गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

अरुण कुमार झा का व्यंग्य - अनुवाद : अर्थ और संदर्भ की बिसात

अनुवाद : अर्थ और संदर्भ की बिसात

अरुण कुमार झा

बेंगलुरु

संपर्क : arunjha03@gmail.com

चाहें तो जोर आजमाइश कर लीजिए। दूसरों को कहाँ ढूढेंगे ! खुद इतर भाषा के किसी पाठ का चयन कर अपनी भाषा में उसका अनुवाद कर डालिए। दो-चार दिन इस अनुवाद को ऐसे ही छोड़ दीजिए। बाद में मूल पाठ का एक बार फिर से अनुवाद कीजिए (इस समय पहला अनुवाद देखने की मनाही है।) और जब आपका यह ताजा-तरीन अनुवाद तैयार हो जाए, तब अपने पुराने पर्चे को निकालिए और लगे हाथ दोनों अनुवादों की तुलना कर शर्तिया परख लीजिए कि अनुवाद कार्य दास कबीरा के शब्दों में ‘सीस काट भुईं पे धरै, तापर धारै पाँव। दास कबीरा यों कहै, ऐसा होऊ तो आव’ की तुलना में कितना दमदार है।

इन दिनों ‘वर्ल्ड क्लास’, ‘इंटरनेशनल स्टैंडर्ड’, ‘ग्लोबलाइजेशन’, ‘लिबरलाइजेशन’ जैसे पाये के दर्जन भर शब्द बाजार में प्रचलन में हैं और धड़ल्ले से बिक रहे हैं । प्रबुद्ध साहित्यकार जयशंकर प्रसाद के एक नाटक में सिकंदर का दूत दंडायन ऋषि से कहता है – “जगद्‌विजेता सिकंदर ने आपको स्मरण किया है” और प्रत्युत्तर में ऋषि की उक्ति है – “तुम्हारा राजा अभी झेलम भी पार भी नहीं कर सका और जगद्‌विजेता की उपाधि लेकर जगद्‌ को वंचित करता है? मैं लोभ से, सम्मान से या भय से किसी के पास नहीं जाता...।” समाजशास्त्रियों के लिए यह शोध का विषय हो सकता है कि ‘वर्ल्ड-क्लास’ शब्द के प्रयोग में ‘वर्ल्ड’ से अनभिज्ञ लोगों की मनोदशा का देश के सामाजिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ेगा? दूरदर्शन के चैनलों पर हिंदी का प्रयोग अब काफी बढ़ा है पर ठेठ हिंदी बोलने वाले भी वहाँ जिम्मेदारी, खुन्नस या रोबदाब के प्रसंग में अक्सर बीच में अंग्रेजी ठूंस देते हैं। क्यों? कोई जरा इन जुमलों का हिंदी अनुवाद करके तो देखे, अनुवाद दोयम दर्जे का साहित्य कैसे बना, शायद पता चल जाए।

आप जानते होंगे कि जो लोग पीछे चलने के आदी होते हैं, वे अपने आका का हुक्म बजाते समय अक्सर अपनी आँख मूँद लेते हैं। पर अनुवाद कार्य में नकेल अगुआ (मूल पाठ) के हाथ में नहीं, बल्कि एक ऐसे तीसरे किरदार के हाथ में होती है जिसे दुनिया अनुवादक के नाम से जानती है और यह अनुवादक नामक जीव अगर विश्वस्त न हुआ तो अर्थ का अनर्थ कर डालने में पूरी तरह सक्षम होता है । आप अनुवाद के सिद्धांत पढ़ लें – अनुवाद कहीं कला है तो कहीं विज्ञान; कहीं कौशल है तो कहीं वाद-वृतांत; कभी दिमागी कसरत है तो कभी चौसर का खेल; कभी शब्दकोशी कुश्ती है तो कभी सृजन की रेल। किसी की दृष्टि में यह काम स्वांत: सुखाय है तो किसी और की नजर में बहुजन हिताय। अनुवादक अकेले किस-किस को संभाले, एक से हेल-मेल बढ़ाओ तो दूसरा दगा दे जाता है। अब आप सीधे अनुवाद प्रक्रिया पर उतर आइए- यदि स्रोत व लक्ष्य दोनों भाषाओं पर आपकी अच्छी पकड़ है तो शब्दानुवाद की भीष्म–प्रतिज्ञा से आप वाकिफ होंगे। इसी तरह कोई अनुवाद अगर आपको वृंदावन की गलियों में घुमाता नजर आए तो सलाह है, जरा सी समझ के लिए आस-पड़ोस के भाषाशास्त्री के पास कतई न जाएं। अन्यथा, महाभारत की पुनरावृति को आप रोक नहीं पाएंगे। कुछ उदाहरण देख लें:-

मूल :- Faults do not lie at their door.

अनुवाद :- दोष उनके दरवाजे पर नहीं है।

मूल :- House Warming Ceremony.

अनुवाद :- गृह तापन समारोह ।

मूल :- The Prime Minister injects new blood in the Cabinet.

अनुवाद :- प्रधान मंत्री अपने मंत्रिमंडल में नए खून की सूई लगाते हैं ।

मूल : ‌ ‌President Roosevelt was patient with Mr. Winston Churchill.

अनुवाद :- राष्ट्रपति रूजवेल्ट विंस्टन चर्चिल के मरीज थे ।

अनुवाद व्यवहार में पेंच भी होता है, यह मेरे मित्र ने मुझसे बताया । वाकया यों है कि एक गुरुजी (‘टीचर’ में मेरे इस भारतीय मित्र के अनुसार गंभीरता व सिजदा के भाव ही नहीं हैं ।) अंग्रेजी पढ़ाने में माहिर थे। बाजाब्ता “यहाँ धारा-प्रवाह अंग्रेजी बोलना और लिखना सिखाया जाता है” नामक कोचिंग सेंटर खोल रखी थी और अंग्रेजी की जमाने की आर्थिक हैसियत का ख्याल रखते हुए अपना पारिश्रमिक प्रतिदिन एक घंटा के हिसाब से (छुट्टियों को बाद देकर) प्रतिमाह पांच हजार रुपये तय कर लिया था। उनके यहाँ एक बार एक लड़का अंग्रेजी सीखने की इच्छा लेकर आया। उसके पिताजी इलाके के ख्यातनाम वकील थे। गुरुजी प्रसन्न हुए। यह सोच कर कि ख्यातनाम वकील उनके फीस की ख्याति से भी परिचित होंगे, गुरूजी ने बगैर कोई दरियाफ्त किए लड़के को पढ़ाना शुरू कर दिया । पर आफत तो तब आई जब महीना भर की सिखाई के दाम मिले महज ५ सौ रुपये, और वह भी नौकर के मार्फत । वकील से जिरह बेकार थी, सो गुरुजी ने पढ़ाना चालू रखा। दो-तीन दिन बाद वकील साहब के पुत्र ने एक प्रश्न किया – “दीवार पर चूने की पुताई करना” को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?” गुरुजी मुस्कुराये, कहा – “To make a coat of lime on the wall.”, इसे लिख लो, याद कर कल सुनाना । लड़का शाम को घर पर यह पाठ याद कर रहा था। वकील साहब ने सुना तो उनकी त्यौरी चढ़ गई । लडके से इस बाबत पूछने पर पता चला कि यह गुरूजी की सीख है। अगले ही दिन गुरूजी को चाय पर आमंत्रित किया गया। जब चाय की चुस्की चस्का हुई तो बात की बात में वकील साहब ने ‘Whitewash’ की हिंदी पूछ डाली। गुरूजी गंभीर नहीं हुए। अंग्रेजी सीखने व सिखाने में आनेवाली समस्याओं का पहले विवेचन किया । तदुपरांत, भाषा शिक्षण के दृष्टिगत अनुवाद पद्धति की उपयोगिता के महत्त्व पर प्रकाश डाला और कहा कि भाषा का व्यक्ति के मनस के साथ गहरा संबंध है । इसकी थोड़ी भी अनदेखी हो जाए तो भाषा के तार झंकृत होने से पहले ही बिखरने लगते हैं, पर यदि समुचित पोषण हो तो भाषा का रूप निखरने में भी देर नहीं लगता । उदाहरण के लिए ‘Whitewash’ की हिन्दी ‘सफेदी-सफाई’ कामकाजी हिन्दी के रूप में स्वीकार्य होगी, परंतु इसे कोई यदि ‘शुभ्र-प्रक्षालन’ का नाम दे दे तो अनुवाद पर कृत्रिमता का आरोप कोई भी मढ़ सकता है । वकील साहब मामला समझ गए । उन्होंने गुरूजी को पारिश्रमिक की शेष राशि सादर भेंट की।

अच्छे अनुवादकों और अनुवाद-पंडितों का जिक्र यहाँ बेकार होगा । अव्वल तो वे बिसात की परिधि में अंटते ही नहीं हैं ।दूसरे उनका यश कई बार इतना विस्तार पा चुका होता है कि जिक्र भर से बहुतों के हाथ-पांव फूलने लग जाते हैं । जानकारों की इस मामले में राय यह है कि भाषाओं की सतही समझ के आधार पर अनुवाद कर लेना बड़े जीवट का काम है । इस देश की राजभाषा इसके अनेक प्रदेशों की जनभाषा भी रही है । पर साधारण बोलचाल, शौक-मनोरंजन या फिर दिल की बात को बाद दे दें तो वहां भी विकास के वाहन अंग्रेजी की पटरी पर ही दौड़ते दिखाई देते हैं । सभ्य-शालीन कहाने के लिए अंग्रेजी का पायदान क्यों जरूरी होता है? इस पर तो गुणीजन ही प्रकाश डालेंगे ।***

[पूर्व में यह निबंध ‘मिलाप राजभाषा पत्रिका’, हैदराबाद के १५ अगस्त २००६ अंक में प्रकाशित हो चुका है |]

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