यशवन्त कोठारी की लघुकथा - एक बूढ़ा और गिलहरी

लघुकथा

   एक बूढ़ा   औऱ  गिलहरी 

यशवन्त कोठारी

तेज बर्फ गिर रही है। चारों तरफ  बर्फ का समंदर है। पेड़ो पर पत्तियों  पर सब तरफ बर्फ ही बर्फ। कभी रेत  का समंदर देखा था,फिर पानी का समंदर  और अब बर्फ का समंदर। 

इस तेज बर्फानी  मौसम में सामने वाले फ्लेट में  एक बूढ़ा  नितांत अकेला ,रोज उसे देखता हूं ,केवल सिगार पीने  के लिए बाहर  आता है, उसे बाहर  देख कर दो गिलहरियां  इस मौसम में भी पास  आकर उसे टुकुर टुकुर तकती  हैं।  बूढ़ा  उन्हें मूंगफली के दाने  डालता है, गिलहरी दाने  लेकर भाग जाती हे बर्फ अभी भी गिर रही है। 

बूढे  के एकांत अकेलेपन  उदासी  का सहारा बन गयी  है गिलहरी। एक चिड़िया भी आ गयी  है. 

गिलहरी की आँखों  में चमक है,  बूढ़े  की आँखों में उदासी।

आज गिलहरी को डालने के लिए कुछ  नहीं है। बूढ़ा ,गिलहरी  चिड़िया तीनो उदास हैं। बर्फ़   अभी भी गिर रही है।  

यशवन्त  कोठारी  ८६  लक्मी नगर ब्रह्मपुरी बहार  जयपुर-२

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2 टिप्पणियाँ "यशवन्त कोठारी की लघुकथा - एक बूढ़ा और गिलहरी"

  1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव7:18 am

    थोड़े में ही बहुत कुछ कह दिया वाह कोठारी जी बूढा
    गिलहरी और चिड़िया उनके सुख दुःख आपसी रिश्ते
    सचमुच प्रभावशाली पर उत्सुकता रह गयी आगे क्या
    हुआ खैर फिर सही बधाई

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