गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

राजीव आनंद का स्मृति लेख - अंतरराष्ट्रीय कविता जगत में भारतीय कविता के विजिटिंग कार्ड रहे नामदेव ढसाल

स्मृति लेख
      अंतरराष्ट्रीय कविता जगत में भारतीय कविता के विजिटिंग कार्ड रहे नामदेव ढसाल

    नामदेव लक्ष्मण ढसाल 15 फरवरी 1949 को पुणे के निकट पुर गांव में महार परिवार में जन्में तथा मुबई की गोलपीठा और कमाीठीपुरा जैसी बदनाम बस्तियों में पले-बढ़े 15 जनवरी की सुबह मुंबई के बॉम्बे हास्पिटल में अपनी अंतिम सांसे ली. दलित और मुख्यधारा दोनों ही समुदाय के बुद्धिजीवियों की उपेक्षा के शिकार रहे नामदेव ढसाल प्रगतिशील नहीं बल्कि एक क्रांतिकारी कवि थे.


    ढसाल की पहली कविता संग्रह 'गोलपीठा' न सिर्फ मराठी साहित्य में ही अपना स्थान बनाया अपितू विश्व साहित्य में अपनी जगह बनायी. प्रसिद्ध लेखक एवं नोबेल विजेता वीएस नॉयपाल ने अपनी पुस्तक 'अ मिलियन म्यूटनी' में नामदेव ढसान के लिए एक पूरा अध्याया ही लिखा है. अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में ढसाल साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में जो कार्य किया यदि उसे उचित स्थान मिले तो नामदेव ढसाल के प्रति सच्ची श्रदांजलि होगी वरन् जीते जी तो जहां दलित बुद्धिजीवियों ने उन्हें डॉ. अम्बेडकर और कांशीराम के पंक्ति में स्थान नहीं दिया वहीं किसी को भी लोहिया-जेपी बना देने वाले सवर्ण बुद्धिजीवियों ने भी उन्हें उचित सम्मान न दे सके.


    कवि विष्णु खरे ने ठीक कहा है कि ''अंतरराष्ट्रीय कविता जगत में भारतीय कविता के विजिटिंग कार्ड का नाम नामदेव ढसाल है. उन्होंने कविता की संस्कृति को बदला है, कविता को परम्परा से मुक्त एवं उसके अभिजात्यपन को तोड़ा है. संभ्रांत कविता मर चुकी है और इसे मारने का काम ढसाल ने किया है. आज हिन्दी के अधिकांश सवर्ण कवि दलित कविता कर रहे है तो इसका श्रेय ढसाल को जाता है. ढसाल ने देश की राजनीति को बदल दिया. भारत में ऐसा और कोई कवि नहीं हुआ.''


    9 जुलाई 1972 को पश्चिम भारत में 23 साल के युवा ढसाल मुबंई में टैक्सी चलाते हुए 'दलित पैंथर' जैसे विप्लवी संगठन की स्थापना की तथा इस संस्था ने डॉ. अम्बेडकर के बाद अपमान से बोधशून्य दलित समुदाय को नए सिरे से जगाया. दलित पैंथर की प्रेरणा उन्हें अमेरिका के ब्लैक पैंथर आंदोलन से मिली थी जो अश्वेतों को उनके राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक अधिकार दिलाने के लिए 1966 से संघर्षरत था. दलित पैंथरों ने डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा को अपनाया हालांकि यह संगठन अपने उत्कर्ष पर तो नहीं पहुंच सका लेकिन बकौल चिंतक आनंद तेलतुम्बडे, ''इसने बताया कि सताए हुए आदमी का आक्रोश क्या हो सकता है. इसने दलित राजनीति को एक मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान की.''


    धरती के दोजख में रहते हुए ढसाल ने अपने जीवन के स्याह पलों को तपती लावा की तरह अपनी कविताओं में उकेरा वह दलित ही नहीं विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर है. हिन्दी लेखक उदय प्रकाश ने ठीक कहा है कि ''ढसाल प्रगतिशील नहीं बल्कि एक एक क्रांतिकारी कवि थ. उनकी कविता में अभिव्यक्ति बेधने वाली थी. सड़कों और गटर की भाषा से कविता करते हुए उन्होंने कविता की परम्परा को ही बदल दिया.''
    अपनी पहली कविता संग्रह 'गोलपीठा' से साहित्यिक फलक पर चमकने वाले ढसाल की अन्य कविताएं 'प्रियदर्शनी', 'खेल', 'मुरका महातराने', 'तुझी अयात कांची' नामक कविता संग्रह में प्रकाशित हुई. ढसाल ने दो उपन्यास यथा 'अम्बेडकरी चालवाल' तथा अंधेले शतक' लिखा जो न सिर्फ मराठी साहित्य अपितू विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर है. भारत सरकार ने 1999 में ढसाल को पदमश्री से नवाजा वहीं साहित्य अकादमी ने इन्हें गोल्डन जुबली लाइफटाइम एचिवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया.
   

ढसाल की एक मराठी कविता का हिन्दी में सूर्यनारायण रामशुभे ने बहुत ही अच्छा भाव अनुवाद किया है-


                ''हे मेरी प्रिय कविता
                 नहीं बसाना है मुझे अलग से कोई द्वीप
                 तू चलती रह, आम से आम आदमी की उंगली पकड़
                 मेरी प्रिय कविते
                 जहां से मैंने यात्रा शुरू की थी
                 फिर से वहीं आकर रूकना मुझे नहीं पंसद
                 मैं लांघना चाहता हूँ
                 अपना पूराना क्षितिज'' 


इतनी सुंदर कविता लिखने वाले नामदेव लक्ष्मण ढसाल को जीते जी तो दलित व सवर्ण बुद्धिजीवियों ने हशिए पर धकेले रखा, मृत्यु के बाद भी कहीं दो शब्द इस महान क्रांतिकारी कवि के लिए सवर्ण मीडिया में नहीं छापा गया. खैर नामदेव ढसाल जैसे कवि मरते नहीं अमर हो जाते है. उनकी स्मृति सदा जीवित रहेगी.

 

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंड़ा
गिरिडीह-815301
झारखंड़

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------