रविवार, 23 फ़रवरी 2014

प्रमोद भार्गव का आलेख - प्रसिद्धि के लिए कीर्तिमान बनाने की होड़

प्रमोद भार्गव

अकसर युवा, किशोर और बच्‍चे गिनीज बुक में नाम दर्ज कराने के लिए खतरों से खेलने का जोखिम उठाते रहते हैं। हाल ही में भिण्‍ड के मोहित दुबे ने लगातार 168 घंटे छात्रों को पढ़ाकर नया कीर्तिमान रचा है। इस रिकॉर्ड को गिनीज बुक अॉफ वर्ल्‍ड रिकॉर्ड में शामिल करने का दावा किया जाएगा। मोहित ने इस लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने के लिए भिण्‍ड के विद्यावती कॉलेज में अपनी कोचिंग के छात्र-छात्राओं को लगातार 168 घंटे पढ़ाया। इससे पहले पोलैंड के इरोल मोजवानी ने 121 घंटे लगातार पढ़ाकर साल 2009 में विश्‍व रिकॉर्ड बनाया था। हालांकि खतरों से खेलते बचपन पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय अंकुश लगाने की पहल कर चुका है। बावजूद सिलसिला थमा नहीं है।

रातोंरात प्रसिद्धि पाने के लिए आजकल युवा और अधेड़ अटपटे करतब दिखाकर जान की बाजी दाव पर लगाने में लगे हुए हैं। जुनून की हदें तोड़ देने वाली होड़ में बच्‍चें और किशोर भी पीछे नहीं हैं। वर्तमान रिकॉर्ड तोड़ने की इन प्रतिस्‍पार्धाओं में रचनात्‍मकता कम मदारी किस्‍म का उद्‌दाम आवेश ज्‍यादा है, जो नया रिकॉर्ड कायम करने के दौरान जानलेवा भी साबित हो सकता है। मानवाधिकरों का हनन भी इन प्रदर्शनों के दौरान धड़ल्‍ले से हो रहा है। इसलिए कुछ करतबों के प्रदर्शनों पर अंकुश भी जरूरी है, जिससे ये प्रेरणा का आधार न बनें ?

साहित्‍य में उत्तर आधुनिक जादुई यथार्थवाद की तरह आम जन को भुलावे में डालने के लिए बुद्धू बक्‍से का पर्दा चमत्‍कारों के एंद्रिक कार्यक्रम परोसकर लोगों को सस्‍ते मनोरंजन का लती बनाने में लगा है। अतिरिक्‍त महात्‍वाकांक्षा के चलते आनन-फानन में लोकप्रियता हासिल करने की इस होड़ में तमिलनाडू का मजदूर युवक मुतुकुमार भी अपनी जान हथेली पर लिए शहीदी अंदाज में शामिल हो गया था। वह 38 सैंकेड़ तक गले में फांसी का फंदा डालकर झूलते रहने का अनूठापन व हैरतअंगेज करतब पेश कर चुका है। इस करतब के प्रदर्शन के दौरान उसे समाचार माध्‍यामों ने जिस तरह से उछाला उससे प्रेरित व प्रभावित होकर अब वह और लंबे समय तक रस्‍सी के फंदे पर लटका रहकर गिनीज बुक अॉफ वर्ल्‍ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा लेना चाहता है। फांसी के फंदे पर लंबी अवधि तक लटके रहने की होड़ आखिर किस तरह की रचनात्‍मकता आथवा सार्थकता की परिचायक है ? इस तरह की बेहूदी और अनर्थक होड़ें मानसिक विकास के कौन से रास्‍ते प्रशस्‍त करने में सहायक साबित हो रही हैं, इस पर गंभीरता से गौर करने की जरूरत है ? हां, इतना जरूर है, मुतुकुमार के इस तरह के जोखिम भरे प्रदर्शन जहां उनकी खुद की मौत का कारण बन सकते हैं, वहीं इस तरह के प्रदर्शनों से प्रेरित होकर खेल-खेल में अतिउत्‍साही युवक फंदे पर लटकने के बहाने मौत को भी गले लगा सकते हैं ?

देश के युवा आश्‍चर्यजनक प्रतिस्‍पर्धाओं और उम्र के विपरीत करतबों के प्रदर्शन में लगे हैं। कुछ साल पहले पांच साल की आकांक्षा ने भुवनेश्‍वर के हाइवे पर मोटरसायकल दौड़ाई थी। इसके पहले उड़ीसा के ही चार साल के बुधिया नाम के मासूम बालक ने तीन किलोमीटर लंबी दौड़ लगा देने की पारी खेली। जबकि यह दौड़ सोलह साल की उम्र तक के किशोरों के लिए थी। लेकिन वह दौड़ के ही समानांतर चल पड़ा और टीवी कैमरों ने अनजाने में ही उसे प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया था। ये दोनों ही उदाहरण प्रतिभागियों के जहां स्‍वास्‍थ्‍य को आहात कर सकते हैं, वहीं कानून की प्रतिपादित अवधारणा के विपरीत भी जाते हैं। इसी तरह मुतुकुमार का प्रदर्शन भी कानून के दायरे में आकर आत्‍महत्‍या के प्रयास के मामले में दर्ज हो सकता है ? हालांकि हमारे देश में ही यह संभव है कि उपर्युक्‍त एकांगी जानलेवा करतबों को जन समूह का समर्थन और मीडिया में स्‍थान मिल जाता है तो कानून के रखवाले ही वास्‍तविकता से आंखें चुराकर सुरक्षा के इंतजाम मुहैया कराने में लग जाते हैं।

मौजूदा कीर्तिमान तोड़कर नया कीर्तिमान रच देने की इस होड़ में मानकों की परवाह किए बिना मध्‍यप्रदेश के इन्‍दौर की आकांक्षा जाचक 61 घंटे लगातार गाकर जहां जर्मनी में लगातार 54 घंटे गाए जाने का कीर्तिमान ध्‍वस्‍त कर देती है, तब प्रतिक्रिया स्‍वरूप मध्‍यप्रदेश के ही खंडवा जिले के भीकनगांव की एक सोलह वर्षीय बाला सानिया सैय्‍यद 64 घंटे लगातार गाकर इन्‍दौर की आकांक्षा के 61 घंटे के कीर्तिमान को पीछे धकेल देती है। गायन की होड़ का यह सिलसिला यहीं थमकर नहीं रह जाता....!, इन्‍दौर का ही एक और युवक दीप गुप्‍ता प्रतिभावान बालक इस प्रतिस्‍पर्धा में कूदता है और कोयंबटूर में लगातार 101 घंटे गाकर सानिया सैय्‍यद के 64 घंटे के कीर्तिमान को अपने बुलंद हौसले के चलते नकार देता है। गीत गाने के ये कीर्तिमान हालांकि बुलंद हौसलों और नेक नीयत की सफल परिणति रहे लेकिन चिकित्‍सकों की मानें तो वे इरादे स्‍वास्‍थ्‍य की दृष्‍टि से खतरनाक भी साबित हो सकते हैं। इतनी लंबी अवधि तक लगातार गाने से स्‍वर तंत्रिकाओं में कालांतर में अवरोध पैदा हो सकते हैं। चिकित्‍सा विज्ञान के अनुसार जीवन को लंबा बनाए रखने के लिए सांसों का भी अपना एक हिसाब है। इस हिसाब के औसत का संतुलन गड़बड़ाने से शरीर में स्‍थायी विकार पैदा हो सकते हैं।

सुर अथवा बेसुरे अंदाज में घंटों गीत गाकर नए-नए कीर्तिमान स्‍थापित करना एक बात है। लेकिन गायक कलाकार बनना इसके बिलकुल विपरीत बात है। लता मंगेश्‍वर, आशा भौंसले, किशोर कुमार, मोहम्‍मद रफी या मुकेश लगातार गाने का कीर्तिमान खड़ा कर स्‍थापित कलाकार नहीं बने ? बल्‍कि अपने मौलिक अंदाज में गाने की वजह से बड़े और प्रतिष्‍ठित कलाकार बने और जनमानस गायन के क्षेत्र में स्‍थायी पहचान बनाई। दरअसल गायन के क्षेत्र में स्‍थायी पहचान और उपलब्‍धियों की आसमान छूती निरंतरता के लिए मौलिक सुर, लय और तान की जरूरत है न कि किसी अटपटी होड़ की ? कमोबेश यह स्‍थिति लगातार पढ़ने या पढ़ान ेस बन सकती है। आंखों की रोशनी कम हो सकती है या जा सकती है। लिहाजा ऐसी होड़ों से बचने की जरूरत है।

कुछ विचित्र कर गुजरने की ये महत्‍वाकांक्षाएं कई तरह के सवाल खड़े कर रही है, जो समाजशास्‍त्रियों को चिंता के विषय बनना चाहिए। इस तरह की प्रतिस्‍पर्धाएं खासतौर से बच्‍चों व किशोरों के संदर्भ में सोचनीय हैं क्‍योंकि आयु और शारीरिक विकास से बड़े करतब मानसिक शारीरिक, सामाजिक व वैधानिक मानकों पर खरे नहीं बैठते, इसलिए इनकी पड़ताल जरूरी है ? इधर शालेय (स्‍कूली) छात्रों के बौद्धिकता विषयक संबंधी जो सर्वेक्षण आए हैं उनके निष्‍कर्ष बताते हैं कि छात्रों में तार्किकता और प्रत्युत्‍पन्‍नमति (आई क्‍यू) का अभाव बढ़ रहा है। साथ ही छात्रों में विज्ञान संबंधी विषयों में भी रूचि कम हो रही है। हमारे राष्‍ट्रपति और प्रधानमंत्री लगातार कम हो रहे वैज्ञानिकों पर चिंता जता रहे हैं।

इधर टीवी पर जिस तरह से अतीन्‍द्रित शाक्‍तियों का झंडा फहराने वाले भूत-प्रेत, नाग-नागिन, तंत्र-मंत्र और पुनर्जन्‍म के घटनाक्रमों ने कब्‍जा किया है। उसके नतीजतन विद्यार्थी-वर्ग की बौद्धिक क्षमताएं कुंद होकर सस्‍ते मनोरंजन की लती और तात्‍कालिक लोकप्रियता दिलाने वाली हैरतअंगेज होड़ों की शिकार हो रही हैं। समाजशास्‍त्रियों और मानवाधिकार के नायकों को युवा वर्ग पर पड़ रहे विपरीत प्रभाव की पड़ताल करने की आवश्‍यकता है। क्‍योंकि हैरतअंगेज अजूबों करतबों और अनूठे कारनामों से तात्‍कालिक लोकप्रियता तो हासिल हो सकती है लेकिन इस महत्‍व की उपलब्‍धि अर्जित नहीं की जा सकती इसलिए इस तरह की बेतुकी होड़ों से युवा वर्ग को निजात दिलाने की जरूरत है।

प्रमोद भार्गव

लेखक/पत्रकार

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

 

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

1 blogger-facebook:

  1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव12:58 pm

    मैं प्रमोद भार्गव जी के विचारों से पूर्णतया सहमत हूँ
    गिनिस बुक में नाम आने से ज्यादा जरूरी है कि
    व्यक्ति जीवित रहे खतरनाक कारनामों पर रोक लगनी
    ही चाहिये उपयोगी और महत्वपूर्ण विषय पर लिखने के
    लिये हमारी बधाई और शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं

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