रविवार, 9 फ़रवरी 2014

पखवाड़े की कविताएँ

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श्याम गुप्त


सखी री ! नव बसन्त आये ।।

जन जन में,
जन जन, मन मन में,
यौवन यौवन छाये ।
सखी री ! नव बसंत आये ।।

पुलकि पुलकि सब अंग सखी री ,
हियरा उठे उमंग ।
आये ऋतुपति पुष्प-बान ले,
आये रतिपति काम-बान ले,
मनमथ छायो अंग ।
होय कुसुम-शर घायल जियरा ,
अंग अंग रस भर लाये ।
सखी री ! नव बसंत आये ।।

तन मन में बिजुरी की थिरकन,
बाजे ताल-मृदंग ।
अंचरा खोले रे भेद जिया के,
यौवन उठे तरंग ।
गलियन  गलियन झांझर बाजे ,
अंग अंग हरषाए ।
प्रेम शास्त्र का पाठ पढ़ाने....
काम शास्त्र का पाठ पढ़ाने,
ऋषि अनंग आये ।
सखी री !  नव बसंत आये ।।
                             

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सुजान पंडित

वीणा वादिनि वर दे।
पुस्तक खोलकर लिखूं परीक्षा, सौ सौ नम्बर दे दे।। वीणा वादिनि वर दे।
कालेज के कैंटिन में माता, गुजरी जवानी मेरी सारी।
गर्ल फ्रेंड्स नित नया पटाया, यही पढाई सबसे प्यारी।।
बाईक मोबाईल मम्मी से ले ली, पापा का एटीएम भर दे।। वीणा वादिनि वर दे।
कितने टीचर आए आकर,चले गए सब रिटायर्ड होकर।
मैं निमोंही फस्ट ईयर में, रह गया सीनियर सिटिजन बन कर।।
अबकी बार मैं पास हो जाउं, एैसा जादू कर दे।। वीणा वादिनि वर दे।
शहर के सारे इंजीनियर डॅाक्टर, साथी हैं कॅालेज के मेरे।
उनके बच्चों का मैं अंकल,कक्षा में वे सीनियर मेरे।।
चाचा भतीजा कैसे पढे अब, क्लास अलग  कर दे।। वीणा वादिनि वर दे


SUJAN PANDIT
KANTA TOLI CHOWK, RANCHI (JHARKHAND)
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सीताराम पटेल


आम आदमी
भारत पिता की जय, भारत पिता की जय, भारत पिता की जय।
भारत पिता :- मैं हूँ आजाद भारत, हो गए छैंसठ साल।
            अभी तक मेरे बेटों का, है बहुत बुरा हाल।
व्यापारी :- मैं हूँ व्यापारी, झूठ मुझको है प्यारी।
          पूरा देश खाने को, निजीकरण की तैयारी।।
पुलिस :- मैं हूँ पुलिस, आदमियों को चटनी सा दूँ पीस।
         भगवान भी मुझे डराते, देखकर मेरा रीस।।
वकील :- मैं हूँ वकील, मेरे पास बेईमानी का मिल।
         बाप को लूट लूँगा,ं  प्रेम नहीं है एक तिल।।
भारत पिता :- मुझे काटा है अंग्रेजी का कीड़ा।
            इसीलिए मैं पा रहा हूँ यह पीड़ा।।
न्यायाधीशः- मैं हूँ न्यायाधीश, देता हूँ फाँसी का आशीष।
           अपराधी को छोड़ दूँ, निरपराधी को दूँ पीस।।
मिनिस्टर :- मैं हूँ मिनिस्टर, मेरा कमाई है डटकर।
          जनता राज में कौन है मेरा टक्कर।।
डॉक्टर :- मैं हूँ डॉक्टर, मेरे पास मरीज जाते मर।
         जीवन में दंड भोगते, मेरे पास जाते तर।।
भारत पिता :- परबुधिया किनके पास, सीख रहे हैं चाल।
            अभी नहीं सुधरोगे, तो खा देगें काल।।
मास्टर :- मैं हूँ मास्टर , ज्यादा मारता हूँ टर टर।
        पढ़ाता लिखाता हूँ कम, ज्यादा रहता हूँ घर।।
डईभर :- मैं हूँ डईभर, बस पलटाता हूँ हर।
         मैं देता हूँ दौड़, सवारी जाते हैं मर।।
आम आदमी :- मैं हूँ आम आदमी, मुझे कोई नहीं पूछते।
             पाँच साल में पूछने, आ जाते हैं लुच्चे।।
भारत पिता :- तुम सभी कुत्तों के समान लड़ो मरो।
            फिर आकर कोई मुझे जंजीर में धरो।।
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नीरा सिन्‍हा

शिकारीपन

मैंने तो बॉस को
वैसे ही आई लव यू कहा था
जैसे मैं अपने पापा को
आई लव यू कहती हूँ

मैंने तो बॉस के
वैसे गले लगी थी
जैसे मैं अपने पापा के
गले लगती हूं

पर बॉस ने कुछ और ही समझा
और झपट पड़े अपने शिकार पर
जो सहज उपलब्‍ध है

क्‍या पापा के उम्र के बॉस के साथ
मेरा सहज और आत्‍मीय रिश्ता
नहीं हो सकता ?

मैं बॉस को आई लव यू नहीं कह सकती ?
उनके गले नहीं लग सकती
क्‍या एक पुरूष और एक स्‍त्री का
बिना सेक्‍स के कोई रिश्ता नहीं बनता ?

अगर बन सकता है तो
फिर क्‍यों पुरूष बन जाता है
शिकारी
और उतर जाता है शिकारीपन पर ?

नीरा सिन्‍हा
न्‍यू बरगंड़ा
गिरिडीह-815301
झारखंड़
---------.

विजय वर्मा

हमें क्या चाहिए
 
ना युद्ध चाहिए ,
ना मार्ग  अवरुद्ध चाहिए,
अवश्यंभावी हो युद्ध अगर
तो   निपटने को उससे
हमें एक परम आयुध  चाहिए।
 
ना लूटा हुआ कोई
अर्थ चाहिए ,
ना दैन्य ,ना दम्भ
हमें व्यर्थ चाहिए।
पर बनी रहे शान्ति
देश की सीमा पर
उसके लिए युद्ध की
सामर्थ्य  चाहिए।
 
रण -बांकुड़े ना हमेशा
युद्ध-रत चाहिए ,
ना मौके पर कभी
युद्ध-विरत चाहिए।
बनी रहे आन-बान -शान
इस देश की ,
जरुरत हो तो फिर
एक महाभारत चाहिए।
 
ना किसी की अतिरिक्त
दया-दृष्टि चाहिए ,
ना रक्त से सनी
कोई सृष्टि चाहिए।
सैनिकों के हौसले
ना पस्त चाहिए ,
ना उन्हें किसी बाहरी का
वरदहस्त  चाहिए ।
फिर हमें  शिवाजी -सा ,
या वीर बंदा वैरागी सा
कोई मस्त चाहिए।
 
 
 
 

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एक अनुभव

आस्तिकता
अँधेरी मानसिकता की
उपज है ,
अज्ञान तथा भय का
परिणाम है।
आस्तिकों को मेरा
दूर से ही प्रणाम है।
 
पर रुको जरा ,
अभी भी एक कसक है
कि  नास्तिकता भी
अहं ,रौशनी और
सब ठीक-ठाक की ठसक है। 

--
  उलटबासियां
[कबीर जी ,रहिमन जी और तुलसी जी की  आत्माओं से क्षमा -याचना   सहित । ]

१] कबीरा शेयर बाज़ार में छोटे निवेशक को ललचाये
    जैसे ही कुछ 'परचेज' करे तड़ से मार्केट  गिर जाए
२] साईं इतना दीजिये कि पैसा रखना पड़े विदेश
  थोड़ा-थोड़ा  सबको बॉटूं,रहे ना किसी को क्लेश
३] रहिमन निज मन की विथा सबको पकड़ -२ सुनाये    
   खुद को नहीं है  चैन तो क्यों  अगला सुखी रह पाए
४] सांच कहूँ तो ना माने ,झूठ  कहे  पतिआए
   C.W.G.,2-G  में कौन-कौन नहीं खाएं !
५] तुलसी संगत मंत्री की कर दे बड़ा  प्रसिद्ध
   बड़े-बड़े फंड पर नज़र रखियो जैसे कि गिद्ध 

 

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS
BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com
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         सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

 
विद्या बाबा
वो कौन है  जिसकी उड़ान  इतनी ऊँची है  कि वो रखता है कदम         
बचपन से सीधे बुढ़ापे में
वो कौन है  जो काटता है उस अस्प्ताल का रिबबन 
जहां उसे इलाज के नाम पर कफ़न ही नसीब होगा बुढ़ापे में 
वो कौन है जो बनता है
सीढ़ी अगले चुनाव में विजय की बुढ़ापे में
वो कौन है जो नाम से विद्या है
पर अंगूठे के अलावा किसी निशान को पहचानता नहीं बुढ़ापे में
वो कौन  है जो युवा नेता की उम्र में अधेड़ता की रेखाओं के पार है बुढ़ापे में
वो कौन है जो गणतंत्र को छब्बीस जनवरी कहता है
और अपने ठेकेदार के आगे गिड़गिड़ाता है बुढ़ापे में
कि आज राजपथ या चाँदनी - चौक में सवारियां कम मिली
इसलिए रिक्शा का किराया कम कर दो
और सुनता है कि
अबे हराम की औलाद
नेता बनकर रिब्बन काटने से फुरसत होती
तो रिक्शा चलाता और किराया भी देता बुढ़ापे में
अब नेता बन गया है तो कल से तेरा रिक्शा बंद
जा नेतागिरी कर और रिब्बन काट बुढ़ापे में
फ़ोटो खिचवा और जबरदस्ती आये बुढ़ापे को त्याग
जोरू तेरी जवान दिखती है , जय बोल बुढ़ापे में
और मौका लगे तो उसे भी टोपी पहना बुढ़ापे में.
तू नहीं होगा तो तेरी नेतागिरी  वो
बखूबी संभाल लेगी तेरे हर बुढ़ापे में .


                                           सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा 27/12/2013
डी - 184 , श्याम पार्क एक्स्टेनशन        साहिबाबाद  - 201005 ( ऊ . प्र . )

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चन्द्र कान्त बन्सल


छोड़ आया हूँ मैं

नागफनी ही नागफनी है बिछी हुई जिन राहों पे
उन राहों पर भी गुलाब का थोडा इत्र छोड़ आया हूँ मैं.

जो राह तुम्हारे दर तक न ले जाये मुझे ओ मेरे महबूब
उस राह की क्या बात वो पूरा शहर छोड़ आया हूँ मैं.

सिर्फ चंद लम्हों के लिए ही मैं मिला था कल उससे
लेकिन उसके दिल में अपने लिए गहरा असर छोड़ आया हूँ मैं.

ये रेशमी चादरे ये नर्म बिस्तर सब चुभता है जन्नत में मुझे
बिन दिलबर के जहन्नुम है तेरा वो बिस्तर छोड़ आया हूँ मैं.

मेरी बेसब्री मेरी बैचैनी कहीं खो न जाये कहीं देर न लग जाये
अपना ख़त तेरे घर तक खुद पता पूछकर छोड़ आया हूँ मैं.

क्या है मेरा हौसला क्या है मेरी उम्मीद बस इतना समझ लो
इन तूफानों में भी एक दिया जलाकर छोड़ आया हूँ मैं.

तमाम सुबूत मिटाए थे मैंने जाने वो मुझ तक पहुंचा कैसे
शायद मकतुल के सीने में अपना खंजर छोड़ आया हूँ मैं.

ये चौराहों में ये मंदिरों में ये मस्जिदों में क्या ढूढ़ते हो
खुद्दारी उसे तो खुद कब्रिस्तान पहुंचा कर छोड़ आया हूँ मैं.

ये आइनों का शहर भी बिखर जाएगा चंद दिनों में ही
उसकी गली में चुपचाप एक दो पत्थर छोड़ आया हूँ मैं.

बदल जायेगा अमीरे शहर थोडा वक़्त तो लगेगा ही
कल शाम ही तो उसका ज़मीर जगाकर छोड़ आया हूँ मैं.
--

निकट विद्या भवन,
कृष्णा नगर कानपूर रोड लखनऊ
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मनोज 'आजिज़'

हलचल तो है !

          
लोग कहते हैं
शहर से दूर
एकांत, गाँवों में
आज भी हलचल कुछ कम है
पर
वे क्या जाने
हलचल तो है, अंदरूनी है
दृश्य से परे
सहज समझ से परे
स्थिर झील की लहरों जैसी
धीमी-धीमी डोलती है जिंदगी
हरे पेड़ों से आवृत्त
चिमनियों के धुंएँ से
पहाड़ तोड़ती मशीनों से
प्राचुर्य और अभाव की दूरी से
और ठौर पाती है जिंदगी
एक अनजान, असहाय किनारे में ।

एक आग ईंट भट्टों में है
और दूसरी आग पेट और फेफड़ों में है
दोनों ही दिखती नहीं
एक ढक जाती है
एकांत और हरित परिवेश से
और दूसरी
स्वयं-विकास स्वार्थ से ।

कौन कहता
गाँवों में हलचल कुछ कम है ?
हलचल तो है--
अनिश्चय, अविश्वास और अनर्थ की !
 
--------------.

कवि कल्याण


---कहर--
एक बादल ने बदल दी दुनिया
बता उत्तर के नाथ
कहाँ खो गया मेरा मुन्ना
कहाँ रह गई मेरी मुनिया
ये पकृति का कैसा मन्जर
ये कहर से ऐसा खण्डहर
बाप न बचा पाया बेटे-बेटी की दुनिया
बेटा न बचा पाया बाप की मुनिया
माँ-बह गई,भाई बिछुड़ गये
गये थे अपने - अब पराये
अरे थे तो अनेक
तो कोई घर में रह गया अब एक
दर्द की जुबान से बोल रहा जमाना
उजाड़ना ही था मेरे नाथ
बता, क्यों बनाई तूने ये दुनिया
लद्दाख के बाद केदारनाथ
पर्वतों पर ही बसे है मेरे सारे नाथ
उबड़, खाब़ड़ रास्ते -तूने ही तो बनाई
दर्शन की ये पगडण्डिया
तीर्थ स्थल धर्म को अब तो बचालो
देखो कैसे उजड़ गई भक्तों की दुनिया
मत होने दो -मत होने दो-भगवन 
किसी के अब ये फिर काली रात
हाँ वादा है तुमसे न छेड़ेंगे प्रकृति को
न तोड़ेंगे - न फोड़ेंगे अब पर्वतों की दुनिया
रक्षा करो-प्रभु अब तो रक्षा करो
किससे करोगे बात - जब न होगा भक्त
ओर न होगी -धरती पे ये दुनिया ------2
एक बादल ने ढहाया कहर ओर बदल गई ये दुनिया
कहाँ खो गया मेरा मुन्ना
कहाँ रह गई मेरी मुनिया
 
कवि-कल्याण
(कल्याण सिंह चौहान)
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    मुरसलीन साकी


होके मायूस जमाने से गजल कहते हैं ।
अष्‍क जब आंखों में आते हैं गजल कहते हैं।
           
वो चांदनी रात और दीदार चांद का करना।
            जब ख्‍याल आता है दिल में तो गजल कहते हैं।

उनके रूख्‍सार पे जुल्‍फों के हसीं सावन को।
देखकर जाने क्‍या होता है गजल कहते हैं।
           
उनके हर लफ्‍ज की तहरीर तो मुमकिन ही नहीं।
            आंखों आंखों के इशारों को गजल कहते हैं।

यूं ही अशआर मयस्‍सर नहीं होते साकी।
डूब कर उनके ख्‍यालों में गजल कहते हैं।

 


 

ये रात अभी क्‍यों बाकी है।

खामोश अंधेरी रातों में
जुगनू बन कर वो आती है।

बस कुछ पल दिल बहलाती है
फिर जाने कहां खो जाती है।

उस वक्‍त खामोशी रातों की
जाने मुझसे क्‍या कहती है।

कहती है तड़पते दिल की सदा
ये रात अभी क्‍यों बाकी है।

अश्कों के समुन्‍दर की तह में
एहसास अभी क्‍यों बाकी है।

वीरान शिकस्‍ता इस दिल में
ये जान अभी क्‍यों बाकी है।
            ये रात अभी क्‍यों बाकी है।

               
                  लखीमपुर खीरी (उ0प्र0)
---------------.


 

राजीव आनंद


चंदा मामा

चंदा, मामा है न दादी ?
पापा कहते है ये सब बकवास है
चंदा एक उपग्रह है !
चांदनी ने कहा, पापा
दादी आपसे बड़ी है
उनसे पूछ लो
चंदा मामा है कि नहीं ?
है न दादी
पापा को समझाओ

दादी ने पापा को समझाया
चंदा उपग्रह नहीं
चांदनी का मामा है
खबरदार जो उसके मासूम
दुनिया में दखलअंदाजी किया
अभी चांदनी मासूम है
चंदा को उसका मामा ही रहने दो
जो गुड़ के पुए पकाता हो
और चांदनी को प्‍याली में खिलाता हो !


राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा
गिरिडीह-815301
झारखंड़

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अमित कुमार गौतम ‘‘स्‍वतंत्र‘‘


भूख लगी है
(1)
दर-दर भटकूं
भूख लगी है।
जिधर भी देखूं
भुखमरी है।
घर में देखूं,
वही हाल है।
पड़ोसी के
घर में भी,
खाली खलिहान है।
दर दर भटकूं
भूख लगी है।

(2)
गांव-गांव में
शहर-शहर में,
भूख लगी है।
घर में केवल,
भरा धुंआ।
पकता भोजन,
यहां वहां।
जितना मिल जाए,
वो भी कम हैं।
पेट में मेरे
आग लगी है।
दर-दर भटकूं,
भूख लगी है।

(3)
मैं गरीब हूं,
भूख लगी है।
फिर भी मन में,
उम्‍मीद जगी हैं।
आज नहीं तो कल
पेट भरेगा हल।
चलो धूमों बागों
इधर-उधर।
कितने टुकड़े पड़े,
इधर-उधर।
दर-दर भटकूं,
भूख लगी है।
(4)
मैं जन सेवक हूं
वोट मुझे दो।
खाली पेट को,
लो नोटों से भरदो।
आज नहीं तो कल,
लूंगा तेरा हल पल।
प्‍यास बुझा दे,
मेरा तू।
सारी दुनिया में।
छाई है भुखमरी।
दर-दर भटकूं,
भूख लगी है।
               
ग्राम-रामगढ़ नं. 2 तहसील गोपद बनास
जिला सीधी (म0प्र0) 486661
-------------.

कंचन अपराजिता 


सरस्वती वंदना
 
हे माँ ,
तुम्हें नमन है।
तुम प्रेरणा बनकर,
मेरे दिल में रहा करो।
तुम शब्द बनकर,
मेरी लेखनी से बहा करो।
 
हे माँ ,
तुम्हें नमन है।
तुम्हारी स्निग्ध धवल वस्त्र सा, 
मेरा हो मन ,
तेरी रूप की शीतलता,
भावनाओं को करे कोमल।
 
हे माँ,
तुम्हें नमन है।
तुम वेद हो ,पुराण हो ,
महाग्रंथ का आधार हो ,
तुम ज्ञान का भंडार हो ,
तुम सर्वज्ञ हो,जीवन सार हो।
 
हे माँ ,
तुम्हें नमन है।
वंदना करूं तुमसे ,
तुम शक्तिपुँज  बनकर,
मुझको आलोकित कर जाओ।
अपनी आभा का एक क़तरा दे जाओ।
 
-------------.

संजीव शर्मा


मुहब्बत
लोग कहते हैं कि मैं तुझसे प्यार करता हूँ
लोग कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे
मुझे भी लगता है कि दिल के किसी कोने से
एक ही नाम बार-बार कहीं गूंजता है
तुझे शायद कि इस बात का अहसास नहीं
मुझको इस बात से जीने कि वजह मिलती है,
लोग तो ये भी कहते हैं कि मुहब्बत करके
सैकड़ों जख्म इस दिल पे उठाये जाते हैं
मैं तो सदियों से मुहब्बत तुझे करता हूँ
और ये मुझको कभी ग़मज़दा नहीं करती,
ये और बात है कि तू मुझे चाहती नहीं लेकिन
हर गली, हर सड़क, हर नुक्कड़ पर
मैं तुझे यूं ही भटकता हुआ मिल जाऊँगा
जिस एक तेरी गली में तेरे दरवाजे पर
रोज सर अपना झुककर मैं चला आता हूँ
जब भी जाता हूँ तो नई उम्मीद के साथ
और आता हूँ तो फिर उन्हीं मायूसियों के साथ.

तेरे बगैर
तेरे बगैर अब तो मुझे नींद भी न आएगी
लगता है ये जिंदगी ऐसे ही गुजर जाएगी
मैं तुझे चाहता हूँ तुझसे मैं कैसे कहूं
मेरी ख़ामोशी मेरी जान ले के जायेगी
एक झोंके की तरह मेरी सिम्त आना तेरा
उम्र भर के लिए तनहाइयाँ दे जायेगी
तू भी जो मेरी बेकसी की पा ले अगर
मेरे अरमानों को शक्ल सी मिल जाएगी
बख्त है बेवफा शिकवा हो क्या ज़माने से
प्यार की हर नजर जज्बा नया दिखाएगी
एक मुद्दत के बाद आस्तां पे तू है खड़ी
सोचता हूँ की कहर किस तरफ से आएगी
मुझे मैय्यत सी नजर आती है मेरी ख़ुशी
मैं तो 'मुर्दा' हूँ मेरे प्यार में क्या पायेगी ।

हरजाई
दिल करता है दिल से खेलूं और वफ़ा बदनाम करुं
करते हैं जो छुपके मुहब्बत उनके चर्चे आम करुं
रात गुजारी पी के घर पर और सुबह मंसूर हुए
ऐसे लोगों के मंसूबे नई शाम तक आम करुं
छुप छुपकर उस चन्द्र बदन ने कईयों को बर्बाद किया
उफ़ क़यामत उसके जलवे उसके क्या क्या नाम धरूँ
घुट घुट कर जीने को उस हरजाई ने मजबूर किया
हाय उस कमबख्त के मैं अब और क्या नाम करुं.


अदम१
सुबह से शाम तक मेरी अदम के किस्से हैं
फ़िज़ा से जाम तक मेरी अदम के किस्से हैं
मेरी गली से चलकर तेरी गली तक पहुंचें
जमीं से बाम२ तक मेरी अदम के किस्से हैं
उम्र कयाम३ हुई, दाग हुई, बाद बने अफ़साने
आं से अंजाम तक मेरी अदम के किस्से हैं
तेरी लटों पे मेरी नफ़स४ असीर५ हुई
मेरे मुकाम तक मेरी अदम के किस्से हैं
तू जिम्मेदार नहीं कोई नहीं हमसफ़र अब
फिगारां६ नाम तक मेरी अदम के किस्से हैं
मौत भी पुरसुकूं७ जो पाए मेरी बदनामी
छलकते जाम तक मेरी अदम के किस्से हैं
मज़े-मज़े में जब उसकी गली से जुड़ गया मैं
अब उसके नाम तक मेरी अदम के किस्से हैं
उसे रुसवाई की बातों से फुर्सत न हुई
खतों-पयाम तक मेरी अदम के किस्से हैं
नहीं है वक्ते-जिना न भरम का पैमाना
मेरे अंजाम तक मेरी अदम के किस्से हैं
नहीं रफीक८ हुए वो मेरी हकीकत के
न उनके काम के मेरी अदम के किस्से हैं
१ मृत्यु २ छत ३ कयामत ४ सांस ५ कैदी ६ ज़ख़्मी ७ चैन ८ मित्र

आंसू
कुछ नहीं तेरी निगाहों का पलटना फिर भी
अश्क अरमान सजाता है तो रो देता हूँ
मैं नहीं जानता हसरत की सियाही क्या है
ख्वाब जब खून बहाता है तो रो देता हूँ
मज़्मूं-ए-इश्क नहीं है तो बता फिर क्या है
दाग बन दर्द उभर आता है तो रो देता हूँ
मौत है ज़िन्दगी मैं धडकनों की रुसवाई
जहां इलज़ाम लगाता है तो रो देता हूँ
बुलबुलें चमन को सर पे उठा लेती हैं
जब कोई उनको रुलाता है तो रो देता हूँ
मुझको उम्मीद नहीं कोई मुझे समझेगा
दर्द सीने में उभर आता है तो रो देता हूँ
ज़िन्दगी गम से समझना हो गई बेमानी
गम अगर दिल को जलाता है तो रो देता हूँ
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निधि जैन


खुश हुए ये जानकर एक दंपत्ति
अब मिलेगी उनको भी संतान रुपी संपत्ति
खिलेगा आँगन में एक प्यारा सा फूल
भर देगा जीवन में खुशियाँ भरपूर
एक प्यारा सा राजकुमार आएगा
हर कोई जिसे देखकर खिलखिलाएगा
घर आँगन गूंजेगी जिसकी किलकारी
लुभाएगी सबको मोहिनी सूरत प्यारी
वो हंसेगा तो दुनिया हंसती हुई लगेगी
गर वो रोएगा तो दिल की धड़कन रुकेगी
वो कुल का दीपक कहलायेगा
पूरा घर उसकी रौशनी से जगमगाएगा
वंश की बेल को आगे बढाकर
पुरखों का वह मान बढाएगा
सजाते सपने, बुनते ख्वाब, बीत गए महीने नौ
जिसका सबको था इन्तजार, फट गई एक दिन वो पौ
आई घर में लक्ष्मी थी, जन्म हुआ था तनया का
स्वागत होना था बेटे का, पर ना हुआ था कन्या का
माँ ने मुँह फेरा उससे फिर, पिता ने गोदी में ना लिया
उसने पैदा होकर जैसे, सबके सपनों को चकनाचूर कर दिया
दादी ने मारे ताने थे फिर, बुआ ने नाक चिडाई थी
सबने मिलकर के फिर, करी ईश्वर से लड़ाई थी
मन्नत जब मांगी बेटे की, कैसे हो गई ये लड़की
सपने तो बुने थे उन्नति के हमने, आ गई है अब ये कडकी
सोच रही थी पड़े-पड़े वो, भूल गए जो वो सब भी
माँ भी तो एक लड़की ही हैं, दादी-बुआ भी हैं लड़की
गर लड़की ही ना होती तो, क्या पुरुष जन्म ले पाता फिर
कौन सा वंश, कैसी विरासत, क्या दुनिया पैदा होती फिर
जिस घर में लड़की का जन्म नहीं होता
वहाँ पर खुशियों का आगमन नहीं होता
दिवाली पर होते ना ही ख़ुशी, ना ही उमंग
होली पर नहीं उड़ते, हर्षोल्लास के रंग
ना मनाया जाता फिर रक्षा-बंधन
ना लगता माथे पर भैया-दूज का चन्दन
गर ना होती लक्ष्मी तो, कैसे मिलती सुख-संपत्ति हमें
सरस्वती से ही तो होती है, विद्याओं की प्राप्ति हमें
दुर्गा ना होती गर तो, शक्तियां कहाँ से हम पाते
चंडी का महारूप ना होता , तो राक्षसों का नाश कभी ना कर पाते
लड़की में ना जाने कितने ही रूप समाए हैं
उसकी शक्ति और मर्यादा के आगे तो ईश्वर ने भी शीश झुकाए हैं
लड़का एक कुल की आन है, लड़की दो कुलों का मान है
लड़की कोई बोझ नहीं है, वो तो ईश्वर का वरदान है
लड़की बेटी है, बहिन है, मौसी-बुआ, दादी-नानी, और ना जाने क्या-क्या है
एवं इन सबसे बढकर, वो एक माँ है
जो जनती है आज को और पालती है कल को
लड़की के बिना हर रिश्ता अधूरा है
लड़की से ही सबका जीवन पूरा-पूरा है
सोचो
दिल से सोचो
क्या लड़की के बिना हो सकती है स्रष्टि की रचना ?
क्या उसके बिना पूरा हो सकता है भविष्य का कोई सपना ?
क्यों पैदा होने से पहले ही लड़की को मार रहे हो ?
क्यों जानते बूझते अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हो ?
इसलिए
जरूरत है जागने की
मिलकर इन कुरीतियों को मिटाने की
वक़्त है अभी भी
ईश्वर की दी इस अमूल्य " निधि " का करेंगे जब मिलकर हम सब सम्मान
तब ही कहलाएंगे हम सब एक सच्चे इंसान
तब ही कहलाएंगे हम सब एक सच्चे इंसान
एक गुमनाम कवियत्री
( निधि जैन )
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मोहसिन ख़ान


ग़ज़ल- 1

मछलियों को तैरने का हुनर चाहिए ।
गंदला है पानी साफ़ नज़र चाहिए।

बातों से न होगा हांसिल कुछ यहाँ,
आवाज़  में  थोड़ा  असर  चाहिए।

न देखो ज़ख्मों से बहता ख़ून मेरा,
लड़ने के लिए तो जिगर चाहिए।

कचरा ख़ुद नहीं होता दूर दरिया से,
फेंकने को किनारे पर लहर चाहिए।

हर सूरत बदलती है कोशिशों से ही,
कौन  कहता  है  मुक़द्दर  चाहिए।

अब चीर दे अँधेरे का सीना 'तन्हा',
रोशनी के लिए नई सहर चाहिए।
 

ग़ज़ल- 2
 
सरकार  कोई  भी  आए ।
ठगी तो जनता ही जाए ।

कुछ तो  कम हो  लेकिन,
बोझ तो बढ़ता ही जाए ।

हो कैसे गुज़र सोचते हैं,
बदन घुलता ही जाए।

हो यहाँ क़ायम रौशनी,
सूरज ढलता ही जाए ।

कबतक होगा ख़ाब पूरा,
सब्र पिघलता ही जाए ।

दरिया में कहाँ बैठेगा,
परिंदा उड़ता ही जाए ।

क़र्ज़ कम न होता दर्द का,
क़िश्त भरता ही जाए ।

दो रोटी की भागदौड़ में,
दम निकलता ही जाए ।


ग़ज़ल-3
 
तुम ही आँखें हमसे चुराते  रहे ।
हम फ़िर भी हाथ मिलाते रहे ।
 
तोड़ना  चाहा  रिश्ता  ख़ून का,
जाने क्या सोचकर निभाते रहे ।
 
तेरे गुनाहों में हम भी हैं शरीक़,
ताले क्यों  ज़ुबाँ पे लगाते  रहे ।
 
बादे ख़ुदा तुझपे किया ऐतबार,
तेरी पनाहों में सिर झुकाते रहे ।
 
अपने  बचपन से है  मुझे नफ़रत,
हालात रोटी को भी तरसाते रहे ।
 
तक़ाज़ों की नोकों से हुआ ज़ख़्मी,
दहलीज़ पे तेरी गिड़गिड़ाते रहे ।
 
जिस्म से हटकर रूह में चिपकी,
जितनी उतरनें मुझे पहनाते रहे ।
 
कितना ‘तन्हा’ था उन दिनों जब,
शर्म से वालिद मुँह  छुपाते  रहे ।

  ग़ज़ल-4
 
ऊँचा उसका क़द हो गया ।
ग़ुरूर उसे बेहद  हो गया ।

ख़ौफ़ से  सिर  झुकवाकर,
अवाम का समद हो गया।

फैलाकर  सूबे  में  दहशत,
गुनाहों का सनद हो गया ।

जिसने  हाथ रंगे  थे ख़ून से,
गवाहों में नामज़द हो गया ।

खिलाफ़ते क़ौमपरस्तिश में,
'तन्हा'  क्यों  बद हो गया ।

   
  ग़ज़ल-5

क्या बात बुरी लगी ज़माने की ।
जो भुलादी आदत मुस्कुराने की ।

दीवार  बनके  खड़ी  है मुसीबत,
फ़िर हो एक कोशिश गिराने की ।

लगाकर  गले  भुलादो  रंजिशें,
बात हो  नफ़रतें  मिटाने  की ।

दहशदगर्दी  के  नाम पे क़त्ल,
ज़रुरत है  मुद्दआ  उठाने की ।

झुलसा है मुल्क़  कौमी  दंगों में,
चल रही है साज़िश जलाने की।

'तन्हा' करता है दुआ रोज़ रब से,
कोई  न हो वज्ह आज़माने  की ।
ग़ज़ल-6

एक रास्ता पहुँचता है गाँव के घर को ।
जाने कब छोड़ेंगे हम इस नगर को ।

धूल, धुँआ, तंग गलियाँ और गंदी बस्ती,
जमा करते हैं रोज़ बदन में ज़हर को ।

नामों के साथ शक्लें भी उतरीं ज़हन से,
देखूँ तस्वीरें तो धोखा होता है नज़र को ।

कैसी अजनबीयत और तन्हाई घुल गई,
जैसे कोई खारा कर रहा हो समन्दर को ।

उगता सूरज निकलता चाँद नहीं दिखता,
कोई मौसम भी कहाँ आता है इधर को ।

'तन्हा' यूँ न कोई क़िस्तों में जीना ज़िन्दगी,
मर ही गए बेमौत कैसे पहुँचाएँ ख़बर को ।

मोहसिन 'तन्हा'

डॉ. मोहसिन ख़ान
स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष 
जे.एस.एम. महाविद्यालय,
अलीबाग (महाराष्ट्र) 402201
     khanhind01@gmail.com
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देवेन्द्रसिंह राठौड़


हँसी पे हसीं की मेरा दिल खिल गया,
देखा उसने इस कदर,मैं तो हिल गया,
वो आके पहलू में बैठे कुछ इस तरह,
जैसे मुझे “दसवां ”सिलेण्डर मिल गया ।
महंगाई के दानव ने बुरा हाल कर दिया,
खाते-पीते आदमी को बेहाल कर दिया ।
छूना उसका प्यार से,मेरा लब सिल गया,
जैसे मुझे “दसवां ”सिलेण्डर मिल गया ।


“शक्कर”का खयाल मुझे कर गया उदास,
उंगली घुमा के चाय में,उसने की मिठास ।
उसकी इस अदा पे,मेरा दिल गया..,
जैसे मुझे “दसवां ”सिलेण्डर मिल गया ।
बिजली की खपत को हमने कम किया,
चेहरे के उसके नूर ने जगमग घर किया ।
आने से उसके बिजली का, कम बिल गया,
जैसे मुझे “दसवां ”सिलेण्डर मिल गया ।
टूटी बेरी नीन्द..,और ख्वाब हसीं टूटा..,
सूरज के उगते ही भाग मेरा रूठा ।
सूरज की किरणों से दिल छिल गया,
ऐसे मुझे “दसवां ”सिलेण्डर मिल गया ।
देवेन्द्रसिंह राठौड़ (भिनाय),
        395, बी.के.कौल नगर अजमेर
        Email:- dsrbhinai@gmail.com
---------.


 

देवेन्द्र सुथार


बेटी
माँ की कोख से ही एक सपना सजाया था
आसमान को छूने का एक विश्वास जगाया था
इस अंथेरी दुनियां मेँ कुछ कर दिखाने का
हौँसला बढाया है इन बेटियोँ ने

फर्क बनाया है तो इस दुनिया ने
कदमोँ तले कुचला है बेटियोँ को
सरताज बनाया है बेटोँ को
जहाँ बेटोँ को अपना और बेटियोँ
को धन समझा जाता है पराया

भुला बैठे हैँ,वो बेटे 25 दिन मेँ
25 साल के उस प्यार को
घर से बेघर कर दिया है
बेचारे इन माँ बाप को,

वहीँ कहीँ खङी है,बुढापे का सहारा
जो लङखङाते हुए कदमो को
सम्भालेगी ये माँ बाप की बेटियाँ।

अगर पिता की शान है बेटियाँ
तो माँ की हमझोली है बेटियाँ
तभी तो कहते हैँ जिन्दगी का
दुसरा नाम है ये बेटियाँ।
---
कविता
ओस की एक बूंद सी
होती हैँ बेटियां
स्पर्श खुरदरा हो तो
रोती है बेटियां

रोशन करेगा बेटा
तो एक कुल को
दो-दो कुलोँ की लाज
होती है बेटियां

कोई नहीँ दोस्तोँ
एक दूसरे से कम
हीरा अगर है बेटा तो
मोती है बेटियां

कांटोँ की राह पर खुद चलती रहेगी
औरोँ की राह मेँ फूल बोती बेटियां

विधि का विधान है यही दुनिया की रस्म
मुट्टठी मेँ भरे नीर सी होती है बेटियां
--.
हम न हिम्मत हारे, हम न हिम्मत हारे
ज्ञान का सागर हमेँ बनाओ
और दूसरोँ को समझाओ।

हम हैँ बाल सिपाही,
कुछ भी कर सकते हैँ भाई।

हमने मां का दूध पीया है,
मां का कर्ज चुका सकते है।

इतनी तो क्षमता हैँ हममेँ,
दुश्मन से भिड सकते हैँ।

कोई भी मुश्किल हो चाहे,आगे बढते जाए।
हम न हिम्मत हारे,हम न हिम्मत हारे।


- देवेन्द्र सुथार ,बागरा (राज)

9 blogger-facebook:

  1. सुन्दर सुन्दर रचनाएँ ---धन्यवाद रवि जी.....

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक से बढ़कर एक !
    सुंदर कविताऐं !

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर सुन्दर रचनाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  4. धन्यवाद श्रीमान जी.

    उत्तर देंहटाएं
  5. bahut khubsurat kavitaye hai. धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव6:48 pm

    निधि जैन की कविता ने प्रभावित किया कन्याओं का समाज निर्माण व् पालन में महत्वपूर्ण स्थान तथा इसके
    बावजूद उनकी दयनीय स्थिति को उनहोंने रेखांकित किया उन्हें बहुत बहुत बधाई वे अब गुमनाम नहीं रहीं

    श्याम गुप्त जी की कविता ने रीतिकाल केप्रसिद्ध कवि
    बिहारी को शर्माने पर मजबूर कर दिया होता कविता छोटी है पर रसों से भरपूर है

    उत्तर देंहटाएं

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