बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

वीरेन्‍द्र सरल का व्यंग्य - योजना बहिन जी

योजना बहिन जी

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वीरेन्‍द्र सरल

वह क्षेत्र बड़ा खुशहाल था। लोग बड़े समृद्ध थे। लेकिन अचानक उस क्षेत्र को प्रकृति की नजर लग गई। वहाँ भीषण अकाल पड़ गया। लोग दाने-दाने के लिये मोहताज हो गये। माटी का मोह ऐसा था, जो उन्‍हें रोजगार के लिये पलायन करने से रोक रहा था। अकाल का समाचार अखबारों में प्रकाशित हुआ था। जिसे पढ़कर उस क्षेत्र का एक हारा हुआ नेता पहुँचा। उसके आने की खबर से वहाँ के लोग राहत की उम्‍मीद लिये भारी संख्‍या में उपस्‍थित हो गये। मगर हारा हुआ नेता तो मानो उनसे बदला लेने के लिये पहुँचा था। उसने कहा-‘‘देख लिया न हमें हराने का परिणाम। जब हमारी सरकार थी तो समय पर बारिश होती थी। पेड़ों पर रसीले ,मीठे और बड़े-बड़े फल लगते थे। खेतों में अनाज की सोने सी बालियाँ लहलहाती थी। अब भुगतो परिणाम, ये हमारी सरकार बदलने के कारण हो रहा है। हमारा मुर्गा खाये, हमारा दारू पिये और हमें ही हरा दिये। यदि हमें वोट देते, हमारी सरकार बनाते तो ये दिन देखने नहीं पड़ते। अब सब कान खोलकर सुन लो , जब तक हमें नहीं जिताओगे, तब तक यहाँ पानी बरसने वाला नहीं है। हमारी मर्जी के बिना तो पेड़ का एक पत्‍ता भी नहीं हिलता, पानी कहाँ से बरसेगा? हमें जिताओ , तभी पानी बरसेगा ,समझे?‘‘ इतना कहकर वह चलता बना। लोग ठगे से उसे देखते रहे।

कुछ दिनों के बाद वहाँ एक महात्‍मा जी पहुँच गये। ये वही महात्‍मा जी थे जो यहाँ से बोरियों में भर-भर कर दान का अनाज ले गये थे। खुशहाली के दिनों में वे यहाँ महीनों तक अपना डेरा जमाये रहते थे। लोगों को संतोषी सदा सुखी का संदेश देते रहते थे। दान की महिमा बतलाते थे। दान के पैसे से स्‍वयं हलुआ ,पुड़ी आदि स्‍वादिष्‍ट ब्‍यंजन गपकते थे और लोगो को ‘जेहि विधि राखे राम तेहि विधि रहिये‘ का भजन सुनाते थे। लोगों को बड़ी उम्‍मीद थी कि महात्‍मा जी के आश्रम में अरबों-खरबों की संपत्‍ति है। अब वे पधार रहे हैं तो इस मुसीबत की घड़ी में मुक्‍त हस्‍त से दान देकर हमारा सहयोग करेंगें। लोगो की भारी भीड़ महात्‍मा जी के स्‍वागत के लिये उमड़ पड़ी। महात्‍मा जी ने पधारते ही प्रवचन देना शुरू कर दिया कि ‘होइहै वही जो राम रचि राखा ,को करि तर्क बढ़ावही शाखा।‘ ‘चाहे लाख करो चतुराई, करम का रेख मिटे न रे भाई, वगैरह-वगैरह। लोगों की उम्‍मीदों पर पानी फिर गया । महात्‍मा जी ने आगे कहा-‘‘जरूर तुम लोगों ने पिछले जन्‍म में कुछ पाप किया होगा। जिसका दंड तुम्‍हे इस जन्‍म में अकाल के दंश के रूप में चुकाना पड़ रहा है। भगवान को प्रसन्‍न करने के लिये व्रत, उपवास और यज्ञ हवन कराना पड़ेगा।‘‘ उसकी सलाह पर लोगों ने अपना बचा-खुचा धन यज्ञ-हवन और शांति पाठ में स्‍वाहा कर डाला पर कोई चमत्‍कार नहीं हुआ। महात्‍मा जी दान-दक्षिणा समेट कर आश्रम की ओर कूच कर गये। लोगों के हाथ केवल निराशा ही लगी।

लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर करें तो क्‍या करें? तभी वहाँ एक दिन चमचा नामक दूत प्रकट हुआ। उसने कुशल कथावाचक की तरह लोगों को समझाया, राजधानी नामक पावन महा तीर्थ में नेता नामक देवता गण निवास करते हैं। वहाँ जाकर उनकी स्‍तुति करने से वे प्रसन्‍न हो जाते हैं और वोटों का प्रसाद चढ़ाने की मनौती मांगने पर प्रसन्‍न हो जाते हैं फिर मन वांछित फल प्रदान करते हैं। ‘नेता जी की आरती जो कोई नर नारी गावे, सुख संपत्‍ति पावे।‘ तुममें से कुछ प्रमुख लोग एक दल बना कर अविंलंब राजधानी की ओर प्रस्‍थान करो और वहाँ पहुँच कर उनकी स्‍तुति करो तो तुम्‍हारा कष्‍ट जरूर दूर होगा। इतना कहकर वह अर्न्‍ताधान हो गया।

उसकी सलाह पर वहाँ के प्रमुख लोगों ने एक दल बनाकर कुछ ही दिनों मे राजधानी नामक पावन महातीर्थ पहुँच गये और उस मंदिंर को तलाशने लगे जहाँ नेता नामक देवता गण विराजते है। उस पावन तीर्थ में निवास करने वाले अन्‍य लोगों से पता पूछते हुये वे उस मंदिर तक पहुँच गये। वहाँ उन्‍होंने देखा, एक महल नुमा बहुत बडा भवन है जिसके आँगन मे एक विशालकाय वृक्ष है। उस पेड़ को घेर कर बहुत से धवल वस्‍त्रधारी नेता अपने हाथों में कुदाल लिये पेड़ के जड़ की खुदाई करने में तुले हैं। लोगों को बड़ा आश्‍चर्य हुआ। वे सोचने लगे, देखो हमारे देश के नेता कितने परिश्रमी हैं। लोग बेकार ही हमारे माननीय नेताओं को बदनाम करते हुये निकम्‍मे और निठल्ले समझते हैं। ये बेचारे यहाँ कुदाल लेकर जड खुदाई करने का श्रमसाध्‍य कार्य करके पसीना बहा रहे हैं। दल प्रमुख ने राजधानी निवासी एक बुजुर्ग से पूछा-‘‘इतना विशालकाय पेड़ हम जीवन में पहली बार देख रहे हैं। इस पेड़ के बारे में हमें बिल्‍कुल जानकारी नहीं है, कृपा करके इस पेड़ का नाम बता दीजिये साथ-ही-साथ ये नेता लोग क्‍या कर रहे हैं यह भी समझा दें तो बड़ी कृपा होगी।‘‘

बुजुर्ग ने समझाया इस पेड़ का नाम लोकतंत्र है। इसके छत्रछाया में अरबों लोग निवास करते हैं। मगर ये नेता इसकी जड़ें खोद रहे हैं। ये इसे यहाँ से उखाड़ कर अपने घर के आँगन में लगाना चाहते हैं। इसलिये इसे धाराशायी करने पर तुले हैं। इतना बताकर वह बुजुर्ग आगे बढ़ गया। लोगों को उसकी बातें समझ में नहीं आयी। दल प्रमुख जड़ खोदने वाले देवताओं को पहचानने की कोशिश करने लगा। एक देवता उसे कुछ जाना-पहचाना लगा , वह खुशी से उछल पड़ा। अरे! ये तो वही देवता है जो पिछले चुनाव में हमारे गाँव में जाकर हमारे सामने हाथ जोड़कर वोटों की भीख मांग रहे थे। चलो, उसी के पास जाकर हम मदद मांगते हैं।

सभी लोग उस नेता के पास पहुँच गये। दल प्रमुख ने उन्‍हें अपने क्षेत्र मे पड़े भंयकर अकाल के संबंध में जानकारी देते हुये मदद की मांग की। मगर उस देवता ने उन्‍हें दो टूक जवाब देते हुये कहा-‘‘मुझे सब मालूम है, अकालग्रस्‍त क्षेत्र के लिये यहाँ से एक योजना जा रही है। जिससे तुम्‍हारी सभी समस्‍याओं का समाधान हो जायेगा।‘‘ फिर उसने एक बहुत ही खूबसूरत योजना की जानकारी उन्‍हें दी और फिर से उस पेड़ की जड़ खोदने में तल्‍लीन हो गया। उसकी बेरूखी देख दल के अन्‍य लोगों की उनसे बात करने की हिम्‍मत नहीं हुई। वे अपनी नम आँखो से बेबसी में इधर-उधर देखने लगे। कुछ समय बाद उन्‍हें वहीं पर एक गोल-मटोल , खूबसूरत देवी जैसी एक महिला दिखाई पड़ी। दल के लोगों को लगा , शायद यही योजना बहिन जी हैं जो हमारे क्षेत्र में जायेगी और चुटकी बजाते ही हमारी समस्‍याओं का समाधान कर देगी। वाकई योजना बहिन जी तो बहुत ही खूबसूरत है। लोग आश्‍वस्‍त होकर अपने गाँव लौट आये और बेसब्री से योजना बहिन जी का इंतजार करने लगे।

दो-तीन महीने बीत जाने के बाद भी जब योजना बहिन जी गाँव नहीं पहुँची तो उन्‍हें चिन्‍ता होने लगी। वे सोचने लगे , योजना बहिन जी कहीं रास्‍ता तो नंही भूल गई। अब तक तो उन्‍हें यहाँ आ जाना चाहिये था पर अब तक आई क्‍यों नहीं ? रास्‍ते में कहीं उसके साथ कोई ऐसी-वैसी घटना तो नहीं घट गई? गाँव वालों के सब्र का बांध टूट रहा था। वे अलग-अलग दलों में बटकर योजना बहिन जी की तलाश करने के लिये निकल पड़े। कोई रेल्‍वे स्‍टेशन, कोई बस स्‍टेण्‍ड और कोई हवाई अड्‌डा पर सुबह से शाम तक बैठकर योजना बहिन जी का इंतजार करने लगें। सभी लोग दिन भर वहाँ योजना बहिन जी का इंतजार करते और देर रात गये थके हारे निराश कदमों से घर लौट आते। महीनों तक उनका यही क्रम चला। एक दिन एक बुद्धिजीवी ने उन्‍हें समझाया-‘‘योजना रेल , बस या हवाई जहाज पर सवार होकर नहीं आती। बंधुओ! वह तो फाइल पर सवार होकर कछुआ चाल से आती है, उसका यहाँ इंतजार करना व्यर्थ है।‘‘ इसे सुनकर एक ग्रामीण ने अपना माथा पीटते हुये कहा-‘‘धत्‌ तेरे की, अरे! हां रे, हम ही लोग कितने बुद्धू हैं। इतनी सी बात हमें अब तक समझ में नहीं आई कि सभी देवी देवताओं के अपने-अपने निजी वाहन होते हैं। जैसे दुर्गा की सवारी शेर, सरस्‍वती की सवारी हंस, लक्ष्‍मी जी की सवारी उल्‍लू वैसै ही योजना बहिन जी की सवारी फाइल, है ना ?‘‘ बात समझ में आते ही सब खुश हो गये और फाइल पर सवार होके आ जा मोरी मैया गाते हुये खुशी-खुशी अपने गाँव लौट आये।

वे लगातार पंचायत प्रमुख और विकास अधिकारी से सम्‍पर्क बना कर योजना बहिन जी की शोर-खबर लेते रहे। बहुत दिनों तक तो कुछ पता नही चला। मगर, अचानक एक दिन गाँव भर में हल्‍ला मचा कि अकालग्रस्‍त क्षेत्र के लिये एक योजना आयी है। गाँव भर के लोग योजना बहिन जी को एक नजर देखने के लिये ग्राम पंचायत की ओर दौड़ पड़े क्‍योंकि राजधानी से वापस लौटने वाले लोगों ने सबको बताया था कि योजना बहुत ही सुन्‍दर हैं। वह हमारी सभी समस्‍यांओ का हल चुटकी बजाते ही कर देगी।

ग्राम पंचायत के सामने अकाल पीडित लोगों की भारी भीड़ थी। सभी लोग योजना बहिन जी से राहत की उम्‍मीद लगाये खड़े थे। भीड़़ के बीच एक दुबली-पतली, बीमार सी महिला खड़ी थी। उसका चेहरा निश्‍तेज था। ऐसा लग रहा था मानो वह स्‍वयं ही अकाल पीडित हो। पता नहीं कितनें दिनों से उसके पेट में अन्‍न का एक दाना भी नहीं गया रहा होगा। उसकी आँखें डबडबाई हुई थी। उसके मन की पीड़ा आँसू के रूप में उसके गालों पर ढुलकने लगी थी । वह कुछ कहना चाहती थी पर भीड़़ और पीड़ा के कारण कुछ कह नहीं पा रही थी।

एक सहृदय ग्रामीण बुजुर्ग ने भीड़ से शांत रहने की अपील की। वहाँ एकत्रित भीड़ कुछ समय के लिये शांत हुई। तब योजना बहिन जी ने बोलना शुरू किया। उसने कहा-‘‘मेरे भाइयों और बहनों! मैं आप लोगों के उम्‍मीदों पर खरा नहीं उतर पाऊँगी , इसका मुझे अफसोस है। मैं आप सबको अपनी आप-बीती सुनाती हूँ। हम लोग कई बहनें हैं, हमें आपदाग्रस्‍त लोगों की सहायता करने के लिये राजधानी से खूब सजा-संवार कर भेजा जाता है मगर रास्‍ते में ही मेरी कई बहनें अपहृत होकर नेताओं की तिजोरियों में कैद हो जाती हैं। कुछ बहनें अधिकारियों के जेबों में पहुँचकर स्‍वाहा हो जाती हैं तो कुछ बहनें भ्रष्‍ट कर्मचारियों के द्वारा लूट ली जाती हैं। कुछ फाइलों में दबकर ही दम तोड़ देती हैं। मैं स्‍वयं कई लुटेरों से लुटती-पिटती यहाँ तक पहुँची हूँ। मेरी दशा आप देख ही रहें हैं। मेरे बदन पर छीना-झपटी के निशान आपको स्‍पष्‍ट दिखलाई पड़ रहे होंगे। अब आप ही बताइये इस दीन-हीन दशा में मैं आपकी क्‍या सहायता कर सकती हूँ। इतना बताकर वह आँचल में मुँह छिपाकर सुबक-सुबक कर रोने लगी। कुछ ही समय बाद वह लड़़खड़ा कर गिर पड़ी। लोगों ने उसकी नब्‍ज टटोलकर देखा, उसके हृदय की धड़कन बंद हो चुकी थी। योजना बहिन जी के प्राण पखेरू उड़ चुके थे

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वीरेन्‍द्र सरल

बोड़रा (मगरलोड़)

पोष्‍ट-भोथीडीह

व्‍हाया-मगरलोड़,जिला-धमतरी

छत्तीसगढ़,पिन कोड-493662

5 blogger-facebook:

  1. बहुत बढ़िया व्यंग्य के लिए बधाई..प्रमोद यादव

    उत्तर देंहटाएं
  2. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव9:52 am

    सचमुच हमारे प्यारे देशका यह दुर्भाग्य है की यहाँ अच्छी
    योजनायें गंतव्य तक पहुचने से पाहिले ही लुट पिट
    अपहर्त हो कर दम तोड़ देती हैं और जिनके लिये वे बनती हैं उन तक कभी नहीं पहुँचती सुंदर व्यंग के लिये
    श्री वीरेंदर सरल जी को बधाई और शुभेच्छा

    उत्तर देंहटाएं

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