शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - फेसबुकी विमर्श

फेस बुकी विमर्श

यशवन्त कोठारी

हर तरफ फेस बुकी विमर्श चल रहा है। जिसे कोई नहीं जानता उसके फेस बुक पर पांच हजार से ज्यादा मित्र है। एक फेस बुकी मित्र के पांच हजार से ज्यादा चाहने वाले थे, मगर संसार छोड़ा तब उठाने वाले नहीं मिले। शव वाहन से ले जाये गये। जो लोग सोशल साइटों पर पैदा होते हैं वे सोशल साइटों पर ही मर जाते हैं। कभी भी आभासी दुनिया से वास्तविक दुनिया में नहीं जा पाते। फेस बुक एक नशे की तरह छा रहा है। फेस बुक से बचो तो ट्विटर और आरकुट और ऐसी ही सैंकड़ों अन्य छोटी-मोटी साइटें।

पहले गांव -गली -मोहल्ले में चौपालें होती थी, अब फेस बुक है। अपनी कोई भी बात अपने मित्रों, परिचितों, रिश्तेदारों या अन्य लोगों को पहुँचाने के लिए फेसबुक- ट्विटर की दुनिया का जवाब नहीं। राजनीतिक दल एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के लिये फेसबुक-ट्विटर का जम कर दोहन करते हैं। बयानवीर राजनीतिज्ञों के लिए तो फेसबुक-ट्विटर एक बड़े मीडिया हाउस की तरह है। खूब जमकर एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की क्रिया का सम्पादन किया जाता है। मध्यमवर्गीय जनता भी फेस बुक पर मजे लेती रहती है। सास-बहू टाइप कमेन्ट भी खूब लिखे और पढ़े जाते हैं। फेस बुक विमर्श में पत्रकारों, कलाकारों, साहित्यकारों, ग्रहणियों, निठ्ठलों, का योगदान भी कम नहीं है। वे एक दूसरे पर कमेंट करते रहते हैं। लाइक और अनलाइक करते रहते हैं, अपना और दूसरों का समय बर्बाद करते रहते हैं। बुद्धिजीवियों का मामला बड़ा रोचक होता है। मेरे अपने सर्वे के अनुसार यदि क' नाम का बुद्धिजीवी 'ख' को एक लाइक मारता है तो 'ख' भी एक ही लाइक करता है, यदि 'ग' एक कमेंट 'च' पर करता है तो 'च' भी एक ही कमेंट 'ग' पर करता है। कई लोगों के कमेंट इतने ओछे होते हैं कि उन्हें अनफ्रेण्ड करना ही ठीक रहता है। फेस बुक पर आन्दोलन भी हो जाते हैं। एक राजनीतिक पार्टी तो पूरी की पूरी सोशल साइट से अस्तित्व में आकर सत्ता तक पहुँच गई।

कभी-कभी फेसबुक- सोशल नहीं हो कर अनशोशल हो जाती है।

एक लेखक विदेश गया उसने फेसबुक पर यह समाचार दे दिया। सभी पांच हजार मित्रों के सीने पर सांप लोट गये। साथी लेखकों ने हवाई अड्डों से लगाकर गुदडी, ठडं, विदेशी, सुरा सुन्दरी पर लेख लिखकर फेसबुक पर लगा दिये विदेश गये लेखक को इतना प्रचार मिल गया कि बस पूछो मत। जो साथी लेखक लेख नहीं लिख पाये, उन्होंने लाइक, अनलाइक, शेयर प्रोमोट आदि स्थलों पर चटखा लगा लगा कर काम चलाया। फेस बुक यदि स्वर्ग है तो फेसबुक को काम में लेने वाले स्वर्गवासी हैं। जीवन के हर मोड पर सोशल साइट खड़ी है। आप चाहे न चाहे सोशल साइट आपको पटकनी देने को तैयार है। लोकप्रिय है। काम की है। मगर खतरनाक है। सूचना है, डेटा बेस है, समाचार है, अफवाह है फिर भी फेसबुक है और फेसबुकी विमर्श है। पिछले दिनों एक व्यक्ति के मरने की अफवाह फेसबुक पर आई। भाई ने जल्दी से कम्प्यूटर खोलकर जिन्दा होने की पुष्टि की।

फेसबुक पर मरने की सूचना मिलने पर भाई लोग लाइक पर लाइक करते चले जाते हैं। कभी कभी आत्मा को शान्ति दे भी लिख देते हैं। दो -चार नये लेखक तो ऐसे भी है जिन्होंने मृत लेखकों के नाम पर खाते खोल दिये और उन खातों पर अपनी भड़ास निकाल रहे है। पता लगने पर खाते बन्द भी कर देते हैं। फेस बुक पर आप गाने वीडियो आदि अपलोड करके उसे वायरल कर सकते हैं। नेताओं के लिए फेसबुक अत्यन्त ही उपयोगी अस्त्र, शस्त्र है। नारों को वायरल करने के लिए ट्विटर - फेसबुक का जवाब नहीं। फेसबुकी लोग स्वतन्त्र है अतः अराजकता फैला सकते हैं। अपने अपने चेहरे फेसबुक पर लगाकर चेहरे छुपाने लगे हैं लोग। सोशल साइटों पर धमाल - कमाल दोनों जारी है। फेसबुकों पर मित्र का मुखौटा लगा कर शहर में घूम रहे है लोग।

कई चालाक, धूर्त, लोग फेसबुक पर गंजों को कंघियां बेच रहे हैं और ज्यादा धूर्त लोग फेसबुक पर अन्धों को सुरमा और चश्मा बेच रहे हैं। फेसबुक विमर्श जारी है। काफी समय हो गया है फेसबुक खोलकर देखता हूँ मित्रों में नया क्या हुआ है। वैसे फेसबुक का दसवां जन्मदिन है। हेप्पी बर्थ डे फेस बुक।

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यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्मीनगर ब्रहमपुरी बाहर

जयपुर -2

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