बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

रवीन्द्र अग्निहोत्री का आलेख - हमारी अंग्रेज़ी!

हमारी अंग्रेजी

हाल ही में देश में अंग्रेजी से संबंधित एक अभूतपूर्व घटना घटी. वैसे तो हमारे देश में जो भी घटना घटती है वह अभूतपूर्व ही होती है. संसद और विधान सभाएं तो ऐसी घटनाओं के लिए “ दुर्घटना संभावित क्षेत्र “ जैसी ख्याति अर्जित कर चुकी हैं. लिम्का बुक वाले चाहें तो उन्हें अपने रिकार्ड के लिए वहां भरपूर सामग्री मिल सकती है. यहाँ जिस घटना का जिक्र किया जा रहा है, वह एक नहीं, कई दृष्टियों से अभूतपूर्व है. हुआ यह कि एक अंतर-मंत्रालयी बैठक में हमारे वित्त मंत्री चिदंबरम साहब ने शहरी विकास सचिव सुधीर कृष्ण को झिड़कते हुए कहा कि आपकी अंग्रेजी मेरी समझ में नहीं आती. आप हिंदी में बोलिए जिसका अनुवाद करके मेरे अधिकारी मुझे अंग्रेजी में समझा देंगे.

सुधीर कृष्ण एम एस-सी (फिजिक्स) हैं, एम ए (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) हैं, पी-एच डी हैं. दूसरे शब्दों में, उनके पास भारतीय विश्वविद्यालयों की दी हुई ऐसी कई अधिस्नातक डिग्रियां हैं जो बिना अंग्रेजी के नहीं मिलतीं. वे आई ए एस हैं जो अत्यंत प्रतिष्ठित नौकरी मानी जाती है. आज तो आई ए एस की परीक्षा और साक्षात्कार भारतीय भाषाओं में देने की अनुमति मिल गई है, पर 1977 में जब वे आई ए एस बने, तब यह अनुमति नहीं थी. तब साक्षात्कार केवल अंग्रेजी में होता था. श्री सुधीर कृष्ण मूलरूप से उत्तर प्रदेश के निवासी हैं, पर आई ए एस की नौकरी में कर्नाटक कैडर में रहे. अतः उन्होंने कन्नड़ भाषा भी सीखी. इससे पता चलता है कि भाषा सीखने में वे पीछे नहीं रहे. अन्य आई ए एस अफसरों की तरह उन्होंने भी विभिन्न पदों पर काम किया, क्रमशः पदोन्नत होते हुए सचिव स्तर तक पहुंचे और अब जून में रिटायर होने वाले हैं. इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह माना जा सकता है कि शिक्षा के दौरान ही नहीं, आई ए एस में प्रवेश से लेकर पदोन्नति के हर सोपान पर उन्होंने अंग्रेजी की बाधा पार की, इसके बावजूद अगर उनकी अंग्रेजी कमजोर है तो क्या इससे यह बात प्रमाणित नहीं होती कि विदेशी भाषा कितनी भी पढ़ ली जाए, उस पर अधिकार नहीं हो सकता ?

चिदंबरम साहब की गिनती हमारी वर्तमान सरकार के “ सुशिक्षित “ लोगों में होती है. कुछ लोग कहते हैं कि उनकी शिक्षा-दीक्षा हारवर्ड (अमरीका) में हुई, शायद इसीलिए उनकी अंग्रेजी भी अलग तरह की होगी. बात गलत तो नहीं है, पर पूरी तरह सच भी नहीं है, क्योंकि उनकी स्कूली और यूनिवर्सिटी शिक्षा तो तमिलनाडु में हुई, एम बी ए उन्होंने हारवर्ड से किया. अतः यह बिलकुल संभव है कि प्रबंधन के गुर सीखने के साथ उनकी अंग्रेजी भी सुधर गई हो. पर हर आदमी तो हारवर्ड नहीं जा सकता.

तो बात हो रही थी चिदंबरम साहब की झिड़की की. बात झिड़की पर खत्म नहीं हुई, बल्कि वहां से शुरू हुई. सचिव महोदय चिदंबरम से तो शिष्टाचारवश कुछ कह नहीं पाए, पर शांत भी नहीं बैठे. बात दूसरे सचिवों की उपस्थिति में कही गई थी. अतः उनके आत्मसम्मान को कुछ ज्यादा ही ठेस लगी. उन्होंने अपने मंत्री कमलनाथ को पत्र लिखा जिसमें चिदंबरम के दुर्व्यवहार की शिकायत करके अपनी भड़ास निकाली. पहले का कोई उदाहरण याद नहीं आता जब किसी अफसर ने सरकार के दिग्गज मंत्री की शिकायत की हो और वह भी लिखकर.

पर शायद वे जानते थे कि जिससे शिकायत कर रहा हूँ, वह कुछ कर नहीं पाएगा . अतः उन्होंने उसी पत्र में यह अनुरोध किया कि समुचित कारर्वाई के लिए यह बात प्रधानमंत्री जी के संज्ञान में लाई जाए. उन्होंने “समुचित कारर्वाई “ के लिए प्रधानमंत्री जी पर भरोसा कैसे कर लिया, यह तो वे ही जानें, पर उनके मंत्री महोदय ने उनके अनुरोध को स्वीकार करते हुए यह शिकायत प्रधानमंत्री जी के पास भेज दी. अब यह तो पता नहीं कि “ मेरी खामोशी अच्छी “ कहने वाले प्रधानमंत्री जी ने इस पर कोई संज्ञान लिया या नहीं, अगर लिया तो क्या किया, पर जैसा अक्सर होता आया है कि सरकार की गोपनीय बातें जनता से गोपनीय नहीं रहतीं, सो यह चिट्ठी किसी तरह मीडिया में आ गई और चर्चा का विषय बन गई. अंग्रेजी समाचारपत्रों ने आई ए एस अफसरों को “ बाबू ” लिखा तो अफसर बिगड़ गए कि हम बाबू नहीं, अफसर हैं ; पर किसी अफसर ने अफसरी दिखाते हुए न तो बैठक में चिदंबरम साहब से कुछ कहने का साहस किया, न उनकी टिप्पणीं के बारे में बाद में कुछ कहा. बात बढ़िया क्वालिटी की अंग्रेजी की थी. अतः संभव है दूसरे अफसरों ने इसीलिए चुप रहना बेहतर समझा हो.

पर इस घटना पर मुझे कुछ कहना है. हमारी सरकार में दो तरह के लोग हैं. एक वे जो अपने अशिष्ट बेतुके बयानों के लिए ही बदनाम हैं, दूसरे वे जो अपने शिष्ट शालीन व्यवहार के लिए जाने जाते हैं, चिदंबरम जी की गिनती इन दूसरे लोगों में ही की जाती है. पर उनकी इस टिप्पणी से तो उनकी छवि धूमिल हुई है. किसी सम्मानित व्यक्ति को इस प्रकार अपमानित करना चिदंबरम जैसे सुशिक्षित व्यक्ति को शोभा नहीं देता.

मामला अंग्रेजी का है, अतः सबसे पहले तो हमारा ध्यान अपनी राजभाषा नीति की ओर जाता है. हमारे मंत्रीगण जिस संविधान की शपथ लेते हैं, उसके अनुसार केन्द्र सरकार की “ राजभाषा “ हिंदी है ( संविधान सभा ने 15 वर्ष के लिए अंग्रेजी में भी काम करने की छूट यह सोचकर दी थी कि परिवर्तन एकाएक करने के बजाय क्रमशः किया जाए ). जब राजभाषा हिंदी है तो बैठक अंग्रेजी में हो ही क्यों रही थी ? हमारे मंत्रीगण शपथ संविधान के अनुरूप काम करने की लेते हैं या उल्लंघन करने की ?

चिदंबरम साहब वकील हैं. तर्क दे सकते हैं कि संविधान के बाद बनाए गए राजभाषा अधिनियम के आधार पर अभी भी अंग्रेजी के प्रयोग की खुली छूट है. बात सच है. तर्क वे यह भी दे सकते हैं कि मैंने तो सचिव महोदय से हिंदी में बोलने के लिए कहा. बिलकुल ठीक, पर आगे यह भी कहा न कि मेरे अधिकारी उसका अंग्रेजी में अनुवाद कर देंगे, अर्थात आपके कामकाज की भाषा अंग्रेजी ही रहेगी. श्रीमान जी, तमिलनाडु में जन्म लेने और शिक्षा पाने के बाद आपने हिंदी विरोध करने वाली पार्टियों में नहीं, बल्कि उस पार्टी में काम करना पसंद किया जो हिंदी के प्रबल समर्थक महात्मा गाँधी को अपना आदर्श मानती आई है. पता नहीं, आप उन्हें अपना आदर्श मानते हैं या नहीं, पर यह तो विचार कर ही सकते हैं कि आप सन 1984 से संसद में हैं और 1985 से केन्द्र सरकार में विभिन्न पदों पर हैं. इस प्रकार केन्द्रीय राजनीति में भूमिका निभाते हुए आपको लगभग तीस वर्ष हो गए. इसलिए वकील साहब, एक बात यह बताइये कि आप वकालत छोड़कर राजनीति में किसलिए आए ? 26 जनवरी 1950 वाली स्थिति बनाए रखने के लिए या इसे बदलने के लिए ? जो छूट 1950 में दी गई थी, उसे कितना खींचेंगे ? इस स्थिति को बदलने का दायित्व कौन निभाएगा ?

सरकार ने राजभाषा नीति के अनुपालन के लिए यह व्यवस्था की है कि सरकारी नौकरी में प्रवेश करते समय हिंदी ज्ञान आवश्यक नहीं, पर नौकरी में आ जाने के बाद हिंदी सिखाने की व्यवस्था सरकारी खर्च पर की जाती है. अखिल भारतीय सेवा में होने के कारण आई ए एस अफसरों को तो उनके प्रारंभिक प्रशिक्षणकाल में ही हिंदी सिखाई जाती है; पर इस प्रशिक्षण का कोई लाभ उठाया जाता है, यह संदिग्ध है क्योंकि मंत्री जी के कामकाज की भाषा तो अंग्रेजी होती है. तो क्यों न केन्द्रीय स्तर पर राजनीति करने के इच्छुक नेताओं के लिए भी हिंदी प्रशिक्षण की सरकारी व्यवस्था कर दी जाए ? संभवतः फिर हिंदी प्रशिक्षण का बेहतर उपयोग हो सकेगा.

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(डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

पी/138, एम आई जी, पल्लवपुरम-2, मेरठ 250 110 )

agnihotriravindra@yahoo.com

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  1. अग्निहोत्री जी आपने दुखती रग पर हाथ रख दिया | एक सही मुद्दा सशक्त ढंग से उठाया है |साधुवाद

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