गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

संजय कुमार गिरि की लघुकथा

एक लघु कथा जो सत्य है -"मेरी व्यथा "

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रद्दी के ढेर में पड़े एक कागज़ के टुकड़े पर जब मेरी नज़र पड़ी तो में एकदम दंग रह गया था ,वो टुकड़ा ......था मेरे अरमानों मेरे जज्बातों .मेरी तपस्या का फल। मेरा बी .ए पास का प्रमाण पत्र (सर्टिफिकेट), मैं गुस्से में लाल पीला होते हुए अपनी पत्नी के समक्ष आया और उस पर सारा गुस्सा उतार दिया। पत्नी ने रोते हुए मुझे अपनी बातों से बिलकुल झकझोर दिया था ,उसने कहा आप ने इतनी शिक्षा ग्रहण की है उसका किया फायदा जब हम अपने बच्चे की स्कूल फीस ,उसको ढंग के वस्त्र, उसको भर पेट पौष्टिक खाना नहीं खिला सकते हैं ?आप दिन रात मेहनत मजदूरी कर थक हार कर अगले दिन २४ घंटे बाद घर आते हो और फिर घर में तमाम तरह की जरुरतों को पूरा करने में जुट जाते हो ,आपको पल भर का भी आराम नसीब नहीं होता ,आपके शरीर को बिलकुल भी आराम नहीं मिलता हैं, फिर उसके बाद आप ने ये नया शौक किया पाल लिया है? की आप हर माह के आखिरी मंगल बार और शनिवार को कहाँ जाने लगे हो ?और उसमें भी ५०-६० रूपये खर्च कर देते हो ,इतने में तो दो टाइम की सब्जी आ जाए। मैं तो बस जैसे अचेत भाव से अपनी पत्नी की सारी दलील सुनता रहा ,और अपने उस प्रमाण पत्र (सर्टिफिकेट )को निहारता रहा , फिर पत्नी ने मुझे झकझोरते हुए कहा इसकी जो जगह थी मैंने उसे वही रख दिया है जब इससे हमें चैन की दो रोटी नहीं मिल सकती तो यह हमारे किस काम का ?


मकान में जगह जगह से सीलन आ जाने के कारण दीवारों पर से पपडियां उतर कर रेट झर रहा था ,और मेरे बूढ़े माँ-पिता जी को शौच के लिए बारबार नीचे से ऊपर आना पड़ता। इस समस्या का भी समाधान मुझे जल्द से जल्द निकालना है पर इसके लिए जो खर्च होना है वह मेरी जमा पूंजी इसके लिए पर्याप्त नहीं है। और माँ पिता जी दिन पे दिन कमजोर होते जा रहे हैं। उनके स्वास्थ की चिंता भी मेरे जेहन में हमेशा रहती और कभी कभी तो मैं अपने आपको ही कोसता की मैं किसी भी तरह से अपने माँ -बाप की सेवा करने में समर्थ नहीं हूँ। अभी मैं ये सब सोच ही रहा था की मेनगेट की घंटी बज उठी ,मैंने जैसे ही गेट खोला बिजली का बिल लिए एक व्यक्ति खड़ा था , मैंने वह बिल अपने हाथों में जैसे ही पकड़ा ...दिल्ली सरकार की और से एक झटका और लगा मित्रों आप समझ सकते हो सरकार का ये झटका किया हो सकता था ?


एक तो दिन पे दिन महंगाई आसमान छू रही है और ऊपर से ये बिजली का बढा हुआ बिल ,कहाँ से जमा करूँगा इतना बिल ?त्योहारों ने भी आ घेरा है अभी दशहरा बीता है और दीवाली आने वाली है , सेलरी जो भी मिली थी वो कब आई और कब ख़त्म हो गई कुछ पता ही न चला ,अभी पूरा महीना पड़ा है . राम जाने अब कैसे घर चलेगा ?
मैं इसी उधेड़ बुन में था की फिर मेरे मेनगेट की डोर बैल बज उठी इस बार मैंने फिर निराशा भाव से जाकर गेट खोला ,इस बार एक छोटा बच्चा जो स्कूल ड्रेस में था उसने मुझसे पूछा अंकल जी आंटी कहाँ हैं उन्हें मेरे स्कूल के प्रिंसिपल बुला रहें हैं, मैंने आश्चर्य चकित हो अपनी पत्नी की और देखा तो उस ने बताया की पास में जो स्कूल है मैंने वहां पर इंटरव्यू दिया था , शायद कोई वेकेंसी हो ?


अरे वाह !ये तो बहुत ही ख़ुशी की बात है ,भगवान् ने चाहा तो तुम्हारी नौकरी जरुर लग जायेगी ,और तुमने जो "पार्लर" का काम सीखा था उसका भी मैं कुछ करने की सोच रहा था ,क्यों न हमघर में ही एक "पॉर्लर "भी खोल लें ...कुछ न कुछ तो आमदनी हो ही जाया करेगी ..!मेरी श्रीमती जी ने इसकी सहमति हाँ में केवल सर हिला कर दे तो दी थी पर मैं उसकी झिझक साफ़ महसूस कर रहा था , मैंने उसे सांत्वना देते हुए कहा कि तुम चिंता न करो , मैं कही न कही से कुछ न कुछ इंतजाम कर ही लूंगा ,और अब तो तुम स्कूल में भी लग ही गई हो तो तुम्हारी तनखाह से थोडा बहुत तो घर चलाने में मदद मिलेगी ही ...,यह कहते-कहते मैंने देखा कि मेरी श्रीमती जी कि आँखों में एक ख़ुशी की चमक झलकने लगी थी ....!आज हम दोनों की खुशियां हमारे चेहरे पर अपनी सुन्दर छवि बिखेर रही थी ........!!हाँ आज हम खुश थे ....बहुत खुश ......ऐसा प्रतीत हो रहा था की जैसे हमारे सपने अब सच हो गए हैं ....!!!

लेखक :संजय कुमार गिरि

,करतार नगर
दिल्ली -११००५३,

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