शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

वीरेन्द्र सरल का व्यंग्य - मुर्गे का प्रेम चौदस

व्‍यंग्‍य

मुर्गे का प्रेम चौदस

वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

दिन भर दाना चुगने के बाद शाम को मुर्गा जब दड़बे में आया तो दड़बे का दृश्‍य देख उसका दिमाग घूम गया। उसकी प्‍यारी मुर्गी एक कोने को कोप भवन बनाकर कैकई की तरह क्रोधित मुद्रा में बैठी थी। मुर्गा उसके नजदीक जाकर उसे प्‍यार से सहलाते हुये पूछा-क्‍या बात है प्राण प्‍यारी? मगर मुर्गी ने हाथ झटकते हुये कहा-‘डोन्‍ट टच मी ,आई हेट यू ।‘ मुर्गे को कुछ समझ में नहीं आया उसने फिर कोशिश की पर मुर्गी ने दोबारा हाथ झटक दिया । अब मुर्गा परेशान होकर रूआंसी स्‍वर में बोला-आखिर बात क्‍या है? कुछ बताओगी भी या यूं ही नखरे करती रहोगी। मुर्गी फुंफकारते हये बोली- किस जमाने रहते हो तुम? आज दुनिया इक्‍सवी सदी में पहुँच गई है और तुम वही आदम युग में जीं रहे हो । तुम्‍हें तो पुरातत्‍व विभाग में जमा कर देना चाहिये अब तुम संग्रहालय के चीज ही रह गये हो। सामने त्‍यौहार है और तुम्हें कुछ पता नहीं है। मुर्गा बोला -अच्‍छा! तो ये बात है , अरे अभी तो रंगों का त्‍यौहार होली के आने में माह भर का समय है। तुम अभी से क्‍यों परेशान हो रही हो। मैं हूँ ना। अब तो मुर्गी का गुस्‍सा खतरे के निशान के ऊपर चला गया। वह पैर पटकती हुई बोली-लगता है तुझसे मुझे तलाक लेना पड़ेगा। मुर्गा घबरा कर बोला-ऐसा न कहो प्राण प्रिये! अपनी बात स्‍पष्‍ट करने की कृपा करो तो मुझे कुछ समझ में आये। मुर्गी बोली -प्रेम पर्व वेलेन्‍टादन-डे आ गया, अभी तक ना कोई शापिंग की है और ना ही कुछ जरूरी तैयारी। चलो आज मार्केट जाकर शापिंग करते हैं । शापिंग करने के लिये मार्केट जायेंगे , वहाँ से फैशनेबल गिफ्‍ट खरीद कर लायेंगे। एक दूसरे को गिफ्‍ट थमायेंगे और फिर शानदार वेलेन्‍टाइन-डे मनायेंगे।

मुर्गे की आँखें सिकुड़ गई वह सोचने लगा , इसके ऊपर भी अंधी आधुनिकता का भूत सवार हो गया है। उसने मुर्गी को समझाते हुये कहा-अरी! पागल हो गई है। ऊलूल-जूलूल बातें कर रही है। हमें ये त्‍यौहार मनाने की क्‍या जरूरत है। हमारा प्‍यार देख कर तो लोग कहते हैं कि ‘ऐसा प्‍यार कहाँ? तुम्‍हें पिछले साल की घटना याद नहीं है। पड़ोस वाली लड़की का बाजू वाले किरायेदार से प्रेम चल रहा था। दोनों एक दूसरे को कितना चाहते थे पर पता नहीं किस बात पर दोनों में खट-पट हो गई। लड़की की शादी बस दूसरे लड़के से होने ही वाली थी तो मौका देखकर उस प्रेमी लड़के ने उस लड़की के चेहरे पर तेजाब से हमला कर दिया था। ये तो उसकी किस्‍मत अच्‍छी थी जो बाल-बाल बच गई। और लड़के को जेल की हवा खानी पड़ी थी अखबारों में पढ़ती नहीं हो क्‍या जो एक साल पहले प्रेम का इजहार कर रहें थे वही जरा सी बात में गुस्‍से में आकर जान लेवा हमला भी कर दिया। क्‍या यही प्‍यार है? दैहिक आकर्षण को प्रेम का नाम देकर प्रेम को बदनाम मत करो। प्रेम दिखावे की चीज नहीं है । यह एक सुखद अहसास है,प्रेम पूजा है इबादत है अरदास है। क्‍या तुमने कभी सुना है कि राधा-कृष्‍ण ,लैला-मजनूं ,हीर-रांझा ने कभी यह त्‍यौहार मनाया था। पर उनके अमर-प्रेम की गाथा को लोग आज भी याद करते हैं। तुम इस लफड़े में मत पड़ो ये सब बाजार की करतूत है। बाजार ने प्रेम को भी ब्‍यापार बना दिया है । आखिर ये बात तुम्‍हें कब समझ आयेगी?

मुर्गे की समझाइश का मुर्गी पर कुछ भी असर नहीं हुआ। वह अपनी जिद पर अड़ी रही । मजबूर होकर मुर्गे को बाजार जाने के लिये तैयार होना ही पड़ा। दोनों तैयारी कर ही रहे थे तभी अपने आप को एकदम सजा-संवार कर मालिक का लड़का दड़बे के पास आया और मुर्गा -मुर्गी का टांग पकड़ कर दड़बे से बाहर खींचने लगा। मुर्गी समझ रही थी कि लड़का उन्‍हें शापिंग कराने के लिये ले जा रहा है पर मुर्गे के कान में खतरे की घंटी बजने लगी थी। उसने फिर मुर्गी को सावधान करने की कोशिश की पर मुर्गी के जिद के आगे उसकी एक न चली। लड़का उन्‍हें खींचकर बाहर निकाल लाया और उनकी टांगे रस्‍सी से बांधकर मोटर साइकिल से लटकाया और आगे बढ़ गया। लटकने के कारण दर्द तो मुर्गी को भी हो रहा था पर वह मुस्‍कुरा रही थी। वह सोच रही थी कि शायद लड़का उन्‍हें शापिंग कराने के लिये ले जा रहा है पर किसी अनहोनी की आशंका से मुर्गे का दिल धक-धक कर रहा था।

बहुत दूर तक सफर करने के बाद एक सुनसान जगह पर उस लड़के की मुलाकात एक खूबसूरत लड़की से हुई । आपस में मिलकर दोनों मुस्‍कुराने लगे। लड़की की नजर मुर्गे और मुर्गी पर थी। उन दोनों ने आपस में कुछ बातें की और ठहाका मार कर हंस पड़े। लड़का बोला- मैंने कल तुमसे वादा किया था न कि मैं तुम्‍हारी मुटठी में सारी दुनिया दे दूंगा। लड़की भी तपाक से बोली और मैंने आपसे वादा किया था कि मैं सारी दुनिया आपके कदमों में रख दूंगी। इसे सुनकर मुर्गा के होश उड़ गये। वह सोचने लगा-अरे! बाप रे, ये तो बहुत खतरनाक लोग हैं। लगता है दोनों जहान इनकी मुटठी में है। जिसे ये अदला-बदली करना चाहते हैं। यदि ये अपने मकसद में कामयाब हो गये तो दुनिया के बाकी लोग कहां रहेंगे। मुर्गा उन दोनों को बड़ी कौतूहल से देखने लगा। मुर्गी मंद-मंद मुस्‍कुराकर मुर्गे को चिढ़ा रही थी। जैसे कह रही हो , देखा इसे कहते हैं प्‍यार।

उस लड़के और लड़की में बहुत समय तक ऐसे ही प्‍यार मोहब्‍बत की बातें होती रही। अन्‍त में लड़के ने अपने जेब से एक मोबाइल का नया हेंडसेट निकाल कर लड़की को देते हुये कहा- लो कर लो दुनिया मुटठी में। लड़की ने भी अपने बड़े से बैग से ग्‍लोब निकालकर लड़के के कदमों पर रखकर बोली और ये लीजिये मैंने सारी दुनिया आपके कदमों में रख दी है। फिर दोनों बहुत समय तक ठहाका मार कर हंसते रहे। उनकी ऐसी दिल्‍लगी से मुर्गा भी हंसे बिना नहीं रह सका। अब लड़के ने घड़ी देखी और लड़की से कहा-अब चलें? लड़की ने सहमति में सिर हिलाया फिर दोनों बाइक पर सवार होकर आगे बढ़ गये।

दोनों एक होटलनुमा स्‍थान पर पहुंचे। लड़के ने मुर्गे और मुर्गी को रसोइया को सौंपते हुये कहा- ये लो काका! स्‍वादिष्‍ट बनना चाहिये। तैयार हो जाये तो खबर करना। हम बाहर बैठकर इंतजार कर रहे हैं। अब मुर्गी को समझते देर नहीं लगी । वह समझ गई थी कि हम जाल में फंस चुके हैं और हमें स्‍वर्ग भेजने की तैयारी शुरू हो चुकी है। वह असहाय नजरों से मुर्गे की ओर देखते हुये छटपटाने लगी थी । कुछ ही समय में रसोइया उनका गर्दन मड़ोरने लगा था और छुरी से गला रेतने लगा था। मुर्गा घूरकर मुर्गी को देखते हुये गुस्‍से में चीखा ,देख लिया अंधी आधुनिकता का दुष्‍परिणाम? यही है इनका प्‍यार। और हमारी संस्‍कृति हमें सिखाती है कि ‘जड़ चेतन जग जीव जगत, सकल राम मय जानि‘ दुनिया के सभी प्राणी में एक ही ईश्वर का वास है।‘ जियो और जीने दो।‘ ये दैहिक आकर्षण को प्रेम का नाम देने वाले लोग प्रेम की परिभाषा को क्‍या समझेंगे। प्रेम पाने का नहीं खो कर खुश होने का नाम है समझी। प्रेम त्‍याग और समर्पण का नाम है। वह मुर्गी को कुछ और समझा पाता उसे पहले ही गर्दन पर फिर छुरी चलने लगी। मुर्गे को लगा मानो यह छुरी नहीं बल्‍कि बाजार है जो हमारी भावनाओं का गला रेत रहा है

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वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

बोड़रा, मगरलोड़

जिला धमतरी

छत्‍तीसगढ़

2 blogger-facebook:

  1. बहुत खूब वीरेन्द्र जी...मजा आ गया पढ़कर...बढ़िया लेखन के लिए बधाई..प्रमोद यादव

    उत्तर देंहटाएं
  2. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव9:09 pm

    मुर्गा मुर्गी के माध्यम से वीरेन्द्र जी ने एक सत्य को उजागर करने की कोशिश की हैकि आज हम स्वाभाविक और सरल प्यार प्रक्रिया को भूल आधुनिकता और कृतिमता के जाल में फँस प्यार
    और प्रीत के असाधारण और बहुमूल्य अवसरों को गवां रहे हैं उत्तम लेखन के लिये बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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