रविवार, 23 मार्च 2014

अमिताभ पाण्‍डेय का विश्‍व टी बी दिवस 24 मार्च के लिए विशेष आलेख - सेहत पर भारी एक बीमारी

विश्‍व टी बी दिवस 24 मार्च के लिए विशेष आलेख

सेहत पर भारी एक बीमारी

अमिताभ पाण्‍डेय

आजादी के बाद हमारे देश ने स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय उपलब्‍धियॉ अर्जित की है जिनके कारण गंभीर बीमारियों का त्‍वरित उपचार संभव हो सका। पोलियो जैसी बीमारी के प्रकोप से भारत अब पूरी तरह मुक्‍त हो चुका है। अब भी कुछ ऐसी बीमारी बाकी हैं जो स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में हो रहे शोध ,नई नई दवाईयों के बाद भी खत्‍म नहीं हो पाई। ट्‌यूबर कुलोसिस टी बी ऐसी ही जानलेवा बीमारी है जिसका त्‍वरित और स्‍थायी उपचार अब तक नहीं हो सका है। ऐसा उपचार जिसके बाद यह बीमारी भारत में कभी किसी को अपना शिकार न बना सके । पोलियो की तरह इस बीमारी को समूल नष्‍ट करने के प्रयास अभी सफल नहीं हो सके हैं। टी बी के ऐसे मरीज भी देखे गये हैं जो कुछ दिनों तक स्‍वस्‍थ रहने के बाद फिर से इसकी चपेट में आ जाते है। यह संक्रामक रोग स्‍वस्‍थ समाज के लिए बडी चिंता का कारण है।

यूं तो टी बी केवल एक बीमारी है लेकिन इसके पैदा होने,बने रहने के कई कारण हैं। गंदगी भरे इलाकों,धूम्रपान करने वालों,कुपोषण से पीडित परिवारों को यह तेजी से अपना शिकार बनाती है। पावरलूम में काम करने वाले बुनकर,पत्‍थरों की खदान में काम करने वाले मजदूर,,बीडी बनाने वाले महिला पुरूष बच्‍चों में टी बी का गहरा असर देखा गया है। यह बीमारी खांसने,छीकंने ,आदि के कारण तेजी से एक मरीज से दूसरे व्‍यक्ति तक तेजी से फैलती है। टी बी के कीटाणु फैलते हुए मरीज के साथ ही आसपास निरतंर सम्‍पर्क में रहनेवालों ,परिवारजनों को भी अपना शिकार बना लेते हैं।

यहॉ यह बताना जरूरी होगा कि हर साल दुनियाभर में 90 लाख से ज्‍यादा लोग टी बी से पीडित होते हैं। पीडितों में कमजोर,पिछडे, गरीब तबके के लोगों की संख्‍या अधिक होती है। ऐसे लोग जो कि भरपूर शारीरिक श्रम के बाद पर्याप्‍त पोषक तत्‍वों से वाला भोजन प्रतिदिन नहीं कर पाते उनको टी बी की बीमारी अपेक्षाकृत जल्‍दी होती है। यदि हम भारत के सन्‍दर्भ में बात करें तो हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 23 लाख लोग टी बी से पीडित होते हैं। यह जानलेवा बीमारी हर 3 मिनिट में 2 लोगों का जीवन खत्‍म कर रही है। प्रतिदिन 750 से अधिक लोगों की असमय मृत्‍यु का कारण बन रही है। भारत में हर साल 3 लाख से ज्‍यादा लोग हर साल इस बीमारी के कारण मारे जाते हैं। देश में नौजवान लोगों की मृत्‍यु के जो 4 प्रमुख कारण हैं, टी बी उनमें से एक है। यह बीमारी हर साल एक लाख से ज्‍यादा महिलाओं के सामाजिक बहिष्‍कार का कारण बनती है। ग्रामीण क्षेत्रों में भूख,गरीबी,से जूझती महिलाएं टी बी से पीडित हो जाने के बाद अपने ही परिवार में उपेक्षा, उत्‍पीड़न का शिकार होती देखी गइ्र है। गरीब परिवारों में यदि कोई बच्‍चा इसका शिकार हो जाये तो उसके ठीक होने या बचने की संभावना बिलकुल कम होती है।

कई बार यह भी देखा गया है कि महिलाएं और बच्‍चे अकारण ही टी बी की चपेट में आ जाते हैं । इस सम्‍बन्‍ध में मध्‍यप्रदेश के पन्‍ना जिले के पन्‍ना विकासखण्‍ड अन्‍तर्गत ग्राम माझा का उदाहरण देना जरूरी होगा। इस गॉव के ज्‍यादातर निवासी पत्‍थर की खदानों में काम करके अपना जीवनयापन करते हैं। पत्‍थर की खदान में काम करते हुए युवा राजेश टी बी का शिकार हो गया । खांसते छींकते हुए यह बीमारी उसके 4 वर्षीय बेटे नरेश को भी हो गई। बीमार की वजह से राजेश का काम पर जाना बंद हो गया तो उसकी आर्थिक स्‍थिति ज्‍यादा बिगड गई । मजदूरी बंद हो जाने से वह खुद का तो इलाज करवा ही नहीं पा रहा था तो बेटे के लिए क्‍या करता ? परिणाम यह हुआ कि बीमारी के कारण पहले नरेश और फिर राजेश की मौत हो गई। मध्‍यप्रदेश के विदिशा जिले के गंजबासौदा, शिवपुरी जिले के पिछोर , कटनी जिले के आसपास ग्रामीण क्षेत्रों में पत्‍थर निकालने का काम प्रमुखता से होता है जिसमें बडी संख्‍या में ग्रामीणजन काम करते हैं । पत्‍थर निकालते हुए ,मजदूरी करते हुए वे कब टी बी का शिकार हो जाते हैं ? कई बार इसका पता ही नहीं चलता ।

कुछ इसी से मिला जुला हाल बुरहानपुर क्षेत्र में पावरलूम पर काम करने वाले मजदूरों, सागर क्षेत्र में बीडी बनाने में जुटे मजदूरों का भी है। रोटी रोजगार के चक्‍कर में ये लोग धीरे धीरे टी बी के कारण मौत की तरफ बढ़ रहे हैं। टी बी से निपटने के लिए केन्‍द्र ओर राज्‍य की सरकारें, अशासकीय संगठन अनेक योजनाओं, कार्यक्रमों के संचालन का दावा करते हैं लेकिन टी बी से लगातार होने वाली मौत सरकारी दावों पर सवाल खडे करती है। टी बी से निपटने के लिए जो योजनाएं चलाई जा रही है, उनकी गहराई से समीक्षा करने की जरूरत है। इन योजनाओं का प्रचार प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरी है। स्‍कूलों,आगंनवाडियों से लेकर मजदूरों के काम करने वाली तमाम जगहों पर टी बी की जॉच उपचार के लिए नियमित और निरतंर कार्यक्रम चलाएं जाये तो इस बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है। केन्‍द्र सरकार ने टी बी की बीमारी से निपटने के लिए लगभग 750 करोड़ रूपये का प्रावधान बजट में किया है। यह राशि खर्च हो जाने के बाद टी बी पूरी तरह खत्‍म हो जायेगी ,ऐसा कहना मुश्‍किल ही है।

1 blogger-facebook:

  1. पैसा जरूर खत्म हो जायेगा टी बी पर नहीं बी बी पर :)
    टी बी अपनी जगह रहेगी कार्यक्रम चलते रहेंगे ।

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