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March 2014
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चाँदनी 

डॉ. मंजरी शुक्ल

जब ईश्वर जरुरत से ज्यादा झोली में गिर देता हैं तो वह भी मनुष्य के लिए अहंकार और पतन का कारण बन जाता हैं I ऐसा ही कुछ हुआ चाँदनी  के साथ..सभ्य, सुशील और बेहद महत्वकांशी चाँदनी को जब महात्मा गाँधी के आदर्शों पर जीवन पर्यन्त चलने वाले ईमानदार और अकेले बाबूजी ने उसे पहली बार सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल के पद पर कार्य करने के लिए भेजा तो मानों कई सतरंगी इन्द्रधनुष उनकी आँखों झिलमिल वर्षा के साथ मुस्कुरा उठे I उसकी माँ की मौत के बाद बाबूजी ने अकेले होते हुए भी उसकी सारी ज़िम्मेदारियाँ माँ भी बनकर बिना किसी शिकन या परेशानी के उठाई I जहाँ आस पड़ोस के मर्द घर में घुसते ही एक गिलास पानी के लिए भी अपनी घरवाली को चीखते हुए बुलाते वहीँ दूसरी ओर पसीने में लथपथ बाबूजी आँगन में आते ही उसे प्यार से गोद में उठाकर जी भर के दुलार करने के बाद भीगी आँखों से  सूखी गीली लकड़ियों को चूल्हे में जलाने के लिए कवायद शुरू कर देते और उसे गोदी में लेकर खाना बनाने के लिए जुट जाते I

"संस्कार" बस इसी शब्द के बीज वो उस नन्ही  बच्ची के  मन मस्तिष्क में बो देना चाहते थे I सारी दुनियाँ देखने के बाद उनकी अनुभवी आँखें ताड़ गई थी कि पैसे से खरीदी गई इज्जत  मजबूरीवश सिर्फ शरीर ही देता हैं I अगर किसी के मन का मालिक बनना हो तो पहले खुद गुणी बनना पड़ेगा I शायद ये बाद चाँदनी  भी महात्मा गाँधी, महाराणा प्रताप, भगत सिंह और लाल बहादुर शास्त्री जैसे अनेक महान और अपने सिद्धान्तों पर अडिग रहने वाले व्यक्तियों के बारे में जानकर समझ गई थी I अपने बाबूजी के सपनों को पूरा करने के लिए उसने भी सारी दुनियादारी को ताक पर रखकर लालटेन की रोशनी में अपने जीवन के वो सुनहरे साल  किताबों की काली स्याही में डुबो दिए, जिनमें उसकी हमउम्र सहेलियां सावन के झूलों में झूलते हुए अठखेलियाँ करती थी I वर्षों बाद बाबूजी की वो सारी कहावतें चरितार्थ होते हुए एक दिन डाकियें के हाथों से नियुक्ति पत्र के रूप में उसके पास आ गई और आँसुओं ने हँसते हुए बाबूजी के  तकलीफों में गुज़रे हुए हजारों पलों को एक ही झटके में अलविदा कह दिया I उसकी तमाम मनुहार और उलाहनों के बाद भी बाबूजी उसके साथ शहर नहीं गए और उसे आशीर्वाद देते हुए उसकी बचपन की खट्टी-मीठी   यादों के साथ आँसू पोंछते हुए उस मिट्टी के घरोंदें के अन्दर चले गए I

चाँदनी को वहाँ पर हर नए प्रिंसिपल की तरह स्कूल के सारे स्टाफ ने हाथों हाथ लिया I जब उसके हाथों से होती हुई लक्ष्मी से कई घरों का चूल्हा जलता था तो ज़ाहिर था कि उन ज़ुबानों में भी सदा चाशनी ही लिपटी रहती थी I स्कूल के गेट के अन्दर घुसते ही मानों वह महारानी बन जाती I गेटकीपर से लेकर बच्चें और बच्चों से लेकर प्रत्येक टीचर की झुकी हुई गर्दन शुरू में तो उसे संकोच से मानों ज़मीन में दो फीट अन्दर गाड़  देती थी पर पता नहीं कब हौले से उसके साथ अहंकार भी अदृश्य रूप में कदम से कदम मिलाते हुए चलने लगा  I इसका पता उसे तब चला, जब एक दिन स्कूल के बूढ़े गेटकीपर ने अपनी ऐनक पोंछते हुए उसे नहीं पहचान पाने के कारण सेल्यूट  नहीं मारा I इतनी गहरी चोट तो उसे तब भी नहीं लगी थी जब मास्टरजी ने उसे फ़ीस नहीं भर पाने की वजह से  डंडे से मारते हुए हथेलियाँ नीली कर दी थी I ग़ुस्से से आग बबूला होते हुए, गोरे चेहरे को लाल करके और पैर पटकते हुए उसने अपने कमरे से ना जाने कौन सा फ़ोन मिलाया कि बेचारा गरीब बूढ़ा गेटकीपर रिटायर होने से पहले ही आँखों में आँसूं भरे उसकी तरफ़ बेबस नज़रों से देखते हुए चुपचाप बिना एक शब्द कहे वहाँ से चला गया और शायद वहीँ से बाबूजी की सारी कहानियाँ उसके दिलों दिमाग से विलुप्त हो गई I

अब वह ज़माने के हिसाब से सुर ताल मिलकर चलने लगी I महँगे कपड़ों से अपनी अलमारी को विभिन्न प्रकारों के आभूषणों से सजाती   हुई, कई बैंकों के लगातार खातें खुलवाती वह अब एक मकान की भी स्वामिनी हो चुकी थी I   कई सांसारिक लोगों की मदद से उसने बहुत ही कम समय में सामाजिक माँ प्रतिष्ठा भी पा ली थी जो धन और वैभव के अनुरूप प्रदान की जाती हैं I  उसने अब सभी देवी देवताओं को दरकिनार करते हुए अब अपना इष्टदेव कुबेर को मान लिया था I  अचानक एक दिन दोपहर में अपने स्कूल का मुआयना करते हुए बच्चों को मिड डे मिल खाते देख कर उसके मन में एक विचार क्रोंधा , जिसे उसके साथ चल रहे चालबाजी के गुरु मिस्टर वर्मा , जो की वहाँ बरसों से अकाउंटेंट  थे, उन्होंने तुरंत ताड़ लिया I बस फिर क्या था ....आँखों से ही चाँदनी  ने स्वीकृति दे दी और ख़ुशी के मारे पान का पीक भी निगलते हुए दूसरे ही दिन से कर्त्तव्यनिष्ठ वर्मा जी ने मिड डे मिल का तीन चौथाई अनाज आस पास की दुकानों पर पहुँचाना  शुरू कर दिया और वहाँ से कीड़ो वाला पुराना अनाज स्कूल लाकर बनवाना   I खाना बनाने वाले अब केवल  कागज़ पर थे I उनकी कमियाँ निकालकर स्कूल की काम वाली बाईयों और चौकीदारों से  ही खाना बनवाना शुरू कर दिया I कुछ दिन तो बच्चों ने कोई शिकायत नहीं की पर जब खाने में रोज ही  कीड़े मिलने लगे और खाना गले के नीचे से उतरना बंद हो गया तो बेचारे अपने घर से ही रूखी सूखी लाकर खाने लगे I ये देखकर चाँदनी  को बहुत सुकून मिला I

हर बात में सरकार को कोसते हुए वो सबकी नज़रों में बेदाग़ बनी रही मानो सरकार कोई एक आदमी हो जो कहीं दूर से बैठा ये सब तमाशा करवा के खुश हो रहा हो I उधर बाबूजी चाँदनी की याद में बहुत बैचेन हो रहे थे I अचानक जब मन की पीड़ा मौन से भी मुखर हो उठी तो वो चल दिए अपना झोला उठाए चाँदनी  के पास I कही उनकी ईमानदार कामकाजी बिटियाँ  अपने स्कूल का कामधाम छोड़कर ना दौड़ी चले आये ,  सोचकर उन्होंने अपना परिचय केवल चाँदनी  के गाँव के पड़ोसी होने का दिया I उस समय मालती बैंक में पैसा जमा कराने गई हुई थी I पहले तो बाबूजी  बैठे  , फिर घूमते टहलते उस ओर जाकर खड़े हो गए जहाँ पर बच्चों का खाना बन रहा था I वे मन ही मन अपनी जीवन भर की तपस्या को फलीभूत होते देखकर ख़ुशी से रो पड़े कि आज उनकी लड़की इस योग्य हैं कि ना जाने कितने नन्हे मुन्ने  बच्चों  को भोजन करवा रही हैं I जिन बच्चों के घर में एक समय का भी खाना छीना झपटी के साथ खाया जाता था  वो बेचारे उस खाने के इंतज़ार में बैठे थे जिन्हें दूसरे बच्चें देखना भी पसंद नहीं करते थे  I अचानक खाने बनाने वाली बुढ़िया अम्मा  फुसफुसाकर चौकीदार से बोली -" हमका लागत हैं दो ठौ छिपकली ई दाल में  गिर गई हैं I "

चौकीदार ने चमचे से हिलाकर देखा तो दो काली छिपकलियाँ  अभी भी दाल के अन्दर तड़प रही थी  I उसने इधर-उधर देखते हुए चुपचाप भगोने को तश्तरी से ढकते हुए धीरे से कहा -" अभी मुझे चाँदनी  मैडम के घर पर बर्तन मांजने भी जाना हैं I अगर छिपकली निकालकर दूसरा दाल का पतीला चढाऊंगा       तो चार घंटे ओर लगेंगे I तुम नाहक ही परेशान मत हो I हमें तो कीड़ों से भरा खाना दिया ही जाता रोज बनाने के लिए ...तो दो छिपकली में कौन सी आफत हुई गई हैं  I "

और अम्माँ ने भी माथे का पसीना पोंछते हुए चुप्पी साध ली I

जब खाना बच्चों को दिया जाने लगा तो बाबूजी के पसीने से तरबतर कुर्ते और पोपले मुँह को देखकर अम्मा को दया आ गई I.वह समझी कि स्कूल में ही कोई नया आदमी काम पर लगा हैं I उन्होंने एक प्लेट खाना उनके आगे भी रख दिया I बाबूजी अन्न का निरादर कर नहीं सकते थे इसलिए वे बिना कुछ कहे खाने बैठ गए I अभी आधा खाना ही खाया था कि सभी बच्चों के साथ साथ उनकी भी हालत बिगड़ने लगी I थोड़ी ही देर में सभी को उल्टी- चक्कर आने लगे I ये देखकर चपरासी और अम्माँ दर के मारे वहाँ से सर पर पैर रखकर ऑफिस कि ओर भागे I पर तब तक चाँदनी वापस लौट कर आ चुकी थी और अपने कमरे में बैठकर पेपर पढ़ रही थी I जैसे ही हाँफते काँपते वर्मा जी और बाकी लोगों ने उसे इस घटना से अवगत कराया तो वह हस्पताल का नाम सुनकर ही बिदक उठी I डॉक्टरों की रिपोर्ट, अधिकारियों का निरीक्षण और बाबूजी की इज्जत का भी आज अचानक उसे पता नहीं कैसे ध्यान आ गया I उसने सभी लोगों को रोजमर्रा में ली जाने वाली दवाइयों को देने के लिए कहा और घर की ओर चल दी I

उधर बाबूजी की हालत बिगडती ही जा रही थी I चाँदनी  को चार बार संदेशा भिजवाया गया की एक बूढ़े आदमी की तबियत भी बहुत खराब है ,पर वो नहीं आई I आखिर रात में बाबूजी ने चाँदनी  का नाम अपने मन में लेते हुए आखिरी साँस ली और उससे बिना मिले ही इस दुनियां से चले गए I अब तो आखिर मालती को बडबडाते हुए आना ही पड़ा I जैसे ही उसकी नज़र जमीन पर गठरी जैसे  पड़े हुए बाबूजी पर पड़ी वह जैसे चेतना शून्य हो गई I उसने काँपते हाथों से बाबूजी का निर्जीव पड़ा ठंडा हाथ पकड़ा I वो बोलना चाह रही थी पर ज़ुबान जैसे तालू में चिपक कर रह गई थी I उसके हाथ, पैर, आँखें,कान जैसे सभी इन्द्रियों ने एक साथ काम करना बंद आकर दिया था I वो बस बाबूजी की ठंडी पड़ी दुबली पतली देह से एक अबोध शिशु की तरह चिपटी पड़ी थी I अचानक वह उठी और पागलों की तरह ठहाका मारकर हँसने लगी और एक-एक करके  अपने सारे गहने वही फेंककर नंगे पैर स्कूल के बाहर जाने लगी I सब मूर्ति की तरह अपलक निहार रहे थे  और कुछ भी नहीं समझ पाने के कारण मानों पत्थर के बेजान बुतों की भांति एक दूसरे को फटी हुई आँखों से देख रहे थे I आख़िरकार वर्मा जी भागे और चाँदनी  के पास जाकर हकलाते हुए धीरे से बोले-' मैडम, आप इतनी रात में कहाँ जा रही हैं ?"

चाँदनी  ने उन्हें भरपूर नज़रों से देखते हुए कहा -" थाने "

और स्याह होती चाँदनी  सोई हुई काली सड़क के अन्धेरे में कहीं गुम हो गई 

फाग़ हरेक जीवन में खुशियों के रंग लेकर नहीं आता
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फाग़ के दिनों में राजेन्द्र सिंह बेदी की फिल्म ‘फागुन’ याद आती है ।
फागुन गोपाल (धर्मेन्द्र) एवं शांता दामले (वहीदा रहमान) पति-पत्नी के
मार्मिक रिश्ते की कहानी हैं। बेमेल शादी के पहलुओं से परिचित कराती यह
कथा प्रेम में बंध कर भी तृष्णा की विडम्बना को दर्शाती है। प्यार अंधा
होता है। वो किसी बंधन-अवरोध को नहीं जानता। धनवान शांता निर्धन गोपाल से
प्रेम करती है, परिवार की इच्छा के खिलाफ दोनों शादी कर लेते हैं। विवाह
बाद गोपाल पत्नी को छोड शहर चला जाता है। दिनों बाद होली के त्योहार पर
घर पर लौटा है, रंगों की दुनिया में अपना कोई रंग तलाशने । पत्नी से रंग
खेलने की हट में होली के रंग उस पर डाल कर नाराज़ कर देता है । रंगों के
त्योहार में कपडा खराब हो जाने का ख्याल बहुत कम रहता है। इस डर में खेली
होली बेरंग सीमाओं को तोड नहीं पाती। कीमती साडी खराब होने पर शांता काफी
नाराज़ है, वह गोपाल को दो टूक कहती है ‘जब आप कीमती साडी खरीद नहीं
सकते,फ़िर इसे खराब करने का अधिकार भी नहीं होता’। शांता के व्यवहार से
पीडित ‘गोपाल’ तिरस्कार का बोध लिए घर छोड देता है । पर वह यह नहीं समझ
पाया कि शांता ने उसका अपमान क्यूं किया होगा, पत्नी के खराब व्यवहार की
वजह जाने बिना वो चला गया। दरअसल बेटी की बेमेल शादी से दुखी माता-पिता
को खुश करने के लिए शांता ने यह नाटक किया था। लेकिन इस कोशिश में पति
खफा हो गया। कपडा भले ही बहुत कीमती रहा हो लेकिन पति-पत्नी के रिश्ते से
कीमती नही था। वो अपने प्रेम पर कायम रह सकती थी…उससे एक गलत निर्णय की
भूल हो चुकी है।

फागुन महीना जिसमें ‘होली’ का त्योहार आता है, वही फाग़ शांता-गोपाल की
ज़िंदगी से ‘रंग’ जाने की त्रासद पीडा है। सालों बाद भी शांता खराब
व्यवहार का दंश से पीडित अकेला-बेरंग जीवन जी रही है। बिटिया दामद उसके
जिंदगी के साथ एडजस्ट करने की कोशिश नहीं करना चाहते, ऐसे में उस असहाय
की जिंदगी में बदलाव मुश्किल नजर आता है । होली जो कि जीवन में ‘रंग’ का
प्रतीक है, शांता के लिए बेरंग विडम्बना की निशानी बन चुका है । उसे
स्मरण है कि बरसों पहले आज ही के दिन गोपाल नाराज़ होकर चला गया था ।
कीमती साडी पर ‘रंग’ डालने के लिए उसने जो पति का तिरस्कार किया था, जब
भी होली आई उस दिन के साथ आई । जीवन को पलट देने वाले काले दिन की याद
बरकरार रही। कह सकते हैं कि होली का रंग शांता को काफी तकलीफ देता था।
फाग़ ने उससे बैर कर रखा था।जीवन की उमंगों से महरूम होकर जीना एक तपस्या
समान होता है। पति के चले जाने बाद वह एकांत व असहाय सी हो गई, उसके जीवन
का स्वरूप मझधार में जी रहा जीवन था। शांता के अकेलेपन को बिटिया- दामद
भी नहीं बांटना चाहते। जीवन की संध्या बेला पर वह किसी सहारे की जरूरत
महसूस करती है, कोई होता जिसको हम अपना कह लेते! भाव में शांता को पति की
कमी खटकती रही । फागुन का रंग जिंदगी को अपराधबोध में जीने को छोड गया
था।

जीवन की संध्या बेला में गोपाल अपने परिवार के पास लौट आता है। शांता की
कहानी से हम समझ पाते हैं कि किसी अपने के बिना ‘होली’ ही नहीं बाक़ी
जिंदगी भी निस्सवाद हो सकती है । कहानी में फागुन व होली को बेकग्राउंड
थीम रखा गया। होली पर्व पर घटी एक साधारण घटना कथा को विस्तार देती है।
जीवन में परस्पर निर्भरता स्वाभाविक बात है। कह सकते हैं कि जिंदगी अकेली
गुजारी नहीं जा सकती। सारा जीवन अकेले होकर भी व्यक्ति किसी सफर का हमसफर
हो सके तो जीना बेमानी नहीं लगता। शांता की कहानी से हमें संदेश मिला कि
फाग़ हरेक की जिंदगी में रंगों का सुखद स्वरूप लेकर नहीं आता। बेरंग
जिंदगी की टीस होली के समय सबसे ज्यादा होती है।

होली के त्योहार में रंगों की प्रतिक्षा सबसे अधिक होती है।उस दिन के बाद
शांता को हर फाग़ में गोपाल का इंतजार रहा,लेकिन वो बरसों तक लौट कर नहीं
आया। गोपाल के नजरिए से इस कहानी को देखें तो उसे भी खुशी नहीं मिली।
तिरस्कार का बोध लिए वो जीवन के आनंद से दूर रहा। पत्नी का खराब व्यवहार
उसे सहन ना हो सका,क्या वो पीडा इस कद्र गंभीर रही कि बरसों दिल में थी?
गोपाल के लिए वो शायद गंभीर थी। पति-पत्नी की पीडा में समानता पीडा की
वजह में देखी जा सकती है। दुख का धागा दो अलग जिंदगियों को एकाकार कर रहा
था। कहानी के प्रकाश में शांता का हिस्सा ज्यादा त्रासद रुप में व्यक्त
हुआ है। साहित्य से सिनेमा में आए राजेद्र सिंह बेदी जीवन की एक विडम्बना
को तलाश कर लाए थे। फाग के साए में पल रही लेकिन रंग की प्रतिक्षा में
बुनी एक कहानी। होली के रंग में बाक़ी जीवन निस्सवाद जीने को विवश कहानी।
फागुन की बेला जिंदगी में रंग लेकर आती है। शांता-गोपाल के सिलसिले में
ऐसा हो ना पाया। होली हरेक की जीवन में खुशियों के रंग लेकर नहीं आती।
फागुन का हर रंग खुद में एक दुनिया समेटे हुआ करता है। कहानी के
परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि जिंदगी रंगों के बिना मुकम्मल नही
है।

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सैयद एस. तौहीद

पुस्‍तक समीक्षा अनन्‍त आलोक

खामोशी को शब्‍द देती कविताएं

घटनाएं बोलती नही हैं। पूछती भी नहीं, वे तो केवल घटित होती हैं और कर देती हैं अपना काम। अच्‍छा या फिर बुरा। हाँ इनके घटित होने से पूर्व एक खामोशी अवश्‍य होती है , जो अनजानी होती है। इस खामोशी को कोई वैज्ञानिक , कोई भविष्‍य दृष्‍टा जान नहीं पाता, समझ नहीं पाता। इसका केवल आभास होता है। उसी आभास को शब्‍द दिए हैं लेखक एवं कवि श्रीकांत अकेला ने अपने काव्‍य संग्रह 'अनजानी खामोशी ' में। यहाँ समीक्षित पुस्‍तक श्रीकांत अकेला का दूसरा काव्‍य संग्रह है। शीर्षक कविता में कवि अनजानी खामोशी को मुखरित करवाते हुए कहलवाता है ''फिर नष्‍ट होंगे घरोंदे/ आहत होगी संवेदना/ जंगल मिट्‌टी हरियाली भी/ और छा जाएगी एक अनजानी खामोशी।''

कवियों के बारे में एक कहावत आम प्रचलित है 'जहां न पहुंचे रवि , वहां पहुचे कवि।' कवि मन घोर निराशा में भी आशा की एक किरण खोज ही लेता है। पड़ोसी देश से हालांकि हमारे संबंध आरम्‍भ से ही अच्‍छे नहीं रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तो कड़वाहट कम होने के बजाय और बढ़ी है। कवि ह्रदय ऐसे में भी संबंधों की मधुरता की आशा करता है। एक बानगी देखिए ''काश ! / सरहद पार से/ तुम लाते/ सद्‌भावना के फूल/ और हम निभाते/ अतिथि देवो भवः की / अपनी मौलिक परंपरा।'' इस कविता में कवि अपनी संस्‍कृति और परंपराओं पर भी गर्व का अनुभव करता है।

कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है ये प्रकृति का नियम है। लेकिन दुख उस समय होता है जब हम कोई मुकाम पा लेने के बाद खुशी में या सफलता के नशे में इतना मदहोश हो जाते हैं कि अपने मूल को ही भूल जाते हैं। आज यह बात आम हो गई है। संतान सफलता पाने के बाद अपने माता पिता को भूलती जा रही है या दुत्‍कार रही है। यह भाग्‍य की विड़ंबना नहीं, हमारी संस्‍कृति का ह्रास है। इसी पर फटकार लगाते हुए कवि 'बेशर्म फूल' कविता में कहता है। ''अकस्‍मात ही नहीं/ खिलता है कोई सुन्‍दर फूल/पहले बीज या / किसी टहनी को /सड़ने का दर्द झेलना पड़ता है/ फिर गुंचे की गोद में खिलता है पुष्‍प/ सिसकता है गुंचा पर/ मुस्‍कुराता है बेशर्म फूल।''

कवि श्रीकांत अकेला प्रत्‍येक विषय पर लेखनी चलाते हैं, विशेषकर समसामयिक विषयों पर इनकी दृष्‍टि और भी पैनी है। हिन्‍द में हिन्‍दी की दुर्दशा पर वे आह्‌वान करते हुए कहते हैं ''हिन्‍द की आवाज बनकर / हिन्‍द को सम्‍मान दो / हो सके ये पुण्‍य करके/ राष्‍ट्र को पहचान दो।

राजनीतिक हलचल से कवि मन कैसे विलग रह सकता है। समकालीन स्‍थिति पर 'चाय पॉलिटिक्‍स' में कवि कहता है ''चाय की चुस्‍कियां बढ़ाती हैं नजदीकियां/ चाय पीना पिलाना यही परंपरा परंपरिक है।/ सत्‍य भी।''

अन्‍ना के आंदोलन ने सब को एक बार फिर गाँधी का स्‍मरण करवा दिया। इस घटना से शायद ही कोई प्रभावित हुए बिना रहा हो। 'मुक्‍ति बंधन' कविता में कवि कहता है '' देखो एक बार फिर/ संभाली है कमान / एक फकीर ने/ जिससे जुड़ गई वो / तमाम भावनाएं , विचार।''

गांव में शिक्षा की लौ से जहाँ कई घर रौशन हुए हैं। वहीं असंख्‍य घरों में आग भी लगी है। और इसकी जद में आए वहाँ के बुजुर्ग। गाँव में रोशन हुई संतानें अपने हिस्‍से की रोशनी सहित शहरों को पलायन कर रही हैं और शेष रह जाते हैं, बूढ़े माँ- बाप। इसे शिक्षा की सबसे बड़ी हानि कहा जाए तो अतिश्‍योक्‍ति न होगी। 'चिट्‌ठी ' कविता में इस बात को कवि कुछ यूँ बयां करता है ''आंखें भर जाती होंगी/ जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर खड़े/ बूढ़े मां- बाप की जो सिर्फ राह तकते हैं/ चिट्‌ठी की क्‍योंकि/ उस गांव में है तो सिर्फ चन्‍द बुजुर्ग ही/ या यूं कहें बुजुर्गों का एक गाँव।''

कवि स्‍वतन्‍त्र पत्रकार भी है अतः स्‍वभाविक है इसकी छाप उनकी दृष्‍टि पर तो है ही , कलम की नोक पर भी बेबाक झलकती है। वास्‍तव में यही रचनाधर्मिता भी है। मुक्‍बिोध ने कहा था सृजन के खतरे तो उठाने ही होंगे। पिछले कुछ समय में दिल्‍ली और अन्‍य शहरों में हुई बलात्‍कार की बर्बरतापूर्ण घटनाएं, असामाजिक तत्‍वों द्‌वारा खून खराबा और पड़ोसी देश की हमारे सैनिकों के सिर कलम करने की अक्षम्‍य घटनाओं पर शासन प्रशासन के मौन को कवि यूँ तोड़ता है ''जैसिका, आरूषि, दामिनि/ या फिर निर्भया का सच हो/ सिर कटी हों लाश या चीन की घुसपैठ/... सिंहासन पर अब सिंह नहीं/ सिर्फ स्‍वार्थी सत्‍तालोलुप / गीदड़ बैठते हैं।'' उत्‍तारखंड त्रास्‍दी से क्षुब्‍ध कवि देवाधिदेव महादेव से प्रश्‍न करता हैं '' हे महादेव ये क्‍या !/ तुम्‍हारी अराधना का ये फल! / ये भयंकर प्रलय कैसी ? / निर्दोष स्‍त्री पुरूष , बच्‍चे/ मूक पशु, पक्षी / मनमोहक फिजाएं / सब खा गए !'

संग्रह की 81 कविताओं में अखबार, पीत पत्रकारिता, सिसकियां, सच्‍चा प्रेम, शब्‍द बाण, एवं सिंहासन पर हों सिंह जैसी भी अच्‍छी कविताएं हैं। संग्रह में कवि कहीं कहीं यति गति और लय की पाबंदी में छन्‍दानुशासन का पालन करता हुआ प्रतीत होता है तो कहीं भाव प्रधान छन्‍दमुक्‍त वातावरण में अबाध गति से बहता चला जाता है। कुछ कविताओं में दोहराव एवं विरोधाभास दोष के अतिरिक्‍त शब्‍दों के चयन में त्रुटि हुई है जो स्‍वसंपादन एवं सतत्‌ अध्‍ययन से दूर होगी। कुल मिलाकर पुस्‍तक संग्रहणीय बन पड़ी है।

पुस्‍तक ः अनजानी खामोशी (काव्‍य संग्रह)

कवि ः श्रीकांत अकेला

प्रकाशक ः हिमालिनी प्रकाशन ,  भुड्‌डी चौक शिमला रोड़

देहरादून उत्‍तराखण्‍ड

मूल्‍य ः 150 रू

समीक्षक ः अनन्‍त आलोक

जिला सिरमौर , हि0 प्र0 173022

गलत तस्वीर

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शहर की मुख्य सडक पर डाकघर के बाहर कूडाघर बरसोँ से बना हुआ था। कचरे की
पेटी के बाहर कचरा बिखरा रहता था। उसमेँ कुत्ते,बिल्लियां,गाएं और इंसान
मुंह मारते रहते थे। ऐसे मंजर शहर मेँ जगह-जगह देखने को मिल जाते थे। यह
कोई नहीँ बात नहीँ थी। नई बात तब बनी,जब स्कूटर पर सवार राहगीर ने एक
विदेशी सैलानी को फटेहाल आदमी को कूडेदान मेँ से खाना बीनते हुए का फोटो
खीँचते हुए देख लिया।
'नो-नो...यह आप क्या कर रहे हैँ? आप भारत की गलत तस्वीर पेश करना चाहते हैँ।'
'मेरे देखे तो यही सही तस्वीर हैँ',सैलानी ने कैमरा गले मेँ लटकाते
हुए कहा,'आप लोग कुछ करते क्योँ नहीँ?'
'यह हमारा काम है क्या? सरकार ही निकम्मी है!' और उसने स्कूटर दौडा दिया।

-देवेन्द्र सुथार,बागरा,जालोर (राज.)।

छोटी गंगा (कहानी)

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`कोई मेरे घर को,स्वर्ग बना दे 

     तोड़कर तारे आसमाँ से,जमीन पर ला दे`

भानु सुबह-सुबह यही पंक्तियाँ दोहराते रहते,कभी मंदिर में कभी सड़कों पर किन्तु इन्हें पूरा करने वाला कोई                 नहीं था.

     बड़े बहू बेटा भानु को परेशान किया करते,खाने पीने तक की सुधि भी नहीं लेते.बूढ़ा शरीर था कब तक साथ दे सहारे की जरूरत थी,सहारा कौन दे यही चिंता दिन रात सताए जा रही थी,जो नजरें बची थी छोटे बेटे पर टिकी थी शायद वही कुछ कर दिखाए.

     माथे पर हाथ रखे भानु सोच रहे थे `बस छोटे बेटे की शादी हो जाए,मैं समझूँगा गंगा नाह कर लिया`.

    `राम...राम ...सहाब`दो आदमी सामने आये बोले.

    `राम ...राम ..`. भानु ने झुककर कहा.

    `मैंने आप लोगों को पहचाना नहीं,कहाँ से आ रहे हो`.भानु बोले.

    `हमें पहचानने की जरुरत नहीं है,हम आपका लड़का देखने आए हैं पडोसी गाँव से` एक ने जवाब दिया.भानु का चेहरा गुलाब की तरह खिल गया उसे ऐसा लग रहा जैसे खुशियाँ खुद चलकर घर आईं हैं.अपने कुर्ते की जेब से बीड़ी तम्बाकू निकालकर उन्हें थमा दी और बैठने के लिए चारपाई लगा दी.

     `बेटा अंदर से ठंडा पानी ले आना,मेहमान आए हैं` भानु आवाज लगाते बोले.

     `जी दादा अभी लाया` अंदर से आवाज आई.

     `और सुनाओ क्या हालचाल हैं?` भानु ने नम्रता से पूछा.

     `ये लीजिये दादा जी,मैं पानी भर लाया,चाय नास्ता अभी तैयार हो रहा है`. बेटा अचानक बोला.

     भानु ने इशारा करके लड़का दिखा दिया.सभी को लड़का पसंद आया बोले, `आपका लड़का हमें पसंद है,आप चाहे तो लड़की देख सकते हैं`.

     `कैसी बात करते हो हम ठहरे पुराने ख़यालात के लड़की नहीं देखेंगे रिश्ता वैसे ही पक्का कर दें`. भानु ने हाथ  जोड़कर विनती की.

     अचानक मेहमान खड़े हुए `आज्ञा दीजिए हम चलते हैं सहाब`

     `ऐसे कैसे चाय नास्ता करके जाइए`

     `नहीं ...नहीं ...अब नहीं हम कुछ भी नहीं खा पी सकते `

     बड़े धूम धाम से शादी कर दी.चर्चायें खूब छाई रही लोगों की जुबान पर कि गाँव में कोई शादी हुई हैं.बहू भी अच्छे घराने की निकली कुछ ही दिनों में सारा माहौल समझ गई.ससुर(भानु )का अच्छी तरह ख्याल रखने लगी,समय पर खाने पीने का इंतजाम कर देती,कभी-कभी पैर भी दबा देती.

     ससुर जी बहुत खुश थे क्योंकि जो प्रार्थना की थी मंदिर में आज पूरी होती नजर आ रही थी,भानु उसे गंगा जैसी मानने लगे क्योंकि उसके विचार पवित्र गंगा की तरह थे?.

     एक दिन की बात हैं बहू ससुर जी के लिए भोजन ले जा रही थी कि जिठानी मुँह ऐंठती भौंह चढ़ाती बुदबुदाई `बड़ी आई महारानी सेवा करने वाली,बहुत देखीं हैं ऐसी पहले ढोंग रचती हैं बाद में समेटकर सम्पति गायब हो जाती हैं`.

     बहू का उत्साह जगा दो कदम आगे बड़ी किन्तु ससुर ने रोक लिया `जाने दे बहू ये तो उसकी रोज की आदत है बुरा नहीं मानते,तुम सझदार हो` ससुर की बात मानकर कदम पीछे खींच लिए.

     जिठानी की आदत दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी कभी-कभी हरकतें हदें पार कर जातीं.एक दिन जिठानी सुबह-सुबह गन्दी गालियाँ बक रही,बहू को सहन नहीं हुआ उसने भी अपना मुँह खोल दिया,खरी खोटी सुना डाली.

     अचानक ससुर जी की तबियत ख़राब हो गई कई डॉक्टरों हकीमों को बुलाया किन्तु कोई सुधार नहीं उन्हें लगा अब अंतिम समय आ गया.बड़े बहू बेटे को बुलाया किन्तु उन्होंने आने से मना कर दिया,पास खड़े छोटे बहू बेटे ने धीरज बँधाई.

     छोटी बहू पैर दबा रही थी,बड़ी बहू खड़ी दरवाजे पर बक-बक कर रही `चलो अब बला टली,सारी रात   खाँसता है न सोता है न सोने देता है,जीना हराम कर रखा है`.

     भानु ने पल में जान लिया जरूर गाली दे रही है मुँह अपना घुमा लिया आँखों में आँसू भर बोले, `बहू घर का ख्याल रखना तुम्हीं लक्ष्मी हो,तुम्हीं गंगा हो`.

     बहू ने भी अपना सर हिला दिया.

     सारी सम्पति मरने से पहले भानु ने अपने छोटे बहू बेटे के नाम कर दी. 

                                       अशोक बाबू माहौर 

                                       ग्राम -कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह, जिला

मुरैना (म.प्र.) 476111 

             

                                       ईमेल ashokbabu.mahour@gmai.com

व्‍यंग्‍य

घोषणा-पत्र लेखक

वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

मुझे सत्‍यानाशी ‘निराश‘ कहते हैं। मैं घोपलेस के संस्‍थापक सदस्‍यों में से एक हूँ। संभव है घोपलेस आपको बड़ा ही अटपटा और अर्थहीन लग रहा हो। इसलिए सबसे पहले मैं आपको इसका अर्थ बता देना अपनी नैतिक जिम्‍मेदारी समझता हूँ ताकि बाद में किसी को ये शिकायत न रहे कि यदि आप इसके संबंध में पहले ही बता देते तो हम भी इस संध के आजीवन सदस्‍य बन गये होते। घोपलेस का फुलफार्म है-‘घोषणा-पत्र लेखक संघ‘। यह एक अपंजीकृत संस्‍था है। चूंकि प्रत्‍येक राजनीतिक पार्टी को चुनावी वैतरणी पार करने के लिये एक आकर्षक और दमदार घोषणा-पत्र की आवश्‍यकता होती है। अतएव इस संस्‍था के सदस्‍यों का उपयोग चुनाव से पहले घोषणा-पत्र लिखवाने के लिए किया जाता है। घोषणा-पत्र लिखने की पहली शर्त है, ऐसा लिखो जिसमें से अधिकांश को कभी भी पूरा न किया जा सके। दूसरी शर्त है, जिसे चुनाव सम्‍पन्‍न होते तक मतदाता सत्‍य ही समझे और तीसरी महत्‍वपूर्ण शर्त है, सत्‍ता में आने के बाद संबंधित दल जिसे भूल जाय। उपरोक्‍त शर्तों के पालन किये बिना लिखा गया घोषणा-पत्र मान्‍य नहीं होता। समीक्षक उसे सिरे से खारिज कर देते हैं। अतएव इस विधा के लेखन में सावधानी बहुत आवश्‍यक है। मुझे यह बताने में कतई संकोच नहीं है कि मैं इस विधा में आजतक सफल लेखन नहीं कर पाया। मगर मेरे समकालीन लेखक इस विधा में लेखन करके नाम और दाम दोनों कमा रहे हैं। आइये अब इस विधा की उपयोगिता पर विस्‍तार से चर्चा करने का प्रयास करते है।

आजकल जैसे-जैसे चुनावी सरगर्मी तेज होती है, वैसे-वैसे घोषणा-पत्र लेखकों की मांग काफी बढ़ जाती है और उनके दाम आसमान छूने लगते हैं। मांग के हिसाब से माल सप्‍लाई कर पाना काफी कठिन होता है। आर्डर लेकर समय पर माल पूर्ति नहीं करने से बदनामी होती है, वह अलग।

इसलिए कुछ जागरूक घोषणा-पत्र लेखक पहले से ही माल तैयार रखते है और मांग के हिसाब से माल बाजार में खपातें हैं। मांग अधिक होने पर ब्‍लैक मार्केटिंग करके अधिक मुनाफा भी कमाते हैं। अब, सभी राजनीतिक दल इतने सक्षम तो है नहीं कि ब्‍लैक में माल खरीद सकें। साथ-ही-साथ ऐसे सभी लेखकों के स्‍टॉक में हमेशा माल उपलब्ध रहे यह भी संभव नहीं है। इसलिए चुनाव से काफी पहले ही एडवांस बुकिंग चालू हो जाती है। यदि मैं अपनी कहूँ तो मैं न तो थोक घोषणा-पत्र लेखक हूँ और न ही चिल्‍हर। मैं तो केवल कमीशन खोर हूँ। मुझे जो आर्डर मिलता है उसे लेखकों को दे देता हूँ और तैयार माल पार्टिर्यों को। पहले मैं इसी तरह अपनी गुजर-बसर की व्‍यवस्‍था कर लेता था पर पिछले कुछ दिनों से मन में इस क्षेत्र में भाग्‍य आजमानें का विचार आ रहा था। रात में मैं आराम फरमाते हुये सोच रहा था कि कब मौका मिले और कब मैं भी अमीर बनूं।

शायद मेरा स्‍वप्‍न साकार होने वाला था। सुबह होते ही मैंने अखबार में पढ़ा, हमें एक सुयोग्‍य और अनुभवी घोषणा-पत्र लेखक की आवश्‍यकता है, जो हमारी पार्टी के लिए थोक में माल तैयार कर सके। इच्‍छुक लेखक अपने सम्‍पूर्ण बायोडाटा के साथ ‘अपना विकास पराया दल‘ के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अशुभचन्‍द ‘निर्दयी‘ से कार्यालयीन समय रात्रि बारह बजे के बाद सम्‍पर्क करें। पता विनाशक मार्ग , सुनसान गली, भ्रष्‍टभवन, कमरा नम्‍बर-420।

रात्रि बारह बजते ही मैं उस पते पर पहुँच गया। कार्यालय का दरवाजा ढकेलते हुये मैंने शिष्‍टाचार के नाते पूछा-‘‘मे आई कम इन सर।‘‘ अन्‍दर से कोई गुर्राया-‘‘ कमीने जल्‍दी आ जा, क्‍यों टेम खराब करता है।‘‘ मुझे कंपकंपी छूट गयी। दिल धक-धक करने लगा। लेकिन अमीर बनने का स्‍वपन मुझे अन्‍दर ले ही गया।

कुर्सी पर एक खूंखार टाइप का आदमी बैठा था, उसके चेहरे पर चाकू से लगे घाव के निशान थे। बड़ी-बड़ी मूंछे थी। वह अपनी लाल आँखों से मुझे घूरने लगा। मैं डरते-डरते अपनी बात शुरू करने के लिए केवल श्रीमान ही कह पाया था। वह फिर गुर्राया-‘‘ श्रीमान होगा तुम्‍हारा बाप, अपुन तो डॉन हैं। निर्दयी कहते हैं लोग मुझे। मुझ पर मर्डर, डकैती, अपहरण इत्‍यादि के सैकड़ों केश चल रहे हैं। अभी तक मैं अदालत में ही लड़ रहा था, इस बार चुनाव लड़ने की तैयारी में हूँ। बोल तुझे किस क्षेत्र से टिकिट चाहिए। ज्‍यादा बक-बक करने की जरूरत नहीं हैं। हमारी पार्टी तुझे जहाँ से टिकिट देगी, वहीं से लड़ने का, नहीं तो अपुन तुझे टपका डालेगा, क्‍या समझे?‘‘

यह सुनकर मेरी पेंट गीली हो गई। मैं वहाँ से डल्‍टे पांव लौटते हुये मिमयाया-‘‘क्षमा कीजिए माई बाप! मुझे टिकिट-विकिट नहीं चाहिए महाप्रभु! मैं तो एक घोषणा-पत्र लेखक हूँ। अखबार में आपका विज्ञापन देखकर चला आया था। मुझे क्‍या पता था कि मैं शेर की मांद में जा रहा हूँ।‘‘

मेरा इतना ही कहना था कि वह कुर्सी से उछलकर मेरे कदमों पर लोट गया और गिड़गिड़ाया-‘‘मेरे अक्षम्‍य अपराध को क्षमा करें भगवन! कृपया मेरी कुर्सी पर सुशोभित होने की कृपा करें। जब से मैंने अपने इस दल का गठन किया है, तब से मुझे आप जैसे ही किसी महापुरूष की तलाश थी। आप ही मेरे तरणहार हैं।‘‘ यह कहते हुए वह मुझे सचमुच जबरदस्‍ती उठाकर अपनी कुर्सी पर बिठा दिया और कक्ष का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया।

मुझे काटो तो खून नहीं। मैं वहाँ से भागने के चक्‍कर में था पर वह मुझे मौका ही नहीं दे रहा था। मैं डर रहा था, यदि इस सिरफिरे का दिमाग घूम गया तो पता नहीं कब मेरा गला घोंट दे। डर के मारे मैं मौनव्रत धारण कर लिया और आँखें मूंदकर समाधिस्‍थ होने का नाटक किया।

वह मुझे बेहोश समझकर मेरे चेहरे पर पानी के छीटें डालने लगा और मुझे झिझोंड़ते हुये कहने लगा-उठो तात, उठो। हमारी पार्टी के लिए फटाफट एक घोषणा-पत्र तैयार कर दो। सत्‍ता में आते ही हम तुम्‍हें मालामाल कर देंगे।‘‘ माल का नाम सुनते ही मेरी आँखे स्‍वमेव खुल गई। मैंने आँखें मिचमिचाते हुये प्रवचनात्‍मक अदांज में कहा-‘‘ किस तरह का घोषणा-पत्र लिखूं बच्‍चा! गरीबी, भूखमरी, बेकारी मिटाने के जुमले पुराने पड़ गये हैं। आजकल मुफ्‍्‌त य फ्री जैसे फार्मूले आजमाए जा रहे है। क्‍या तुम्‍हारे लिए भी कुछ ऐसा ही लिखूं?‘‘ वह अपने कानों को बंद करके चीखा-‘‘नहीं महाराज नहीं, यह तो हमारे लिए पाप है। दूसरों के द्वारा इस्‍तेमाल की गई चीजों का प्रयोग करना हम जूठन खानें के समान पाप समझते हैं। हमारे लिए तो कुछ ऐसा नया लिखो जो सब पर भारी पड़े। विरोधियों के मुँह पिचक जाय और हम कुर्सी से चिपक जायें।‘‘ मैंने कहा-‘‘मगर मैं क्‍या करूं बालक मेरी बुद्धि की रेंज तो इससे अधिक जा ही नहीं रही है। मैं विवश हूँ। कोई दूसरा लेखक ढूंढ़ लो।‘‘ इतना सुनते ही वह फिर भड़क गया। रिवाल्‍वर निकालकर मेरी कनपटी पर टिका दिया और गुर्राया-‘‘ अक्‍ल नहीं है तो क्‍यों घोषणा-पत्र लेखक बना फिरता है बे। अबे कुछ भी उलूल-जूलूल लिख। जो मन में आता है वही लिख। हमें तो केवल चुनाव जीतना है, घोषणा थोड़े ही पूरी करना है। जल्‍दी लिख नहीं तो तेरी खोपड़ी उड़ा दूंगा, समझे?‘‘ मैं सूखे पत्‍ते की तरह काँपने लगा पर मौत के डर ने मेरे दिमाग में हलचल पैदा की। लेखनी अपने आप चलने लगी, मैं क्‍या लिख रहा था, यह मुझे भी पता नहीं चल पा रहा था। आखिर तीन घंटें की मशक्‍कत के बाद माल तैयार हुआ। जिसे उन्‍होंने तुरन्‍त मुझसे छिन लिया और मुझे लात मार कर कमरे से बाहर कर दिया। मैं वहाँ से ऐसा भागा कि घर पहुँचकर ही दम लिया और दो दिनों तक आराम से हाँफता रहा।

कुछ दिनों के बाद जब मेरा भय दूर हुआ तब मुझे अपने लिखे हुये घोषणा-पत्र के संबंध में जानने की इच्‍छा हुई पर निर्दयी के पास जाना बहुत ही खतरनाक लगा। अचानक एक दिन एक जगह उस पार्टी की आमसभा आयोजित हुई। भारी भीड़ थी। निर्दयी जी के आते ही कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। स्‍वागत के बाद निर्दयी ने सभा को संबोधित करते हुये बड़े ही विन्रमता के साथ कह रहे थे-‘‘देवियों एवं सज्‍जनों! हमारी पार्टी आप सभी की सेवा करने के लिए बड़ी बैचेन है। बस मौका मिलने की देर है फिर हम आपकी ऐसी सेवा करेंगे कि आप जीवन भर नहीं भूल पायेंगें। यदि आपके अमूल्‍य वोटों के बदौलत हम सत्‍ता में आते हैं तो हम घोषणा करते हैं कि यातायात की समस्‍या से निपटने के लिए हम बहुमंजिली सड़कों का निर्माण करेंगें। सड़कों का रेल मार्ग में और रेलमार्ग का वायुमार्ग में परिवर्तन करेंगें। अर्थात सड़कों पर रेलगाडि़यां चलेंगी और पटरियों पर हवाई जहाज। वायु मार्ग को बिना इंजन वाली गाडि़यों के लिए खोल दिया जायेगा। मतलब आप साइकिल, बैलगाड़ी ,तांगा इत्‍यादि से आकाश मार्ग पर सफर कर सकेगें। आपके घर जन्‍म लेने वाले सभी बच्‍चों को जन्‍म से ही वृद्धावस्‍था पेंशन योजना का लाभ दिया जायेगा और साठ से अधिक उम्र के युवक-युवतियों को बेकारी भत्‍ता दिया जायेगा। हम सभी मतदाताओं को सरकारी खर्च पर आगामी चुनाव तक विदेश भ्रमण कराते रहेंगे। कर्मचारियों को केवल रविवार के दिन ही काम करना पड़ेगा बाकी दिनों की छुट्‌टी रहेगी और वेतन में सौ प्रतिशत वृद्धि। हम जहाँ पर नदी नहीं है वहाँ पर भी पुल और बांध बनवायेंगें और उसके बाद पुल के नीचे तथा बांध के सामने नदी बनवायेंगे। सभी को एक-एक मोटर साइकिल और प्रतिमाह दस-दस लीटर प्रेट्रोल मुफ्‍त बाटेंगें। हर घर के सामने एक-एक अस्‍पताल और महाविद्यालय बनवायेंगे। हर गाँव को जिले का दर्जा दिया जायेगा। यदि आपको उपरोक्‍त सभी सुविधाओं का लाभ उठाना है तो हमें एक बार अवश्‍य मौका देवें।‘‘

इसी तरह घोषणा करते हुये निर्दयी जी जगह-जगह सभा-सम्‍मेलन करने लगे। पर्चे बंटवा कर सघन जनसम्‍पर्क के साथ चुनाव प्रचार किया। पर चुनाव के बाद पता चला कि उनकी पार्टी बुरी तरह से हार गई है। उनके प्रत्‍याशी जमानत तक नहीं बचा पाये। तब से वे गुस्‍से में आग-बबूला होकर मुझे ढूंढ़ने लगे।

एक दिन मुझे देखकर वह रिवाल्‍वर लेकर मारने को दौड़ाया। मैं बचाओ-बचाओ कहते हुये भागा और अचानक धड़ाम से पलंग के नीचे गिर पड़ा। मेरी नींद टूट गई थी। चिडि़यों की चहकने की आवाज से मुझे आभास हुआ, शायद सुबह होने वाली है।

 

वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

धमतरी ( छत्तीसगढ़)


उस दिन यमराज के पास और एक विचित्र केस आया। केस स्टडी करने के बाद यमराज
को बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ। उन्हें लगा कि इस केस को ईश्वर की जानकारी में
लाना जरूरी है। केस को लेकर वह दौड़ा-दौड़ा ईश्वर के पास गया। कहा -
’’प्रभु! आज बेहद शुभ समाचार लेकर आया हूँ; सुनकर आपको भी सुखद आश्चर्य
होगा।’’
ईश्वर ने मुस्कुराकर कहा - ’’तब तो बिलकुल भी विलंब न करो यमराज जी, सुना
ही डालो।’’
यमराज ने कहा - ’’प्रभु! जिस भारतीय प्रजाति के मनुष्य को हम विलुप्त समझ
लिये थे, वह अभी विलुप्त नहीं हुआ है। देखिये, सामने खड़े इस मनुष्य को।
साथ ही साथ इसके बहीखाते को भी देखते चलिये।’’
पहले तो ईश्वर ने उस अजूबे मनुष्य को निगाह भर कर देखा, फिर जल्दी-जल्दी
उसके खाते के पन्नों को पलटने लगा। खाते में उस मनुष्य के सम्बंध में
निम्न विवरण दर्ज थे -
नाम - दीनानाथ
पिता का नाम - गरीबदास
माता का नाम - मुरहिन बाई
(ईश्वर की बहीखता में मनुष्य की जाति, वर्ग, वर्ण, देश आदि का उल्लेख नहीं होता।)
पता ठिकाना - जम्बूखण्ड उर्फ आर्यावर्त उर्फ भारतवर्ष उर्फ भारत उर्फ
हिन्दुस्तान उर्फ इंडिया।
(एक ही स्थान के इतने सारे नामों को पढ़कर ईश्वर की बुद्धि चकराने लगी।)
हिम्मत करके उसने आगे की प्रविष्टियाँ पढ़ी। बही खाते के बाईं ओर के (आवक
अर्थात पुण्य वाले) सारे पन्ने भरे पड़े थे परन्तु दाईं ओर के (जावक
अर्थात पाप वाले) सारे पन्ने बिलकुल कोरे थे। ईश्वर को बड़ी हैरत हुई। अंत
में बने गोशवारे को उन्होंने देखा जिसमें संक्षेप में निम्न लिखित बातें
लिखी हुई थी -
झूठ बोलने की संख्या - शून्य
चोरी, धोखेबाजी अथवा ठगी करने की संख्या - शून्य
आजीविका के लिये भीख मांगने की संख्या - शून्य
अपने स्वार्थ, सुख अथवा स्वाद के लिए दूसरे प्राणियों को दुख देने, पीड़ित
करने अथवा हत्या करने की संख्या - शून्य
अपने स्वार्थ, सुख अथवा स्वाद के लिए, धर्म के नाम पर शब्दों का प्रपंच
रचकर, लोगों को ठगने, लूटने, दिग्भ्रमित करके उन्हें आपस में लड़वाने की
संख्या - शून्य
ईश्वर और धर्म के नाम पर लोगों को देश, जाति अथवा संप्रदाय में बाँटने का
काम करने की संख्या - शून्य
बहीखाता पढ़कर ईश्वर के मन की शंका और गहरी हो गई। उन्होंने यमराज से पुनः
पूछा - ’’क्या यह मानव वाकई भारतीय है?’’
यमराज ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा - ’’मैंने इसके बारे में बहुत
बारीकी से जांच किया है, प्रभु! यह भारतीय ही है। संभालिये इसे और मुझे
आज्ञा दीजिये।’’
’’ठहरिये यमराज जी!’’ ईश्वर ने कहा - ’’इसके सम्बन्ध में हमारी योजना अलग
है। इस विचित्र मानव को वापस पवित्र देवभूमि भारत भेज दीजिये। वहाँ किसी
अजायब घर में इसे सुरक्षित रखवा दीजिये। इसके पिंजरे के बाहर सूचना-पट
टंगवा दीजिये जिसमें लिखा हो - ’विलुप्त प्रजाति का भारतीय मानव’।
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KUBER
Email - kubersinghsahu@gmail.com

ईडिया , आईडिया है वह किसी को भी आ सकता है ये आईडिया पर निर्भर करता है कि वे किस को किस तरह से और किस रूप में आता है, वैसे तो आईडिया के आने के लिए समय काल परिस्थियों का कोई बंधन नहीं होता। आईडिया जब चाहे, जहाँ चाहे , जिसे चाहे और जिस तरह भी चाहे आ सकता है. वैसे आईडिया के बारे में ये आम अवधारणा है कि ये सुबह के वक्त उस समय ज्यादा आता है जब लोग टायलेट में होते हैं, शौच के समय सोच में आये इस आईडिया की बात ही अलग होती है।

आईडिया जात पांत , धर्म, लिंग भेद को नहीं मानता ना ही अमीर गरीब, छोटे बड़े में भेद करता है, देश के लोकतंत्र की तरह ही उसके लिए सब बराबर होते हैं। कुछ लोग इसी उधेड़बुन में रहते हैं कि कैसे आईडिया लगाया जाय और कुछ के आईडिया हकीकत में आने से पहले ही दम तोड़ देते हैं।

वैसे आईडिया के अनेक प्रकार होते हैं कुछ आर्थिक होते हैं तो कुछ सामाजिक और कुछ राजनैतिक। आईडिया गरीबी के भी होते हैं और अमीरी के भी। आईडिया की आडियोलाजी भी होती है। वो धर्मनिरपेक्ष भी होती है साम्प्रदायिक भी। आईडिया की व्याख्या, करने वाले अपने हिसाब से करते हैं। तमाम तरह के आईडिया तब तक आईडिया ही रह जाते हैं जब तक कि इन्हें धरती पर ना उतारा जाय। बहुमत के बिना भी सरकार चलाने का आईडिया चल भी जाता है और केजरीवाल सरकार की तरह नहीं भी चलता।

व्याख्या करने वाले आईडिया को कला भी मानते हैं और विज्ञान भी। आईडिया कला है या विज्ञान इसे अपने अपने आईडिया से सिद्ध किया जा सकता है। अपना आईडिया आने के साथ आते ही कुछ लोग इसे फलीभूत करने में जुट जाते हैं। कुछ लोग इसे चुरा लेते हैं। जिनका अपना आईडिया चोरी जाता है वो अपने आईडिया के चोरी होने की रिपोर्ट भी नहीं कर सकता। अपने अन्डो को कोयल के घोंसले में रख कर उन्हें पलवाने का कौवे का आईडिया आज भी कारगर है तो एक पार्टी में दाल न गले तो दूसरी में जाने का राजनीतिक आईडिया भी है। वोट लेने के भी अपने अपने आईडिया है। गर्मी में भी कान पर मफलर लपेट कर तो कोई मंच पर पानी पी पी कर तो कोई जनता के बीच जा कर हाल चाल पूछने और छोटे बच्चों को गोद में दुलार कर अपना आईडिया लगाता है। आईडिया तो लडकी पटाने के भी है

इस आईडियों पर किसी का कापीराईट नहीं है मगर ये सदाबहार आईडिया है जो सदियों से प्रचालन में है और आगे भी रहेंगे। लेकिन अब आईडिया भी बदलती दुनिया के साथ बदल रहे है। टीवी पर अनेक आईडिया आते हैं जब ये आईडिया क्लिक हो जाय तो व्हाट एन आईडिया सर जी और नहीं भी क्लिक हो तो नो उल्लू बनाविंग का आईडिया तो चल ही जाता है।

©श्याम यादव इंदौर 452016

उसके नाम के बिना शायद में कभी अपना वजूद सोच भी नहीं सकती थी ,फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि वो मुझसे मानसिक तौर पर जुदा हो गया I शारीरिक जरूरतें तो पूरी करनी ही थी आखिर जानवर  जो था पर इतना भी पशु नहीं था कि बाहर मुंह मारने जाता क्योंकि उसमें  हज़ार तरह की बीमारियों का खतरा जो था I तो तन के स्तर पर एकतरफा सम्बन्ध हमेशा ही चलते रहे चाहे मर्जी हो या ना हो I  एक आज्ञाकारी कुतिया की तरह सदैव एक हड्डी पर दौड़कर मैं उसकी सेवा में अपना बदन नुचवाने के लिए पहुँच जाती I बरबादियों के शेर और ज़लालत भरी कहानियाँ पढने में मुझे अजीब सा सुकून मिलता  ...लगता कि चलो इस दुनियाँ में कोई तो दूसरा ऐसा है जिसने ये भोगा हैं या फिर किसी को अपने सामने इस नर्क में बिखरते देखा हैं वरना वहीँ भावनाए, वही संवेदनाएँ और मेरे बहते आंसूओं  ने उन कहानियों के पात्रों को कैसे जीवित कर दिया जिन पर सिर्फ मेरा ही हक़ है I 

बचपन में जब ये पता ही नहीं था कि दर्द क्या होता है और वो कैसा होताहै तो माँ को रोते देखकर बड़ा आश्चर्य होता था I सोचती थी कि माँ हर समय क्यों हम लोगों से छुपकर मुँह में पल्लू ठूँसकर रोती हैं I खाना तो तीनों बार हमारे साथ ही खाती हैं I शायद स्कूल की छुट्टी में भूख से बिलबिलाते पेट में रोटी से ज्यादा कभी कुछ पाने की आकांशा ही न रही I पिताजी को तो महीनों घर आते नहीं देखा था , कहाँ रात गुज़ारते थे वो ये तो शायद मुझे और माँ के अलावा सारे मोहल्ले को मालूम था I माँ को मैंने कभी उनसे सवाल जवाब करते भी नहीं देखा I  हाँ,,जब भी कभी पूछा तो उसने अपने फटे ब्लाउज के साथ गोरी पीठ आगे कर दी जिस पर बेल्ट की मार के नीले निशान पड़े रहते थे I पर जब उन लाल और नीले निशानों को देखने के बाद भी मैं जब कुछ नहीं समझ पाती तब भी उनकी सूजी लाल आँखें देखकर आगे कुछ जानने की हिम्मत नहीं कर  पाती और उन्हें रोता देखकर उनके गले से लिपटकर खुद भी रोने लगती I  मेरी माँ ने तो घर के बाहर की दुनियाँ से जैसे  नाता तोड़कर घर में ही शिवालय बना लिया था और स्थापित कर दिया था मेरे राक्षस जैसे बाप को , जिसकी लगता हैं प्राण प्रतिष्ठा  करना भूल गई थी और इसलिए केवल उस मंदिर में भक्त ही रह गया था I 

माँ हमेशा से मुझे मुझे फूलों में रखने का ख्वाब देखती थी I मेरा रूप देखकर कहती कि तू जो भी चाहेगी वही होगा और इसलिए बड़े ही प्यार और दुलार से मेरा नाम रखा था - स्वयंसिद्धा I फिर मेरे काले घने बालों कि छोटी गूंथते हुए मुस्कुरा के कहती - " तुझे लेने तो कोई सुन्दर सा राजकुमार आएगा और खुबसूरत से सफ़ेद घोड़े पर बैठा के ले जाएगा  I और मैं ताली बजाकर खुश होती हुई जैसे परीलोक में पहुँच जाती और शायद वहीँ  से सफ़ेद रंग का घोडा भी मैं पसंद करने  लगी थी I एक दिन तो क्लास में टीचर ने टोक भी दिया था कि क्या तुम्हें  सफ़ेद रंग के अलावा कोई रंग नहीं पता हैं I सफ़ेद भालू,सफ़ेद कुत्ता और यहाँ तक कि तुम्हारा तो ब्लैक बोर्ड भी सफ़ेद रंग का होता हैं I और फिर  क्लास में हँसी का फव्वारा फूट पड़ा था और सारे बच्चे  पेट पकड़कर हँसते हँसते मानों पागल हो गए थे I और मेरा मन कर रहा  था कि टीचर को अपना सफ़ेद रंग का जूता फेंक कर मार दूँ I पर मन में जैसे ही मेरे सफ़ेद घोड़े वाला राजकुमार का मुस्कुराता चेहरा नज़र आया मेरा सारा गुस्सा अगले ही पल काफूर हो गया  I 

पर विधाता को तो जैसे कुछ और ही मंजूर था I  सफ़ेद घोडा तो आकाश से आया पर मुझे नहीं मेरी  माँ को अपने साथ ले जाने के लिए और पलक झपकते ही उन्हें उड़ा ले  गया सफ़ेद बादलों के पीछे ...जहाँ पर मैंने बहुत आवाज़ लगाई साथ जाने की, पर घुंटी -घुंटी चीखों के अलावा मेरे मुँह  से कुछ नहीं निकला और फिर काले भैसें पर सवार जैसे यमराज ने मुझे इस जीवन को जीने में ही मृत्यु को विवाह पर उपहार के तौर पर दे दिया था जिससे में तिल-तिल कर के मरू... मेरी अभिलाषा भी पूर्ण हो जाए और उनका वरदान भी I आज फिर मेरा पति जो बाहर की दुनियाँ में एक महापुरुष था और सभी उसे आदर से रंजन जी कहकर बुलाते थे , घर की देहरी पर आते ही वो जूतों के साथ उस " जी" से जुड़ी उन  तमाम उपमाओं का जामा भी बाहर उतार आता और फिर शुरू होता उसकी कुंठित मानसिकता के पीछे का भयानक सच लातों और जूतों के साथ , जिन्हें भोगने के बाद मैं अपने उस स्टोर रूम में पहुँच जाती जहाँ पर मैंने सबसे छुपाकर अपनी कल्पनाओं की एक अलग दुनियाँ  बसा रखी थी I जहाँ पर किताबों की नीली स्याही से पात्र निकल कर मेरे दुःख के बराबर के हिस्सेदार होते थे I वे मेरे आँसूं पोंछते और अपनी व्यथा कहते I कई बार तो हम सब एक साथ घंटों चुपचाप बैठे रहते I भला आँखों से ज्यादा दर्द की भाषा कौन बोल पाया हैं I 

पर इन्हीं सब के बीच एक परिवर्तन हुआ कैसे और कब I बिलकुल झटके ...अचानक... अगर सोचा जाए तो मानों एक पल में प्रलय का आना,या फिर तारे का टूटना या संगीत का सप्तम सुर..सब जैसे थम गया जब अचानक वो एक दिन रंजन के साथ मेरे " घर " आया I कुछ ख़ास आकर्षण नहीं था उसमें पर शायद किसी भी औरत को मानसिक तौर पर जीतने  की कला उसमें थी Iउसकी बातें,उसकी सोच और उसका स्त्री जाती के प्रति सम्मान देखकर मैं अभिभूत हो गई I  धीरे- धीरे मेरे कमरे के कहानी के पात्र उन कागजों में  सिमटते  चले गए और फिर ना जाने कहाँ  विलीन हो गए I उनकी जगह पर आकर बैठ गए हँसते , खिलखिलाते , हौले से गुदगुदाते प्रेम में डूबे हुए वो हसीन  चेहरे जो हक़ीकत में तो क्या मेरे सपनों में भी कभी मुझे नहीं दिखे थे  I 

धीरे - धीरे रंजन के घर आने का मैं इंतज़ार करने लगी क्योंकि "वो" सिर्फ़ उसी के साथ आता था I अचानक एक दिन वो अपनी ढेर सारी किताबों को एक पन्नी में लपेटे हुए आया और मुझे  हिफ़ाजत से रखने को बोल कर तीर कि तरह बाहर चला गया  I कुछ नहीं समझ पाते हुए भी मैंने उन्हें सहेज कर रख लिया I हालत अब ये हो गई थी कि सारा काम निपटाकर मेरी आँखें सूनी उदास सडकों पर ठहर जाती, जिनका वजूद बिना उसके क़दमों की आहत के बेकार  था I कई बार में रोती और अपना सर धुनती कि वो मुझसे मिला भी तो उम्र के उस पड़ाव में आकर जहाँ पर केवल उसके एहसास को मैं दूर से ही महसूस कर सकती थी I धीरे-धीरे वो मुझसे बिना कुछ कहे और पूछे दर्द की गोलियाँ मेरे हाथों में पकड़ा देता था जिन्हें मैं अपने आँसूं रोकते हुए कस कर मुट्ठी में पकड़ लेती I मेरे तन की सिरहन को शायद कभी वो जान ही नहीं पाया  या अगर जाना होगा तभी मेरे पास नहीं आया होगा I मेरे शरीर के साथ मेरे मन के इतने गहरे ज़ख्म उसे दिखते कैसे थे ..कई बार पूछना चाहा पर अब तो पीड़ा की चिंगारियों ने लावे का रूप ले लिया था और उसे मैं बहने से रोकने में  नाकाम सिद्ध हो रही थी I 

फिर  एक दिन उसका फ़ोन आया कि जिस गन्दी पन्नी में अखबार  के अन्दर उसके पन्ने हैं उन्हें मैं पढ़ लूँ ,क्योंकि वो हस्पताल में भर्ती हैं  I मेरे आगे जैसे पूरा कमरा  घूमने लगा I बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए  मैं  फर्श पर ही बैठ गई I कब..कहाँ.. कैसे ..ये सारे  सवाल मेरे हलक में ही फंस के रह गए I मैं कुछ बोलू इसके पहले ही उसने फ़ोन काट दिया I  मैं ना जाने कितनी देर तक वहीँ पर चेतना शून्य होकर बैठी रही I तभी अचानक रंजन आया और मेरे हाथ में अण्डों की थैली पकड़ाता हुआ बोला- " अमृत मर गया I "

मेरी आखों मैं आई हैरानी भाव को देखता हुआ वो आगे बोला  -" अरेये वही मेरा दोस्त जो हमेशा मेरे साथ घर आता था I "

और सुनो , "जरा चार अंडे का आमलेट तो बना देना I "

मैं आँख फाड़े उसे देखती रही I मेरे सामने ये कौन था जो ना  तो इंसान था और ना  ही पशु I मैं झटके से उठी और जीवन में पहली बार बिना मार की परवाह किये बगैर अपने कमरे की ओर दौड़ी I कुण्डी बंद करने के बाद मैंने वो हजारों पन्नों का मोटा बण्डल निकाला  I एक के बाद एक पन्ना खुलता गया जिस पर मोतियों जैसी लिखावट में अनगिनत बार बस एक ही लफ्ज़ लिखा गया था -" स्वयंसिद्धा "  

मंजरी शुक्ल  

कल तक अपने जिस मुहल्ले में हफ्तों रेहड़ी वाले के दर्शनों को आंखें तड़प जाती थीं , आज चिड़ियों के चहकने से पहले ही बिस्तर में दुबके दुबके रेहड़ी वाले की आवाज सुनी तो पहले तो सोचा कि कोई सपना देख रहा होंऊ। रेहड़ी वाला गला फाड़ फाड़ चीख रहा था ,‘ साडि़यां ले लो! प्रेशर कुकर ले लो! पतीले ले लो! डिनर सेट ले लो! कंबल ले लो! बेड शीट्स ले लो। मोबाइल फोन ले लो। टीवी ले लो! जो चाहे ले लो! मुफ्त में ले लो!’ उसकी आवाज सुन मैं फिर बिस्तर में दुबके सोचने लगा,‘ यार, मुफ्त में?? मुफ्त में तो यहां आज प्यार भी नहीं मिलता! और एक ये रेहड़ी वाला है... कहीं सुबह सुबह उल्लू ता नहीं बना रहा होगा? बना रहा होगा तो बनाता रहे? अब तो मैं ये भूल ही गया हूं कि कभी मैं मानुस जात में पैदा हुआ था!

रेहड़ी वाले ने फिर फटी आवाज दी,‘ थालियां ले लो! परातें ले लो! गैस सिलेंडर ले लो! जो चाहे ले लो!’ जब मैंने गैस सिलेंडर की आवाज सुनी तो मैं बिस्तर छोड़ झट खड़ा हो गया। असल में घर का गैस सिलेंडर चार दिनों से खत्म था और पड़ोसी की दया पर चूल्हा जल रहा था। एजेंसी वाले रहे अपनी मर्जी के! आनन फानन में आधा पौना कुरता पैजामा पहना और दो दो सी‍ढ़ियां घुटनों दर्द होने के बाद भी एक साथ उतर गया। सामने देखा तो रेहड़ी वाला! ऊ लाला!

रेहड़ी क्या मानो वह रेहड़ी में पूरा ट्रक ही भर लाया था, ठसाठस। मैंने उसकी रहेड़ी पर नजर दौड़ाते पूछा,‘ भाई साहब! बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?’

तो उसने लच्छेदार लहजे में कहा,‘ एक नहीं हजार पूछो! जो पूछना है दिल खोलकर हजार बार पूछो! हम आए ही आपके लिए हैं। पूछने का हक आजकल तो कम से कम आपका बनता ही है। ये सब सामान जो आप देख रहे हैं न, सब आपके लिए ही है। जो चाहो उंगली लगाओ और अगले क्षण अपने घर में पाओ !’

‘पर साहब मैं तो पेंशन में रो पीट आटा दाल ही खरीद सकता हूं,’ मैंने अपनी मजबूरी न चाहने के बाद भी जाहिर कर ही दी।

‘आप बस किसी एक माल को हाथ तो लगाइए बस! हाथ लगाते ही माल आपका। कोई पैसे नहीं। कोई हीडेन चार्जेज नहीं!’

‘कोई चार्जेज नही? मतलब! बिन पैसे माल अपने देश में कबसे बिकने लगा? यहां तो किसीसे बात करने के भी पैसे लगते हैं।’

‘पर हम नहीं लेंगे! हम तो बस माल बांटने आए हैं,’ कह उसने मेरी आंखों में माल लेने की ललक जगाई तो मैंने पत्नी के पास पिछले चार सालों से एक ही साड़ी होने के चलते उससे पूछा, ‘तो भाई साहब! ये वाली साड़ी कैसे दी?’

मेरे कहने भर की देर थी कि उसने आव देखा न ताव, साड़ी थैले में डालता बोला, ‘लो साहब , ये साड़ी आपकी हुई, अब जैसे चाहो पहनो! और कहिए, आपको क्या चाहिए?’

‘पर इसका रेट तो बता देते?’ मैंने कांपते हाथों में साड़ी वाला थैला मुश्किल से संभालते कहा तो वह हंसते हुए बोला,‘ कमाल है साहब! हम आपको कुछ देना चाहते हैं कि आपके हाथ कांप रहे हैं। कैसे वोटर हैं आप भी ? बस, आप माल को हाथ लगाते जाइए, हम आज आपको देने आए हैं, बस! आप भी क्या याद करेंगे कि .....’

‘ पर फिर भी??’

‘ आप पूछ ही रहे हैं तो बताओ, आपके घर में कितने वोटर हैं?’

‘ ले देकर हम चार हैं! पर बीवी ने आजतक वोट पाया ही नहीं!’

‘क्यों?’

‘कहती है वोट पाने जाने में समय बरबाद क्यों करना, जितनी देर वोट पाने को खराब करनी उतने को चार सीरियल निकल जाते हैं। ’

‘गलत बात! सारे नेता चाहे एक से हों पर वोट जरूर पाओ! अपने लिए न सही तो न सही, पर हमारे लिए तो सही! तो मतलब आपके घर में जिंदा तीन वोट हैं?’

‘ हां, मेरे जिंदा रहने तक तो यही समझो!’

‘ तो इसका मतलब आप तीन चीजें ले जा सकते हो मुफ्त में!’

‘मुफ्त में? मतलब?’

‘मतलब, हर माल एक वोट!’

‘पर मैंने तो सुना है कि वोट अमूल्य होता है?’

‘ अरे सब बकवास है। यहां कुछ भी अमूल्य नहीं। सबका मोल भाव है। यहां राख से लेकर लाख तक सब बिकाऊ है। भगवान भी! जो सुने पर विश्‍वास करते हैं वे अंधेरे में जीते हैं। असल में जिओ मेरे यार असल में!’

‘मतलब!’

‘ मतलब संसद से लेकर पगडंडियों तक सब बिकाऊ! चुनाव के सीजन में देश में हमने एक अभियान चला रखा है कि हम अपने हर वोटर को उसका मन माफिक एक माल मुफ्त में देंगे। उनसे माल का एक पैसा भी नहीं लेंगे! कमाने के लिए तो चुनाव के बाद टाइम ही टाइम होता है। बस एक बार जीत जाएं! घर में वोटरों के हिसाब से आप कोई से तीन आइटम फ्री में पूरे अधिकार के साथ ले जा सकते हैं।’

‘मतलब, मैं समझा नहीं!’

‘ मतलब ये कि जो आपको सबसे जरूरी लगे या आप अपनी जरूरत के हिसाब से तीन आइटम हमारी पार्टी की ओर से शौक से सीना चौड़ा कर घर ले जाइए प्लीज!’

‘ और जो ये गैस सिलेंडर ले जाना हो तो ?’ मैं मुद्दे पर आया तो वह बोला, ‘ साहब , ये तो उनके लिए हैं जिनके घर में कम से कम बारह वोट हों। आप अपने घर की वोटों के हिसाब से माल देखें तो मेरे और आपके मतलब दोनों के लिए बेहतर होगा! पर हां ! जिस तरह हम आपको ईमानदारी से माल दे रहे हैं आप हमें ईमानदारी से वोट हमें देंगे, ऐसी हम आपसे उम्मीद करते हैं।’

‘उम्मीद!!’ मुझे भीतर ही भीतर हंसी आई तो वह मेरे भीतर की हंसी को रोकता बोला,‘ हां! उम्मीद! हम सब इस देश में उम्मीद के सहारे ही तो चले हैं।’

‘ पर ये प्रेशर कुकर, ये साड़ी , ये कंबल? इसकी क्या गारंटी है कि...?’

‘ पूरी गारंटी है साहब! मजाल साड़ी में से कोई ऐरा गैरा भीतर झांक सके। ये कंबल! इसे मरियल से मरियल वोटर तो वोटर, अगर सर्दियों में सर्दी भी ढक ले तो उसे भी सर्दी न लगे! जो और हमारे प्रेशर कुकर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बिन गैस के भी खाना तैयार कर देता है। बस, बुझे चूल्हे पर हमारा कुकर रखो और खाना तैयार! हमने इसे केवल अपने वोटरों के लिए चुनाव में बांटने के लिए विशेष रूप से डिजाइन करवाया है। पर एक बात से सावधान आपको जरूर करना चाहूंगा!’

‘ किस बात से ?’ मैंने प्रेशर कुकर एक बगल में तो दूसरी बगल में कंबल , साड़ी ठीक वैसे जैसे कई दिनों का भूखा कुत्‍ता रोटी का टुकड़ा दांतों में दबाता है दबा पूछा तो वह बोला, ‘इस बात से कि इसके बाद दूसरी पार्टी का प्रेशर कुकर गलती से भी मत लेना। वह उसमें दाल डालने से पहले ही फट सकता है। प्रेशर कुकर ही क्या? उनका सारा माल बोगस है। क्या फायदा , जो जान जाए तब पछताए , ’ और वह मुझे तीन वोट के बदले मेरी पसंद की तीन आइटम थमा आवाजें देता आगे हो लिया,‘ मन चाहा माल ले लो! पर माल पर वोट ले लो !’

अशोक गौतम,

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

" ... एक साहित्‍यिक कार्यक्रम में मुझे अध्‍यक्षता / मुख्‍य अतिथि के रूप में बुलाया था और जैसा कि होता है, एक करोड़पति को भी। अभी हम मंच पर नहीं बैठे थे। उन्‍होंने बात-चीत शुरू कर दी- तो आप ही सहगल साहब हैं। आप को लिखने का शौक कब शुरू हुआ। न जाने मुझे क्‍या हुआ। मैं चिढ़ गया। बोला क्‍या यह शौक है ? उन्‍होंने जवाब में वही कहा-हां शौक ही तो होता है। अब की बार मैंने सहज होकर पूछा- क्‍या आप शौकिया सांस लेते हैं। शौकिया खांसते हैं। शौकिया गुस्‍सा होते है। अगर ‘हां‘ तब में भी शौकिया लिखता हूं, वरना लेखन मेरे जीवन का अंग है। कई लोग मुझ से पूछते हैं कि आपने लिखना कब से शुरू किया ? तो मेरा उत्त्‍ार होता है- जब दो साल का था तभी से लिख रहा हूं..." -- इसी संस्मरण से

डगर डगर पर मगर

(आत्‍मकथा)

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हरदर्शन सहगल

पिछले भाग 3 से जारी...

भाग 4 (अंतिम)

जब मैं अपना पहला उपन्‍यास 'सफेद पंखों की उड़ान‘ लिख रहा था, तो मेरी बड़ी बिटिया कविता कॉलेज से घर (रेलवे क्‍वार्टर) पहुंचते ही साइकिल को बरामदे में खड़ा करने के बाद, कपड़े भी नहीं बदलती। जाकर उपन्‍यास को पढ़ती कि कितना कैसे आगे बढ़ा है। इससे मैं बहुत सतर्क हो गया था कि कुछ पृष्‍ठ तो लिख डालूं ताकि बिटिया को निराशा न हो। इस छोटे से (112 पृष्‍ठों के) उपन्‍यास को पूरा करने के लिए मैंने बीच बीच में छुटि्‌टयां भी लीे। फिर दो महीने के अंदर प्रेस कापी तैयार कर ली थी। और छपने को अभिव्‍यंजना दिल्‍ली को भेज दिया था। जहां से मेरे दो कहानी संग्रह 'मौसम‘ और 'टेढ़े मुंह वाला दिन‘ पहले छप चुके थे। इधर डॉ मेघराज शर्मा बीकानेर का तकाजा था कि हम इसे 'धरती प्रकाशन‘ से फौरन निकाल देंगे। कृपया दिल्‍ली से वापस मंगवा कर हमें दे दीजिए। वायदे के अनुसार उन्‍होंने (प्रुफ की काफी अशुद्धियों के साथ), तुरंत छाप डाला था। डॉ मेघराज का प्रकाशन, आगे बढ़ नहीं पाया। मुझे पैसा नहीं मिला पर उस पर 'रागेय राघव‘ पुरस्‍कार मिला। इसका जिक्र पहले कर आया हूं।

यह सब आगे आगे आगे की बातें आपसे आप शुरू हो जाती हैं। शुरूआती साहित्‍यिक दौर के कुछ अंश, बीकानेर के, तो कुछ गाजियाबाद के, लिख आया हूं। गाजियाबाद की बिलकुल युवा पीढ़ी, धीरे धीरे या कहें फुर्ती से विलुप्‍त सी होती गई। एक स्‍तंभ की भांति रह गए श्री से․रा․ यात्री। और भी जरूर कुछ रहे होंगे, जिनसे मेरा परिचय न था। न ही यात्री जी ने किसी से करवाया। मैं यात्री जी ही का ही होकर रह गया। हमारे घर के पिछवाड़े बिलकुल करीब यात्री जी का कॉलेज पड़ता है, जहां पर वह पढ़ाते थे। मुझ पर तो हमेशा बालपन या बालापन या बालमन आज भी सवार रहता है। घर पहुंचा सामान पटका। भाग भाग कर सुसारिलियों के घर, बहन जी के घर, भाई साहब के घर। जल्‍दी जल्‍दी। सब कोई खिलाना पिलाना चाहते, पर कहां पर कितना खा लूंगा। भाग खड़ा होता और यात्री जी के कॉलेज। 'बहुधा‘ का प्रयोग यात्री जी के हित में करूंगा। बहुधा यात्री जी मिल भी जाते। बड़े प्रसन्‍न भाव से पूछते-कब आए। कुछ दिन तो रहोंगे ना। कब तक यहां हो। ठीक है- मैं आकर मिलता हूं। चाय पिओगे।

- चार बार पी चुका।

- एक बार और हमारे साथ सही। दुनिया भर का हाल। अरे एक तुम्‍हारे यहां कोई श्रीगोपालाचार्य हैं उन्‍होंने न्‍यायमूर्ति जैसे उपन्‍यास लिखे हैं। लाजवाब। उनको मेरी बधाई देना। चन्‍द्र भी तो वहीं रहता है। हमारा ․․․․․․․․․․(कोई गालीनुमा संबोधन) यार है। बहुत पुराना यार। उसे मेरी नमस्‍ते कहना। मैंने बड़े नामी एडवोकेट श्रीगोपालाचार्य जी से बीकानेर पहुंचकर यात्री जी का अभिवादन/प्रशंसा प्रेषित की।

- कौन से․रा․ यात्री हम तो नहीं जानते।

अब मैं उस बड़ी, साथ ही सरल शख्‍सियत से क्‍या कहूं कि आप क्‍या, बीकानेर वाले ज्‍़यादातर लेखक, (चन्‍द्र जी वगैरह को छोड़कर) अपने सिवा किसी को नहीं जानते। बीकानेर के भी सिर्फ उन लेखकों को जानते हैं जो उनसे महफिलों वगैरह में रूबरू होते रहते हैं। उनके पठन से नहीं, बल्‍कि उनकी शक्‍लों से उन्‍हें पहचानते हैं।

यह वकील श्रीगोपालाचार्य तथा बैंक अधिकारी श्री सुमेरसिंह दइया, हर शाम को ही 'सूर्य प्रकाशन मन्‍दिर‘ की शोभा बढ़ाते, बतियाते रहते थे। बिस्‍सा जी से चाय पीते रहते थे। इन दोनों ने सूर्य प्रकाशन से अपनी बहुत सारी पुस्‍तकें छपवा रखी थीं।

मैं और श्री सांवर दइया हंसा करते थे कि बिस्‍सा जी रायल्‍टी तो देते नहीं। यह उसी पैसे की एवज में बिस्‍सा जी से ज्‍़यादा से ज्‍़यादा चाय पीकर हिसाब चुकता करते हैं। घर जाकर ये लोग जरूर हिसाब लगाते होंग कि आज कितने की चाय पी आए और रायल्‍टी का कितना पैसा वसूल हो गया।

राजस्‍थानी को समर्पित विद्वान लेखक श्रीलाल नथमल जोशी जी का एक किस्‍सा सुनाता हूं। वे बी․जे․पी․ वाले कला एवं संस्‍कृति संस्‍थान के सर्वोसर्वा थे। पिछले ही वर्ष 88 साल की आयु में दिवंगत हुए। अंत तक खूब सक्रिय रहे। उनसे डॉ․ आशा भार्गव कांग्रेस कार्यकर्त्री के घर, किसी खिलाने पिलाने (पिलाने का अर्थ आप लोग 'उस पीने‘ से कतई न लगाएं प्‍लीज़, यहां यह दौर दौर ः नहीं चलता) वाली गोष्‍ठी में श्री जोशी जी से संवाद हुआ। मैंने जोशी जी से देश में छपने वाले लेखकों के विषय में चर्चा छेड़ने की गुस्‍ताखी कर डाली। स्‍पष्‍ट उत्त्‍ार मिला। मैं किसी को नहीं जानता। मैंने हंस कर कहा जोशी जी आप मुझे भी नहीं जानते होते, अगर मैं बीकानेर में न रहता होता। मुझे जानने का दूसरा कारण भी मैं जानता हूं। रेलवे के कारण। वे भी रेलवे में ही कर्मचारी थे।

अभी बीकानेर पर कहने को बहुत कुछ पड़ा है। फिलहाल पड़ा रहने दीजिए। हां यात्री जी, यात्री जी। याद आया। यात्री जी ही की वार्ता कर रहा था और 'बहुधा‘ शब्‍द का इस्‍तेमाल कर रहा था। बहुधा यात्री जी कॉलेज में दिखाई न देते तो स्‍टाफ रूम जा कर या प्रिंसिपल साहब से दरियाफ्‍त करने की कोशिश करता- यात्री जी कहां हैं ?

- भई यात्री जी तो यात्रा पर निकले हुए हैं। कुछ पता नहीं।

- आएं तो कृपया बता दें कि सहगल साहब बीकानेर से आए हुए हैं।

- हां अगर वापस आ गए तो जरूर बता देंगे।

कई बार मैं छोटे भाई बृजमोहन की, वही हमारी संयुक्‍त साइकिल, जिसका इतिहास पहले लिख आया हूं , उठा लेता और यात्री जी के घर बड़ी तेजी, उत्‍साह से जा पहुंचता। तब तक घरों में फोन लगे नहीं थे। यात्री जी मिल गए तो ठीक नहीं तो अपने आने का संदेशा छोड़ आता। हमारे मुहल्‍ले आर्य नगर, जहां यात्री जी का काॅलेज है, और यात्री जी के घर, कवि नगर का फ़ासला बहुत अधिक दूरी का है, पर यात्री जी हमेशा हर जगह ''पैदल दो टांगों पर सवार‘‘। कहते है- साइकिल सीखी ही नहीं। रिक्‍शा का हर रोज़ का किराया कौन भरे। भले ही कड़ाके की गर्मी हो। धूप धूल हो। रात का अंधेरा हो। यात्री जी हमेशा अकेले पैदल आते जाते, दिखलाई देंगे। मेरे बड़े भाई साहब उनसे कहते- यात्री जी वह सुनसान इलाका है। गुंडागीरी राहज़नी भी होती हैं। यात्री जी उत्त्‍ार देते- मुझे कौन लूटेगा। उनमें से कोई मेरा स्‍टूडेंट भी तो हो सकता है। कुछ कलैक्‍टर बने हैं तो कुछ लुटेरे भी तो बने हैं। बस एक दो मिनट किसी से डायलॉग करने का मौका अगर मुझे मिल जाए तो फिर मुझे कोई लूट नहीं सकता। वैसे भी भले आदमी जानते हैं कि इसके पास है ही क्‍या।

मेरे आने का समाचार पाते ही यात्री जी चिरपरिचित गंभीर, मुस्‍कराहट लिये फौरन हमारे यहां हाजिर। फौरन नहीं आ पाए तो शाम तक ज़रूर ज़रूर, आकर, हम सब घर वालों से बड़ी आत्‍मीयता के साथ घुल मिल-जाते। एक घर में मैं अगर नहीं मिला तो दूसरे घर दूसरे घर नहीं मिला तो तीसरे घर तीसरे, नहीं तो चौथे। बच के जाएगा कहां। यात्री जी हमारे सभ्‍ाी घरों, मेन, ससुराल, बड़े भाई साहब, कृष्‍ण बहनजी, सभी घरों को और सदस्‍यों को अच्‍छी तरह से जानते हैं। बहन जी के मकान से बाहर, दाएं तरफ की दीवार अक्‍सर टूटी मिलती है, जिससे विद्यार्थियों को कॉलेज पहुंचने का शार्टकट मिल जाता है। पर इससे हमारे घर वालाें को परेशानी होती है। यात्री जी से कहलवा, कहलवा कर प्रिंसिपल द्वारा मैं इस रास्‍ते को बंद कराता रहता था। पर दीवारों की नियिति ही 'टूटना‘ है। इस 'दीवार-दर्शन‘ से सभी परिचित होंगे। दिन के उजाले में पाटिए। रात के अंधेरे में ध्‍वस्‍त। दुनियां में कौन सा क्षेत्र है, जहां आदमी शार्टकट अख्‍तियार कर, मंजिल पर नहीं पहुंचना चाहता।

कई बार सुबह सवेरे यात्री जी घर आ पहुंचते। चलों वहां या दिल्‍ली, घुमा लाएं। मैं फौरन तैयार। माताजी के मुंह से निकलता- अब इसका कोई भरोसा नहीं, कब लौटे। मुझसे अक्‍सर कहतीं- तू हमसे मिलने अाता है या यात्री जी से।

मेरी थ्‍योरी 'एक पंथ दो काज‘ वाली रहती। यदि यात्री जी गाजि़याबाद से कहीं बाहर होते तो (इनकी फितरत में यात्राएं, नए पुराने लोग, ठिकाने) मैं अपने गाजि़याबाद के कार्यक्रम में, यदि संभव होता तो कुछ रद्‌दोबदल कर लेता।

मैं बचपन को छोड़कर, बिना कंपनी कहीं भी आने जाने से परहेज रखता हूं। और किसी खास लेखक के पास जाकर रूबरू नहीं हुआ। एक बार यात्री जी मुझे हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स बिल्‍डिंग ले गए थे। वहां पर एक मिनट के लिए उश्‍क जी से बात हुई थी। श्‍याम मनोहर जोशी सीढि़यों में मिले थे। 'सुख‘ की कोई अश्‍लील सी परिभाषा समझा गए थे। पांच मिनट के लिए हिमांशु जोशी। दस मिनट के लिए वीरेन्‍द्र सक्‍सेना से साक्षात्‍कार हुआ था। इसके बाद इन लोगों से कभी नहीं मिल पाया सिवाए, वीरेन्‍द्र सक्‍सेना के। चलते फिरते कभी रमेश रंजक भी मिले थे।

यात्री जी ने लिखा भी हैं, बताया भी है कि लेखक बनने से पूर्व ही, वे सब बड़े लेखकों से घनिष्‍ठ हो लिये थे। मेरे और यात्री जी के अलग अलग पहलुओं/रास्‍तों के परिणामों के नफा-नुकसानों की, परिणामों की मीमांसा पाठक स्‍वयं कर लें।

मेरा निष्‍कर्ष वही है कि कोई अगर चाहे भी तो दूसरे की तरह नहीं बन सकता। यात्री जी दो दो महीनों तक अश्‍कजी के पास इलाहाबाद, कसौली वगैरह रह आते थे। बम्‍बई की साहित्‍यिक यात्राएं, लखनऊ, कानपुर, बरेली, भोपाल और न जाने कहां कहां की गोष्‍ठियों समारोहों में पैसे की तंगी के बावजूद जा पहुंचते थे। शिमला, गिरीराज कुशोर के यहां आदि। फिर विभूति नारायण राय जहां जहां, यात्री जी वहां वहां। कोई जगह नहीं छोड़ी। अपनी अपनी आदत सोच की बात है। मुझे भी कई प्रशंसकों के पत्र दूरदराज से आते रहे कि आएं, हमें भी सेवा का मौका दें। उनका आभार व्‍यक्‍त किया और बस। श्री मालचंद तिवाड़ी, जब श्रीडूंगरगढ़ रहते थे तो उनके घर कई लेखक काफी रोज/महीने तक भी रूके थे। वह ज़माना था कि मालचंद मुझे आदर्श लेखक भला इंसान मानते थे। उनके सभी पत्र मेरे पास महफूज पड़े हैं। उनकी दिली ख्‍वाहिश थी कि मैं भी बेशक लंबे समय तक उनके यहां रहूं। मैंने उत्त्‍ार दिया- मैं किसी पर भार बनकर नहीं रह सकता। - भार कैसा ? हमारा सौभाग्‍य होगा। आपसे कुछ सीखने को मिलनेगा। उनकी रगों में लेखक बनने का नया नया जोश, हिलोरें मार रहा था। मैं एक बार सुबह से शाम तक के लिए उनके यहां गया था। उन्‍होंने, चेतन स्‍वामी (अब डॉ) ने गर्मजोशी से स्‍वागत किया। रवि पुरोहित, बजरंग शर्मा, सत्‍यदीप आदि आदि कई लेखकों की मौजूदगी में एक गोष्‍ठी हुई। मैंने अपनी उन्‍हीं दिनों लिखी दो कहानियां सुनाईं और पूछा कैसी लगीं। मालचंद झट बोले- हें सहगल साहब मैं, और आपकी कहानियों पर कोई टिप्‍पणी करूं ? मैंने विनम्रतापूर्वक संकोच भाव से कहा- हर लेखक की कहानी में कुछ कमियां तो रहती ही हैं। शाबाश! एक नए लेखक ने मेरी एक कहानी की, एक भूल की ओर इंगित किया। मैं फौरन कंविंस हो गया। उसे सुधारा। दोनों ही कहानियां बड़ी पत्रिकाओं में छपी थीं। बहुत बाद में मालचंद तिवाड़ी ने मेरी समग्र कहानियों पर बड़ा आलेख लिखकर 'हंस‘ में छपवाया था।

मेरी मुलाकात और आत्‍मीयता विभूति नारायण राय (तत्‍कालीन डी․आई․जी․, बी․एस․एफ़․) के साथ उनके बीकानेर के पदस्‍थापन पर ही हुई थी। फिर क्‍या था। दिन में दो दो तीन तीन फोन। दूसरे तीसरे दिन उनकी कार जीप मेरे दरवाजे़ पर। मेरा भी उनके बंगले पर जाना अक्‍सर होता। अपना काम निकलवाने के लिए कई लोग मुझसे, सिफारिश करवाने लगे थे। बहुत दिलदार हैं राय साहब। कोई भी लेखक हो उससे हिलमिल जाने वाले। कहते भी कि अगर हम अफ़सरी को चिपकाए फिरें तो फिर किसी लेखक से कैसे मिल सकते हैं।

जहां जहां राय साहब, निरीक्षण को बीकानेर से बाहर जाते, उनके साथ मात्र दो कर्मचारी होते एक जीप ड्राइवर एक बंदूक से लैस अंगरक्षक। इन दोनों से राय साहब नियमों के तहत (प्रोटोकोल) बात कर नहीं सकते थे। लंबे सफर में टूटी सड़कों, रेतों पर हिचकोले खाती जीप में पढ़ भी नहीं सकते थे। मज़ाकिया स्‍वाभाव के राय साहब बोर होने से बचने के लिए चाहते कि मैं भी उनके संग हो लूं। श्रीकरणपुर, श्रीगंगानगर, खाजूवाला आदि तीन चार जगहाें, मैं गया भी। वहां पर राय साहब की शानोशौकत। सारी सड़कें झांडि़यों से सुशोभित। सारा स्‍टाफ़ अटनशैन। पर राय साहब नाम मात्र का सैल्‍यूट लेते और किनाराकश हो जाते। हर एक की फ़रियाद सुनते और फौरन समाधान कर देते। बड़े कर्मचारियों की शिकायतें भी सुनते जो अपने मातहतों की कामचोरी का विवरण करते थे। तब उन्‍हें दया भाव रखने का सुझाव देते कि ये बेचारे छोटे कर्मचारी फिर भी अनुशासन के तहत आपके घर का काम भी कर देते हैं। दूसरे महकम्‍मों में ज़रा जा कर देखो।

दिन का शानदान डिनर। शाम को लॉन में कुर्सियां रखकर पीने पिलाने के दौर। मेरे लिए लेमन।

मेरे एक इशारे पर उनका सारा स्‍टाफ हाजि़र।

मैंने यह सब गाजियाबाद जाकर बड़े भाई साहब को बताया था कि वहां पर हमारी बहुत इज्‍़ज़त होती है। भाई साहब हंसने लगे- नादान, इज्‍़ज़त तो इससे भी बढ़ चढ़कर मंत्रियों के सेवकों, धोबियों, नाइयों आदि की भी होती है।तू तो पढ़ा लिखा है। यह कौन सी इज्‍़ज़त हुई।

उसी क्षण मुझे अपनी असलीयत, हीनता भाव का बोध हो आया। वास्‍तव में, मैं अगर बी․एस․एफ․ बंगले, संस्‍थानों में कदम भी रखना चाहूंगा तो पुलिस के जवान मुझे दूर से भगा देंगे।

इसके बाद मैं राय साहब के साथ किसी भी टूर पर नहीं गया। हां जब तब वह फोन करते करते यह कहकर फोन काट देते कि बाकी की बात आपके मेरे यहां आने पर होगी। इतनी मुहब्‍बत। तो फौरन चला भी जाता। कभी राय साहब पूछ लेते- कहीं जा तो नहीं रहे हैं। हम आ रहे हैं। वे सपत्‍नीक आ जाते। दो चार बार, अपने ससुर साहब, बच्‍चों के साथ भी आते रहे। गाने सुनने के भी बेहद शौकीन-लगाओ वही सहगल वाला- 'हाय किस बुत की मुहब्‍बत में गिरफ्‍तार हुए‘ आदि। राय साहब के साथ उन, दो एक वर्षों की बातों की फेहरिस्‍त बहुत लंबी है। कई कई पृष्‍ठ न रंगे। अतः विराम देता हूं।

लेकिन एक बात बहुत स्‍पष्‍ट है। हाय हरजाई। क्‍या मजाल कि यहां से जाने के बाद, मेरे किसी एक पत्र का भी उत्त्‍ार दिया हो। एक दो बार वापस बीकानेर आए तो रास्‍ते से फोन किया कि हम दो घंटे में पहुंचने वाले हैं। खाना अाप ही के यहां खाएंगे।

एक बार मेरी किसी किताब 'शायद‘, 'सरहद पर सुलह‘ का भव्‍य आयोजन बीकानेर की संस्‍था ने किया। इस संस्‍था के सर्वोसर्वा श्रीलाल नथमल जोशी तथा डॉ वत्‍सला पांडेय थीं। उसमें पूना से डॉ मालती शर्मा, गाजि़याबाद से, से․रा․ यात्री, जोधपुर से डॉ सूरज पालीवाल, दिल्‍ली से राय साहब और पुस्‍तक प्रकाशक अजय कुमार भी आए थे। तीन दिन तक खूब गहमागहमी रही थी। फिर तू कौन और मैं कौन ?

यह शब्‍द मैं राय साहब को लेकर लिख रहा हूं। दरअसल राय साहब के मिलने वालों का दायरा ही इतना बड़ा है कि 'किसे भूलूं किसे याद रखूं। ऊपर से इतना बड़ा पद। अक्‍सर मुझसे भी कहा करते- सहगल साहब! ज़रा घूमा फिरा कीजिए। चलिए हमारे साथ दिल्‍ली के तमाम लेखक लेखिकाओं से मिलवा लाएं। डॉ महेश शर्मा, पूर्व सांसद भी यही कहते। मगर․․․․․․। वे राय साहब जहां गए उसी के हो लिये। हां यात्री जी तो उनके खर्चे पर मारिश्‍यस तक हो आए। यात्री जी या सूरज पालीवाल जैसे उनके पास कभी भी कहीं भी पहुंच जाते हैं, तो गले लगाते हैं। मैं भी पहुंचता तो निश्‍चित रूप से मुझे भी गले लगाते। इसमें कोई संदेह नहीं। पर मैं जाऊ तब ना। मैं किसी से अपनी वैसी आवभ्‍ागत, मेहमान नवाज़ी से बाज आया। जो दूसरों के पद के कारण हासिल होती हो। भाई साहब का कहा वह वाक्‍य कभी नहीं भूला। हां कॉलेज के कोर्स में एक चैप्‍टर भी था। 'हाऊ टु बी, ए, एम पी‘ चौराहे पर खड़ा सिपाही, एम․पी/मंत्री जी को सैल्‍यूट मारता है। ड्राइवर समझता है। पुलिस वाले मुझे सैल्‍यूट दे रहे हैं। तौबा। यह भी कदरे सच है कि उनके लेखन की कद्र, उनके पद के कारण ही कुछ ज्‍़यादा है। बीकानेर के लेखक भी मुझे इसी कारण राय साहब से दूरी बनाएं रखने को कहते। तू बड़ा लेखक है या राय साहब ?

इसमें दो राय नहीं कि बड़ा पद, बड़ा लेखक भी बनाता है। बड़े बड़े प्रकाशक हाज़री भरते हैं।

साहित्‍य, चिंंतन, नकार, स्‍वीकार, ज्‍़यादा से ज्‍़यादा, हर क्षेत्र के ज्ञान अभिज्ञान को जज्‍़ब कर लेने की लालसा, आदमी को कहां से कहां पहुंचाती है। कभी वह अति उत्‍साह से भर कर, पूरी दुनियां को अपनी मुट्‌ठी में भर सकने में, अपने आप को सक्षम समझने लगता है तो कभी क्‍या, फ़ौरन उन्‍हीं उत्‍साह वाले क्षणों से ज़रा आगे बढ़ते ही, अवसादग्रस्‍त हो उठता है। हीन ग्रंथियां उसे आ घेरती हैं। वह दूसरों के मुकाबले अपने को एक बोने के रूप में देखने लगता है। कुछ तो उसे स्‍वयं अपनी अक्षमता का बोध सताता है और बहुधा इसके लिए दूसरों को कोसता है। मन ही मन गालियां देता है, जो उसकी राह में आड़े आ रहे हैं। स्‍वयं बौने होने के बावजूद बड़ी सफ़ाई से, बड़ी चालाकी और भोलेपन के नाटक से योग्‍यों को आगे नहीं आने देता। दूसरों का बना बनाया काम ध्‍वस्‍त करने में रस लेता है। सारा मज़ा किरकिरा कर देता है। ऐसे विचारजगत में अलग किस्‍म के शातिरों की दुनियां का बोलबाला है। दरअसल यह व्‍यक्‍ति का अंतर-संसार द्वंद्व युद्ध भी होता है जो निरंतर चलता रहता है। और उसे परेशान सा किए रहता अनिश्‍चय संदेह में जीने को आदमी अभिषप्‍त प्रायः है ः-

इस दिल की हालत क्‍या कहिए

जो शाद भी है, नाशाद भी है।

अपनी ऐसी ही समस्‍याओं, शंकाओं और जीवन की निरथकताओं का कच्‍चा चिट्‌ठा कभी मैंने समाधान हेतु डॉ․ रामेश्‍वर दयालु अग्रवाल को लिख भेजा था और यह भी लिख भेजा था कि बरेली के उसी साइकलोजीकल ब्‍यूरो में जाकर उनसे भी मंत्रणा कर देखें।

दरअसल यह मेरी बचपन की प्राब्‍लम रही है, जिसका समाधान कोई भी मनीषी मेरे लिए नहीं कर पाया। कुछ आम जनों का जवाब होता। मस्‍त बनकर रहो। बुद्धू बनकर रहो। किसी चीज़ में माथापची करो ही मत। जो हुआ अच्‍छा ही हुआ। जो हो रहा है अच्‍छा ही हो रहा है। जो आगे होगा अच्‍छा ही होगा (गीता) यानी सब कुछ ऊपर वाले के हाथ में छोड़कर खुद बेफिक्र हो जाओ। मैं पूछता हूं - फिर तुम प्रयास पर प्रयास क्‍यों करते हो। क्‍यों अप्रोचें लड़ाकर पैसा खिला खिलाकर अपना काम किसी भी तरह निकलवा लेने के लिए दिन रात पागल क्‍यों हुए जाते हो। छोड़ दो ना सब कुछ भगवान पर। जो होना होगा- जो जाएगा। तुम्‍हें किसकी चिंता। जब सब कुछ ऊपर वाले के हाथ में है। मनुष्‍य तो उसकी कठपुतली मात्र है। क्‍या हमारे इन प्रवचनाें तर्कों का उन पर केाई असर पड़ता है ? तब कैसे हम पर उन ज्ञानियों, मनीषियों के उपदेशों का असर रंग ला सकता है ?

प्रो․ अग्रवाल जी का लंबा पत्र आया था कि साइकलोजीकल ब्‍यूरों वालों के पास जाने की ज़रूरत नहीं। जीवन-लक्ष्‍य और शांति प्राप्‍त के लिए तीन रास्‍ते ज्ञान, भक्‍ति, कर्म बताए थे। इन तीनेां में भक्‍ति मार्ग सामान्‍य व्‍यक्‍ति के लिए आसान बताया था। जीवजगत, आत्‍मा परमात्‍मा जीवन-लक्ष्‍य की विस्‍तृत व्‍याख्‍या की थी। कई संतों महात्‍माओं के प्रवचनों को समझने अनुशीलन करने के और ग्रंथों का स्‍वाध्‍याय करने जैसे सुझाव दिए थे। गीता को सर्वश्रेष्‍ठ ग्रंथ बताया था।

मैंने लिखा था कि इनको पढ़ने से तो मुझसमें उल्‍टा, अनास्‍था जाग्रत होती है। मेरे और तकोेर्ं के आगे जैसे उन्‍होंने भी हथियार डाल दिए थे। (शायद पहले भी लिख चुका हूं ) - कि जब तुम खुद ही अपनी सहायता नहीं करना चाहते तो कोई दूसरा तुम्‍हारी सहायता कैसे कर सकता है। यह तो कोई उत्त्‍ार न हुआ। जब स्‍वामी रामकृष्‍ण परमहंस, अपनी आत्‍मा को विवेकानंद के शरीर में उंडेल कर उन्‍हें महाज्ञानी बना सकते थे तो बाकी मनीषी, जिज्ञासुओं के साथ ऐसा क्‍यों नहीं कर सकते ?

तब वे पात्र सुपात्र का वर्णन करने लगते हैं। फिर सोचता हूं कि क्‍या मेरे प्रोफेसर साहब भी जीवन से कभी संतुष्‍ट रहे। बीवी बच्‍चों को वे संतुष्‍ट न रख सके तो प्रतिक्रिया स्‍वरूप स्‍वयं भी असंतुष्‍ट रहे। अपनी कार्यशैली की मंद गति से भी असंतुष्‍ट रहे। मित्रों की दग़ाबाज़ी से भी नाराज़। इत्‍यादि। और अंत में ब्रेन हैमरेज से मृत्‍यु। यह सब आखिर क्‍या है।

2-2-70 को कमला को सैन्‍ट्रल स्‍कूल नं․ एक बीकानेर में एस यू पी डब्‍लयू टीचर की नौकरी मिल गई। हम सब और मेरे मित्रगण, कुछ ईष्‍यालुयों को छोड़कर, बहुत खुश हुए हमारी खुशी का आपार नहीं था। आगे चलकर जब पता चला था कि यह भी हमारे साथ एक प्रकार की ज्‍़यादती हुई है। प्राइमरी ग्रेड मिला था। जबकि टी जी टी ग्रेड मिलना चाहिए था। तब फिर असंतुष्‍टि। फिर संघर्ष। कई पापड़ बेले कई कई वर्षों की जद्‌दो जहद के पश्‍चात अंततः टी जी टी ग्रेड डेट अॉफ अपाइंटमेंट से एरियर सिहत लेकर रहे। फिर बहुत खुश हुए। कमला की पे पहले से ही कुछ मुझसे अधिक थी। अब और शानदार हो गई।

यह भी एक बड़ा जीवनदर्शन है। आपका मारा हुआ हक आपको वापस मिल जाए (चेखव की कहानी 'धन्‍यवाद‘) आपकी खोई हुई कोई वस्‍तु आपको वापस प्राप्‍त हो जाए। जर्मन लेखक का इसी विषयवस्‍तु पर लिखा बड़ा उपन्‍यास (साइकिल चोर)।

कमला की सर्विस लगते ही बधाइयों की बौछार हुई थी। इतना बड़ा सेमी गोवर्नमेंट (एटोनिमस बॉडी)­ स्‍कूल और इतना अच्‍छा ग्रेड। इसके सामने राज्‍य सरकार की नौकरी क्‍या है। (जो, कभी सरकारी क्षेत्रवाद नीतियाें के कारण हमें नहीं मिली थीं)

अशोक आत्रेय ने कहा था- अब तो हमें चाय के साथ नाश्‍ता भी मिला करेगा।

अब देखिए तमाशा। पहला तमाशा तब हुआ था जब एक दिन अचानक वही मेरा अफ़सर डी․एस․टी․ई․ मेरे कमरे में आया था। डी एस से झाड़ तो खा ही चुका था (शायद उनसे ज़रूर वायदा भी कर आया होगा) मुझसे बोला- हो गया। आप कहना मानकर बीकानेर आ गए। अब आपको वापस रेवाड़ी भिजवा देते हैं। मैंने कहा- अब क्‍या ज़रूरत है। यही जम गया हूं। हर बार उखड़ना (उजड़ना) नहीं चाहता।

एक साथी बोला- इन्‍होंने तो यहां ज़मीन भी खरीद ली है।

दूसरे साथी ने कहा- इनकी मिसेज की सेंट्रल स्‍कूल में सर्विस लग गई है।

- कांग्रच्‍यूलेशन। हें हें करता हुआ, डी एस टी ई वापस चला गया।

इसी प्रकार का दूसरा तमाशा मई 1970 में हुआ। रेवाड़ी से मि․ खानचंद बत्रा ने दिल्‍ली ट्रांसफर करा ली थी। अतः रेवाड़ी में यहां बीकानेर से किसी एक की ट्रांसफर रेवाड़ी होनी लाजमी थी। मैं छोटे छोटे बच्‍चों, कमला की सर्विस, लिखने पढ़ने आदि के कारण बहुत व्‍यस्‍त हो चला था। बस अपनी रूटीन की छह घंटों की ड्‌यूटी निभाई और घर वापस। मुझे दफ्‍़तर खास तौर से दफ्‍़तर की राजनीति का कोई पता नहीं रहता था। और न शुरू से किसी राजनीति (चाहे वह साहित्‍य की ही क्‍यों न हो) की खैर खबर नहीं रहती थी। कोई भी व्‍यक्‍ति रेवाड़ी जाना नहीं चाहता था। ऐसे में भाई लोगों ने चुपचाप मेरा ही ट्रांसफर करा देने की चाल चल डाली। उस मंडली में एक तेज तरार्र लड़का प्रेमप्रकाश मेरा हितैषी था। उसने सारी पोल मुझे बता डाली।

मैंने कहा- न तो मैं जूनियर मोस्‍ट हूं। न सीनियर मोस्‍ट। और न ही मेरा यहां लांगर स्‍टे है। मेरा ट्रांसफर कैसे हो सकता है। कहने लगा। तुम्‍हारे ट्रांसफर आर्डर हो चुके हैं। संभलना हो तो संभल लो। एक दो दिन में तुम्‍हें आर्डरज थमा दिए जाएंगे। बाकी सबने अपने अपने जैक लड़ा रखे हैं। तुझे ही बलि का बकरा बनाया जा रहा है। यहां रूल्‍ज़-रेगुलेशन को पूछने वाला कोई नहीं।

सुनकर मैं दंग रह गया। मुझसे ज्‍़यादा परेशान, कमला। रात भर नींद नहीं आई। सुबह स्‍कूल के लिए मुझे बिना कुछ कारण बताए जल्‍दी निकल गई।

रास्‍ते में सिविल लाइन में डी․एस․टी․ई․ का बंगला पड़ता था। पहले वाला अफ़सर ट्रांस्‍फर पर जा चुका था। अब कोई नया लगा था। कमला सीधी उसके बंगले में जा पहुंची। साइकिल को एक ओर स्‍टेंड पर खड़ा किया। डी․एस․टी․ई․ बरामदे में खड़ा शेव बना रहा था। सुबह सवेरे किसी अंजान लेडी को देखकर हड़बड़ा गया। कमला ने संक्षेप में शुरू से अब तक की हकीकत बयान कर डाली। सुनकर कहने लगा। आप दोनों सैंट्रल गार्वनमेंट कर्मचारी हो। मि․ सहगल की ट्रांस्‍फर तो रूल्‍ज के मुताबिक होना गलत है।

- लेकिन, सर सुना है आर्डर तो हो चुके हैं।

- आप जाकर मि․ सहगल से कहें, लंबी छुट्‌टी पर चले जाएं। मैं मंजूर कर लूंगा।

ऐसा ही हुआ। मैं दो महीने की छुट्‌टी पर रह कर, लिखता पढ़ता, घर की देखभाल करता रहा। बीच बीच में दफ्‍़तर के हालात का जायजा भी लेता रहा। वहां जैसे तूफ़ान आया हुआ था। हर वक्‍त यही ट्रांस्‍फर के चर्चें। पूरी मंडली प्रेमप्रकाश के पीछे पड़ गई- तूने यह सारा भेद सहगल को बताकर हमारा सारा खेल बिगाड़ दिया। प्रेमप्रकाश ने उत्त्‍ार दिया- यह तो गौ हत्‍या होती। वह ठहरा सीधासादा पढ़ने-लिखने वाला आदमी। अपने काम से काम रखने वाला। ड्‌यूटी आवर्ज के अलावा दफ्‍़तर में जमघट में शामिल होकर राजनीति नहीं करता। क्‍या यही उसका कसूर है। अब हर कोई ट्रांस्‍फर की मार से बचने के लिए कोई न कोई तिकणम लगाए हुए मुस्‍तैद। एक दूसरे की आलोचना निंदा। हल्‍की हल्‍की अंदर से दुश्‍मनी।

मैंने जीवन में कई बार अनुभव किया है। कोई लाख आपका अपना हो, (अपवादों को छोड़ दें) जब आपस में हित टकराते हैं, तो एक दूसरे के दुश्‍मन से बन जाते हैं।

देा महीने बाद मि․ बाहुद्‌दीन ख़ान को रेवाड़ी ट्रांस्‍फर कर दिया गया। बाकियों की सांस में सांस आई। मैंने भी क्‍लर्क के कहने से ड्‌यूटी रिज्‍़यूम कर ली कि खतरा टल गया है।

एक बात यह भी थी कि जब रेवाड़ी में रहते हुए मुझे रेलवे क्‍वार्टर मिलने वाला था तो मुझे बीकानेर ट्रांस्‍फर कर दिया गया। अब यहां बीकानेर आकर वापस अपना नाम क्‍वार्टर की प्रियार्टी लिस्‍ट में िलखवाया था। और फिर से नंबर आने को था तो फिर रेवाड़ी धकेला जा रहा था।

खैर अब 19-7-70 को रेलवे क्‍वार्टर T-62/C रेलवे मालगोदाम के पीछे क्‍वार्टर मिल गया और मैं वहीं बस गया। अग्रवाल क्‍वार्टर और रेलवे क्‍वार्टर की दूरी बहुत ही कम है। बहुत सा हल्‍का सामान ताे महल्‍ले के बच्‍चे ही उठा उठाकर ले गए; मानों उन्‍हें कोई खेल मिल गया है। बाकी का सामान गाड़े वाले ने सिर्फ दो फेरों में पहुंचा दिया। इस क्‍वार्टर से तो 'जयहिन्‍द‘ और भी एकदम करीब हो गया। साथ ही नागरी भंडार लाइब्रेरी। साथ ही सब्‍जी मंडी है। लाइने पार की। टूटी दीवार फांदी और इन तीनों जगहों या कुछ और आगे सज्‍जनालय कोटगेट जाना हो तो भी साइकिल की कोई खास जरूरत नहीं। कस्‍बानुमा बहुत कम आबादी वाला शहर बीकानेर तेरी जय हो। आज इस सारे के सारे इलाकों में हद से ज्‍यादा भीड़। स्‍कूटर कारें। रास्‍ते जाम। महानगर का भ्रम पैदा करता है। तो भी बीकानेर से, कही पहले वाला कस्‍बाई-बोध खत्‍म नहीं हुआ। प्रिंसिपलों, बड़े बड़े डाक्‍टरों, ओहदेदारों, पुराने दंभरहित संस्‍कार वाले महानुभाव मौजूद हैं। यह बड़ी हस्‍तियां ऐसे ही किसी कॉलेज के बाहर की सीढि़यों, गली के किसी कोने या चौकों के बड़े बड़े पाटों (तख्‍तपोशों) पर बड़े सहज भाव से बैठी गपशप लड़ाती मिल जाएंगी। शहर भर की खबरें 'पाटा गजट‘ कहलाती हैं।

हां कुछ सालों से नई नई कॉलोनियों और माल्‍ज के जाल फैल जाने से थोड़ा थोड़ा बदलाव आने लगा है। मुझे ठंड बचपन ही से खूब सताती आई है। पहले पेशावर फ्रंटियर अफगानिस्‍तान जैसे इलाके फिर उससे कुछ कम ठंड वाले पंजाब प्रांत फिर उससे और कम यू․पी․ में ठंड झेली है। जवानी के जोशोखरोश में आराम से झेलता गया। अब तो बीकानेर में दिसंबर जनवरी में भी लगातार घूप में नहीं बैठा जाता। यह मेरी बढ़ती उम्र के लिए एक तरह का वरदान है।

मेरे सबसे बड़े बेटे विवेक का, तथा उससे छोटी बेटी कविता का जन्‍म तो जब मेरी पोस्‍टिंग रेवाड़ी में थी तो गाजि़याबाद में हुआ था। वे दोनों बड़े मजे से पंजाबी बोलना सीख गए थे। तीसरे नंबर पर बेटे अजय का जन्‍म बीकानेर के पी․बी․एम․ हास्‍पीटल में, जब हम अग्रवाल क्‍वार्टरों में रहते थे, हुआ था। वह भी जैसे तैसे पंजाबी सीख गया, लेकिन सबसे छोटी बेटी शिल्‍पी का जन्‍म रेलवे क्‍वार्टर बीकानेर में हुआ। वह पूरी तरह माई (काम वाली) के हाथों पली। वह पंजाबी नहीं बोल सकती थी। किसी मुलाकात के दौरान दिल्‍ली मे ंडॉ․ महीप सिंह जी से इस विषय में बात हुईं तो कहने लगे। पंजाबी तो आनी ही चाहिए। जिस व्‍यक्‍ति को जितनी ज्‍़यादा भाषाएं आती हैं, उसका महत्‍व अधिक आंका जाता है। उसे किसी तरह से पंजाबी सिखाओ।

अभी शिल्‍पी छोटी थी। मेरे सामने किसी भी चीज की डिमांड रखती (यह ला दो। वह ला दो) तो मैं कहता- पंजाबी बोलकर मांगोगी तो जरूर ला दूंगा। इस तरह बड़ी मुश्‍किल से वह पंजाबी सीख तो गई, पर उसकी पंजाबी वाली टोन नहीं है। हम बड़े लोग भी पंजाब की उस ठेठ टोन में कहां बात कर पाते हैं, जो लुधियाना, अमृतसर, जालंधर आदि वालों की है। चार पांच बार डॉ सुखजोत (संपादक अन्‍यथा) से फोन पर बात हुई तो मैंने कहा- आहा बोली में क्‍या मिठा स्‍वर है। इसे सुनकर कानों को तृप्‍ति मिलती है। इस बचपन की बोली को मन तरसता है।

हर बोली का अपना मिज़ाज होता है। उसमें रस घुला होता है। राजस्‍थानी में भी इस रस की कमी नहीं। मेरे सारे बच्‍चे तो इसे अपने संगियों के साथ मजे़ से सीख गए। पर न जाने क्‍यों मैं संकोचवश, कुछ कुछ जानते हुए भी, बोल नहीं पाता। अगर लिखने भी लग जाता तो काफी कुछ हासिल कर जाता। ज्‍़यादातर प्रांतीय भाषाओं में, हिन्‍दी की भांति कम्‍पीटीशन, टफ नहीं हुआ करता। पूरे एक वर्ष में हिन्‍दी में छपी पुस्‍तकों की संख्‍या और प्रांतीय भाषाओं में छपी पुस्‍तकों की संख्‍या में, ज़मीन आसमान जितना अंतर है। मेरे परम मित्र स्‍व․ सांवर दैया ने पहले हिन्‍दी में लिखा। फिर सारी स्‍थितियों का मूल्‍यांकन कर राजस्‍थानी में लिखने लगे। खूब लिख लिया। नाम हुआ। महत्‍व बढ़ा। अब उनके नाम से राजस्‍थानी साहित्‍य अकादमी, बीकानेर 'सांवर दइया, पैली पोथी‘ पुरस्‍कार भी देती है।

जहां तक मेरा अपना मूल्‍यांकन है, वह इस प्रकार से है कि जो लोग अंग्रेजी से हिन्‍दी में आए, और जो हिन्‍दी से राजस्‍थानी में आए, उनमें बेहतर लिखने की समझ पैदा हुई।

कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपनी ठेठ भाषा में, बिना विश्‍व, क्‍या राष्‍ट्रीय भाषा, को बिना पढ़े मौलिक सृजन करते चले जाते हैं तथा प्रांतीय स्‍तर पर ही अपनी पहचान बना लेते हैं।

एक मजेदार घटना सुनाता हूं। यहां बीकानेर के राजस्‍थानी में केन्‍द्रीय साहित्‍य अकादमी से पुरस्‍कृत लेखक स्‍व․ मूलचंद प्राणेश की एक कहानी सांवर दइया ने, जबानी मुझे सुनाई थी। कहने लगा- देखो कितने अच्‍छे कथ्‍य की कहानी है।

सुनकर मैंने कहा- है। लेकिन यह तो चुराई हुई कहानी है। जबकि मैं किसी की कहानी को अपने नाम से छपवाना, जूठन खाने जैसा समझता हूं। बताऊं यह किसकी कहानी है। यह किसी अफरीकी देश के लेखक की है। लेखक का नाम इसलिए भी याद रह गया कि वह मेरे वाला नामसा है। 'दर्शन आग़ा‘।

सुनकर सांवर दइया जैसे आगबबूला हो गया। कहने लगा-तो ये लोग चोरी करते हैं।

मगर दूसरे दिन फिर सांवर दइया से सामना हुआ तो बोला-सहगल साहब। मैंने बहुत दिमाग खराब किया और इस नतीजे पर पहुंचा कि यह चुराई हुई कहानी नहीं है।

-कैसे ? मैंने जिज्ञासवश पूछा तो उसी टोन में बोला ये सब लोग, कुछ पढ़ते तो हैं नहीं। चुराएंगे कहां से ? यह बस संयोग, चिंतन, सृजन वश हो गया। विचारों का मिलान। यानी नकल के आरोप तो सिर्फ हमारे यहां के साहित्‍य के, बड़े दिग्‍गजों पर, लगते ही रहते हैं, जो ज्‍़यादा भाषाओं के ज्ञाता होते हैं, जिनकी खूब प्रशंसा होती है और कभी कभी मट्‌टी पलीद भी होती रहती है।

मैंने 'नई कहानियां‘ में छपे, बीकानेर रिपोतार्ज, में बीकानेर को एक मस्‍त शहर के रूप में प्रस्‍तुत किया है। यहां के बड़े बड़े कई बुद्धिजीवी बस अपने में ही में मस्‍त हैं। अपना जैसा भी लेखन है, जैसे वही सब कुछ है।

एक बुजुर्ग (85 से ऊपर के) बड़े सरल स्‍वभाव के अति शालीन ग्रामीण प्रवृति के धनी श्री अन्‍नाराम 'सुदामा‘ हैं। खूब लिखा है; राजस्‍थानी में। अब तक भी लिखते ही चले जा रहे हैं। बिना छपने, न छपने की परवाह किए। वे डॉ․ मेघराज के पिताश्री हैं। वही मेघराज जिन्‍होंने 'धरती प्रकाशन‘ चलाया था। इसलिए भी खास तौर से कि मुख्‍यतः अपने पिता की पांडुलिपियों को पुस्‍तक का रूप प्रदान कर सकें। सुदामा जी को कई पुरस्‍कार/सम्‍मान भी प्राप्‍त हो चुके हैं। वे ठेठ राजस्‍थानी परिवेश में ढले पले हैं। इसलिए वे ठेठ ग्रामीण, ग्रामीण चिंतक, उन बेकसूर अनपढ़ सीधे सादे मुंह में जबान न रखने वाले शोषित वर्ग का दर्द मर्म पहचानने वाले, उनके प्रतिनिधि रचनाकार हैं। उनकी पहचान राजस्‍थान में ही रही। बाद में उन्‍होंने कुछ बड़े उपन्‍यास हिन्‍दी में भी लिखे। उन्‍हें परखवाने (विश्‍ोषकर उनकी हिन्‍दी) डॉ मेघराज मेरे पास भी लाते रहे।

हिन्‍दी में छपने से, उनका, खास तौर से 'आंगन नदिया‘, 'अज हूं दूरी अधूरी‘ की दूर दराज़ के इलाकों में चर्चा हुई (हालांकि दोनों में कई स्‍थलों पर एक दूसरे का दुहराव है। सीमित जमीन के कारणवश तथा शायद मोटे उपन्‍यास बनाने के मोहवश) इनमें से एक पर उन्‍हें राज․ साहित्‍य अकादमी का (हिन्‍दी का) सर्वोच्‍च, 'मीरा पुरस्‍कार‘ भी प्राप्‍त हुआ। तब सुदामा जी के मुंह से बरबस निकला कि काश मैंने अपना सारा साहित्‍य शुरू से ही हिन्‍दी में लिखा होता। हर कोई लेखक मन से यही चाहता है कि उसे विशाल पाठक वर्ग मिले। सराहे।

एक बात, मेरे जीवन में यह भी रही कि मुझमें नए नए नगर देखने उनमें रमने की लगन बचपन से ही रही। अमूमन मेरे साथ कहना चाहिए मेरे मन में एक जिज्ञासा सी बलवती हो उठती है कि अगर मैं यहां या उस जगह या इस गली, या इस हवेली, मुहल्‍ले में रहता होता तो मुझे कैसे कैसे आभास होते। और कुछ अनदेखी जगहों को कल्‍पनाओं के सहारे, जानने समझने खोजने की लालसा भी बनी रहती है। गाड़ी किसी छोटे स्‍टेशन पर रूकी, एक आदमी अपना सामान समेटता हुआ, सामने किसी रेलवे क्‍वार्टर में घुस गया या अाउटर सिगनल की ओर या स्‍टेशन-बाहर सामने की किसी गली में चला गया तो सोचता हूं कि अगर मैं भी इस शहर में इन्‍हीं गलीकूचों क्‍वार्टरों में रहता होता तो मेरा परिवेश, मेरी सोच मेरा रहन-सहन कैसा होता। और उनका प्रभाव मेरे लेखन पर कैसा पड़ता।

बता आया हूं जहां जहां छोटे जीजाजी रहे, मैं भी वहां वहां पहुंचा। लगभग वह सारी छावनियां स्‍टेशन मैंने देख लिये। इसी तर्ज पर जहां जहां कमला के सैमिनार लगे, ड्‌यूटियां लगीं, उन में से कई जगहें मैंने और मेरे परिवार ने देख लीें।

मेरी सबसे छोटी बिटिया अभी मुश्‍किल से दो महीने की थी कि कमला का सैमेनार 15 दिनों का, अजमेर में 'ओरंटेशन‘ कॉलेज में आयोजित हुआ। 17-8-72 से 31-8-72 तक का। दो समस्‍याएं पैदा हुईं। छोटी सी नन्‍ही बच्‍ची को संभालने की। दूसरी रहने की। क्‍योंकि हम सपरिवार वहां जा रहे थे। पहली समस्‍या का समाधान तो यह निकाला कि चंपा बाई जो शिल्‍पी की देखभाल करती थी, को साथ चलने को राज़ी कर लिया। उसका टिकट खरीदा। हमारा रेलवे-पास तो था ही। छोटे बच्‍चों विवेक (अशु), कविता, शिल्‍पी, अजय को स्‍कूल से छुट्‌टी दिलवा दी। और तैयारी प्रारम्‍भ। लेकिन दूसरी समस्‍या वहां पर रहने की ?

मैंने, ईश्‍वर चन्‍दर सिंधी हिन्‍दी के उस समय के चर्चित लेखक जो सारिका में खूब छपते थे, को पोस्‍टकार्ड डाल कर पूछा कि क्‍या हमारे अजमेर में ठहरने की कोई व्‍यवस्‍था हो सकती है। उत्त्‍ार मिला। मैं कोई मदद नहीं कर सकता। उर्स के दिन हैं। धर्मशालाएं वगैरह सब भरी पड़ी हैं। ऐसे में इबादत करने वाले पर्यटकों की भरमार होती है। सभी लोग खुद अपने मकान के बड़े हिस्‍सों को मुंह मांगे किराए पर दे देते हैं। पैसे की खातिर, खुद, अपने ही घर में कोनों में सिमट कर गुज़ारा कर लेते हैं। ऐसे में कोई मकान होटल किराए पर मिलना भी मुश्‍किल है। चलो एक बात हुई। उस वक्‍त के लेखक कम से कम पत्रों के उत्त्‍ार तो दिया करते थे। आज के हमारे बहुत से लेखक अकड़ कर कहते हैं हम पत्रों का उत्त्‍ार देना अपनी हतक समझते हैं। कुछ कहते हैं अपने आप ही अगले को समझ लेना चाहिए कि हम इन कामों में रूचि नहीं रखते। एक बार कानपुर से कहानी भेजने का प्रस्‍ताव आया था। मैंने कोई कहानी भेज दी। कोई उत्त्‍ार नहीं। कई पत्र लिखे। न कोई उत्त्‍ार, न छपी हुई कहानी प्राप्‍त हुई। मैंने फोन मिलाया तो जनाब, तथाकथित संपादक राजेन्‍द्र राव साहब जी का उखड़ हुआ स्‍वर सुनाई दिया- अपने लेखन का स्‍केल ऊंचा कीजिए। भले आदमी! तूने ऐसे घटिया आदमी से कहानी, अपने शानदार लैटर पैड पर लिखकर मंगवाई ही क्‍यों ? चलो हो लिया। कहानी वापस कर देते। पत्र ही लिख देते। फोन ही कर देते। यह आज के ऊंचेपन का नमूना है।

वैसे आजकल सभी संपादक पत्र न भेजकर, फोन से ही काम चला रहे हैं।

ईश्‍वर चंदर का ज़माना, फोन का जमाना नहीं था। शालीनता का जमाना था अतः उसने उत्त्‍ार तो दिया था। बात जब पत्रों और संपादकों की चल निकली है तो पहले धैर्यपूर्वक, आपको, अपनी चिंता से भी अवगत कर दूं कि पत्रों के न रहने से कोई भी लेखक संपादक अपनी जिम्‍मेवारी से सीधा अपने को मुक्‍त पाता है ''नहीं नहीं फोन पर मैंने ऐसा तो नहीं कहा था। आप कुछ गलत समझ गए होंगे। रेकार्ड रहित, मुक्‍त विचरण, बिना पासपोर्ट, वीजा घूम रहे हैं। ''अरे भई कह दिया होगा।‘‘ अब मॉफी मांगे लेते हैं। पर असली चिंता अपनी जगह। साहित्‍य के पत्रों वाले इतिहास के विलुप्‍त हो जाने की है, जिन्‍हें आज हम बड़े बड़े लेखकों के संपादकों, लेखकों को लिखे गए, तत्‍कालीन समय को समझने में सहायक पाते हैं। शोधार्थी भी उनसे लाभान्‍वित होते हैं। अब तक पिछली पीढ़ी वालों के पत्र, पत्रिकाओं के मोटे मोटे अंकों में, किताबों में छप रहे हैं। आज के लेखकों को इस रूप में कौन पढ़ पाएगा।

मेरे पास मम्‍बई के कर्मठ युवा लेखक रमा शंकर का पत्र आया था कि आपके पास तो लेखकों के खूब पत्र होंगे। हम ऐसे आपके पत्रों के आदान-प्रदान को पुस्‍तक रूप में छापना चाहते हैं।

मैंने उत्त्‍ार दिया-भैया मेरे पास तो आज तक भी ऐसे पत्र बड़े बड़े लिफाफों में भरे पड़े हैं; पर कल को तुम लोग क्‍या करोगे। क्‍या दोगे।

कोई फोन आता है-सहगल साहब, आपका पत्र मिल गया। थोड़ा समय बचाने के लिए यह फोन कर रहा हूं। यानी पहले के बड़े से बड़ा लेखक यथा विष्‍णुप्रभाकर, रामदरश मिश्र आदि निकम्‍मे, निट्‌ठले थे। मेरे पास हसन जमाल साहब के सबसे ज्‍यादा पत्र हैं। इन्‍हीें को आधार बनाकर (बिना कभी हसन जमाल देखे) उस पर शानदार लेख वक्‍त ज़रूरत छपवा दिया था।

''अब मुझे अपनी थोड़ी भड़ास निकालने की भी इजाजत अता फरमाएं। इस भड़ास को मेरा 'सत्‍य‘ (और कुछ दूसरों का भी) समझ कर ताइद करने की मेहरबानी करेंगे। इसी लिए मैंने अपने आत्‍म कथ्‍य में यही शब्‍द लिखे हैं कि मैं बचपन में लेखकों को कोई आकाशीय, देवतुल्‍य श्‍ाक्‍ति समझता था। पर जब धीरे धीरे कुछ बड़े लेखकों से पाला पड़ा तो पाया, बेशक वे अपनी मित्र मंडली में विशिष्‍ट कहलाते हैं पर शिष्‍ट नहीं हैं वे। वही बात उन सब के नामोल्‍लेख कर उन्‍हें महत्त्‍व देना, और अपने को आत्‍म पीडि़त दर्शाना होगा। फिर भी कुछ नाम तो चाएंगे ही। जिन्‍होंने लिस्‍ट बना रखी है कि इन इनको छापना है। इन इन को नहीं। इससे बेहतर तो वाइड सर्कुलेशन वाली अच्‍छा पैसा देने वाली पत्रिकाएं होती हैं जो निष्‍पक्ष भाव से सिर्फ रचना पर ध्‍यान देती हैं। पर हमारे लघु पत्रिकाओं तथा कथित संपादक नाक भौं सिकोड़ते हैं। हूं व्‍यावसायिक।

गिरीराज किशोर ने मेरी स्‍वीकृत कहानी बिना टिप्‍पणी के लौटा दी। पूछ बैठा तो, चलो जवाब मिला-आपसे किसी और बढि़या सी कहानी की उम्‍मीद करते हैं। पूछो, घटिया थी तो स्‍वीकृति पत्र क्‍यों भेजा था।

एक दोस्‍त ने राज़की बात कही-बेशक और कुछ श्रेष्‍ठ भेजकर देख लो। जब उन्‍होंने तुम्‍हें न छापने का फैसला ही कर लिया है तो कुछ भी नहीं छापेंगे। पक्‍की बात है। उनकी मित्र मंडली ने उनके सामने लिस्‍ट प्रस्‍तुत कर दी होगी कि सिर्फ इन इन को ही छापना है। बाकियों को खारिज करना है। उठने नहीं देना है। मुझे हंसी आ गई क्‍या 'अकार‘ जैसी पिद्‌दी पत्रिका में छपने से मैं आकाश को छू आऊंगा। ऐसी पत्रिकाओं के (बिना पढ़े भी) गुणगान इनके मित्रगण ही गाते रहते हैं। पत्रिका वह जिसका वाइड सर्कूलेशन हो। आम जनता की धड़कन का अंग बने। मात्र बोद्धिको भर की होकर न रह जाए।

मैं साहित्‍य क्षेत्र में होते हुए भी, साहित्‍य, साहित्‍यकारों के असली मकसद से नादान, सोचता हूं, शायद ऐसी ऐसी ही पत्रिकाओं के ज़रिए साहित्‍य का इतिहास लिखा जाना हो जो पत्रिकाएं अपवाद स्‍वरूप ही कहीं सहज उपलब्‍ध हों। यदि ऐसी पत्रिकाएं कहीं भूले भटके किसी बुक स्‍टाल पर पड़ी भ्‍ाी हों तो आम पाठक, पत्रिका का शीर्षक ही देखकर बिदक जाएं- यह सब मैंने अपने छोटे आलेख ''हिन्‍दी पत्रिकाओं के विरोधाभासी स्‍वर‘ (शेष जुलाई सितंबर 2010) में लिखा है। अच्‍छी खासी प्रतिक्रियाएं मिली थी। दया दीक्षित ने लिखा था कि पढ़कर, ''हंसी रोके नहीं रूकती है।‘‘

कभी मेरे पुराने मित्र अजय ने मुझे जयपुर बुला भेजा था। अचानक अशोक आत्रेय जयपुर की सड़कों पर टकरा गया। कहने लगा-चलो चलकर मणि मधुकर से मिलवा लाता हूं। मेरी जिज्ञासा जागृत हो उठी-हां हां वे 'अकथ‘ नाम की पत्रिका भी तो निकालते हैं ना। मैंने भी एक कहानी भेज रखी है। मिलकर पूछ आते हैं। अशोक ने कहा-गलती की। वह छापेगा ही नहीं।

मणि मधुकर जी साहब बाकायदा किसी 'बड़े‘ संपादक के रूप में प्रकट हुए। मैंने अपनी कहानी के बारे में पूछा तो ज़रा और बढि़या एक्‍टिंग के साथ, ऊंचे हो गए-मुझे ध्‍यान नहीं। मैं अपने पी․ए․ से पूछूंगा। उसने चाय पानी तक को न पूछा। हम वापस चले आए। अशोक हंसने लगा-पी․ए․ ? 'अकथ‘ शायद डेढ़ अंक निकाली और बंद। लो इतिहास तो बन ही गया।

लखनऊ के एक बड़े नामी गिरामी संपादक हैं। सदा मित्र लोग उनके लेखन के कसीदे काढ़ते नहीं थकते। उनकी पत्रिका का भी बड़ा चमत्‍कारी नाम है। होगा। मैं कब इनकार करता हूं। मैं भी एक कहानी भेज बैठा। यात्री ने वही घोषणा कर दी कि क्‍या मजाल जो तुम्‍हारी कहानी छाप दे। चलो बाबा न छापे। पर मेरे पत्रों का कुछ उत्त्‍ार तो दे। चलों उत्त्‍ार भी न दे। लौटा तो दे। मेरे मित्र रतन श्रीवास्‍तव उनके लखनऊ कार्यालय जा पहुंचे। बड़ी सज्‍जनता से पेश आए। कहने लगे सहगल साहब की कहानी जरूर अच्‍छी रही होगी। मेरे मित्र (शायद क्‍लास फैलो भी) डॉ आमोद (संपादक 'तत्‍सम‘) ने भी लिखा था। खुद भी आए थे। कहानी देखेंगे। कोई उनसे पूछे कलयुग की लिखी कहानी, क्‍या सतयुग में देखेंगे।

हेमंत कुकरेती माने हुए कवि कहलाते हैं। पत्रिका निकालने से पूर्व खूब ही बढि़या लैटर पैड छपवाया। उसी उच्‍च कोटि के लेटर पैड पर मुझ नाचीज को लिख भेजा। पत्रिका निकालने जा रहा हूं। आपके बिना अंक अधूरा रहेगा (जैसे शब्‍द) मैंने कहानी भेज दी। हेमंत जी मौन। तंग आकर मैंने फोन का लाभ (चार पांच रूपए का नुकसान) उठाया।

- तबीयत अपनी (या घर वालों की) बिगड़ गई थी। पहला अंक तो निकल चुका है। आपकी कहानी बहुत अच्‍छी है। अगले अंक में देंगे। हाय वह अगला अंक। न नींद आई न तुम आए। तुम्‍हारी याद ही आई। जब तब हेमंत जी का नाम पढ़ने सुनने को मिलता है। मुझे अपनी वह 'कहानी‘ याद आ जाती है। मुझे लगता है केवल लैटर पैड ही छपा था। कोई पत्रिका नहीं छपी होगी।

ये तो कुछ बड़े नाम, चर्चित नाम हैं। टटपुंजिए नाम भी बहुतेरे हैं। पर छोडि़ए। पटना से कोइर् मरिया जी और उनके खासमखास (क्‍या करना नाम याद करके) 'जन विकल्‍प‘ निकाल रहे थे। कहानी विशेषांक के लिए कहानी मंगवा भेजी। मैंने भी जिद पकड़ ली कई कई किस्‍म की इबारतों से अलंकृत पत्रों का खजाना पेश करता रहा। एक दो फोन भी किए घर वालों ने कहा बाहर गए हुए हैं। जब आए तो बता देना सहगल साहब का फोन था। मगर चूं तक नहीं। मुझे लगता है ये सब ऐसे लोग दरअसल 'स्‍थितिप्रज्ञ‘ की श्रेणी में बने रहते हैं। मान अपमान गुणगान (यदि गाली भी दो)का इनके हाथी जैसी मोटी खाल पर कोई असर नहीं होता। अंबाला वाले स्‍वामी वाहिद काजमी ने भी ऐसों की खूब खबर ली है। अपने बड़े लेख में 'लेडीज फर्स्‍ट‘ लिखकर पहले मेहरू निस्‍सा परवेज की करतूतों का खुलासा किया है। वही बात कि ऐसे बड़े लेखक/संपादक/विद्वान बहुत महीन महीन मुस्‍करा कर अगले को उसके अज्ञान 'हीनता बोध‘ का एहसास कराते रहते हैं। अगर दोनों आमने-सामने हों तो। ऐसे में मेरा जैसा भला कह सकता है सिवाए इसके तुम को तेरा घर मुबारक․․․․․․․․․․।

इससे भी बढ़कर ये तथाकथित संपादक जो, पाप करते हैं वह, रचना को न छापना। न लौटाना। या अगर बहुतेरी मिन्‍नत समाजत के बाद लौटाएंगे भी, ताे रचना को बिगाड़ कर, थोड़ा इधर उधर से फाड़कर, ताकि अगला उसे दूसरी जगह भी न भेज सके। हो सकता उनके मन में भय भी हो कि इसके छपने से अगला, उन्‍हें पछाड़कर कहीं आगे न निकल जाए।

एक मजेदार किस्‍सा गाजियाबाद के उन्‍हीं युवा लेखकों की कारगुजारी का सुनाना चाहता हूं। उन पट्‌ठों ने कोई पत्रिका छापने की घोषणा कर डाली। छपास के भूखे लेखकों की क्‍या कभी कमी रही है ? आनन फानन में ढेरों रचनाएं खिदमते ऐडिटर आने लगीं। जरा गौर फरमाएं 'पट्‌ठो‘ शब्‍द का इस्‍तेमाल दोबारा कर रहा हूं, जबकि मुझे नई उम्र की इन नई नस्‍लों को निहायत ज़हीन कहना चाहिए था तो इन पट्‌ठों/जहीनों (जिस शब्‍द को पसंद न करें, कृपया काट दें) ने सारी की सारी रचनाओं पर स्‍याही डाल दी। कुछ पेजों पर गलतियों के निशाने देे मारे कुछ पेजों को थोड़ा थोड़ा फाड़कर रचनाएं लौटा दीें।

वजह पूछी गई तो मासूमों ने जवाब दिया कि यह सब हमारे साथ हो चुका है। उन्‍हें इस बात से मतलब न था कि किन्‍हों ने उनके साथ ऐसा सुसुलूक किया था और वे बदला किस से ले रहे हैं। तब मुझे दिल्‍ली कैंट के एक बड़ी उम्र के रेलवे ए․एस․एम․ की याद ताज़ा हो आई। बड़ी शेखी से सम्‍य स्‍टाफ को अपनी परिपक्‍व बुद्धि का परिचय दे रहे थे, ''मैंने तो पूरा बदला चुका लिया था।‘‘ खुलासा होने पर पता चला कि जनाब एएसएम बनने से पहले टीचर हुआ करते थे। और सारे बच्‍चों को बेदर्दी से पीटा करते थे। वजह वही कि हमने भी अपने टीचरों से खूब मार ख्‍ााई थी। इसे कहते हैं अपनी सरजमीं की विरासत को कायम रखना। इसी संदर्भ में विभाजन के इतिहास पर नज़र डालें। किन मुसलमानों ने किन हिन्‍दुओं को मारा; बदला लिया दूसरे मुसलमानों से। इसी प्रकार किन हिन्‍दुओं ने किन मुसलमानों को मारा लूटा और बदला लिया दूसरे हिन्‍दुओं से।

एक बात और․․․․․․․․ कई संपादक का रचना के साथ लेखक का पता टेलीफोन नं․ नहीं छापते। पता नहीं उनके मन में भय व्‍याप्‍त है कि कोई दूसरा संपादक भी उनसे रचनाएं न मंगवाने लगे। पाठक उनके गुणगाान गाकर उनकी बुद्धि को बर्स्‍ट/भ्रष्‍ट न कर दें। या वे समझते हैं कि वे ऐसे ऐसे बड़े नामी गिरामी लेखकों को छापते हैं जिनके पते पाठकों को मुंह जबानी रटे पड़े हैं।

पहले जब 'राजस्‍थान पत्रिका‘ हमारी खूब कहानियां छापा करती थी तो पते भी छापती थी। हमें 15, 20 प्रशंसा पत्र प्राप्‍त हो जाया करते थे। इससे (शायद कुढ़ कर) उन्‍होंने पते छापने बंद कर दिए। एक प्रकाशक अनुराग प्रकाशन के किशन चन्‍द जी ने किताब पर ही से मेरा तथा दूसरों के पते ही उड़ा दिये तो नमन के प्रकाशक नितिन गर्ग ने 'समर्पण‘ को साफ़ कर दिया। पांडुलिपि प्रकाशन ने मेरे उपन्‍यास 'टूटी हुई जमीन- में जी भर कर प्रूफ और दूसरी अशुद्धियों को बढ़ावा दिया, जबकि पांडुलिपि टाइप करा कर जांच कर भेजी थी। यहां तब तक अपना ज्ञान भी उंडेल दिया मुहम्‍मद अली जिना को हसन अली कर दिखाया। मॉफ करें थोड़ा बहक गया हूं। थोड़ा और बहकने दीजिए।

तीन चार बार मैंने कुछ लेखकों को, उनकी उत्‍कृष्‍ट रचनाएं पढ़कर उन्‍हें, C/o (मार्फत) संपादक प्रशंसा पत्र लिखे। क्‍या मजाल जो संपादकों ने उन तक उन्‍हें पहुंचाने की जहमत उठाई हो।

एक तरफ हम ढोल पीट पीट कर चाय के प्‍याले में तूफान लगाने की कोशिश करते हैं कि सरकार आम जनता को साहित्‍य, संस्‍कृति से दूर रखना चाहती है तो दूसरी तरफ हम स्‍वयं अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत महसूस क्‍यों नहीं करते कि हम स्‍वयं लेखक प्रकाशक संपादक क्‍या क्‍या गुल खिला रहे हैं। बहुत थोड़े प्रकाशक ऐसे रह गए हैं, जो पांडुलिपि को ढंग से पढ़कर, प्रूफ देख-दिखवाकर, किताबों के उचित प्रचार प्रसार में रूचि दिखाते हैं। मगर बहुत ज्‍़यादा तादाद में ऐसे हैं जो पांडुलिपि को गले में पड़ी, किसी बला की तरह उतार कर बोरों में भर कर बेचने को रवाना कर देते हैं। सिर्फ एक उदाहरण हाजि़र है। समरसेट मॉम की किताब मेरे सामने है। खूबसूरत से रंगीन आवरण पर मोटे मोटे शीर्षक से लिखा है शौतान (शैतान की जगह) में खुदा। अंदर ठीक लिखा है। यह तो है विश्‍व प्रसिद्ध लेखकों के साथ। दूसरों की कैसे ऐसे तैसी करते होंगे। कल्‍पना, करने को नहीं कह रहा, खुद आप ध्‍यान दे सकते हैं। अंदर अनुवाद की भाषा लचर। थोड़ा सजग पाठक अनुवाद पढ़कर ही समझा लेता है कि लेखक के साथ न्‍याय नहीं हुआ। प्रकाशक किसी भी ऐरे गैरे भाषा के लाल बुझकड़ को पकड़कर प्रति पृष्‍ठ मामूली राशि देकर अनुवाद करवा डालता है। या लेखक से पैसा लेकर जितनी हो सके, उतनी घटिया छपाई कर करवा कर पुस्‍तक निकाल देता है। बाल साहित्‍य का हाल तो पूछिए ही मत। बस, नहीं तो और लंबी हांकता चला जाऊंगा।

हो सकता है यह अध्‍याय जीवनी जैसी विधा में अनावश्‍यक लगे परन्‍तु ये तमाम चीजें मेरी जिंदगी के साहित्‍य के सरोकारों गहरा रिश्‍ता रखती हैं।

अपने थोड़े महत्‍वपूण्‍ार् विभाजन पर लिखे उपन्‍यास 'टूटी हुई जमीन‘ का संक्षेप में उल्‍लेख करते हुए, ऐसी बेहूदी पर ध्‍यान खेंचने वाली बातों को खत्‍म करता हूं।

'टूटी हुई जमीन‘ (प्रकाशक पांडुलिपि प्रकाशन दिल्‍ली) में सैकड़ों अशुद्धियां हैं। पहली ही लाइनों में मां की ममत्‍वपूर्ण दृष्‍टि को 'महत्‍वपूर्ण‘ दृष्‍टि लिखा गया है। ऐसे ही मुहम्‍मद अली जिना को शायद अहमद बना दिया है। ऐसे में जानकार पाठक लेखक की बुद्धि को कोसेंगे।

प्रकाशक ने इसके कई संस्‍करण निकाल लिये। मेरे लाख सिर पटकने पर भी सुधार नहीं किया। पहले संस्‍करण की थोड़ी रकम बड़ी मुश्‍किल से यात्री जी के द्वारा भिजवाई। उसके बाद एक और कहानी संग्रह 'मिस इंडिया ः मदर इंडिया‘ उन्‍होंने चन्‍द्र जी की देखरेख में कुछ अच्‍छा निकाला। दोनों के पैसों के लिए बार बार, नेताओं की तरह आश्‍वासन दिए चले आ रहे हैं ''चिन्‍ता न करें।‘‘ और पुस्‍तकें भेजें। यार लोग कहते हैं। इसी में शुक्र करो-तुम्‍हारी किताबें छप जाती हैं। पैसे तो नहीं देने पड़ते।

अब बस। मैं खुद यह सब लिखते हुए बोर होने लगा हूं। मेरे से बहुत सीनियर बुजुर्ग लेखकों का भी कमोबेश यही हाल है। कुछ बता देते हैं। कुछ मारे शर्म के चुप्‍पी मार जाते हैं।

फिर ऐसी विपरीत स्‍थितियों में क्‍यों लिखता हूं। बस लिखा जाता है। जब लिखा जाता है तो पत्रिकाओं में छपने को भेज देता हूं। छपने पर उन्‍हें पुस्‍तकाकार रूप में देखने का मोह जागृत हो जाता है। (शोध विद्यार्थियों का भी कुछ भला हो जाता है) सेाच आती है जब प्रकाशक हमारी किताबों से खा-बना रहे हैं तो हम भी उनसे कुछ चाहने की गुस्‍ताखी कर बैठते हैं। बहुत थोड़े हमारे प्रकाशक इस दिशा में ईमानदारी बरतते हैं। हाल ही में प्रभात प्रकाशन दिल्‍ली ने मुझे अग्रिम रायल्‍टी दी है। पर बकाया सारे माल (?) की खपत कैसे होगी। जो कुछ हो लिया सो ठीक।

अरे कहां से कहां भटक गए थे, मेरे दोस्‍त श्री हरदर्शन सहगल साहब। तेरी लंबी हांकने की बुरी आदत नहीं जाएगी। तू बात कर रहा था अजमेर जाने की। याद दिला दूं। तुम्‍हारी मिसेस का अजमेर में, उर्स के दिनों में सैमिनार होना था। चल बता फिर क्‍या हुआ।

सॉरी सॉरी वही बता रहा था। तो सुनिए। बात तो अजमेर जाने की कर रहे थे। समस्‍या विकट हो चली थी। ऐसे में हमारे वायरलैस के साइफर ओपरेटर श्री मदन मोहन शर्मा को जरा सी भनक पड़ गई। मेरे पास आए। बोले-आपको शायद पता नहीं, अजमेर में मेरे खुद का मकान है। नीचे वाला पोर्शन अपने लिए खाली रख छोड़ा है। ऊपर किराएदार हैं। मैं अभी किराएदार के नाम पोस्‍टकार्ड डाले देता हूं। आप जितने रोज़ भी रहें, आपका अपना घर है। मुझे मनमांगी मुराद मिल गई। उन्‍होंने एक कागज पर सविस्‍तार पता-रास्‍ता दर्शाते हुए लिखकर मुझे थमा दिया।

बीकानेर से अजमेर के लिए गाड़ी न तब (1972 में­) सीधी चलती थी और न आज 2011 में ही। बस, एक सिर्फ चंद दिनों महीनों के लिए चली थी। थोड़ा रोचक प्रसंग है। आगे बताऊंगा। रास्‍ते में․․․․․․․ स्‍टेशन पर रात के समय गाड़ी बदलनी पड़ती है। खैर सवेरे नौ दस बजे के करीब हम सब अजमेर पहुंच गए। तमाम रास्‍ते रिक्‍शे तांगे ठसा ठस उर्स के कारण भरे हुए थे। मैंने तांगे वाले को, कागज निकालकर कहा, वहां पर पहुंचा दो। तांगे वाले ने हमें किसी मोड़ पर उतार दिया कि आगे संकरी गलियां हैं। भीड़ है। मकान तक नहीं पहुंचा सकता। मैंने परिवार वालों को एक स्‍थान पर खड़ा कर दिया कि इतने भारी बक्‍शों, बिस्‍तरों समेत सबका जाना उचित नहीं। पहले मैं अकेला जाकर मकान ढूंढ़ आऊं। मैं रास्‍ते भूलने में शुरू ही से काफी माहिर हूं। कहां का कहां जा पहुंचता हूं (बहुत किस्‍से हैं) अपने डुप्‍लैक्‍स के एक जैसे ब्‍लाकों में आगे पीछे हो जाता हूं। इससे ज्‍यादा मैं अपनी तारीफ नहीं कर सकता। आप कहीं मुझे 'फिलासफर साहब‘ का दर्जा अता न करने लगें। बेशक चढ़ती जवानी में अरस्‍तु सुक्रांत जैसों से आगे निकल जाने की सोचता रहा हूंगा।

मैं बार बार उस स्‍थान को घर घर को परख रहा था कि कहीं आती बार बिछड़े हुए परिवार को आसानी से ढूंढ़ लूं। सारे रास्‍तों में भी मोड़ों के दुकानदारों के बोर्ड पढ़ता, आखिरकार मंजिले मकसूद तक जा पहुंचा। किराएदार ने बतया कि मदन मोहन जी के खत अपने से ठीक दो रोज पहले हमने तीर्थ यात्रियों को निचला पोर्शन किराए पर उठा दिया है। अब उन्‍हें निकाला तो नहीं जा सकता। इन दिनों सभी मकान वाले खुद तंग जगह में रह कर खूब पैसा कमा लेते हैं। सो हमने भी मालिक मकान का भला चाहा। कोई बात नहीं। आप एक बार परिवार को ले आएं। फिर कुछ और इंतजाम करने की कोशिश करेंगे।

मैं उसी प्रकार पूरी सतर्कता बरतते हुए, परिवार को, वापस ढूंढ़ निकालने में कामयाब हो गया। कमला को सारी स्‍थिति बताकर पूरे परिवार और चम्‍पा बाई को वापस उसी मकान में ले गया। परिवार वालों ने छत पर ही एक बहुत ही छोटा सा कमरा दिखया। आगे एक टैरिस पड़ती थी। वहां खड़े हो जाओ तो दुनिया भर की रौनक के नजारे देखते रहो। कहा-अगर इतने भर में आप लोग गुज़ारा कर सकें तो देख लें। वैसे काफी दूरी पर एक आलीशान बंगला भी आपको मिल सकता है। एक बार उसे भी देख आएं। नहीं तो यह जगह तो कहीं गई नहीं। उस परिवार में एक जोशीला युवक था-शायद बेरोजगार खाली-बोला चलिए। उसने अपनी साइकिल निकाल ली। मैंने एक साइकिल किराए की ले ली। कमला को पीछे बिठाया। बंगला वास्‍तव में रहने लायक था। देखकर मजा आ गया। मगर था सुनसान में। राशन पानी स्‍टोव के लिए मट्‌टी का तेल कैसे बार बार बाजार जाकर लेकर आ सकेंगे। बंगले से आगे कॉलेज पड़ता था जहां सैमीनार होना था। वह तो और भी सुनसान जगह। आयोजकों को कमला ने रिजम्‍पशन रिपोर्ट दी। और समस्‍या बताई।

- मैडम कोई बात नहीं। आपके परिवार के रहने के लिए एक दो कमरे खाली करवा देंगे। पर खाना तो आप अकेली को ही मिलेगा। पांच मील की दूरी से कैसे बार बार सामान लाद लाद कर लाएंगे। छोटे बच्‍चे भी साथ हैं तो किसी वक्‍त भी रात सवेर किसी चीज की ज़रूरत पड़ सकती है।

हम वापस आ गए। कमला काे पंद्रह दिन तक की किराए पर, साइकिल दिलवा दी। और उसी परछती में ही घर बसा लिया। परछती न कहो इसको। यह तो फ्‍लाइंग चेम्‍बर था। एक कोने में चम्‍पा बाई खाना बनाती। सीढि़यों से नीचे उतर कर नहाते धोते। विवेक, कविता, अजय, शिल्‍पी को खिलाते। टैरिस से सभी तरह के नज़ारे देखते। मैं वहीं बैठा हुआ किताबें पढ़ता। कभी कुछ लिख लेता। घर से बाहर कदम रखते ही, रौनक का रंग हृदय में समा जाता। खिलौने वाले, बाजे वाले, बांसुरी की धुन बजाते, बासुरी वाले। चाट गोल गप्‍पे खिलाने वाले। औरतों के श्रृंगार के सामान लिये घूमते फिरते बच्‍चे नौजवान वृद्ध। ले लो; ले लो। खिदमत में हाजि़र। जैसे मुफ्‍त में बांट रहे हों। हरे कांच की चूडि़यां कमला के लिये ले आया। कमला ने नापसंद कीं यह तो गांव वालियों सी हैं। मेरा दिल टूटा। मैंने चूडि़यां तोड़ डालीं। मेरी और कमला की पसंद कभी भ्‍ाी जिंदगी भर मेल नहीं खाई। जब यह खरीदारी करने दुकान में जाती है। मैं अक्‍सर दुकान से बाहर खड़ा रहता हूं। कहीं चीज़ को लेकर दामों को लेकर टोकाटाकी ने हो जाए। पैसा लुटाती है तो लुटाती रहे। महारानी जी किसी तरह खुश रहे। ''जो तू चाहे, जैसा चाहे वही रूप धरूंगी‘‘ वाली मीरा इससे कोसों दूर है। चीजों के चुनाव और परखने के मामले में मैं 'अनाड़ी सैयां‘ हूं। चलो तेरी रज़ा मेरी खुदा। मान जा। नाराजगी का कहर न ढा।

दिल लगाने के लिए और भी है कुछ मुहब्‍बत के सिवा। पर बिना मुहब्‍बत तो आम आदमी का काम नहीं चलता।

कमला साइकिल दौड़ाती हुई, सुबह सवेरे क्‍लासें अटैंड करने निकल जाती। कमला के बिना मैं क्‍या करूं। इस नन्‍हीं सी कोठरी में। हां कुछ देर नन्‍हीं सी गुडि़या (शिल्‍पी) को गोदी में गुदगुदाता। हंसाता। खेलता। उसकी हरकतों पर मुग्‍ध होता। बाकी बड़े बच्‍चे भी कौनसे बड़े बच्‍चे थे। सारे छोटे छोटे मेरे मन के दुलारे। उनकी अंगुलियां थामें बाजार से जो मांगे दिलवा लाता। खिला लाता। कुछ खाने को, चम्‍पा बाई के लिए भी ले आता। मगर आखिर कितनी देर तक इन गलियों को नवाजता।

मैं गलियों, बाजारों फिर कुछ चौड़ी सड़कों पर दौड़ लगाता हुआ रेलवे स्‍टेशन जा पहुंचता।

वायरलैस अॉफिस का पता लगाया। वायरलैस स्‍टाफ से जा मिला- मैं भी बीकानेर का एक वायरलैसी हूं। उन्‍होंने बड़ी गर्मजोशी से खुशआमदेद कहा। बैठाया चाय पिलाई। परिचय बढ़ाया। उस वक्‍त बीकानेर और अजमेर अलग अलग रेलवेज, डिविजनों में पड़ते थे। (आज दोनों एक में समा गए हैं) एक दूसरे के स्‍टाफ वर्किंग आवर्ज शिफ्‍ट वगैरह की जानकारी का आदान प्रदान हुआ। मैंने उन्‍हें बताया। मैं कहानी लेखक भी हूं। ईश्‍वर चन्‍दर मनोहर वर्मा भी तो रेलवे में हैं। उनसे मिलना है। उनमें से एक मेरे साथ चल पड़ा। लाइनों में से गुजरते हुए बड़ी बिल्‍डिंग में जा पहुंचे। यह रेलवे का बहुत बड़ा अकाउंट्‌स अॉफिस था। ऊपर की मंजिल में दोनों महारथी अकाउंटेंटस, जो मूलतः लेखक थे, साइड बाई साइड बैठे हुए, काम करते हुए नहीं, कहानियां लिखते हुए मिले। वाह खूब दफ्‍तर में कहानी लेखन शॉप खोल रखी है। काश मुझे भी ऐसा कोई खुशनुमा दफ्‍तर नसीब हुआ होता।

ईश्‍वर चन्‍दर से खतो किताब तो हो ही चुकी थी। उसने झट से पहचान की मोहर लगा दी। और मकान न दिलवा पाने के कारणों का खुलासा करने लगा। मैंने कहा अब इस टापिक काे छोड़ो। बताओं क्‍या लिख रहे हो। उसने दराज खोली। कुछ खाली कागजों के ऊपर कहानियों के शीर्षक लिखे पड़े थे।

- हें ऐसे लिखते हैं आप। पहले शीर्षक बाद में कहानी। जबकि हम जैसे कहानी पूरी कर चुकने के बाद कई दिनों तक उचित/श्रेष्‍ठ शीर्षक की तलाश में भटकते फिरते हैं।

-नहीं, पहले शीर्षक लिख लेने से कहानी लिखने में बहुत आसानी हो जाती है।

खैर यह तो अपने अपने तौर तरीके हैं जिसे जो ठीक लगे वैसा ही करे। पर पहले कहानी का शीर्षक, थीम, रूपरेखा बना लेने से कहानी लिख पाना बेशक आसान तो हो सकता है पर कहानी में जो, अपने को टटोलने, नई राहों की खोज-प्रक्रिया और गहराई अपेक्षित है, वह मेरे जैसे के हिसाब से 'कहानी में नदारद‘ हो जाती है।

इतने में मनोहर वर्मा भी हमारे बीच आ बैठा। उसे इस प्रकार के डिस्‍कशन में खास रूचि नहीं थी। वह मूलतः बाल लेखन करता था। इसी में उसकी खासी पैठ थी। डींग मारने लगा-जैसे लेखकों को संपादकों की ज़रूरत होती है। उसी प्रकार संपादकों को भी हम लेखकों की ज़रूरत होती है। हम तो उन्‍हें धमका भी देते हैं कि हम भी आपकी इमेज खराब कर सकते हैं।

मैं इन दो महान लेखकाें से मिलकर कृतकृत स्‍नान में नहा कर तरोताज़ा हो उठा। बाद में भी इनके यहां, और रेलवे वायरलैस आफिस जाता रहा। बस उस वक्‍त यही दो लेखक मेरी नज़र में थे। ईश्‍वर चंदर, कमलेश्‍वर जी की नजर में चढ़े हुए थे। उन्‍होंने वास्‍तव में कुछ बहुत अच्‍छी कहानियां लिखी थीं- 'न मरने का दुःख‘ और 'एक पेशेवर गवाह‘ कहानियां मुझे अब तक झझकोरती हैं। ईश्‍वर चन्‍दर सिंधी में भी लिखा करते थे। मैंने पूछा था कि क्‍या सिंधी पत्रिकाओं में संपादक भी कुछ पे करते हैं तो जनाब ने जवाब दिया। बिलकुल नहीं। मगर हां सिंधी के पाठक बड़े कद्रदां होते हैं। वे कभी कभी हमारी कहानी पर खुश होकर कुछ रूपए मनीआर्डर से भेज देते हैं। सुनकर मुझे बहुत अच्‍छा लगा, जहां हिन्‍दी पाठक प्रशंसा करने में भी कंजूसी बरतते हैं वहां सिंधी के पाठक किस तरह से अपने लेखकों को प्रोत्‍साहित करते हैं, ऐसी मिसाल फिर कभ्‍ाी किसी भी अन्‍य भाषा के पाठकों के बारे में सुनने को नहीं मिली। इतना ज़रूर सुना कि महाराष्‍ट्र, केरला, बंगाल के पाठक अपने बड़े लेखकों की वंदना करते हैं। यह भी कौन सा कम है। पर हिन्‍दी के पाठक । सुभानअल्‍लाह । अपने महल्‍ले में भी कोई नहीं जानता। बात ठीक भी है। वे दरअसल पाठक होते ही नहीं मात्र, असली मायनों में फकत पड़ोसी होती हैं। उनमें से चंद एक पड़ोसी-धर्म भी निभाते हैं और कुछ बिना वजह किसी के लेखक होने से कुछ कुछ कुढ़ते भी रहते हैं।

मेरा, अजमेर वाली परछती (फ्‍लाइंन चैंबर) में क्‍या काम। नहा धोकर नाश्‍ता करके वहां से छूट निकलता। दिन भर हर मकाम पर धमा चौकड़ी मचाए फिरता। शिल्‍पी की पैदाइश के फौरन बाद लालगढ़ (बीकानेर) बड़े हास्‍टिपल से वैस्‍काटमी का आपरेशन करवा लिया था। सफलता की जांच नहीं हो पाई थी। सो अजमेर के रेलवे हास्‍पिटल में एक दिन उसी निकम्‍मेपन के आलम में घूमते घुमाते पूछते पुछाते जा पहुंचा। कार्ड दिखाया। नर्स एक ओर ले गई। शाम को आकर रिपोर्ट ले जाने को कहा। शाम केा फिर जा पहुंचा तो उसी नर्स ने 'फिट‘ का सर्टीफिकेट जबानी दे दिया। मन में थोड़ा संशय बना रहा। बीकानेर लौटने के बाद फिर लालगढ़ हास्‍पिटल चला गया। डाक्‍टर नहीं था। नर्स मुझे ऊपर अॉपरेशन थ्‍येटर ले गई। उसने जांच के बाद आश्‍वस्‍त किया। जाकर अपनी मिसेस से कहना, अब तुम्‍हें मुझसे तो केाई खतरा नहीं। इस वाक्‍य के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। जरा दिमाग दौड़ा कर देखे तो।

मैं अजमेरी लेख्‍ाकों से तो मिल ही चुका था। अब बारी थी संपादकों से मिलने की। वन प्‍लस वन। टू इन वन। प्रकाश जैन और उनकी पत्‍नी दो संपादक मिलकर 'एक‘ बहुत चर्चित पत्रिका 'लहर‘ निकाला करते थे। अब तो कई वर्षों से बंद है जमाना गुजरा। कोई खोज खबर नहीं, प्रकाश जी तो स्‍मृति शेष हो चुके हैं। पर उनका, उनकी पत्रिका 'लहर‘ का नाम आज भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है। पिछले महीनों ही किसी लेख में पढ़ने को मिला कि उसमें एकदम उत्‍कृष्‍ट रचनाएं छपा करती थीं- आगे लिखा है कि कोई देखकर बताए कि अगर उन अंकों में कोई भी निम्‍न श्रेणी की रचना छपी हो। मेरी कहानी 'छलावा‘ उस में शुरूआती दौर में छपी थी। इस से मैं थोड़ा तन गया- क्‍या वास्‍तव में मैं भी शुरू ही से अच्‍छा लिखा करता था। मधुरेश जी ने कैरियर, 'लहर‘ ही से प्रारंभ किया था। मधुरेश जी ने यहां तक लिखा है, जिन्‍हें, प्रकाश जैन खूब चाहते थे, उनके विरूद्ध लिखा तो भी प्रकाश जी ने बड़ी उदारता से उसे छाप दिया। इक वह भी संपादक थे, इक यह भी संपादक है। जिनका ख्‍़ाुलासा कर आया हूं कि इन्‍होंने एक लिस्‍ट तैयार कर रखी है कि इन इनको लिफ्‍ट देनी है। छापना है (भले ही कूड़ा लिखें) और इन इनको कतई नहीं छापना। यह बात मैं ही नहीं कह रहा। कई जगह पढ़ने को मिलती है।

हां तो, एक छत पर लहर का कार्यालय था। मैं सीढि़यां चढ़ता हुआ वहां जा पहुंचा। अकेले प्रकाश जैन बड़ी मुस्‍तैदी से कागजों ही कागजों के झुंड में व्‍यस्‍त दिख रहे थे। मैंने किंचित ऊंचे स्‍वर में, हाथ जोड़ते हुए नमस्‍ते कहा। और अपना परिचय दिया। उन्‍होंने प्रसन्‍नता प्रकट की। बैठाया। दीवार के सहारे घड़ा रखा था। उठकर मेरे लिए पानी का गलास भर लाए। फिर टैरिस से ही नीचे झांक कर चाय वाले को आवाज़ देते रहे। भीड़ के शोरगुल के कारण या तो वह सुन न सका या ग्राहकों के झमघट के कारण अनसुना कर दिया। प्रकाश जी खुद ही नीचे जाकर दो गलास चाय थामे वापस, अपनी सीट पर आ बैठे। एक गलास मेरी ओर बढ़ा दिया।

-आपने कष्‍ट किया। चपड़ासी नहीं है।

-मैं ही चपड़ासी। मैं ही झाड़ू लगाने वाला। मैं ही क्‍लर्क। मैं ही संपादक। मैं ही डाकिया। सवेरे घर से आते समय पोस्‍ट आफिस से अपनी डाक लेते हुए आता हूं। शाम को सारी डाक पोस्‍ट आफिस में डाल आता हूं। मनमोहिनी अस्‍वस्‍थ चली रही हैं। और किसी का सहारा नहीं।

सुनकर मैं दंग। इतनी बड़ी हिन्‍दुस्‍तान जैसे विशाल देश की बड़ी चर्चित पत्रिका 'लहर‘। और उसके संपादक। यही हाल 'शेष‘ के संपादक․․․․․․ 'लोकगंगा‘ या 'आधारशिला‘ के संपादक भी बयान करते हैं। दूसरी और व्‍यावसायिक घरानों की खूब खूब बिकने वाली पत्रिकाओं का अंबार है। जरूरत से कम कर्मचारी रखते हैं। अधिक से अधिक उन्‍हीें पर भार डालकर उनका शोषण करते हैं। शायद सरकारी पत्रिकाओं का हाल बेहतर हो। मैं तो आज तक गिनी चुनी पत्रिकाओं यथा 'हंस‘ 'संचेतना‘ 'फिल्‍मी दुनिया‘, 'फिल्‍मी कलियां‘, 'मधुमती‘ के कार्यालयों को देख पाया हूं। आज तक भी केन्‍द्रीय साहित्‍य अकादमी, दिल्‍ली, भाेपाल भारत भवन, केन्‍द्रीय हिन्‍दी निदेशालय, ज्ञानपीठ, एनसीईआरटी जैसे ऊंचे संस्‍थानों आदि किसी को भी देख पाने का सबब हासिल नहीं कर पाया। डाक, खतोकिताबत (भले ही वन वे ट्रैफिक) जिंदाबाद। इसका कुछ खामियाजा भुगत रहा हूं। यह वाक्‍य मेरे कुछ हितैषी बताते हैं कि संपर्क एक महत्‍वपूर्ण शार्टकट फार्मूला है। पर दम भी तो चाहिए जो किसी 'लेखक‘ में हो। डॉ महीप सिंह, क्षेमचंद सुमन, से․रा․ यात्री, नरेन्‍द्र मोहन, मधुरेश, सुकेश साहनी या एक दो और हो सकते हैं, के निवास को छोड़कर किसी के पास नहीं गया। हां कुछ को सैमिनारों गोष्‍ठियों में जरूर देखा है। ज्‍़यादातर से बात नहीं कर पाया। एक दो तथाकथित बड़े लेखकों की अकड़ से आहत भी हुआ हूं। वे लेखकों, विद्वानों के खुदा हैं।

मेरे लिए बस बीकानेर के आत्‍मीय मित्र/लेखक जिंदाबाद। सबसे बढ़कर स्‍व․सांवर दैया प्रो․ रामदेवाचायर् और उनसे बढ़कर मार्गदर्शक, स्‍व․ यादवेन्‍द्र शर्मा 'चंद्र‘। आजकल, कला अनुरागी कद्रदान हैं एडवोकेट उपध्‍यान चंद्र कोचर उनकी पत्‍नी, मेरी स्‍नेहमयी भाभी कमला कोचर है। साथ ही उनकी बहू श्रीमती प्रीति कोचर हैं।

बाकी भी कई अंतरंग इज्‍़ज़त करने वाले मित्र हैं पर उनके यहां कमोबेश 'परदा‘ है। या उनके निवास बहुत दूर भी पड़ते हैं। या फिर उनमें से कुछ सृजनशील थे। चूंकि उन्‍होंने लगभग लिखना पढ़ना छोड़ रखा है लिहाजा मुझे भी उन्‍होंने छोड़ सा रखा है। पूछेंगे क्‍या लिखा है। पढ़ा है। तो क्‍या क्‍या जवाब देंगे। असली वजह यह भी होती है कि जब लिखने से विरक्‍ति ले रखी है, तो लिखने वाले से क्‍या करना मिलकर। पहले वाला, जिज्ञासाओं से भरा भरा हराभरा माहौल गायब हो चुका है। जैसे तैसे दे दिलाकर कोई सी किताब निकल जाए। विमोचन समारोह में वाहवाही लूट लें। इसी से संतुष्‍टि प्राप्‍त कर, लेखक कहलाने की पदवी पा जाएं। मेरे सामने जिन कुछ नए लोगों ने थोड़ा बहुत बेहतर भी लिखा, तो यह कार्य, यह लंबा सफर/रास्‍ता उन्‍हें दुष्‍कर महसूस हुआ। शार्टकट मैथे। पत्रकार बन जाओ लोकल अखबारों में कुछ भी लिखकर छपवाते रहो। या कुछ गलतशलत सी समीक्षाएं लिख जाओ। संपादक, सह सम्‍पादक बनने की कोशिश में जुट जाओ। गोष्‍ठियों का आयोजन करो। संचालन करो। भाषण दे देकर अपने से वरिष्‍ठों का मार्गदर्शन करो। या उन्‍हें या उससे बढ़कर शहर की गैर साहित्‍यिक बड़ी हस्‍तियों को अध्‍यक्ष मुख्‍य अतिथि वशिष्‍ट अतिथि बनाकर पूरे श्‍ाहर में संपर्क बढ़ाओ। उनके लिए इससे ऊपर साहित्‍यकर्म और कुछ नहीं। संस्‍थाओं को अपने कब्‍जे में कर लेने की मारामारी भी इन सुकृतियों में शामिल है। इम्‍पार्टेंस। हां किसी भी ढंग से छोट से छोटे पुरस्‍कारों की झपट छीनी भी तो एक गुण है। इस गुण के रहते वे पहली सीढ़ी से ऊंची मंजिल तक जा पहुंचते हैं। सारी की सारी एक के बाद दूसरी लपाकत बस उन्‍हीें में या उन्‍हीं तक में समाती चली जाती है। सत्त्‍ाा की तज़र् पर, 'पुरस्‍कार‘ के लिए भी। मशहूर हो चला है कि पुरस्‍कार मिलता नहीं, लिया जाता है।

इस गुर को न जानने वाले अंदर ही अंदर कुढ़ते हुए अपने को उदार जैन्‍यूइन राइटर का तगमा स्‍वयं को पहना देते हैं। तेरी राह तुझी को मुबारक। हमें अपना घर ही प्‍यारा। सभी पुरस्‍कारों के, (एक एक पुरस्‍कार की पूरी जानकारी रखते हुए) प्राप्‍त करते रहा। लेखन की दुनिया में संस्‍थाओं के पदाधिकारी बनते चले जाओ फिर तुम्‍हें लिखने की जरूरत ही क्‍या है। उनमें से जो कुछ ज्‍यादा होशियार (इसे व्‍यापक अर्थों में लिया जाए) होते हैं, वे बड़े अफसरों की भांति साहित्‍य लिखने वाले, साहित्‍य के प्रकाशकों, पुरस्‍कार की लगन में सब कुछ निछावर करने वालों के भाग्‍य निर्माता हो जाते हैं। वे खुद लेखक होते हुए भी लेखक नहीं रह जाते। इस विषय पर भी मेरी एक कहानी 'हत्‍या‘ है। बेशक वे कुछ न लिखकर भाषणों द्वारा साहित्‍य के प्रवक्‍ता बन बैठते हैं। स्‍थापनाएं कायम करते हैं और तो और फतवे भी जारी करते हुए किसी किसी को उससे ऊंचा या एकदम दूसरों से नीचा साबित करने की कुचेष्‍टा करते रहते हैं। यह भी कहते हैं कि किसी कुपात्र का किसी भी संदर्भ में हमारे नाम लेने से उसको महत्‍व मिल जाएगा। भले ही हम उसकी भर्तसना ही क्‍यों न करें। वे अपनी जबान की कीमत स्‍वयं तोलते रहते हैं-उस जबान की लंबाई भी हर वक्‍त नापते रहते हैं, कि मेरे मुंह में ऐसी जबान है जो किसी का भाग्‍य बना सकती है। जिसका चाहूं भाग्‍य चकनाचूर कर के रख दूं। मैं भाग्‍य निर्माता हूं। चाहे तो पूरी दुनिया में इसी जबान से पूरे साहित्‍य/विचार जगत में तहलका मचा कर रख दूं। ऐसी जबान से ही नामी वकील बेगुनाहों को फांसी के तख्‍ते पर चढ़ा देते हैं और गुनाहगार को उद्‌दंड सांड की तरह समाज में फिर से बलात्‍कार हत्‍या करने को, जज साहब से, छुड़वा लाते हैं। जा मौज कर। तो, क्‍या मिलिए ऐसे लोगों से․․․․․․․।

यहां वहां सब जगह साहित्‍य की राजनीति छायी रहती है। लिहाज़ा अपन अपनी छोटी सी किताबों से घिरी कोठरी (स्‍टडी रूम) में ही खुश। आप गोष्‍ठियां करते रहें। वक्‍तव्‍य देते रहें श्रोता (?) तालियां बजाते दस बारह की भीड़ लगाते रहें। इधर हम चुपचाप, कुछ खरा, कुछ खोटा लिखते रहें। यही राह मेरे जैसों के लिए सुखद है। कोई इसे अगर मजबूरी कहे तो भी मुझे कबूल।

मैं दो या तीन बार प्रकाश जैन जी से मिला (मनमोहिनी जी से नहीं मिल पाया) एक बार तो उर्स के कारण इतनी भीड़ थी कि आगे (घर) के रास्‍ते के लिए निकल पाना नामुमकिन हो गया। भीड़ मुझे धकेलती हुई 'लहर‘ कार्यालय तक पहुंचा गई। मैं ऊपर सीढि़यां चढ़ गया। प्रकाश जी को बताया कि भीड़ ने मुझसे कहा कि क्‍यों वक्‍त बरबाद कर रहा है। जाकर प्रकाश जी से मिल। सुनकर वे खूब हंसे। प्रकाश जी बड़ी मुस्‍तैदी से रचनाएं देखते जाते। बातें भी करते जाते। उसी दम, साथ लगे लिफाफों में कुछ रचनाएं, वापसी के लिए डालते जाते। मैंने पूछा कि विज्ञापन वाले चैक भी लौटाते हैं। बोले हां। सभी प्रकार के विज्ञापन छापकर पत्रिका की छवि धूमिल नहीं करनी होती। डाक की व्‍यवस्‍थित ढेरियां, उनकी टेबल के साईड रेक पर रखी होतीं।

जैसे कि बताया खूब मटरगश्‍ती में समय बिताता और सोचता जब घर पहुंचूं तो कमला पहुंची हुई मिले। कमला के लिए दीवानगी की हालत कभी खत्‍म नहीं हुई। बीकानेर में भी, जब तक कमला सर्विस में रही और मैं कहीं बाज़ार या दोस्‍तों के बीच होता, तो मेरी कोशिश यही होती कि जब मैं घर पहुंचूं तो कमला आई हुई मिले। वरना बिना कमला के घर, मेरे लिए वीरानगी का प्रतीक होता। साइकिल चलाते हुए भी मुंह में 'कमला कमला‘ नाम की माला जपता हुआ चलता। लेकिन मेरे जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्‍य, कि कमला ने मेरे इस एहसास को कभी न समझा। वह इसे मात्र 'नाटक‘ कहकर भर्तसना ही करती रही। लेकिन फर्ज़ अदायगी में वह एक कदम भी पीछे न रही। हमेशा मेरे सुख दुःख सुविधा का ध्‍यान रखा। पर शारीरिक स्‍तर पर समय समय पर उसकी भी अपनी कुछ मजबूरियां रहीं। वह मेरा साथ नहीं दे पाई तो मैंने भी उसके साथ कभी जबर्दस्‍ती करने की कोशिश नहीं की। जबदर्स्‍त सर्दियों की रातें में जाकर ठंडे पानी से नहाया।

हां एक दो बातें और ः-

जब जब मैं बीमार पड़ता, कमला मेरी पूरी तीमारदारी करती। अपनी होम्‍योपैथी की दवाइयों से भी कई बार मुझे ठीक किया। मेरे मित्रों को भी ठीक किया। एक बार सूयप्रकाश बिस्‍सा जी के दूरदराज के घर, मुझे लेकर चली गई। डॉक्‍टर ने उन्‍हें जयपुर रैफर किया था। कमला ने उन्‍हें दस दस पंद्रह पंद्रह मिनट के वक्‍फे से अपनी दवाइयां खिला खिला कर एक दम ठीक कर दिया। बिस्‍सा जी जिस तिस के सामने गुणगान करते फिरते- हमें तो हमारी भाभी जी ने ठीक कर दिया। इसी प्रकार मेरे जयपुर तक के मित्र जब मेरे घर आते तो मुझे लगता कि मुझ से मिलने को आए हैं। नहीं, वे कमला से इलाज करवाने आते थे। खास तौर से श्रीनंद भारद्वाज और उनकी पत्‍नी।

मेरे बीमार पड़ने पर, कमला मेरे आस पास बनी रहती। कभी कभी प्‍यार से दो मीठे बोल भी बाेल देती तो मैं कहता-अच्‍छा हो जो मैं हमेशा बीमार ही पड़ा रहूं। मैं उससे कैसे शब्‍दों कैसे प्‍यार की अभिलाषा करता, वह इससे अनजान। कभी कभी प्‍यार की बातों पर झिड़क तक देतीं, तो मैं यही सोचता 'वन साइडिड लव‘। लेकिन यह भी पूर्ण सत्‍य कैसे हुआ। एक बार शाम को इंचार्ज ओमप्रकाश जी ने कहा-आपकी शिफ्‍़ट खत्‍म हो गई। मेरे साथ मालगोदाम तक चलोगो ? वहां अपने दफ्‍तर का सामान आया हुआ है। मैं उनके साथ हो लिया। रास्‍ते में मेरा क्‍वार्टर पड़ता था। कमला चौखट में खड़ी मेरा इंतज़ार कर रही थी। मैंने ओमप्रकाश जी काे बताया-उधर देखो। हर रोज़ कोई सी शिफ्‍ट के खत्‍म होते ही कमला इंतज़ार करती हुई मिलती। उधर उन जैसे जनाबों का यह हाल कि घर वालों को पता ही नहीं होता कि उनकी कौन सी शिफ्‍ट चल रही है। किसी वक्‍त भी घर से निकल जाते। बेशक किसी वक्‍त जाएं। किसी वक्‍त आएं।

चार साल पहले मेरा हरनियां का आपरेशन होना था। मैंने ग़ौर किया कि जैसे कमला का पूरा चेहरा मुर्झा गया है। एकदम ढीली कमज़ोर।

कमला निर्णय लेने में एकदम दृढ़। कह दिया सो कह दिया। वही होगा। आपकी राय की जरूरत नहीं। दूसरा, सबको अपना बना लेने की, कला उसमें है। उस उपेक्षित वर्ग से भी खूब हिलमिल जाती है; जिन्‍हें लोग बाग नजदीक नहीं आने देते। उनकी आर्थिक मदद भी करती है।

पत्‍नी, पति का सबसे बड़ा संबल होती है। वही उसकी जटिल समस्‍याओं का समाधान निकालती है। उसे अपने सही निर्णय लेने को प्रेरित करती है। चाहे कैसी भी मानसिक धरातल की पत्‍नी हो। मुश्‍किल में वही ढाल बनती है। मेरे लिए भी वही उचित जो कमला ने कह दिया। 'शी इज़ माई कमांडर इन्‍चीफ‘।

सवर्सि में होते हुए उसने मेरी साहित्‍य-रूचि-संगीत रूचि में कोई रूचि नहीं दिखाई ''मैं घर देखूं या आपके गाने सुनूं‘‘। इसके बावजूद उसने मेरे साहित्‍यिक मित्रों की हमेशा (बेशक मेरी अनुपस्‍थिति में) आवभगत की। घर आने वाली, लेखिकाओं को तो और भी जैसे घर के सदस्‍य जैसा रूतबा दिया। वास्‍तव में यह कमला के पढ़े-लिखे होने संस्‍कारित होने का प्रमाण है। जबकि दूसरी ओर बीकानेर के ज्‍यादातर ढेठ घरों में मैंने यह पाया कि दरवाजे की ओट से ''बार ग्‍याओड़ा है‘‘ कहकर हमें चलता कर दिया जाता। चन्‍द्र जी का घर अपवाद था। अब बीकानेर अवश्‍य कुछ परिवर्तन की ओर अग्रसर है।

कम से कम कमला, जैसे तैसे मेरी डाक की ओर ध्‍यान देती। उन्‍हें सरसरी तौर से परख कर मेरी टेबल पर सहेज कर जमा देती। कभी कभार कुछ प्रतिक्रिया भी प्रकट कर देती। हां रिटायर होने के बाद बहुओं के आ जाने के बाद उसमें साहित्‍य के प्रति रूचि जागृत हुई। लेकिन उसका मुख्‍य विषय होम्‍योपैथी आयुवेर्दिक धार्मिक किताबें हैं। इनमें उसकी खासी गति भ्‍ाी है। उसकी पुस्‍तकों का अलग रेक है। थोड़ा बहुत लोगों का इलाज भी कर देती है। इस मायने में, और उसके मिलनसार स्‍वभाव के कारण बहुत से लोग इसके भगत भी हैं। डॉ साहब कमला जी। कमला जी। वाह कमला। मेरा सिर आपसे आप उठ जाता है। तब भी जबकि मुझे वह एकदम बुद्धु समझती है। हमारे घर का यह भी नियम रहा है कि किसी कारणवश मेरा कोई सहकर्मी बिना चाय पिए चला भी जाए, किन्‍तु मेरा चपड़ासी बिना चाय के नहीं जाना चाहिए। मैं नाइट ड्‌योटी में साथ के चपड़ासी को भी बादाम, पिस्‍ता, काजू, किशमिश खिलाता रहा।

चलिए वापस। अभी तो कमला का सैमिनार खत्‍म नहीं हुआ। उर्स के दिनों के बीच में ही राखी का दिन पड़ा। तो सारे अजमेर के बाजारों में राखियों की भी बहार आ गई। नीचे का पोर्शन जो किराए पर मुस्‍लिम परिवार ने ले रखा था, वहां से दो छोटी छोटी प्‍यारी प्‍यारी बच्‍चियां मेरे पास छत पर आ पहुंचीं। थोड़े संकोच मिश्रित उल्‍लास के साथ बोलीं- क्‍या आप हमारी अम्‍मी जान से राखी बंधवा लेंगे ? वे दोनों आपको राखी बांधना चाहती हैं।

- अरे इससे बढ़कर मेरे लिए क्‍या खुशी हो सकती है। मैंने दुगने उल्‍लास के साथ कहा। उन्‍हें ले आओ ना।

पांच सात मिनट में ही वे दोनों मेरी बनने वाली बहनें सजधज कर राखी लिये, हमारे उस छोटे से कमरे में आ पहुंचीं। उन्‍हें देखकर कमला की खुशी का आर पार न था। गाजि़याबाद वाली बहनें तो नहीं पहुंच सकती थीं। इन बहनों को भगवान ने भेज यिा। उनका स्‍वागत किया। मैंने दोनों से राखी बंधवाई। उन्‍हें (उस वक्‍त के हिसाब से) पांच पांच रूपए भेंट किए। चाय नाश्‍ता कराया। अब वे खुश खुश लौट रही थीं तो सहसा मेरे मुंह से न चाहते हुए भी प्‍यार से निकल गया। जब बहनें भाई को राखी बांधने आती हैं तो भाई का मुंह भी अपने हाथ से मीठा कराती हैं।

-ये हमें पता नहीं था। जैसे कुछ पश्‍चाताप से कहा।

-अजी कोई बात नहीं यह तो यूं ही कह दिया। आपने राखी बांध दी। इससे बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं है। आपने सच मुझ पर मेरी गाजि़याबाद दिल्‍ली वाली बहनों की अनुपस्‍थिति में उपकार किया है। इसे कभी नहीं भूलूंगा। मैं सचमुच आनंद विभोर था।

कुछ रोज बाद बिदाई के समय उन्‍होंने पूरा मिठाई का पैकिट ला दिया। मैंने कमला ने बहुतेरा इनकार किया। पर उनकी जिद-लेना पड़ेगा। और आपको हमारे घर अकोला भी ज़रूर आना पड़ेगा। जो युवक उनके साथ था, कहने लगा-हम बहुत अमीर घराने से हैं, बड़े बिजनेसमैन हैं। अकोला में हमारी हवेलियां हैं। वहां आकर रहिएगा। अगर आप लोग हमारे हाथ का पक्‍का खाना न खाना चाहें, तो आपको अलग से रसोई घर दे देंगे। मैं हंसने लगा-हम लोग ऐसा परहेज नहीं रखते। अब तो जब बहन भाई का रिश्‍ता बन गया है, तो बहनों के हाथ का खाना तो और लजीज लगेगा।

इतनी दूरी। फिर कौन आता जाता है। हां कुछ अर्से तक खतोकिताबता शादियों के निमंत्रण पत्र। मेरे द्वारा शगुन के पैसे भेजना, चलता रहा। फिर धीरे धीरे सब समाप्‍त। पर सोचता जरूर हूं कि कोई सबब अकोला का बन ही जाए तो अपनी ढ़ेरों चिटि्‌ठयों में उनका अड्रेस उनकी चिट्‌ठी से लेकर पहुंच ही जाऊं। आत्‍मीय क्षण तो कभी जिंदगी से जुदा नहीं होते।

बीकानेर बसने और मकान की बात।

- ओ कमला तू काहे को मकानों, मकान बनवाने के पीछे पड़ी हुई है। पहले तू ने आते ही किराए के मकान लेने से पहले ही ज़मीन (ताजिया चौक में) का छोटा सा टुकड़ा, तांगे वालों, गाड़े वालों के बीच खरीद डाला, जहां हर वक्‍त मोटे चूहे, शेर जैसे कुत्त्‍ाे, सैर करते रहते हैं। लगभग सारी आबादी मुस्‍लिम परिवार मज़दूर तबकों की थीं।

-यही छोटे तबके के कहलाने वाले लोग आत्‍मीय प्रेम देते हैं। वक्‍त ज़रूरत बढ़ चढ़कर काम आते हैं। घने मुहल्‍ले में सेफ्‍टी भी रहती है। हमारे छोटे परिवार के लिए यह थोड़ी जगह बहुत है।

लेकिन जैसे ही हमने निर्माण कार्य आरम्‍भ किया, पिछवाड़े में रहने वाला ताराचंद, सामने आकर तन गया। आपके पिछवाड़े मेरा दरवाजा और ऊपर खिड़की पड़ती है।

-यह तो सरासर गलत है। इन्‍हें हम बंद करा देंगे।

-तो आप मुझे पांच सौ रूपए दीजिए।

-किस बात के ? तुम्‍हारे, नाजायज कब्‍जे के ?

वह लड़ने-मरने को तैयार हो गया। मैंने पांच सौ रूपए देने से साफ इनकार कर दिया। बाद में किसी सरदार जी को वह ज़मीन बेच दी। सुजान सिंह ने अपनी ज़मीन पर वहीं मकान बना ही लिया था। चलो दोनों, सरदार भाई मिलकर अड़ोस पड़ोस में खुश रहो। लेकिन उन दोनों सरदार भाइयों की तो दुश्‍मनी सी हो गई। बहुत बाद में सुजानसिंह ने व्‍यास कॉलोनी में बड़ा मकान खरीद लिया। आज तक वहीं बड़े ठाटबाट के साथ रह रहा है।

फिर कमला के कहने पर यू आई टी में, एच․आई․जी मकान के लिए पैसे जमा कर दिए। फिर कमला, कमला के स्‍कूल के स्‍टाफ के कहने पर पैसे वापस ले लिये कि मैटीरियल एकदम घटिया किस्‍म का लगा रहे हैं।

मगर कमला को चैन कहां। इसने धूल भरे फड़ बाज़ार (पठानों के महल्‍ले में) एक पुराने मजबूत टाइप के मकान का सौदा कर डाला। तय यह हुआ कि आधी रकम कोर्ट में पहले मालिक-मकान को, दे दी जाएगी। आधी बाद में। कब्‍जा मिलने पर। मैंने कोर्ट में 10-15 सौ या हजार रूपए रजिस्‍ट्रेशन फीस के भर दिए। अब काइयां मालिक मकान इस जिद पर अड़ आया कि सारी की सारी रकम अभी दे दीजिए। कल किसने देखा है। आप बकाया का भुगतान करें, न करें।

मैंने जवाब दिया- आपका भी क्‍या भरोसा। कल को आप पूरी रकम लेने के बावजूद मकान का कब्‍जा दें, न दें।

-आपके पैसे पैसे कोर्ट में फंस चुके हैं। देख लो।

-यह तो कुछ हजारों की बात है। चाहे मेरा लाखों का नुकसान हो जाए। मैं ऐसे घटिया आदमी से सौदा तो क्‍या बात करना भी पसंद नहीं करता। तुमने चाल चलकर मुझे फंसाया है। भाग जा। वह तो वहीं खड़ा, सोचता रहा। पर मैं साइकिल दौड़ा कर भाग खड़ा हुआ। वह पीछे से बहुतेरी आवाजें देता रहा। कई लोगों से कहलवाया कि समझौता कर लें सहगल साहब का ही, कोर्ट-फीस भरने से नुकसान हो रहा है।

-उस घटिया, अपनी जबान से फिरने वाले आदमी, को मेरे नुकसान की फिक्र करनी की ज़रूरत नहीं। बस सौदा कैंसिल। सो कैंसिल।

बाद में मुझे पता चला कि कुछ कटोती के बाद कोर्ट से मेरा पैसा वापस मिल सकता है। एप्‍लीकेशन लगा दी। दे चक्‍कर पर चक्‍कर। कभी कलक्‍टर नहीं। तो कभी बाबू नहीं। रीडर अवश्‍य मिलता। उसके हाथ में काफी कुछ था। मैंने रीडर से कहा- मेरे पास चक्‍कर लगाने का समय नहीं है। प्रैक्‍टिकल लाइफ आप जानें। हम तो कहानियों से ही इमारते बनाते हैं। साफ साफ बता दीजिए कि अगर पैसा न मिलना हो तो कोई बात नहीं। मैं तो अपने स्‍वाभिमान की खातिर, एक तरह से सारा पैसा गवा ही चुका हूं।

-अच्‍छा आप कहानियां लिखते हैं। क्‍या क्‍या लिखा है। कैसे लिखते हैं। हम आपको बहुत से अजूबे प्‍लाट बताएंगे। उन पर लिखिएगा। हमने दुनिया देखी है। आप निहायत भोले ईमानदार आदमी हैं। अब आपको दुबारा इस सिलसिले में आने की जरूरत नहीं। बस जरा यहां दस्‍तखत करते जाइए।

कुछ रोज बाद वही श्री तेजकरण व्‍यास (रीडर) पैसा लेकर हमारे रेलवे क्‍वार्टर आ पहुंचे। कमला को पैसा थमाया। कमला ने उन्‍हें राखी बांधी। उनके परिवार बेटे बहुओं के साथ आत्‍मीयता बढ़ती गई।

मेरा कहानी जीवन दर्शन यही कहता है कि जब दुनिया में इतने सारे नेक लोग बसते हैं तो हम घटिया लोगों पर क्‍यों लिखें। घटिया पात्र बस एक उपकरण की भांति चरित्रवान लोगों को परोक्ष्‍ज्ञ रूप से हाइलाइट करने वाले दिखें। इस समय उदय प्रकाश, उदय प्रकाश हर जगह छाए हुए हैं। पर देखा जाए तो वे मानवता को क्‍या दे रहे हैं ? मैंने तो 'हंस‘ में एक बड़ा पत्र भी छपवाया था कि वे घोर पराजय दर्शन के पैरोकार हैं। जब ईमानदार आदमी को पहले ही से पता है कि अंततः उसकी हार ही होनी है तो फिर वह क्‍यों कर संघर्ष (रिवोल्‍ट) करे।

आज साहित्‍य में यथार्थ के नाम पर बहुत सारा ऊटपटांग कचारा परोसा जा रहा है, जिसे, उनके अंध भक्‍त फौरन से पेश्‍तर खा लेने को दौड़ते हैं। जगुप्‍सा पैदा करने वाले तथाकथित साहित्‍य को हजम करते/कराते फिरते हैं।

छोडि़ए, इसी मकान की बात, थोड़ी और कर ली जाए। अग्रवाल क्‍वार्टर गंदे नाले के किनारे बसा हुआ है। मेरे पास सिरे का मकान था। वहां के सब निवासी उन पर काबिज हो रहे थे।

हमें हराम के गंदे मकान में नहीं रहना। रेलवे क्‍वार्टर अलॉट हो ही चुका है। मैं अग्रवाल क्‍वार्टर के मालिक को चाबी थमाने को जा ही रहा था कि मुझ पर इस बात का दबाव पड़ने लगा कि चाबी कंकरिया टी․टी․ई को दे दो। वही इस में रह लेंगे। मैंने लाख बहस की कि यह अनैतिक होगा। कंकरिया साहब भी मेरे पुराने साथी हैं। जब ये टिकट कलेक्‍टर थे तभी से इन्‍हें जानता हूं। ये मेरे साथ चलें। मैं चाबी मालिक मकान को थमाकर रिक्‍वेस्‍ट कर दूंगा कि वे क्‍वार्टर इन्‍हें दे दें।

-फिर तो उस मकान मालिक की मर्जी पर होगा। क्‍या पता उसने पहले ही से किसी से वायदा कर रखा हो। चाबी दे न दे।

मैं सोशल फोर्स से दब गया। यह कचौट मुझ पर बनी रही। 1985 में जाकर 'जाता हुआ क्‍वार्टर‘ नाम की कहानी लिखी।

-ओ कमला अब तुझे फिर मकान की क्‍यों पड़ी हुई है ? मजे़ से अपने रेलवे क्‍वार्टर में गुजर कर रही है। मगर नहीं। कमला तो कमला है-कल को अगर आपका कहीं ट्रांसफर हो गया तो मैं बच्‍चों के साथ कहा रहूंगी ?

मुक्‍ता प्रसाद में बहुत खूबसूरत बड़ा मकान मिला। लेकिन मैंने मना कर दिया- मेरी रात दिन की ड्‌यूटियां हैं। इतनी दूरी से कैसे आता जाता फिरूंगा।

अंत में डुप्‍लैक्‍स कॉलोनी में हाऊसिंग बोर्ड का कुछ छोटा ही सही, पर सुन्‍दर ढंग का मकान मिला अपनी मनमर्जी मुताबिक इस पर अधिक निर्माण कराया। तराशा। बगीची भी लगाई। इसी में रहकर चारों बच्‍चों की शादी कीं। रिश्‍तेदारी बढ़ी। भांजी स्‍वीटी उर्फ कंचन, (पंजाब नेशनल बैंक) की शादी भी बीकानेर में करवा दी, इसे बीकानेर ले आया। सो इस तरह बीकानेर का ही हो गया। 1956 से न भी मानें तो स्‍थाई रूप से मेरे 1965 से बसे मेरे जैसों को आज तलक कुछ लोग बड़ी सहृदयता से 'बाहर का आदमी‘ कहते हैं। कुछ चहेते मित्र इसे बीकानेर का सौभाग्‍य तक भी कहते हैं कि तूने साहित्‍यिक क्षेत्र में बीकानेर का नाम ऊंचा उठाया है।

पूरे देश में ऐसी दो तरफी प्रतिक्रिया, कहानियों में भी पढ़ने को मिलती रहती हैं। कहानियों को छोडि़ए मात्र महाराष्‍ट्र की ओर नजर उठाकर देख लें। 'अनेकता में एकता का नारा‘ तो अति सुन्‍दर है परन्‍तु मजहब, जाति, उपजाति, क्षेत्रियता, नेताओं, साधुसंतों के पूजनीय स्‍थलों, अपनी अपनी रीतिरिवाजों, मान्‍यताओं ने एक देश में अनेक देश भी तो पैदा कर रखे हैं। दरअसल यह कुछ संकुचित बुद्धि वालों के कारण से है।

इस अनेकता के 'दाे कौमों के साथ साथ न रह सकने‘ वाले परिणाम (पाकिस्‍तान) के रूप में भी देखने को तो बचपन में ही, अभिष्‌प्‍त रहा हूं। भुक्‍त-भोगी, मेरे जैसे, कश्‍मीरी पंडित ही, इसे समझ सकते हैं। मेरे पास पूरे जीवन का रिकार्ड तिथि अनुसार डायरियों, फाइलों आदि में अंकित है। बस एक टेलिप्रिंटर कोर्स के विषय में कुछ कुछ रोचक जानकारी अवश्‍य देना चाहूंगा। यह ट्रेनिंग पौने दो महीनों (12-4-76 से 25-5-76) की गाजि़याबाद रेलवे ट्रेनिंग स्‍कूल में हुई थी। गाजि़याबाद तो अपने चार चार घर हैं। बढि़या हुआ। ज्‍़यादातर वायरलैस आपरेर्ज उम्रदराज थे। जो नार्दन रेलवे के हर डिवीजन; इलाहाबाद, फिरोजपुर, दिल्‍ली, मुरादाबाद, जोधपुर, बीकानेर आदि से आए थे। उनमें से बहुत से पुराने बेली भी थे। कइयों के साथ नई दोस्‍ती भी हुई।

इन्‍स्‍ट्रैक्‍टर खुद टैलिपिं्रटर के विषय में ख्‍़ाास जानकारी नहीं रखते थे। टेलिप्रिंटर के शायद पौने दो लाख पुर्जे बताए थे। वे कैसे काम करते थे। सैद्धान्‍तिक रूप से कुछ कुछ लिखवा दिया। रटो और पास हो जाओ। इंस्‍ट्रैैक्‍टर हम लोगों के हम उम्र, उनके बीच (हम घर, पत्‍नी से बिछड़े, वियोगी विरहई भाई) क्‍या पढ़ते बल्‍कि उन्‍हें कामसूत्र के पाठ पढ़ाने लगते। वे इन्‍स्‍ट्रैक्‍टर (?) शर्मसार हो कर भाग खड़े होते। बाद में तो उन्‍होंने क्‍लास में आना ही बिलकुल बंद कर दिया। पढ़ो न पढ़ो, पास होओ। फेल हो, तो दुबारा आना पड़ेगा। अपना भला बुरा खुद सोच समझ सकते हो। क्‍लास रूम में शोरगुल होता रहता। अश्‍लील चुटकुले-बाजी होती रहती। ब्‍लैक बोर्ड पर चाक से स्‍त्री पुरूष रेखांकन किया जाता। मुझसे यह सब कहां सहन होता। बड़े बड़े कटहल के पेड़ों के साये में चक्‍कर काटता। और जब दिल करता तो घर को भाग जाता। छोटे भांजियां भांजे मेरे हाथ में फाइल देखकर बड़े उत्‍साहित होते-मामाजी स्‍कूल से पढ़कर आ रहे हैं। हें मामाजी आज स्‍कूल की जल्‍दी छुट्‌टी हो गई। फिर पूछते-मामाजी-अगर आप फेल हो गए तो ?

-तो क्‍या। वापस डेढ़ दो महीनों के लिए गाजियाबाद आना पड़ेगा।

-तो मामाजी आप ज़रूर फेल हो जाना। बड़ा मजा आएगा। पर पिताजी न जाने कैसे मेरे मनोभाव पढ़कर, माताजी से कहते कि यह कमला के लिए उदास है।

उधर बीकानेर में पत्‍नी, बच्‍चे अकेले मुश्‍किल से दिन गुज़ार रहे थे। जैसे ही छुटि्‌टयां हुई। वे सब भी गाजि़याबाद आ पहुंचे।

दिल्‍ली वालों की भी मौज थी। पहली गाड़ी मिलते ही एस एंड टी ट्रेनिंग सेंटर गाजियाबाद से भाग छूटतें।

मुश्‍किल दीगर स्‍टाफ वालों की थी जो निर्वासन भोग रहे थे। उनका हॉस्‍टल में खाने पीने का पैसा कटता। दिल्‍ली वाले तो खाना खाकर आते या साथ ले आते। रात को घर जाकर खाते। सबसे ज्‍़यादा मौज मेरी थी। घर का खाना। टी․ए․डी․ए․ ऊपर से मुफ्‍त।

जब शुरू में ट्रेनिंग के लिए गाजियाबाद आया था तो यात्री जी के यहां जा पहुंचा।

-आ गए ? कब आना हुआ। कितने रोज़ रूकोगे। वे हमेशा ऐसे ही पूछते थे, जब जब गाजियाबाद जाता।

-पौने दो महीने। मैंने झट से उत्त्‍ार दिया।

-झूठे। तुम तो तीसरे चौथे दिन वापस भागते नज़र आते हो।

स्‍थिति स्‍पष्‍ट होने पर बहुत खुश हुए यात्री जी। अब तुम से जमकर बातें हुआ करेंगी।

दूसरे चौथे दिन यात्री जी हाजि़र। एक दो बार स्‍कूल की छुटि्‌टयों के दिनों मैं और यात्री जी दिल्‍ली वगैरह भी हो आए। बाकी के गाजि़याबादी लेखकों (वही गिने चुने) से भी उठक बैठक होती रहती। अब तो सुना है, गाजियाबाद में लेखकों/प्रकाशकों की तादाद खासी बढ़ गई है। पर कहीं बढ़ चढ़कर मिलने की मेरी प्रवृति पैदा न हुई।

एक बात और भी न जाने क्‍यों, कभी कभी मेरे जेहन में यात्री जी और गािजयाबाद को लेकर आती रहती है। उस समय में भी, गाजियाबाद में लेखकों कवियों का इतना अकाल तो नहीं रहा होगा। खास नाम कुंवर बेचैन, विपिन जैन को तो थोड़ा बहुत मैं भी जानता था/हूं। आज तक कभी कुंवर बेचैन से नहीं मिला। बेशक एक कमी, बिना संबल के, कहीं आने जाने, भागदौड़ मचाने की मुझ में है ही। लेकिन यात्री जी ने मुझे किसी से भी नहीं मिलवाया। हो सकता है मुझे इस काबिल न समझा हो। या उन सबको यात्री जी निम्‍न श्रेणी के साहित्‍यकार मानते हों। या चाहते हों, सहगल मात्र मेरा ही भक्‍त बना रहे। मुझे तो खुद ही संपर्क बढ़ाने, अपने को पहचनवाने में जबर्दस्‍त संकोच रहा है। बस मन में एक मलाल जरूर बना हुआ है। मुझे मालूम पड़ा था कि लखनऊ से आकर दुर्गा भाभी पत्‍नी भगवती चरण वोहरा (सरदार भगत सिंह वाली) गाजियाबाद आ बसी हैं तो मैंने यात्री जी से अपनी हार्दिक इच्‍छा व्‍यक्‍त की थी कि दुर्गा भाभी जी के चरणस्‍पर्श करना चाहता हूं। एक दिन उधर ले चलिए। इस पर यात्री जी ने बेढंगा मुंह बनाकर मेरी (और शायद दुर्गा भाभी की भी), उपेक्षा कर दी। मैं जाकर उन्‍हें न मिल पाया। बाद में उनके निधन का समाचार सुना। आज तक मन ऐसा द्रवित हो उठता है कि बयान नहीं कर सकता।

मैं भी ऐसा छोटा बालक भी नहीं था कि अगर अकेला चला जाता तो कोई मुझे रास्‍ते से उठाकर तो न ले जाता। ऊंचा सुनने का भी मुझे थोड़ा रोग था पर बीस जगह रास्‍ता पूछने पर आखिर मिल ही तो जाता।

जब तब हम दोनों को मेरे बड़े भाई साहब, पुस्‍तकें छपने की समस्‍याओं पर बात करते हुए पाते हैं तो लेखकों की बेचारगी पर हंसते हैं कि इतना समय हो गया, तुम दोनों को लिखते। अब भी तुम्‍हारी दयनीय हालत है। मुझसे कहते हैं कि यात्री जी तुम्‍हारे साथ प्रकाशकों के पास फौरन, इसीलिए चल पड़ते हैं कि इन्‍हें भी किताबें छपवाने के लिए नए नए संपर्क ढूंढ़ने हैं। पुरानों को भी अपनी याद दिलानी है।

इस बात को यात्री जी भी थोड़ा रद्‌दोबदल के साथ कहते हैं कि मैं मुद्‌दतों तक किसी से नहीं मिलता। तुम्‍हारे आने पर इसी बहाने, उनसे भी मिलना हो जाता है।

तीन चार बार अजय कुमार (मेघा बुक्‍स) के यहां भी हम लोग गए थे। अजय ने नया प्रकाशन शुरू किया था। यात्री जी ने उसे पुस्‍तक देने से इनकार कर दिया था। जब 'मेघा बुक्‍स‘ का काम-नाम मशहूर हो चला तो उसने भी परोक्ष रूप से यात्री को छापने से मना कर दिया। हां एक बार यात्री जी मुझे अशोक कुमार, ऐसोसिएट एडीटर इंडिया टुडे के पास ले गए थे। मेरी विभाजन पर लिखी कहानी 'लुटे हुए दिन‘ कब की अशोक जी ने स्‍वीकृत कर रखी थी, पर छपने का नंबर नहीं आ रहा था। इसके एक सवा महीने बाद वह कहानी छपकर आई थी। अगले दौर में यात्री जी ने एक दो तीन प्रकाशकों से मिलवा कर कुछ मदद करने की कोशिश की थी। चंद्र जी के लैटर, प्रकाशकों के नाम, मेरी जेब में थे। यात्री जी ने कहा- चलों, इन्‍हें तो मैं भी जानता हूं। पर सबने इनकार कर दिया कि खुद चन्‍द्र जी ही की पांडुलिपियों, हम नहीं छाप पा रहे। वे बहुत लिखते हैं और हमारे पास छोड़ जाते हैं। एक प्रकाशक, शायद इन्‍द्रप्रस्‍थ, तो पूरे कबाड़ची लगे। वे मेरा एक उपन्‍यास (अलग अलग शीर्षकों वाला) को कई कई किताबों की शक्‍ल में छापना चाहते थे। मैंने साफ इनकार कर दिया कि मुझे अपने उपन्‍यास की दुर्गति नहीं करानी। एक ने कहा-यह पांडुलिपि छोड़ जाइए। जब कभी छपेगी तब आपको पांच सौ रूपए दे दिए जाएंगे। बोलो है मंजूर ?

मैं दंग रह गया-क्‍या प्रकाशक भी बनिए की तरह यूं सौदा करते हैं। मैंने झट से अपनी पांडुलिपि को खींच लिया-ऐसी जगह मुझे नहीं छपना। एक दो जगह यात्री जी ने सौदा तो कराया। मगर वे न तो छाप रहे थे। न पांडुलिपि वापस ही कर रहे थे। यात्री जी ने चक्‍कर काट काट कर पांडुलिपि उनसे लेकर अपने खर्चे से मुझे वापस भिजवाईं।

हां जब 'टूटी हुई ज़मीन‘ उपन्‍यास लिखा गया तो यात्री जी ने श्री हरीराम द्विवेदी, पांडुलिपि प्रकाशन दिल्‍ली से फोन पर ही बात कर ली थी। मुझे लेकर कृष्‍ण नगर गए। हरीराम जी ने पूछा- आप इसके कितने पैसे लेंगे ?

-इसकी कीमत आप क्‍या कोई भी प्रकाशक मुझे दे नहीं सकता। पूरे अठारह साल रो रो कर इसे पूरा किया है। आप इसे फ़ौरन छापने को तैयार हैं, मेरे लिए यही बहुत है। यात्री जी ने कई सालों बाद चक्‍कर काट काट कर उनसे तीन हज़ार का चैक लेकर मुझे रजिस्‍ट्री किया था। तीन हजार का उस कुछ सस्‍ते समय में भी क्‍या मोल था। बताए देता हूं। एक हजार तो पहले ही टाइप के लग चुके थे। अब एक हजार 'शेष‘ पत्रिका को, तथा पांच पांच सौ 'आकार‘ तथा 'आसपास‘ को भिजवा दिए। इसके बाद हरीराम जी ने इसके कई संस्‍करण निकाले, जिनके पैसों के तकाजे कर करके थक गया हूूं उनके यहां आने जाने, फोनों, खतों के कम से कम डेढ़ हजार मेरी जेब से और लग गए हैं। हरी राम जी के नेताओं की तरह आश्‍वासन दर आश्‍वासन। आप चिंता न करें। दो पांडुलिपियों बड़े तकाजे कर करके हरी रामजी ने मुझसे ली थीं कि सारे पैसे इकट्‌ठे दे दूंगा। चन्‍द्र जी तो साल में दो बार अपने बेटों के पास जाकर शाहदरा रहते थे। उन्‍होंने बड़ी मुश्‍किल से 'मिस इंडिया ः मदर इंडिया‘ कहानी संग्रह, अपने सामने निकलवा कर, (पूरे आठ साल बाद) छपवाया था। दूसरी पांडुलिपि न तो हरी राम जी ने छापी न वापस की। उम्‍मीदों पर दुनियां कायम है। कुछ भी कहो, इस मायने में चन्‍द्र जी का दबदबा मानना पड़ेगा उन्‍होंने बीकानेर के लगभग सारे लेखकों को छपवाया था। मुझे मेहरौली ले गए थे। वहां से अनुराग (असली नाम कुछ दूसरा है) प्रकाशन से एक कथा संग्रेह 'मर्यादित‘ तथा दो बाल कथा संग्रेह के कुल दो हजार में दिलवाए थे। बस ठप।

लगे हाथ प्रकाशकों के कच्‍चे चिट्‌ठों की वार्ता यहीं कर लेने में कोई हर्ज नहीं। आलेख प्रकाशन, नवीन शाहदरा से मेरा पत्र व्‍यवहार चल रहा था। श्री उमेश चन्‍द्र अग्रवाल ने लिखा था कि जब कभी इधर आएं, अपनी सारी पांडुलिपियां लेते आएं। यात्री जी को बताया तो बोले-चलो वह तो मेरा शिष्‍य रहा हुआ है। उसने मेरी भी कई किताबें छाप रखी हैं। वहां पहुंचने पर उमेश जी ने मेरी पांच बड़ी छोटी पांडुलिपियां रख लीें। कुछ समय बाद उन पर स्‍वीकृति की मोहर लगा दी। बड़ी मुश्‍किल से केवल दो बच्‍चों की कहानियों के संग्रह निकाल पाए (पैसे नदारद। शायद भविष्‍य में कभी कुछ मिल जाए) यात्री जी ने बताया उसकी हालत खस्‍ता है। मैं भी अपनी बकाया पांडुलिपियां वापस मंगवा रहा हूं। सो पूरे आठ सालों की प्रकाशन गृह की धूल चाटने के बाद मेरी तीनों पांडुलिपियां सुरक्षित पहुंच गई। मैं इसे भी अनुकम्‍पा मानता हूं।

एक बार मैं आत्‍माराम एंड संस और एक बार निधि प्रकाशन कश्‍मीरी गेट, एक एक पांडुलिपियां छोड़ अया था। लंबा अर्सा गुज़रा। यात्री जी ने सलाह दी कि रोल देंगे। मैं आत्‍माराम एंड संस गया। उन्‍होंने कहा यह तो बहुत ही अच्‍छी कहानियां हैं कमेटी ने इसको रिकमेंड किया है। पर कब छापेंगे यह नहीं कह सकते।

-वापस कर दीजिए।

-शाम को आइए।

कमला साथ थी। कहने लगी-जब आपकी कहािनयों की प्रशंसा कर रहे हैं तो छापने दीजिए।

-इनका कोई भरोसा नहीं। मैंने यात्री जी के शब्‍द दोहरा दिए। शाम को हम दोनों फिर पहुंचे तो मुझसे लिखवा लिया-'संशोधन के लिए ले जा रहा हूं।‘ फिर मैं कभी वहां पर नहीं गया। जबकि यात्री जी की किताबें आज भी वहां से निरंतर छप रही हैं।

जब डॉक्‍टर महीप सिंह जी को पता चला कि मैं 'निधि प्रकाशन‘ को अपना कथा संग्रेह 'टेढ़े मुंह वाला दिन‘ दे आया हूं तो उन्‍होंने मुझे लिखा कि वापस मंगवा लो। हम छापेंगे। उन्‍होंने मेरा पहला 'मौसम‘ कहानी संग्रह 1980 में अभिव्‍यंजना प्रकाशन से छाप रखा था। इसे भी 1982 में बड़े सलीके से छाप दिया। दोनों के पैसे भी दिए थे।

एक बार मैं अकेला, (अपनी भांजी कमलेश के बच्‍चे को लेकर, शारदा प्रकाशन पहुंचा था) मुझे सहारे की जरूरत हमेशा पड़ती है चूंकि (बताया आया हूं। मैं रास्‍ते, तथा लोगों के चेहरे भूलने में काफी होशियार हूं)

झारी साहब को जब मैं अपना परिचय दे रहा था तो वे मुस्‍करा रहे थे। फिर बोले आपको परिचय देने की क्‍या जरूरत है। आपके नाम को कौन नहीं जानता। मैंने दो पांडुलिपियां उनके सामने रख दीें।

-क्‍या आप कुछ सहयोग करेंगे ?

-सहयोग ? मैं कैसा सहयोग कर सकता हूं। मैं तो कोई किताब बिकवा नहीं सकता। (जबकि उस जमाने में रेलवे बोर्ड, रेल कर्मचारियों की पुस्‍तकें प्राथमिकता के आधार पर खरीद लिया करते थे। पर यह बात मैं क्‍यों कहूं। इतनी बड़ी स्‍पलाइयां करने वाले क्‍या खुद नहीं जानते होंगे।)

तब मेरा भोलापन भांपते हुए झारी साहब का भाई धीरे से बोला-इनका मतलब है कि प्रकाशन में आप भी कुछ पैसा लगाएंगे।

इतना सुनते ही मैंने दोनों पांडुलिपियां वापस खींच ली-मुझे ऐसी जगह कुछ भी नहीं छपवाना।

तब झारी साहब ने मुझे ठंडा किया-नहीं ऐसी बात नहीं; क्‍या हम सभी से पैसा लेते हैं ? हमारे यहां बड़े बड़े लेखक, कमलेश्‍वर, आबिद, सुरती वगैरह वगैरह तक छपते हैं।

उन्‍होंने बहुत मुद्‌दत बाद 'गोल लिफाफे‘ व्‍यंग्‍य कथा संग्रह छापा जिसमें प्रूफ की बेशुमार अशुद्धियां हैं। मैंने दूसरी पांडुलिपि वापस मंगवा ली। बहुत बाद में मुझे प्रकाशित पुस्‍तक कोई कुछ पैसे और पुस्‍तक की प्रतियां भी मिलीं।

हां इस दृष्‍टि से अजय कुमार जी (मेघा बुक नवीन शाहदरा) मेरे लिए बहुत ही अच्‍छे साबित हुए। उन्‍होंने ही मुझे कहीं से ढूंढ़ निकाला था। पहले पहल मेरे घर गाजियाबाद, अपने स्‍कूटर से आए। फिर दो तीन बार बीकानेर भी मेरे निवास पर आए। खुद मेरी पांडुलिपियां लीं। छापीं। खूब प्रतियां और और कुछ धन राशि दी। अब तक वे मेरी पांच पुस्‍तकें छाप चुके हैं। कुछ और भी छापने वाले हैं। जब तब जब मैं गाजि़याबाद जाता, मुझे सपत्‍नीक खाने पर आमंत्रित करते। उन द्वारा छापी पुस्‍तकों पर मुझे दूरदराज के इलाकों से प्रतिक्रियाएं आती हैं। बाकियों (प्रकाशकों) के साथ खट्‌टे मीठे अनुभव रहे। एक तो मेहनत करके लिखो; फिर प्रकाशकों की हाजिरी भरो। देखा जाए तो यह किसी स्‍वाभिमानी लेखक के कलेजे पर किसी चोट कचौट से कम नहीं। इससे अच्‍छा है ः न ही लिखो। पर ऐसा भी कभी हुआ है। लिखने का जुनून जब बचपन ही से भूत की तरह सवार हो तो वह लिखे बिना कैसे रह सकता है। लिखा ही जाता है। जब लिखा जाता है तो देर सवेर किसी तरीके से छप भी जाता है। अभी बड़े आराम से प्रभात प्रकाशन दिल्‍ली से थोड़ा बड़ा कथा संग्रह 'तीसरी कहानी‘ अच्‍छी शर्तों के साथ आ रहा है। अधिकांशतः सहज कम, संघर्ष ज्‍यादा। हां जो बड़े बड़े ओहदों पर बैठे हैं (लेखक चाहे किसी स्‍तर के हो) किताबें बिकवा सकते हों। किसी प्रकाशक का हित या फिर अहित कर सकने में सबल हों, उनकी पुस्‍तकें धड़ल्‍ले से छपती चर्चित होती रहती हैं। हम जैसे रेंग रेंग कर आगे बढ़ने वालों में से है।

दिल दहला देने वाला समाचार।

18-2-1977 को रात्रि पौने बारह बजे मेरे चपड़ासी ने मेरे दरवाजे पर दस्‍तक दी। बताया वायरलैस से आपके भाई साहब का संदेशा आया है कि आपके पिताजी की तबीयत बिगड़ गई है। इसके बाद हमारे किसी और संदेश की प्रतीक्षा मत करना।

मैं और कमला उदास हो गए। रात भर तैयारी में लगे रहे। रूलाई भी निकलने लगे तो मैं रोक लूं कि क्‍या पता हमारे गाजियाबाद पहुंचते पहुंचते पिताजी ठीक हो जाएं। पर दूसरे मैसेज (सूचना) की प्रतीक्षा मत करना। क्‍या अर्थ हुआ कि बस चल पड़ो।

19-2-77 को सपरिवार सुबह 8 बजे बीकानेर एक्‍सप्रेस से चल पड़ा। स्‍टाफ के बहुत से लोग स्‍टेशन पर पहुंचे हुए थे। जब गाड़ी चलने को हुई थी तो मि․बंसल ने दुःखी स्‍वर में कहा-जाओ पर पिताजी तो मिलेंगे नहीं। मैं जोर जोर से रोने लगा। सब ने ही पहले पिताजी के निधन का समाचार मुझसे छिपाए रखा था। भाई साहब की हिदायत ही ऐसी थी कि हरदर्शन इस सदमें को सहन नहीं कर पाएगा। अब यह मि․बंसल ही जानें कि क्‍यों बता दिया था।

बहुत पहले लिख आया हूं। पिताजी हमेशा मेरे मास्‍टर सैंटीमेंट रहे। इतना लाड प्‍यार कम पिता ही बच्‍चों को दे पाते होंगे। बहुत ही छोटी आयु से उनकी खुश मिजाजी हंसोड़पन मस्‍ती उनकी सीखों से प्रभावित रहा हूं। और उनके दुःखों से हमेशा मैं भी दुःखी रहा हूं। जब बरेली में टूर से आते जाते थे मैं बहुधा उनको स्‍टेशन सी अॉफ करने, फिर गाड़ी से लौटने के इंतजार में प्‍लेटफार्म पर खड़ा रहता था। उनके गायन, स्‍वरों को सुन-सुनकर झूम उठता। अंतिम कुछ वर्षों को छोड़कर वे हमेशा गाते रहे। आवाज मुकेश और रफी के बीच वाली थी। से․रा․ यात्री जब जब आते उनसे गाने सुनते। घुलमिल जाते। उनके अनुभव सुनते। उनका इन्‍ट्रव्‍यू भी लेना चाहते थे। बस रह गया। पिता जी फिल्‍म लाइन में चले गए होते तो बड़ा नाम होता। था ओर कुछ नहीं, पिताजी, माताजी का कहना मानकर लाहौर जाकर अपने कुछ रिकार्ड ही बनवा लाते। अब जब टेपरिकार्डर का जमाना शुरू हुआ ही था तो उनका पहले वाला स्‍वर न रहा था। फिर भी इतना बुरा न था। हम लोगों ने कोशिश भी की लेकिन टेपरिकार्डर ने दगा दे दिया।

पिताजी की डायरी से पता चलता है कि उनका जीवन दुःखों से भरा अत्‍यंत संघर्षमय रहा। (पूरा विवरण पढ़कर मैं द्रवित हो उठता हूं) फिर भी यारेां के बीच ठहाके लगाते रहे (यह तो मैंने भी देखा है) उनके बीच बहुत पापुलर रहे हैं।

पिताजी लिखते हैं-मुझे पहले पहल दमे का दौरा अक्‍तूबर 1949 में पड़ा। 18-10/44 से लेकर 1-2-1945 तक सिक लिस्‍ट में रहा। 3½ महीने।

इसके बाद तो यह सिक और फिट का सिलसिला उनका पूरी सर्विस (55 साल की उम्र, रिटायरमेंट एज थी) तक चलता रहा था।

एक बार लायलपुर के बड़े रेलवे अस्‍पताल में उनका भगंदर का आपरेशन हुआ था तब एनैस्‍थिसिया जैसी सुविधाएं नहीं थीं। मैं बहुत ही छोटा था। कुछ समझ नहीं पा रहा था। इतना बड़ा अस्‍पताल पिताजी की चीखों से जैसे दहल रहा था। मेरा छोटा सा दिल भी रह रहकर दहल उठता जैसे अंदर, पिताजी का कत्‍ल किया जा रहा हो।

पिताजी का दुःख मेरा अपना दुःख था। पिताजी का सुख मेरा अपना सुख था।

हां रिटायरमेंट के बाद दिन रात की ट्‌यूरिंग की मशक्‍कत से मुक्‍त हो जाने से पिताजी लगभग, तंदरूस्‍त हो गए थे। चुस्‍त दुरूस्‍त। जब जब मैं गाजि़याबाद पहुंचता, पिताजी निहाल हो उठते। मेरे बचपन के दिनों की तरह मेरी अंगुली थामे बजरिया, सब्‍जी मंडी ले जाते। मेरी मनपसंद की तरकारियां खरीदते। बार बार माता जी से कहते-देख दर्शी आया है। जैसे माताजी मुझे न देख पा रही हों। वे कहतीं आपके ज्‍यादा लाड प्‍यार ने ही तो इसे बिगाड़ा है। देखो अब तक शादी के लिए हामी नहीं भरता। मैं तो वह दिन देखने को तरस गई-जब यह अपनी पत्‍नी के साथ बाजार से रिक्‍शे में बैठकर घर आए जाएगा।

-अरे कर लेगा शादी। अभी कौन सा बड़ा हो गया है। हां जरा सोच विचार वाला ज्‍यादा है। पर है तो बच्‍चा ही ना।

और आज, मेरे जीवन के अंग, पिताजी नहीं दिखे। हमारे पहुंचने से पहले ही उन्‍हें सुबह हिंडोन नदी शमशान घाट पहुंचा दिया गया था। मैं बिलख बिलख बिलख कर आधा हुआ जा रहा था। माताजी मुझे अलार्म घड़ी दिखा रही थी कि उनकी भरी हुई चाबी से घड़ी अभी तक भी चल रही है। पर वे हमसे दूर चले गए। हमेशा मुझसे कहा करते थे कि मैंने हवाई जहाज का टिकट बुक करा रखा है। देखना अचानक ही किसी दिन उड़ जाऊंगा।

भाई साहब के दोस्‍त सरदार केसर सिंह मुझे दिलासा देने के लिए हंस रहे थे-अरे रोता है। तेरे बाल सफेद होने को आ रहे हैं। क्‍या बाकियों के फादर्ज की डैथ नहीं होती।

लेकिन सच मेरे फादर, मेरे फादर थे। एक अनमोेल आदर्श राह दिखाने वाले। कोई काम करने से पूर्व उसके परिणामों के विषय में सोच की हिदायत देने वाले। कमला और उसके हैंडराईटिंग, उसके बनाए चित्रों के प्रशंसक। वे बार बार बीकानेर भी आते रहे थे। बच्‍चों से हिलमिल कर खेलते थे। हिन्‍दी का कम ज्ञान रखते हुए भी धीरे धीरे मेरी कहािनयां भी पढ़ते थे। मुझे सर्विस में रहते हुए, मेरे कंडक्‍ट रूल्‍ज से भी बाखबर करते थे। मेरे दोस्‍तों विशेषकर अशोक आत्रय, अजय से भी बतियाते थे। मेरे चीफ इंस्‍पैक्‍टर श्री ओ․एन․ सक्‍सेना उनसे बेहद प्रभावित थे। उनके अनुभवों से सीख लेने को तत्‍पर रहते थे।

मैं तो पहले ही से, कभी उनके न रहने की कल्‍पना मात्र से सहम सहम उठता था कि उनके बगैर कैसे रह पाऊंगा। और आज सच मुच वे नहीं थे।

27-2-77 सुबह भाई साहब के साथ हरद्वार अपने पुश्‍तैनी पंडित शिवकुमार से पिण्‍डदान कराया। उसी दिन दोपहर गाजि़याबाद के लिए चल पड़े थे। हम लोगों ने पिताजी की नसीहत के मुताबिक, बालमुंडन नहीं किया था। और न ही हम श्राद्ध जैसी कोई रस्‍म अदायगी करते हैं। (बालमुंडन एक प्रकार से प्रचार सा बन जाता है। अगला आपको देखता है और तब पूछता है- कौन ? नहीं रहा) पिताजी प्रगतिशील विचारों वाले थे। इन चीज़ों पर उनका कोई विश्‍वास नहीं था। यह सब पंडितों के पीढ़ी दर पीढ़ी खाते चले जाने के धंधे हैं। कैसे कोई अनपढ़ विमूढ़ विक्षिप्‍त व्‍यक्‍ति ब्राह्‌मण कुल में जन्‍म लेने से पूज्‍य हो जाता है। हरद्वार के हमारे पंडित फिर भी हमारे लिए रहने ठहरने बर्तनों की व्‍यवस्‍था करते हैं। श्रम करते हैं और तो और हमारे पूर्वजों का इतिहास आदि का पूरा रिकार्ड बढि़या कागज पर अमिट स्‍याही से लिखते बताते हैं। विदेशों में तो इस चीज के लिए लोग हजारों डालर देने को भी तैयार हैं। उन्‍हें यह सब फिर भी नहीं मिलता। सो इन हमारे पंडितों की दक्षिणा तो उचित है। आगे बहुत पाखंड हैं।

मैं भी यह सोचता हूं कि साल में एक श्राद्ध करने का क्‍या मतलब। मैंने अपने स्‍टडी रूम में माताजी पिताजी का चित्र बिलकुल सामने लगा रखा है। हर प्रातः उनको श्रद्धा पूर्वक नमन करता हूं। उनके लाड प्‍यार उनसे मिली प्रेरणा को याद करता हूं ''मैं आपके ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकता। आपने ही मुझे हंसमुख होने जैसी नियामत बख्‍शी है। मैं आज भी आपकी गोद में खेल रहा हूं।

महीनों तक मैं इस सदमे से बाहर नहीं आ पाया था। सुबह उठता तो पूरा सिरहाना भीगा हुआ मिलता। यानी मैं नींद में भी रोता रहता। आंसू बहाता रहता। मुझे बार बार पी․बी․एम․ अस्‍पताल जाना पड़ता। डॉक्‍टर दिलासा/ढांढस बंधाते दुनिया तो आने जाने का तमाशा है। क्‍या इतनी मामूली बात को भी मैैं नहीं जानता। जानता तो हूं पर अपने को समझा नहीं पाता। अपने को काबू में नहीं रख सकता। अनजान लोगों के मरने, उनकी हत्‍याएं होने पर बरबस आंसू छलक आते हैं। किस मट्‌टी का बना हूं। ऐसी गीली मट्‌टी का, जो कभी सूखने का नाम नहीं लेती।

और तमाशा देखिए। पिताजी की तेरहवीं के बाद जब सुबह हम सब बीकानेर मेल से अपने क्‍वार्टर पहुंचे। मैं चाय का कप पी रहा था, चपड़ासी ने फिर दरवाजे़ पर दस्‍तक दी। मेरे ससुर चोपड़ा साहब के निधन की सूचना मिली। वह भी पिताजी की मृत्‍यु से ग़मज़दा थे। यही कहते रहते थे-वह मेरा समधी पीछे था। हमउम्र दोस्‍त भला आदमी पहले था। मैंने सब कुछ खो दिया। चोपड़ा साहब के विशाल व्‍यक्‍तित्‍व कृतित्‍व कर्ममठता, आत्‍मविश्‍वास आदि गुणों के विषय में पहले ही लिख आया हूं।

फिर उसी शाम को हम लोग बीकानेर मेल, से दूसरी सुबह, वापस ग़ाजि़याबाद जा पहुंचे।

बाद में यह चला-चली का मेला चलता रहा। बड़े जीजाजी, छोटे जीजाजी, बड़ी बहन जी, छोटी बहन जी कृष्‍णा, मेरी छोटी भतीजी स्‍नेहलता जिसको उसके ससुराल वालों ने दहेज की खातिर जला डाला था, फिर उसके गम में मेरी भरजाई जी (राणो) ने भी अपने को आग के हवाले कर दिया था। सब एक एक कर इस नश्‍वर संसार से जाते रहे। पर हम लोग कभी भी दूरी होने के कारण अथीर् के साथ न जा सके। एक दिन बाद में ही पहुंचे। सास तथा माताजी के निधन पर भी यही हुआ था।

बड़ी बहन जी सुमित्रा तो मेरी माता तुल्‍य थीं। कई दिनों तक यूं ही डोलता रहा। एक दिन यहां के राम नरेश सोनी, हिन्‍दी राजस्‍थानी गुजराती के साहित्‍यकार ने हाल पूछा तो मैं सिसक उठा। उन्‍होंने कहा-अब तुम उन पर स्‍मृति लेख लिखो। मैंने एक रेखाचित्र 'निक्‍की‘ (छोटी) के नाम से लिखा था। वह तीन जगह छपा। सबने उसे कहानी के रूप में पेश किया। सोचता हूं। मैं भी अपने अगले कहानी संकलन में इसे और बीकानेर पर लिखे रिपोतार्ज को, डाल दूं। दोनों ही महत्‍वपूर्ण हैं और किसी दूसरी किताब में शायद ही जा पाएं। मेरा बहुत कुछ लिख हुआ, पुस्‍तकाकार रूप, से अभी तक वंचित है। प्रकाशन की समस्‍याओं पर बहुत कुछ लिख ही आया हूं। लिखना कम कर रखा है। पर किसी महानुभाव के आग्रह/आश्‍वासन पर इस ग्रंथ को तो पूरा करना ही है।

अपनी निशानी छोड़ जा

अपनी कहानी छोड़ जा

जीवन बीता जाए․․․․․․․․।

ये ग्रंथ मेरे बच्‍चों के लिए भी आवश्‍यक रहेगा।

बच्‍चों की शैतानियां, चालाकियों के किस्‍से हर मां बाप के पास ढ़ेरों होते हैं। उस समय भले ही आप उनसे परेशान हो उठें। झुझलाने लगें, उसको डांटने लगें कि इसने तो हर वक्‍त हमारे नाक में दम कर रखा है। इस जैसा जिद्‌दी बच्‍चा हमने और कहीं नहीं देखा। किन्‍तु बच्‍चों की यही शरारतें होशियारियां अपनी जिद मनवाने के गुर बहुत बाद में हमें थ्रिल (पुलकित भाव विहृत) देती है। गुदगुदाती है।

हमने भ्रमण हेतु उदयपुर का कार्यक्रम बनाया। मगर बड़े लड़के विवेक जिसे हम अशू बुलाते हैं और आजकल तो अफसर लगा हुआ है।

बीच में अफसरी की एक बात और करता चलूं। और अफसरी से ज्‍यादा, ज्‍यादातर बापों की। कहते हैं ना कि सिर्फ 'बाप‘ ही ऐसा होता जो अपने बच्‍चों की प्रगति से दिलोजान से बेतहाशा खुश होता है।

मुझे जब अशु के प्रमोशन की सूचना फोन पर मिली तो आंखों में खुशी के आंसुओं की इतनी बाढ़ उमड़ पड़ी कि मुझसे बाला तक नहीं जा रहा था उसे बधाई तो क्‍या देता।

बातों का तो अंत नहीं होता। बात में से बात।

पिछले साल जब मैं और अशु गाजि़याबाद पहुंचे तो भाई साहब ने अशु से कहा आई एम प्राउड अॉफ यू जो तुम, चोपड़ा साहब और मेरे बाद, गज़ेटिड आफिसर बने। पर भाई साहब ने मुझे यह कभी नहीं कहा कि तुम्‍हारे साहित्‍यकार बनने पर मुझे गर्व है।

हां तब के अशु ने जिद पकड़ ली थी-उदयपुर नहीं जाना, जयपुर जाना है। क्‍यों? नहीं बस जयपुर ही जाना है। अरे उदयपुर झीलों की नगरी है। जयपुर से कहीं अधिक सुन्‍दर। नहीं जयपुर ही जाना है। नहीं तो मैं नहीं जाऊंगा। अकेला ही बीकानेर घर में रह लूंगा। खाना कौन खिलाएगा। भूखा रह लूंगा।

मुझे और कमला को घुटने टेकने पड़े। हम सब 11-10-78 को जयपुर पहुंचे। एक होटल में जा रूके 'मद्रास होटल‘। वहीं से मैंने अशोक आत्रेय को फोन किया। मनेजर ने उसे अपने होटल का रास्‍ता सचुएशन समझाई।

मैंने कहा अब मज़ा आएगा। अशोक से मिलकर। और वह यहीं जयपुर का चप्‍पा चप्‍पा जानता है। वही हमें पूरा जयपुर घुमा भी देगा। लेकिन अशू ने जिद पकड़ ली-नहीं पहले यहां के सबसे बड़े (फ्‍लाने) पोस्‍ट आफिस चलो।

-क्‍यों वहां क्‍या है देखने लायक।

-नहीं सबसे पहले वहीं चलना है।

-पर क्‍यों ?

अच्‍छा आप सब यहीं ठहरें। मैं अकेला ही जा रहा हूं। वह सचमुच चल पड़ने को तत्‍पर दिखा।

-अकेला तो मैं कभी न भेजूं। अभी तो बिलकुल छोटा बच्‍चा है। कमला ने प्रतिरोध किया।

-नहीं नहीं मैं इसके साथ जाऊंगा। थोड़ा ठहरो, अशोक आता ही होगा।

दस पंद्रह मिनट में अशोक हाजिर-बड़े अमीर बन गए हो। होटल में ठहरे हो। उठाओ सामान। घर चलो।

-हमें कौनसे ज्‍़यादा दिन रूकना है। अब यही ठीक हैं। पहले इसे पोस्‍ट आफि़स ले जाना है।

पोस्‍ट आफिस पहुंच कर अशू ने पोस्‍टमास्‍टर से विशेष नई पुरानी पोस्‍टल टिकटों की डिमांड शुरू कर दी।

अब मैं समझा कि यह लड़का हमे ंउदयपुर की बजाए, जयपुर क्‍यों ले लाया है। सिर्फ टिकटों की खातिर। उसे टिकटें और पुराने सिक्‍के इकट्‌ठे करने का शौक था। मुझे भी बचपन में पुराने से पुराने सिक्‍के रखने का शौक था। शेखुपरा के तमाम फेरी वाले, जब तब उनके हाथ ऐसे मुगलकालीन विक्रमादित्‍य युग या फिर रियासतों के महाराजों के सिक्‍के हाथ लगते तो मुझ