मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

प्रमोद यादव का व्यंग्य - चाय पे बुलाया है...

चाय पे बुलाया है../ प्रमोद यादव

clip_image002

“ शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है इसीलिए मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है ”

बिना मतलब के कोई किसी को चाय पर नहीं बुलाता..( वैसे तो आजकल यह चलन ‘आउट डेटेड‘है..कोई चाय तो क्या पानी भी नहीं पूछता ) पर “इन्होंने” तो पूरे आवाम को एक साथ,एक ही वेन्यु में चाय पर बुलाया तो मतलब कुछ न कुछ नहीं बल्कि बहुत ही कुछ था..कहने को वे कहते रहे कि किसी ज़माने में वे भी चाय बेचा करते..इसलिए उन्हें मालूम है कि चाय की गुमटी या ठेला एक तरह से फुटपाथ का पार्लियामेंट होता है...दुनिया-जहान की सारी आवश्यक और अनावश्यक बातों की,राजनीति, धर्म, विज्ञान, सिनेमा, युद्ध, सीमा की ,पड़ोस की अनुपमा, साधना आदि की चर्चा केवल यहीं होती है..इसलिए देश की दशा, दुर्दशा, व्याप्त भ्रष्टाचार, सुराज-स्वराज आदि की चर्चा करने चाय की चौपाल को चुना..वे ये भी फरमाए कि चाय गरीबों का व्यापार है..( इतना तो सभी जानते हैं भाई....हम कहाँ कहते हैं कि टाटा या अम्बानी केतली लिए घूमते हैं ) आगे बोले कि सारे देश की जनता से एकमुश्त चर्चा करने चाय की गुमटी को चुनने का कारण इनसे बेपनाह मोहब्बत है.और इसलिए इन्हें सम्मानित करने का शौक चर्राया ..यह एक प्रयोग है..सार्थक हुआ( चुनाव जीते ) तो आगे और भी कुछ करेंगे..( अगला पड़ाव ‘ पानठेला ’ हो सकता है..पानठेले में भी वही सब चर्चा होती है जो चायठेलों में होती है..फर्क इतना है कि चाय ‘आगाज’ है तो पान ‘अंत’)

अब तक तो देश में दो ही तरह के चाय प्रसिद्ध रहे – रेलवे की चाय और नान-रेलवे चाय..पहली वाली चाय कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक जैसी,एक कीमत की –और बेहद ही बकवास - बेस्वाद..वहीँ दूसरी चाय (नान-रेलवे) विभिन्न स्वाद व महंगे दामों में ठेलों, गुमटियों, ढाबों, रेस्तराओं, थ्री-स्टार, फाइव स्टार में उपलब्ध होते हैं..अब ये तीसरी पोलिटिकल चाय का प्रमोशन-विमोचन हुआ है..इसका स्वाद तो वही बता पाएंगे जिन्होंने चुस्की ली....राजनीतिक चाय को हलक से उतारना हर किसी के बस की बात नहीं. और वो भी मुफ्त की...तो आइये- बात करते है..कुछ पीने और पिलानेवालों से..चाय की चौपाल पर.. सबसे पहले चलते हैं-कोलकाता ..

‘ हाँ भैयाजी.. सुना है आप पच्चीस सालों से यहाँ पार्टी कार्यालय के सामने पार्टी के लोगों को पिला रहें हैं..आप के पिलाये लोग आज भी राजनितिक पटल पर कई ऊँचे पदों पर पगलाए पसरे हैं..क्या इसके पूर्व कभी किसी बड़े लीडर.ने आपको इस तरह तवज्जो दी ? ‘

‘ नहीं साहब..बिलकुल नहीं..अपने आखिर अपने होते हैं..चायवाले का दर्द एक चायवाला ही समझ सकता है..’

‘ अच्छा..तो बताओ..इनसे आपको क्या उम्मीदें हैं ?’

‘ उम्मीद तो यही है साहब कि ये पी.एम. बनेंगे तो हमारा सालों से रुका रकम(उधार की चाय का) जो पार्टी वाले पी (डकार) गए हैं..हमें ईमानदारी से दिला देंगे..हम जब-जब भी मांगते हैं, ये देते जरुर हैं पर केवल धमकी.. कि तुम्हारी गुमटी गोल कर तुम्हे भी ‘गो-वेंट-गान‘ कर देंगे.. ‘

‘ ठीक है भैया ..आप “ पैसा वसूल “ कार्यक्रम जारी रखे..हमारी शुभ-कामनाएं..’ और मैं चलता बना.

इस बार पटना के प्रमुख इलाके के चौराहे पर स्थित चाय-स्टाल पर पहुँच मुफ्त की चाय पीते एक जजमान से पूछा-

‘ भाई साहब..देश की सबसे महंगी मुफ्त चाय कैसी है ?’

उन्होंने तपाक से कहा- ‘ मुफ्त की है इसलिए बढ़िया है..अब रोज तो मिलेगी ना ? ‘ जवाब के साथ उसने एक अदद प्रश्न भी उछाल दिया..एक के साथ एक फ्री की तरह..मैंने समझाया-

‘ रोज नहीं भैया..केवल अभी दो घंटे भर..रोज पिलायेंगे तो ये सड़क पे आ जायेंगे... फिर इन्हें तो कोई मुफ्त में भी न पिलाये....बताइए..आप केवल चाय पीने आये हैं या इनसे कुछ चर्चा भी चाहते है ?’

‘ हाँ..मैं कुछ जानना चाहता हूँ..’

‘क्या ?’

‘ यही कि ये पागलों की तरह सबको क्यों मुफ्त में चाय पिला रहे हैं ? ‘

मैं आगे और कुछ न सुन सका, भाग आया.

देश का दिल दिल्ली के एक चाय स्टाल पर पहुंचा तो वहां ग्राहक टाईप आदमी कोई न दिखा..सारे लोग नेता जैसे भेष में दिखे..हकीकत तो यही है कि सब पीने वाले नेता ही थे..जिसका स्टाल था वह बंदा लोगों को दौड़-दौड़ कर कप सर्व करते दिखा..मैंने पहला सवाल उसी को दागा कि आप मालिक होकर नौकरों की तरह क्यों सर्व कर रहे हो तो उसका जवाब था- ‘ क्या करें जी..दो घंटों के लिए उन्होंने इसे जबरदस्ती हायर(हाईजैक) किया है..पैसा देंगे भी या नहीं..कह नहीं सकता..इन सबका रिकार्ड तो आप जानते ही है- माले मुफ्त-दिले बेरहम ’ इन्होंने तो ये भी कहा है कि अगर प्रोग्राम फ्लाप हुआ तो एल.सी.डी. का भी पैसा तुमसे वसूलेंगे..’

‘ सचमुच..गन्दी बात..गन्दी बात....’ मैंने उसे सांत्वना दिया. फिर सवाल किया- ‘आपको अगर चर्चा का अवसर मिले तो क्या पूछेंगे ? ‘

‘ केवल यही कि हम चाय वालों ने उनका क्या बिगाड़ा ? दो घंटे बाद ये तो कूच कर लेंगे ..फिर हजारों टूट पड़ेंगे कि मुफ्त की चाय पिलाओ ..लोगों को समझाते-समझाते महीने लग जायेंगे. इस चौपाल के बाद पूरे चुनाव तक पार्टी वाले यूँ ही मुफ्त की चाय पिलाते रहेंगे तो हम चाय वाले खायेंगे क्या ?.. ’

उसका दुःख वाजिब था..

.फिर मैं एक नेताजी की ओर मुड़ गया..पूछा- ‘ नेताजी..इस चाय पार्टी से भला देश का कोई भला होने वाला ? ‘

वे मुस्करा कर बोले- ‘ देश का भला- आपका ठेका. ...हमने तो इस इवेंट का ठेका लिया है..दो घंटे बीतने को है... अब.करोड़ रूपये हमारी जेब में...समझे ? ‘

मैं बिलकुल समझ गया कि गयी भैंस पानी में....तभी एक सज्जन ने मुझे भी मुफ्त की चाय थमा दी.. दो चुस्की ले मैं वहीँ कुर्सी में झपक गया...दुसरे ही पल दुसरे लोक पहुँच गया.. अमरीका का व्हाइट हॉउस...ओबामा को देख मैं पुलकित हो उठा .. मैंने हाथ मिलाया तो उन्होंने भी गर्मजोशी से ‘शेक-हैण्ड’ किया..मैंने सीधे मुद्दे पर आते उनसे पूछा-

‘ओबमाजी.. क्या आप भी पोलिटिक्स में आने के पहले चाय बेचते थे ? ‘

वे उबल पड़े- ‘ वाट रबिश क्वेशचन ?..पूछना है तो कोई ढंग का पूछो.. व्हाई आर यू आस्किंग अबाउट ब्लडी टी..? ’

मैंने बताया कि इन दिनों मेरे देश के दो बड़े लीडर “ चाय-चाय “ का खेल खेल रहें हैं.. आवाम को बता रहे हैं कि कभी वे भी चाय बेचकर गुजारा करते थे..( फ़िलहाल इनका गुजर-बसर विमान और चापर में होता है..धरती पर पाँव भी नहीं धरते) आसन्न चुनाव के चक्कर में दोनों वोट बटोरने “ आम” बनने का चक्कर चला रहे हैं..

‘ आप क्या बोल रहे ..मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा....आई कांट अंडरस्टेंड ....’ ओबामा झल्लाए.

मैंने समझाया कि ये इलेक्शन के पहले पब्लिक को भरमा रहे हैं कि कभी वे भी उन्हीं की तरह आम आदमी थे..एक ने चाय की हांक लगाई तो दूसरा भी ‘हम किसी से कम नहीं’ के अंदाज में चायवाला बन गया.. वे भी देश को चीख-चीख कर बता रहें हैं कि उनसे पहले वे....वे बेचते थे चाय... अपने भाई के साथ...इसलिए आपसे पूछा कि क्या आप भी...?’

‘ नो..नो..हम पीते नहीं तो बेचेगा क्यों ?हमारे घर पानी ही नहीं होता तो कैसे बनेगा टी ? हम तो बचपन से ही बीयर-शेम्पेन पीते आये .. चाय की चुस्की कभी नहीं ली.. हमारे यहाँ पानी खूब महंगा.. दुकानों में बिकता है..सुना है आजकल तुम्हारे मुल्क में भी पानी बिकता है..गुड..वेरी गुड..खूब ..तरक्की किया..’ वे हो-हो कर हंसने लगे.

‘ सर जी..क्या आपने कभी इलेक्शन जीतने.. आम आदमी बनने.. कुछ बेचा ? ‘

‘ नहीं..हमने बेचा नहीं..बल्कि ख़रीदा.. बड़े लोग बेचते नहीं..केवल खरीदते हैं..’

‘ क्या ? ‘ मैंने चौंकते हुए पूछा.

‘ नहीं बताएगा..वेरी सीक्रेट ..सारी..’ वे चुप हो गए.

.एक पल के लिए हमारे बीच सन्नाटा पसर गया...मैं उस “सीक्रेट” के बारे में सोच ही रहा था कि अचानक जोरों का शोर उठा.. टूटने-फूटने, गिरने-पड़ने, दौड़ने -भागने की आहट आई..कुछ समझ पाता कि “ धड़ाम’ की आवाज के साथ मैं कुर्सी से नीचे गिरा और झपकी से बरी हो गया..ओबामा का सीक्रेट- सीक्रेट ही रह गया....पता कर पाता तो देश के इन कर्णधारों को फ्री में “हैण्ड ओवर” कर देता...कम से कम देश वाले डांडियाखेडा जैसे फ्लाप शो की तरह “चाय-चाय” का यह बोरिंग गेम देखने से तो बच जाते..

xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx

- प्रमोद यादव

गयानगर,दुर्ग,छत्तीसगढ़

4 blogger-facebook:

  1. अच्छी खबर ली.बढ़ीया.

    उत्तर देंहटाएं
  2. Yadavji bhai majaa aa gayaa. Achhi rachana ke liye badhai

    उत्तर देंहटाएं
  3. श्री चावलाजी, श्रीवास्तवजी,यादवजी...आप सबका शुक्रिया ..प्रमोद यादव

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------