बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा की लघुकथा - कुहासा

अध्यापक कभी अवकाश - प्राप्त नहीं होता , उसकी निवृति उसके व्याप्ति - सूत्र को अनन्त बनती है.

..........प्रोफेसर सेवक वात्स्यायन

लघुकथा

कुहासा

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सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

" मम्मी ! एक बात तो पक्की है " बेटी की आँखों में चमक थी .

" क्या ? "

" मेरे पापा मेरी सभी सहेलियों के पापा से अच्छे हैं ."

" वह कैसे ? " माँ के चेहरे पर मुस्कान थी .

" पापा हमारी जरूरत की कोई भी बात हमारे कहने से पहले ही समझ जाते हैं और पूरी भी कर देते हैं .उनकी इच्छा है कि मैं खूब पढूं और बड़ी होकर खूब अच्छे काम करूं .........कई बार तो पापा स्व्यम तकलीफ में होते हैं और हमें बताते भी नहीं और हमारी परेशानी को हल करने में लग जाते हैं .रियली पापा इस ग्रेट .आई एम् प्राउड आफ हिम ." बेटी ने चहकते हुए कहा .

" इतनी बड़ी - बड़ी बातें करने के लिए अभी तुम बहुत छोटी हो , समझीं . जाओ अपना होम - वर्क पूरा कर लो ." माँ ने बेटी को दुलारते हुए कहा .

" ठीक है ! पर पहले मेरी पूरी बात सुनो ."

" बोलो मेरी अम्मा ."

" वो जो साक्छी के पापा हैं न , वे हर दिन ड्रिंक करते हैं , केसिनो जाते हैं , घर में गुस्सा करते हैं और कोई उन्हें टोकता है तो घर में ही मार - पीट पर उतर आते हैं . साक्छी के केरियर की तो कभी बात ही नहीं करते ."

" हाँ बिटिया तुम ठीक कहती हो ! तुम्हारे पापा सिर्फ अच्छे पापा ही नहीं सबसे अच्छे पति भी हैं .मेरी और ही देखो . जब मैं उनकी पत्नी बनीं , मैं एक सामान्य और मामूली लड़की थी . तुम्हारे पापा ने मेरे अंदर बैठी प्रतिभा को पहचाना , मुझे उत्साहित किया , मेरे सोये आत्मविश्वास को जागृत किया , हर कठिनाई या असफलता पर भी मुझे निराश नहीं होने दिया , जरूरत पड़ने पर गाइड भी किया . उसका परिणाम सबके सामने है , आज मैं सफल स्कूल - टीचर हूँ .नहीं तो मेरी सारी जिंदगी सिर्फ चूल्हा - चौका बन कर ही रह जाती ."

" तुम दोनों ही महा - बुद्धू हो ." पास खड़े बेटे ने व्यंग से दोनों को टोका .

" क्या कह रहा है ,जतिन . तेरे पापा तेरे लिए क्या कमीं छोड़ते हैं ?"

" वो जो कुछ भी करते हैं , अपने स्वार्थ के कारण करते हैं ,अपनी चोरी पर पर्दा डालने के लिए करते हैं ."

" ऐसी बातें करते हुए तुम्हें शर्म आनी चाहिए ."

" मम्मी ! शर्म मुझे नहीं , पापा को आनी चाहिए . आप अपना ब्लड - प्रेशर ऊँचा मत कीजिये . पहले मेरी पूरी बात सुन लीजिये ."

" बोल क्या कहना चाहता है ."

" आपको पता भी है , आजकल पापा जब देखो तब सरला आंटी के घर बैठे दिखाई देते हैं ."

" तुझे कैसे पता ?"

" मेरा दोस्त राहुल उसी गली में रहता है , जिसमें सरला आंटी का घर है . कल पापा ने आपको बताया था कि पापा अपने आफिस - फ्रेंड के साथ किसी को देखने असप्ताल गये थे , जबकि राहुल ने मुझे आज बताया कि पापा बहुत देर तक सरला आंटी के घर पर थे .पापा ने आपसे झूठ बोला न . क्यूँ बोला ये तो वे ही जाने ."

" भइया ! ऐसी उल्टी - सीधी बातें तुझे राहुल ही पड्राता है . पापा के लिए ऐसी बात कहते हुए तुझे भी शर्म आनी चाहिए .सरला आंटी एक समझदार महिला होने के साथ - साथ साहित्यकार भी हैं ."

" हाँ , बड़ी भारी साहित्यकार हैं , महादेवी वर्मा हैं .. दुनियादारी जानती नहीं और तरफदारी करने लगी पापा की ."

" तुम दोनों बहस मत करो …….हो सकता तुम ठीक कह रहे हो .पर किसी दोस्त - वोस्त कि बातों में आकर तुम्हें अपने पिता को कटघरे में नहीं खड़ा कर देना चाहिए , अगर तुम्हारे पापा ने झूठ बोला भी है तो वे अधिक दिन तक उसे मुझसे छिपा नहीं पाएंगे . उन्हें मुझसे अधिक कोई नहीं जानता . उनके प्रति मेरा विश्वास इसलिए अडिग नहीं है कि वे मेरे पति हैं और पति कुछ भी करे , वह देवता ही होता है . मैं जानती हूँ उन्होंने अपने रक्त से सींच कर इस घर - परिवार की परवरिश की है और किसी भी हालत में वे इस पेड़ को सूखने नहीं दे सकते .इस समय तुम दोनों का फर्ज सिर्फ इतना है कि अभी जो काम तुम्हारे जिम्मे है , तुम उसी में लगे रहो बस .....समझे मेरे बच्चों ."

" मम्मा, ! यु आर ग्रेट . " दोनों बच्चे एक साथ बोले .

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
डी - 184,श्याम पार्क एक्सटेंशन , साहिबाबाद ( गाजिआबाद ) ऊ .प्र .Pin 201005,
Mo.No.09911127277 ,

1 blogger-facebook:

  1. अखिलेः चन्द्र श्रीवास्तव9:27 am

    पारिवारिक रिश्तों में आपसी विश्वास और समझदारी
    जरूरी है तभी रिश्ते टिक पातें है अरोरा जी की कहानी
    इसी तथ्य पर प्रकाश डालती है अच्छी रचना के लिये
    बधाई और शुभेच्छा

    उत्तर देंहटाएं

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