गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

देवेन्द्रसिंह राठौड़ की लघुकथा - वर्चस्व

वर्चस्व

वर्चस्व की लड़ाई को लेकर जिले के एक सांसद और विधायक में ठन गई । विधायक भी बहुत ऊँची पहुँच वाले थे । हाईकमान से उनके प्रगाढ़ सम्बन्ध थे । लोक सभा के चुनाव आने पर विधायक महोदय को मौका मिल गया..,बदला लेने का... । अपने सारे वफादारों को लगा दिया, एम.पी.साहब के विरूद्ध कार सेवा में । चुनाव सम्पन्न हुये, और जब चुनाव परिणाम आया तो सांसद महोदय बड़े मामूली अन्तर से चुनाव हार गये । आशानुरूप वे जिले में विधायक महोदय के विधान सभा क्षेत्र में भारी मतों से पिछड़े । एम.एल.ए.साहब बड़े खुश थे । मूंछ की लड़ाई जीत जो गये। कुछ माह के अन्तराल में विधान सभा चुनाव की तारीखें तय हो गई। एम.एल.ए.साहब अपने टिकट को लेकर आश्वस्त थे । उनके रसुखात के चलते भला उनका टिकट कटाने का साहस किसी में था भी नहीं, मगर जब टिकट की घोषणा हुई तो उन्हें व उनसे ज्यादा उनके वफादारों को झटका लगा । सूची में उनका नाम नहीं था..। मगर मन अभिमान से भरा हुआ था, इसलिये पहुँच गये राजधानी...., अपने आकाओं के पास । खूब हाथ-पैर मारे, मगर असफल रहे ।

उनको टिकट कटने का कारण बताया तो उन्होंने माथा पीट लिया ; उनको बताया गया कि इस बार हाईकमान ने यह फैसला किया कि, लोक सभा के चुनाव में जिन विधान सभा क्षेत्र में पार्टी भारी मतों से पिछड़ी है वहाँ से मौजूदा विधायक को टिकट नहीं दिया जायेगा क्योंकि मौजूदा विधायक के प्रति जनता की नाराजगी की वजह से ही पार्टी लोक सभा में पिछड़ी है, और आपके विधान सभा क्षेत्र से भी पार्टी भारी मतों से पिछड़ी है इसलिये हम कोई जोखिम नहीं लेना चाहते....। एम.एल.ए.साहब आज वर्चस्व की इस लड़ाई में खुद से ही हार गये थे ।

संपर्क :- देवेन्द्रसिंह राठौड़ (भिनाय),
395, बी.के.कौल नगर अजमेर
Email:- dsrbhinai@gmail.com

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