गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

उमेश मौर्य का लघु आलेख - जिन्दगी की गाड़ी

जिन्‍दगी की गाड़ी

-उमेश मौर्य

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रोड पर बहुत सी गाड़ियाँ पीं-पीं करती हुई भागी जा रही थी। कुछ धीरे से, तो कुछ बहुत तेज। वो सब तो चलाने वाले पर निर्भर था। लोग अपने अपने तरीके से उसे परिचालन कर रहे थे। कोई तनाव में तो कोई मस्‍ती में। किसी का लक्ष्‍य निश्‍चित था, तो किसी के लिए समय निकालने का साधन। लेकिन हर एक आदमी व्‍यस्‍त सा दिख रहा था। मगर क्‍यों किसी को कुछ पता न था।

हर तरफ, हर जगह केवल आदमी ही आदमी। जिधर देखो उधर ही लोगों की ऊंची कल्‍पनाओं के सहारे दौड़ती जिन्‍दगी। हर आदमी अपना अपना भविष्‍य संवारने, बनाने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहा है। नींद, चैन, सुख, शान्‍ति, एवं आराम को त्‍याग दिया है। आठ घण्‍टे, बारह-बारह घण्‍टे काम, यहाँ तक की सृष्‍टि का चौबीस घण्‍टे भी आज की भाग दौड़ में कम पड़ने लगे। आवश्‍यकताऐं दिन ब दिन बढ़ती जा रहीं है। जिसके लिए आदमी मृगतृष्‍णा की तरह एक के बाद एक पूरी करना चाह रहा। लेकिन क्‍या पता कब पूरी होंगी ये अभिलाषाऐं ? शायद कभी नहीं ...

हमारा समाज के प्रति, परिवार के प्रति, अपने कर्मों के प्रति निष्‍ठा और ईमानदारी से काम करना ही हमें सफल एवं सुखमय जीवन दे सकता है। एक व्‍यक्‍ति को सबसे पहले अपने जीवन को जी भर के बिना अपनी आत्‍मा का हनन किये हुए जीना चाहिए। फिर उसे अपने परिवार में पत्‍नी से प्रेम, बातें करना, उसके साथ समय निकालना, बच्‍चों के प्रति उन्‍हें मार्गदर्शन करना, उनको जीवन के अनुभवों से अवगत कराना। उनके साथ खेलना, खाना, हॅसना, बैठना, एवं उनकी मूलभूत आवश्‍यकताओं को ध्‍यान देना आदि हमारी जिम्‍मेदारियों में आता है। उससे एक कदम और आगे चलें तो हमारे माता-पिता की हमसे क्‍या-क्‍या उम्‍मीदें होती है। उन्‍हें विश्‍वास दिलाना, सुरक्षा की जिम्‍मेदारी उनके बढ़ती हुई उम्र में एक सहारा एवं आनंद का अनुभव दिलाती है। जिसके कारण हमारे जिन्‍दगी की गाड़ी बड़ी मस्‍ती से आगे निकलती रहती है। इससे थोड़ा और आगे चलें तो हमारे भाई, बहन, की भी हमारे जीवन के पहलू है जिन्‍हें हमारा मार्गदशर्न व स्‍नेह बॉटते रहना चाहिए। और अपने कर्तव्‍यों तथा उन्‍हें उनके कर्तव्‍यों की याद दिलाना चाहिए।

हमारे आस पास में हमारे दोस्‍तों के साथ हमारा व्‍यवहार मधुर हो। ईमानदारी पूर्ण एवं समझदारी के साथ होना चाहिए। अनावश्‍यक समय एवं औपचारिकता का ज्‍यादा निर्वाह हमें जीवन में धीरे-धीरे बॉधता चला जाता है। इसके अतिवाद से बचना भी चाहिए। ''न काहू से दोस्‍ती, न काहू से बैर।'' उम्‍मीद से ज्‍यादा न विश्‍वास न दिलाऐं। इससे दोनों पक्ष सुरक्षित रह सकते है। और आन्‍तिरिक वैमनष्‍य बढ़नें की संभावनाऐ कम हो जाती है। अब हमारे कार्य क्षेत्र में हमारा क्‍या उत्‍तरदायित्‍व बनता है। उसे पूरी निष्‍ठा से, एवं ईमानदारी से करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए इससे हमारा वर्तमान तो अच्‍छा बनता ही है साथ साथ भावी भविष्‍य भी उज्‍जवल बनता है। हमें अपने आपको अपने इर्द गिर्द जो हमारे सम्‍पर्क में रहते है उनसे ही हमारी जिसके साथ जो भी जिम्‍मेदारियाँ है। यथानुसार पूरी करते रहते जीवन की गाड़ी के साथ आगे बढ़ते रहना चाहिए। जिससे धीरे-धीरे चारों तरफ एक अच्‍छा माहौल बन जायेगा। और अपने आप मस्‍ती की गाड़ी जीवन की राह में दौड़ने लगेगी।

-उमेश मौर्य

सराय, भाईं, सुलतानपुर

उत्‍तर प्रदेश,

भारत

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