शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

प्रमोद यादव का व्यंग्य - मैं बिकाऊ नहीं

मैं बिकाऊ नहीं../ प्रमोद यादव

‘ पापा ..पापा..हम अगर आपको बेचें तो आप कितने में बिकेंगे ? ‘

आठ वर्षीय बेटे के मुंह से यह सवाल सुन मुझे अटपटा लगा, मैंने उलटे उससे पूछा- ‘ ये क्या अटपटा सवाल है ? मैं क्यों बिकूँगा ? और भला मुझे क्योंकर कोई खरीदेगा ? तुम्हारे दिमाग में ऐसी बातें आई कहाँ से ? ‘

‘ पापा..”छोटा भीम” देख रहा था तो ब्रेक आने पर दूसरे चैनल पर चला गया..वहां कोई अंकल बता रहे थे कि युवराज चौदह करोड़ में बिका..दिनेश कार्तिक साढ़े बारह करोड़ में..सहवाग तीन करोड़ में...इसलिए पूछा कि आपको अगर बेचें तो कितना मिलेगा..’

‘ अपनी मम्मी से पूछ लेना..मेरी कीमत वही लगा पाएगी..वैसे अक्सर तो वह यही कहती रहती है कि मुझे कोई कौड़ियों के भाव भी न खरीदे..’

‘ मैं समझा नहीं पापा..साफ-साफ बताओ न आप कितने में बिक सकते हैं ? और आपको खरीदेगा कौन ? क्या आदमियों की भी बोली लगती है ? ‘

‘ बेटे इतिहास उठाकर देखो तो समझोगे..सदियों पहले “दास-प्रथा” का चलन था..बड़े-बड़े अमीर विदेशी-हब्शी लोग थोक के भाव में आदमी ( दास ) खरीदते और उनसे ढोरों की तरह काम लेते..आदमियों की मंडी सजती थी….खरीदार आदमियों के शरीर को छू-छूकर देखते...हट्टे-कट्टे और मांस-पेशी वालों को पसंद करते ..जैसे शरीर-शरीर न हुआ सब्जी हो गया.. फिर मोल-भाव करते...मुझे खरीदकर कोई मेरा अचार भी नहीं दाल सकेगा..मुझे कोई नहीं खरीदेगा..’

‘ मम्मी भी नहीं ? ‘ उसने मासूमियत भरे स्वर में पूछा.

‘ तुम्हारी मम्मी तो सत्रह साल पहले मुझे “सात वचनों” में लपेटकर खरीद ली है..अब तो उसी की प्रापर्टी हूँ..दुबारा मुझे क्यों खरीदेगी ? ‘

‘ बेच तो सकती है ना ? ‘

‘ हाँ..बेच सकती है ‘ अब बेटे को कैसे बताता की मुझे बेच डाली है. मैंने कहा- ‘ पर “ सेकण्ड हैण्ड “ माल आजकल खरीदता कौन है ? सबको नए की चाह है..’

‘ पर पापा..युवराज कैसे चौदह करोड़ में बिक गया..वह भी तो आपकी तरह “ सेकण्ड हैण्ड “ ही होगा..’

‘ वो नंबर वन क्रिकेट खिलाडी है बेटे .. क्रिकेट के काले धंधे में सब कुछ बिकाऊ है..’

‘ तो आप इस काले धंधे से क्यों नहीं जुड़े ? जुड़ते तो आज करोड़ों के होते..’

‘ अरे बेटा..अब ये उमर काले-धधे करने के नहीं , बल्कि बाल काले करने के हैं..बता..बाल काले करूँ कि काला धंधा करूँ ? ‘

‘ अच्छा पापा..ये बताइये कि क्रिकेट खिलाड़ी ही बिकते हैं या हाकी-फ़ुटबाल खिलाड़ी भी ?

‘ वैसे तो इस देश में सब बिकाऊ है..पर दाम केवल क्रिकेट में ही अच्छे मिलते हैं..’

‘ तो पापा..कल से मैं केवल क्रिकेट ही खेलूंगा ..मेरे लिए आप स्टम्प और एक बैट ला दीजिये..प्रक्टिस करूँगा..आपकी उमर तक तो करोड़ों का हो ही जाऊँगा..’

‘ ऐसा नहीं होता मेरे लाल .’ मैंने समझाया – ‘ केवल नामी-गिरामी खिलाड़ी ही बिकते हैं...’

‘ तो नमन झा क्यों नहीं बिका पापा ? ‘

मैं झुंझला गया,बोला- ‘ ये क्या तुम खरीदने-बेचने और मोल-भाव की बातों में अपना समय बर्बाद कर रहे हो..जाकर चुपचाप अपनी पढ़ाई करो...बच्चों को इन सब बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए..’

‘ ध्यान नहीं दूंगा तो आपकी तरह हो जाऊँगा पापा..न घर का न घाट का....मैं भी नहीं बिक पाऊंगा ..और करोड़ों से वंचित रह जाऊँगा..’

मैंने गुस्से से फटकारा- ‘ छोडो ये बकवास ..और दूसरा कुछ पूछना हो तो पूछो..’

‘ एक सवाल के जवाब को तो आप जलेबी की तरह गोल-मोल कर रहें हैं..और क्या पूछूं ? अरे बताइये भी कि आप जैसे लोग कभी बिकते भी हैं या..’ वह भी तलमला गया.

‘ हम आम आदमी पांच साल में एक बार ही बिकते है बेटा ..चुनाव के दिनों में..वह भी कौड़ियों के मोल..कभी साडी में बिक जाते हैं तो कभी कम्बल में..इससे ज्यादा घास कोई डालता भी नहीं..अब आम आदमी करे तो क्या करे ? ‘

‘ क्या करें से क्या मतलब....कोशिश तो करें कि “आल सीजन” बिक सकें..साग-सब्जियों की तरह...कल को मेरा कोई दोस्त पूछेगा कि तुम्हारे पापा की क्या कीमत है तो मैं क्या जवाब दूंगा ?

‘ कह देना डालर के मुकाबले रूपया से भी कम..’ मैं भन्ना गया- ‘ पूछेगा तो पहले उसके बाप की कीमत पूछना..’

‘ पापा ..आप तो नाराज हो गए..जैसा कि आप कहते हैं-सब बिकाऊ है तो किसी का भाव पूछने में क्या हर्ज है ? आप अपनी कीमत नहीं आंक सके पर बाकी तो आंकते ही होंगे..’

‘ हाँ..बाकी बिकाऊ होंगे..मैं नहीं .मैं किसी भी कीमत में नहीं बिकूँगा..’ मुझे ताव आ गया.

‘ युवराज से कुछ ज्यादा....बीस करोड़ में भी नहीं ? बेटे ने कटाक्ष किया.

‘ हाँ.. बीस करोड़ में भी नहीं... मुझे काला धंधा नहीं करना..मैच-फिक्शिंग जैसे घिनौने काम नहीं करने..मैं बिकाऊ नहीं ..समझे ? ‘

‘ तो ठीक है पापा..आप बाल ही काला करते रहिये..मैं मम्मी से बाकी पूछ लेता हूँ..’

अब बेटे को कैसे बताता कि उसके मम्मी की नजरो में मेरी कीमत फूटी कौड़ी भी नहीं..रोज-रोज लडती है कि हर महीने आफिस से वेतन के अतिरिक्त “और कुछ’ क्यों नहीं लाता..जैसे पड़ोस के लोग लाते हैं.. रोज सुनाती है कि पड़ोसियों का घर दिन प्रतिदिन भरता जा रहा है और हमारा घर किसी मरघट की तरह सूना का सूना ..यही सब सोच रहा था कि अचानक पूरबी आ गई...और बेटे ने आखिरकार उसे प्रश्न दाग ही दिया- ‘ मम्मी..पापा को अगर बेचें तो कितने में बिकेंगे ?

‘ तुम्हारे पापा बिकाऊ नहीं बिट्टू..( बिकते वही हैं जो काम के होते है )..उन्हें कोई नहीं खरीद पायेगा..’

माँ-बेटे के संवाद को और सुन न सका,चुपचाप बाथरूम की ओर बढ़ गया. पूरबी ने इतना तो ठीक कहा कि मैं बिकाऊ नहीं.पर उसका आशय यह कतई न था.

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- प्रमोद यादव

गयानगर, दुर्ग,छत्तीसगढ़

5 blogger-facebook:

  1. श्री वर्माजी..धन्यवाद...प्रमोद यादव

    उत्तर देंहटाएं
  2. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव2:52 pm

    प्रमोद जी का व्यंग सटीक और प्रासंगिक है और क्रिकेट
    में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनैतिकता को रेखांकित करता
    है वहीं दुसरे खेलो के प्रति उदासीनता को भी उजागर करता है बधाई प्रोमोद जी

    उत्तर देंहटाएं
  3. श्री अखिलेशजी, सम-सामयिक रचनाओं का एक अलग ही मजा है..लिखने में भी आनंद आता है..आपका बहुत-बहुत शुक्रिया कि हमेशा की तरह पसंद किया....प्रमोद यादव

    उत्तर देंहटाएं

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