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आलोक कुमार सातपुते की 3 लघुकथाएँ

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सावधान

उस घर के गेट पर लिखा हुआ था-कुत्तों से सावधान। एक आदमी ने डरते-डरते उस घर के दरवाज़े की कॉल-बेल बजायी और खतरनाक कुत्तों की भौंक सुनने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो गया, लेकिन उसे सुखद आश्चर्य तब हुआ, जब एक लड़की ने दरवाज़ा खोला और कहा-आइये अंकल अन्‍दर आ जाइये।

पर वो कुत्ते...उस आदमी ने संशय के साथ पूछा।

अंकल वो क्‍या है कि इस कॉलोनी में चोरियाँ बहुत होती हैं, और चोरों से बचने के लिए यह एक अच्‍छा उपाय है। इसके अलावा इससे बिना किसी अतिरिक्‍त खर्च के हमारी सम्‍पन्‍नता भी बढ़ी हुई दिखती है

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दान

‘ये देखो, एक घुमक्‍कड़ बाबा ने मुझे मोती-मूँगा और पुखराज रत्‍न दिया और मैंने उसे सिर्फ़ सौ रूपये टिका दिया...मानते हो कि नहीं, कि हम भी उस्‍ताद हैं।'

‘‘अरे यार ये तो कोई अन्‍धा भी बता देगा कि ये रत्‍न नक़ली हैं। इस मोती की तो पॉलिश भी निकल रही है। ये रत्‍न तो दस रूपये में भी महँगे हैं।''

‘छोड़ो ना यार, वो बाबा बड़ा ही सिद्ध पुरुष था। उसने मुझे भरपूर दुआएँ दीं। आज जहाँ माँ-बाप तक अपने बच्‍चों को पानी पी-पीकर कोसते हों, वहाँ उसने मुझे दुआएँ दीं..समझो मैंने उसे उसकी दुआओं के बदले में पैसे दे दिये।'

‘‘अरे भइया ऐसे में तो हर आदमी दुआओं का कारोबार शुरू कर देगा।''

‘अरे यार आप तो हमेशा निगे़टिव सोचते हो। अरे भाई दान-घरम भी तो कोई चीज है। समझो हमने सौ रूपये दान कर दिये।'

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सॉरी

‘क्‍यों आपने मेरी गाड़ी को पीछे से क्‍यों ठोंका?'

‘‘सॉरी!''

‘क्‍या सॉरी? मेरी गाड़ी की बैकलाइट फूट गयी।'

‘‘मैंने कहा ना सॉरी।''

‘अरे आप तो सॉरी ऐसे कह रहे हैं, जैसे अहसान कर रहे हों।'

‘‘अबे साले जब से सॉरी बोल रहा हूँ। तेरे को समझ में नहीं आता है क्‍या? बताऊँ क्‍या तेरे को?''

‘मुआफ़़ कीजियेगा भाई-साहब ग़लती मेरी ही थी। दरअसल मैं ही आपकी गाड़ी के सामने आ गया था...सॉरी।'

प्रमाणित किया जाता है कि प्रस्‍तुत सभी लघुकथाएं मेरी मौलिक रचनाएं हैं।

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अरुण कुमार झा


लघु कथाएँ अच्छी हैं | लेखक को बधाई |

पहली कहानी सार्थकता सिद्ध करती है ! शेष दौनो भी ठीक हैं !

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