संदेश

March, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

मंजरी शुक्ल की कहानी - चाँदनी

चित्र
चाँदनी  डॉ. मंजरी शुक्ल जब ईश्वर जरुरत से ज्यादा झोली में गिर देता हैं तो वह भी मनुष्य के लिए अहंकार और पतन का कारण बन जाता हैं I ऐसा ही कुछ हुआ चाँदनी  के साथ..सभ्य, सुशील और बेहद महत्वकांशी चाँदनी को जब महात्मा गाँधी के आदर्शों पर जीवन पर्यन्त चलने वाले ईमानदार और अकेले बाबूजी ने उसे पहली बार सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल के पद पर कार्य करने के लिए भेजा तो मानों कई सतरंगी इन्द्रधनुष उनकी आँखों झिलमिल वर्षा के साथ मुस्कुरा उठे I उसकी माँ की मौत के बाद बाबूजी ने अकेले होते हुए भी उसकी सारी ज़िम्मेदारियाँ माँ भी बनकर बिना किसी शिकन या परेशानी के उठाई I जहाँ आस पड़ोस के मर्द घर में घुसते ही एक गिलास पानी के लिए भी अपनी घरवाली को चीखते हुए बुलाते वहीँ दूसरी ओर पसीने में लथपथ बाबूजी आँगन में आते ही उसे प्यार से गोद में उठाकर जी भर के दुलार करने के बाद भीगी आँखों से  सूखी गीली लकड़ियों को चूल्हे में जलाने के लिए कवायद शुरू कर देते और उसे गोदी में लेकर खाना बनाने के लिए जुट जाते I "संस्कार" बस इसी शब्द के बीज वो उस नन्ही  बच्ची के  मन मस्तिष्क में बो देना चाहते थे I सारी दुनियाँ देखने क…

सैयद एस. तौहीद का आलेख - फाग़ हरेक जीवन में खुशियों के रंग लेकर नहीं आता

फाग़ हरेक जीवन में खुशियों के रंग लेकर नहीं आता
------------------------------------------------
फाग़ के दिनों में राजेन्द्र सिंह बेदी की फिल्म ‘फागुन’ याद आती है ।
फागुन गोपाल (धर्मेन्द्र) एवं शांता दामले (वहीदा रहमान) पति-पत्नी के
मार्मिक रिश्ते की कहानी हैं। बेमेल शादी के पहलुओं से परिचित कराती यह
कथा प्रेम में बंध कर भी तृष्णा की विडम्बना को दर्शाती है। प्यार अंधा
होता है। वो किसी बंधन-अवरोध को नहीं जानता। धनवान शांता निर्धन गोपाल से
प्रेम करती है, परिवार की इच्छा के खिलाफ दोनों शादी कर लेते हैं। विवाह
बाद गोपाल पत्नी को छोड शहर चला जाता है। दिनों बाद होली के त्योहार पर
घर पर लौटा है, रंगों की दुनिया में अपना कोई रंग तलाशने । पत्नी से रंग
खेलने की हट में होली के रंग उस पर डाल कर नाराज़ कर देता है । रंगों के
त्योहार में कपडा खराब हो जाने का ख्याल बहुत कम रहता है। इस डर में खेली
होली बेरंग सीमाओं को तोड नहीं पाती। कीमती साडी खराब होने पर शांता काफी
नाराज़ है, वह गोपाल को दो टूक कहती है ‘जब आप कीमती साडी खरीद नहीं
सकते,फ़िर इसे खराब करने का अधिकार भी नहीं होता’। शांता के व्यवहार से
पीडित ‘गोपाल’ तिरस्…

पुस्तक समीक्षा - खामोशी को शब्‍द देती कविताएं

पुस्‍तक समीक्षा अनन्‍त आलोकखामोशी को शब्‍द देती कविताएंघटनाएं बोलती नही हैं। पूछती भी नहीं, वे तो केवल घटित होती हैं और कर देती हैं अपना काम। अच्‍छा या फिर बुरा। हाँ इनके घटित होने से पूर्व एक खामोशी अवश्‍य होती है , जो अनजानी होती है। इस खामोशी को कोई वैज्ञानिक , कोई भविष्‍य दृष्‍टा जान नहीं पाता, समझ नहीं पाता। इसका केवल आभास होता है। उसी आभास को शब्‍द दिए हैं लेखक एवं कवि श्रीकांत अकेला ने अपने काव्‍य संग्रह 'अनजानी खामोशी ' में। यहाँ समीक्षित पुस्‍तक श्रीकांत अकेला का दूसरा काव्‍य संग्रह है। शीर्षक कविता में कवि अनजानी खामोशी को मुखरित करवाते हुए कहलवाता है ''फिर नष्‍ट होंगे घरोंदे/ आहत होगी संवेदना/ जंगल मिट्‌टी हरियाली भी/ और छा जाएगी एक अनजानी खामोशी।''कवियों के बारे में एक कहावत आम प्रचलित है 'जहां न पहुंचे रवि , वहां पहुचे कवि।' कवि मन घोर निराशा में भी आशा की एक किरण खोज ही लेता है। पड़ोसी देश से हालांकि हमारे संबंध आरम्‍भ से ही अच्‍छे नहीं रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तो कड़वाहट कम होने के बजाय और बढ़ी है। कवि ह्रदय ऐसे में भी संबंधों …

देवेन्द्र सुथार की लघुकथा - गलत तस्वीर

चित्र
गलत तस्वीर

शहर की मुख्य सडक पर डाकघर के बाहर कूडाघर बरसोँ से बना हुआ था। कचरे की
पेटी के बाहर कचरा बिखरा रहता था। उसमेँ कुत्ते,बिल्लियां,गाएं और इंसान
मुंह मारते रहते थे। ऐसे मंजर शहर मेँ जगह-जगह देखने को मिल जाते थे। यह
कोई नहीँ बात नहीँ थी। नई बात तब बनी,जब स्कूटर पर सवार राहगीर ने एक
विदेशी सैलानी को फटेहाल आदमी को कूडेदान मेँ से खाना बीनते हुए का फोटो
खीँचते हुए देख लिया।
'नो-नो...यह आप क्या कर रहे हैँ? आप भारत की गलत तस्वीर पेश करना चाहते हैँ।'
'मेरे देखे तो यही सही तस्वीर हैँ',सैलानी ने कैमरा गले मेँ लटकाते
हुए कहा,'आप लोग कुछ करते क्योँ नहीँ?'
'यह हमारा काम है क्या? सरकार ही निकम्मी है!' और उसने स्कूटर दौडा दिया।

-देवेन्द्र सुथार,बागरा,जालोर (राज.)।

अशोक बाबू माहौर की कहानी - छोटी गंगा

चित्र
छोटी गंगा (कहानी) `कोई मेरे घर को,स्वर्ग बना दे       तोड़कर तारे आसमाँ से,जमीन पर ला दे` भानु सुबह-सुबह यही पंक्तियाँ दोहराते रहते,कभी मंदिर में कभी सड़कों पर किन्तु इन्हें पूरा करने वाला कोई                 नहीं था.      बड़े बहू बेटा भानु को परेशान किया करते,खाने पीने तक की सुधि भी नहीं लेते.बूढ़ा शरीर था कब तक साथ दे सहारे की जरूरत थी,सहारा कौन दे यही चिंता दिन रात सताए जा रही थी,जो नजरें बची थी छोटे बेटे पर टिकी थी शायद वही कुछ कर दिखाए.      माथे पर हाथ रखे भानु सोच रहे थे `बस छोटे बेटे की शादी हो जाए,मैं समझूँगा गंगा नाह कर लिया`.     `राम...राम ...सहाब`दो आदमी सामने आये बोले.     `राम ...राम ..`. भानु ने झुककर कहा.     `मैंने आप लोगों को पहचाना नहीं,कहाँ से आ रहे हो`.भानु बोले.     `हमें पहचानने की जरुरत नहीं है,हम आपका लड़का देखने आए हैं पडोसी गाँव से` एक ने जवाब दिया.भानु का चेहरा गुलाब की तरह खिल गया उसे ऐसा लग रहा जैसे खुशियाँ खुद चलकर घर आईं हैं.अपने कुर्ते की जेब से बीड़ी तम्बाकू निकालकर उन्हें थमा दी और बैठने के लिए चारपाई लगा दी.      `बेटा अंदर से ठंडा पानी ले आना,मेहमान …

वीरेन्द्र सरल का व्यंग्य - घोषणा-पत्र लेखक

चित्र
व्‍यंग्‍य घोषणा-पत्र लेखक वीरेन्‍द्र ‘सरल‘ मुझे सत्‍यानाशी ‘निराश‘ कहते हैं। मैं घोपलेस के संस्‍थापक सदस्‍यों में से एक हूँ। संभव है घोपलेस आपको बड़ा ही अटपटा और अर्थहीन लग रहा हो। इसलिए सबसे पहले मैं आपको इसका अर्थ बता देना अपनी नैतिक जिम्‍मेदारी समझता हूँ ताकि बाद में किसी को ये शिकायत न रहे कि यदि आप इसके संबंध में पहले ही बता देते तो हम भी इस संध के आजीवन सदस्‍य बन गये होते। घोपलेस का फुलफार्म है-‘घोषणा-पत्र लेखक संघ‘। यह एक अपंजीकृत संस्‍था है। चूंकि प्रत्‍येक राजनीतिक पार्टी को चुनावी वैतरणी पार करने के लिये एक आकर्षक और दमदार घोषणा-पत्र की आवश्‍यकता होती है। अतएव इस संस्‍था के सदस्‍यों का उपयोग चुनाव से पहले घोषणा-पत्र लिखवाने के लिए किया जाता है। घोषणा-पत्र लिखने की पहली शर्त है, ऐसा लिखो जिसमें से अधिकांश को कभी भी पूरा न किया जा सके। दूसरी शर्त है, जिसे चुनाव सम्‍पन्‍न होते तक मतदाता सत्‍य ही समझे और तीसरी महत्‍वपूर्ण शर्त है, सत्‍ता में आने के बाद संबंधित दल जिसे भूल जाय। उपरोक्‍त शर्तों के पालन किये बिना लिखा गया घोषणा-पत्र मान्‍य नहीं होता। समीक्षक उसे सिरे से खारिज कर दे…

कुबेर की लघु व्यंग्य कथा - विलुप्त प्रजाति का भारतीय मानव

चित्र
उस दिन यमराज के पास और एक विचित्र केस आया। केस स्टडी करने के बाद यमराज
को बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ। उन्हें लगा कि इस केस को ईश्वर की जानकारी में
लाना जरूरी है। केस को लेकर वह दौड़ा-दौड़ा ईश्वर के पास गया। कहा -
’’प्रभु! आज बेहद शुभ समाचार लेकर आया हूँ; सुनकर आपको भी सुखद आश्चर्य
होगा।’’
ईश्वर ने मुस्कुराकर कहा - ’’तब तो बिलकुल भी विलंब न करो यमराज जी, सुना
ही डालो।’’
यमराज ने कहा - ’’प्रभु! जिस भारतीय प्रजाति के मनुष्य को हम विलुप्त समझ
लिये थे, वह अभी विलुप्त नहीं हुआ है। देखिये, सामने खड़े इस मनुष्य को।
साथ ही साथ इसके बहीखाते को भी देखते चलिये।’’
पहले तो ईश्वर ने उस अजूबे मनुष्य को निगाह भर कर देखा, फिर जल्दी-जल्दी
उसके खाते के पन्नों को पलटने लगा। खाते में उस मनुष्य के सम्बंध में
निम्न विवरण दर्ज थे -
नाम - दीनानाथ
पिता का नाम - गरीबदास
माता का नाम - मुरहिन बाई
(ईश्वर की बहीखता में मनुष्य की जाति, वर्ग, वर्ण, देश आदि का उल्लेख नहीं होता।)
पता ठिकाना - जम्बूखण्ड उर्फ आर्यावर्त उर्फ भारतवर्ष उर्फ भारत उर्फ
हिन्दुस्तान उर्फ इंडिया।
(एक ही स्थान के इतने सारे नामों को पढ़कर ईश्वर की बुद्धि चकराने लगी।)
हिम्मत करक…

श्याम यादव का व्यंग्य - व्हाट एन आईडिया सर जी

ईडिया , आईडिया है वह किसी को भी आ सकता है ये आईडिया पर निर्भर करता है कि वे किस को किस तरह से और किस रूप में आता है, वैसे तो आईडिया के आने के लिए समय काल परिस्थियों का कोई बंधन नहीं होता। आईडिया जब चाहे, जहाँ चाहे , जिसे चाहे और जिस तरह भी चाहे आ सकता है. वैसे आईडिया के बारे में ये आम अवधारणा है कि ये सुबह के वक्त उस समय ज्यादा आता है जब लोग टायलेट में होते हैं, शौच के समय सोच में आये इस आईडिया की बात ही अलग होती है। आईडिया जात पांत , धर्म, लिंग भेद को नहीं मानता ना ही अमीर गरीब, छोटे बड़े में भेद करता है, देश के लोकतंत्र की तरह ही उसके लिए सब बराबर होते हैं। कुछ लोग इसी उधेड़बुन में रहते हैं कि कैसे आईडिया लगाया जाय और कुछ के आईडिया हकीकत में आने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। वैसे आईडिया के अनेक प्रकार होते हैं कुछ आर्थिक होते हैं तो कुछ सामाजिक और कुछ राजनैतिक। आईडिया गरीबी के भी होते हैं और अमीरी के भी। आईडिया की आडियोलाजी भी होती है। वो धर्मनिरपेक्ष भी होती है साम्प्रदायिक भी। आईडिया की व्याख्या, करने वाले अपने हिसाब से करते हैं। तमाम तरह के आईडिया तब तक आईडिया ही रह जाते हैं जब तक…

मंजरी शुक्ल की कहानी - स्वयंसिद्धा

चित्र
उसके नाम के बिना शायद में कभी अपना वजूद सोच भी नहीं सकती थी ,फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि वो मुझसे मानसिक तौर पर जुदा हो गया I शारीरिक जरूरतें तो पूरी करनी ही थी आखिर जानवर  जो था पर इतना भी पशु नहीं था कि बाहर मुंह मारने जाता क्योंकि उसमें  हज़ार तरह की बीमारियों का खतरा जो था I तो तन के स्तर पर एकतरफा सम्बन्ध हमेशा ही चलते रहे चाहे मर्जी हो या ना हो I  एक आज्ञाकारी कुतिया की तरह सदैव एक हड्डी पर दौड़कर मैं उसकी सेवा में अपना बदन नुचवाने के लिए पहुँच जाती I बरबादियों के शेर और ज़लालत भरी कहानियाँ पढने में मुझे अजीब सा सुकून मिलता  ...लगता कि चलो इस दुनियाँ में कोई तो दूसरा ऐसा है जिसने ये भोगा हैं या फिर किसी को अपने सामने इस नर्क में बिखरते देखा हैं वरना वहीँ भावनाए, वही संवेदनाएँ और मेरे बहते आंसूओं  ने उन कहानियों के पात्रों को कैसे जीवित कर दिया जिन पर सिर्फ मेरा ही हक़ है I  बचपन में जब ये पता ही नहीं था कि दर्द क्या होता है और वो कैसा होताहै तो माँ को रोते देखकर बड़ा आश्चर्य होता था I सोचती थी कि माँ हर समय क्यों हम लोगों से छुपकर मुँह में पल्लू ठूँसकर रोती हैं I खाना तो तीनों बार हमारे…

अशोक गौतम का व्यंग्य - हर वोटर एक माल

चित्र
कल तक अपने जिस मुहल्ले में हफ्तों रेहड़ी वाले के दर्शनों को आंखें तड़प जाती थीं , आज चिड़ियों के चहकने से पहले ही बिस्तर में दुबके दुबके रेहड़ी वाले की आवाज सुनी तो पहले तो सोचा कि कोई सपना देख रहा होंऊ। रेहड़ी वाला गला फाड़ फाड़ चीख रहा था ,‘ साडि़यां ले लो! प्रेशर कुकर ले लो! पतीले ले लो! डिनर सेट ले लो! कंबल ले लो! बेड शीट्स ले लो। मोबाइल फोन ले लो। टीवी ले लो! जो चाहे ले लो! मुफ्त में ले लो!’ उसकी आवाज सुन मैं फिर बिस्तर में दुबके सोचने लगा,‘ यार, मुफ्त में?? मुफ्त में तो यहां आज प्यार भी नहीं मिलता! और एक ये रेहड़ी वाला है... कहीं सुबह सुबह उल्लू ता नहीं बना रहा होगा? बना रहा होगा तो बनाता रहे? अब तो मैं ये भूल ही गया हूं कि कभी मैं मानुस जात में पैदा हुआ था! रेहड़ी वाले ने फिर फटी आवाज दी,‘ थालियां ले लो! परातें ले लो! गैस सिलेंडर ले लो! जो चाहे ले लो!’ जब मैंने गैस सिलेंडर की आवाज सुनी तो मैं बिस्तर छोड़ झट खड़ा हो गया। असल में घर का गैस सिलेंडर चार दिनों से खत्म था और पड़ोसी की दया पर चूल्हा जल रहा था। एजेंसी वाले रहे अपनी मर्जी के! आनन फानन में आधा पौना कुरता पैजामा पहना और द…

हरदर्शन सहगल की आत्मकथा - डगर डगर पर मगर : अंतिम भाग

चित्र
" ... एक साहित्‍यिक कार्यक्रम में मुझे अध्‍यक्षता / मुख्‍य अतिथि के रूप में बुलाया था और जैसा कि होता है, एक करोड़पति को भी। अभी हम मंच पर नहीं बैठे थे। उन्‍होंने बात-चीत शुरू कर दी- तो आप ही सहगल साहब हैं। आप को लिखने का शौक कब शुरू हुआ। न जाने मुझे क्‍या हुआ। मैं चिढ़ गया। बोला क्‍या यह शौक है ? उन्‍होंने जवाब में वही कहा-हां शौक ही तो होता है। अब की बार मैंने सहज होकर पूछा- क्‍या आप शौकिया सांस लेते हैं। शौकिया खांसते हैं। शौकिया गुस्‍सा होते है। अगर ‘हां‘ तब में भी शौकिया लिखता हूं, वरना लेखन मेरे जीवन का अंग है। कई लोग मुझ से पूछते हैं कि आपने लिखना कब से शुरू किया ? तो मेरा उत्त्‍ार होता है- जब दो साल का था तभी से लिख रहा हूं..." -- इसी संस्मरण सेडगर डगर पर मगर(आत्‍मकथा) हरदर्शन सहगल पिछले भाग 3 से जारी...भाग 4 (अंतिम)जब मैं अपना पहला उपन्‍यास 'सफेद पंखों की उड़ान‘ लिख रहा था, तो मेरी बड़ी बिटिया कविता कॉलेज से घर (रेलवे क्‍वार्टर) पहुंचते ही साइकिल को बरामदे में खड़ा करने के बाद, कपड़े भी नहीं बदलती। जाकर उपन्‍यास को पढ़ती कि कितना कैसे आगे बढ़ा है। इससे मैं बहुत…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.