ताईस-अट्ठाईस साल हो चले। प्यार और प्यार के उपमान सब मैले हो चले और सभी प्रतीकों के देवता कूच कर चले। लेकिन दिल की उमंग बरकरार है और वह बार-बार गा उठता है- पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही।

बहुत मनुहार की, किन्तु पत्नी ने घास नहीं डाली तो अपना दिल नेताजी की ओर चल पडा और इलू-इलू करने लगा। नेताजी सदाबहार हैं। उनके यहाँ प्यार, भ्रष्टाचार, अनाचार, दुराचार आदि-आदि पुरबहार हैं। सत्तासीन होने से पहले वे चाहे जैसे भी दिखें, लेकिन एक बार सत्ता पर काबिज होते ही उनके शरीर के ठूँठ भी हरिया उठते हैं। ऊपर से नीचे तक जवानी ठाठें मारने लगती है। वैसे भी पचास-पचपन की उम्र में तो नोताजी को लोग घास डालना शुरू करते हैं। सच कहें तो लोकतंत्र में एक ही प्रजाति प्यार के काबिल है, और वह है नेताजी। पत्नी, पुत्र, माता-पिता सबके प्रेम का सोता एक दिन सूख जाता है, किन्तु नेतागिरी एक ऐसा पेशा है जिसके प्रेम की धारा अविरल-अविरत निर्बाध गति से बहती रहती है। बल्कि हर पाँच साल बाद उसका नवीकरण होता रहता है। और यदि मौका लग गया तो पाँच साल में दो-तीन बार भी हो सकता है।

पाँच साल या उससे कम अवधि में आने वाले मौसम से अपना आशय है चुनाव के मौसम से है। सच कहें तो लोकतंत्र में चुनाव का मौसम प्यार का मौसम होता है। चारों ओर नेताजी लोग अपने अहैतुक प्रेम का बखान कर-करके मतदाताओं से प्रेम की भीख माँग रहे होते हैं- दे दे प्यार दे, प्यार दे, प्यार दे रे...। कोई-कोई नेता लोग प्रेम के पुजारी ही बन जाते हैं-प्रेम के पुजारी हैं हम, प्रेम के पुजा..री। उन्हें मतदाता के प्रेम मात्र की इच्छा है। आप तो बस उनको दिल खोलकर प्रेम दीजिए। उनके नाम पर अपने प्रेम का ठप्पा लगा आइए। बाकी का काम वे खुद कर लेंगे। आपके प्रेम की डोर पकड़कर वे सत्ता पर काबिज हो जाएँगे। तमाम तरह के कामों में करोड़ों-अरबों रुपये का वारा न्यारा कर लेंगे। खूब ढेरों घोटाले कर लेंगे। ऐतराज करने और रास्ते का रोड़ा बननेवाले भले लोगों का कत्ल करा देंगे। अपहरण और बलात्कार करवा डालेंगे। भू-माफिया के साथ मिलकर शहर-गाँव की अच्छी-अच्छी संपत्तियाँ औने-पौने दाम अपने नाम करा लेंगे। यानी वे अपने दम सब कुछ कर लेंगे, बस आप तो उन्हें प्रेम दीजिए। उन्हें आपसे और कुछ भी नहीं चाहिए। ओ.. हाउ स्वीट ऑफ यू.. नेताजी!

कहते हैं युद्ध और प्यार में सब कुछ जायज है। और इधर कुछ सिरफिरे भाई-बाबा टाइप के लोग ऐसे निकल आए हैं जो खुद प्यार को ही नाजायज करार देने पर तुले हुए हैं। अब कोई उनसे पूछे कि भइए, प्यार कैसे नाजायज हो सकता है? प्यार तो खुदा है- लव इज गॉड। तो क्या गॉड नाजायज है? भगवान के बेटे, सुन्दर-असुन्दर, अमीर-ग़रीब सबसे प्यार करनेवाले ईसा मसीह ने कहा- अपने पड़ोसी से प्यार करो- लव दाइ नेबर। हमने अपने पड़ोसी और पड़ोसिनों से मन ही मन बहुत प्यार किया। सच कहें तो हमने पूरी दुनिया से प्यार किया। लेकिन सबने हमारे प्यार को शक की निगाह से देखा। हमने जब-जब उनको प्यार देना चाहा, वे हमसे दूर भागते रहे, जैसे हमारा प्यार कोई प्यार नहीं, खुजली का पाउडर हो। पता नहीं, किस पागल ने कहा है कि लव बिगेट्स लव। प्यार देने से प्यार मिलता है! कर्टसी बिगेट्स कर्टसी! इन्सानों के मामले में तो हमें कभी ऐसा नहीं प्रतीत हुआ। अलबत्ता कुत्तों, गायों, और यहाँ तक कि गधों को भी प्यार करो तो वे बदले में प्यार जैसा ही कुछ लौटाते हैं। किन्तु इन्सान को प्यार करो तो अकसर वह शक की निगाह से देखता है और प्रायः धोखा दे जाता है। आप वफ़ा करें तो उधर से ज़फा मिलती है- हमने ज़फा न सीखी, उनको वफ़ा न आई। पत्थर से दिल लगाया, सीने पे चोट खाई। बड़ी अज़ीब शै है प्यार! इसीलिए कबीर साहब ने छह सौ साल पहले कहा- अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही ना जाय। गूँगे केरी सर्करा, खावै औ मुसकाय।

लोकतंत्र में नेताजी जैसा कुछ नहीं। वे सबसे बड़े वाले, पहुँचे हुए पीर और फकीर है। वे ही लोकतंत्र का आदि और अंत हैं। उन्हीं से लोकतंत्र शुरू होता है और उन्हीं में जाकर समा जाता है। वे लोकतंत्र के परंब्रह्म हैं। वे संसद में सबकी आँख में मिर्च झोंकें तो उसे आँख का अंजन और प्यार का मंजन समझ कर स्वीकार कर लीजिए- प्यार का मंजन घिसे रे पिया। उनके इस कारनामे में भी एक गहरा राज है। वे चाहते हैं कि सब लोकतंत्र-वासी निर्मल-चक्षु होकर उनके प्यार की पावनता को देख-समझ सकें। इसलिए उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से यह काम किया है। उनका संदेश स्पष्ट है। सब लोग एक-दूसरे की आँख में मिर्च झोंकें और अपने-अपने प्राप्तव्य को हर कीमत पर प्राप्त करें। आखिर प्यार में जब कुछ जायज है। यदि प्यार के अतिरेक में जंग छिड़ जाए तो उसमें भी सब कुछ जायज है।

कुल मिलाकर नेताजी बड़े प्यारे जीव हैं। उनसे प्यार किए बिना रहा भी तो नहीं जाता। वैलेण्टाइन डे आ गया। किसी और से प्यार की बात करना निरापद नहीं रहा। इस चक्कर में अन्दर भी भेजे जा सकते हैं। लेकिन नेताजी से प्यार करना बिलकुल निरापद है। इसलिए इस परम पुनीत प्रेम-प्रकटन दिवस पर हम नेताजी पर ही अपना सारा प्यार न्यौछावर करना चाहते हैं- नेताजी, आइ लव यू!

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2 blogger-facebook:

  1. श्री रामवृक्ष जी, बेहतरीन सम-सामयिक व्यंग्य के लिए बधाई..प्रमोद यादव

    उत्तर देंहटाएं
  2. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव2:44 pm

    सचमुच तमाम शंका कुशंकाओं में राम ब्रिछ जी ने
    नेताजी को प्यार करने के लिए ढूँढ ही लिया इस
    सुंदर व्यंग के लिये बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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