शनिवार, 1 मार्च 2014

मनोज 'आजिज़' की लघुकथा

(लघुकथा )

उत्ताप 

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शादी की भीड़ थी । दुल्हा कुछ ही मिनटों में पहुँचने वाला था । गाजे-बाजे की आवाज़ आ रही थी । लोग व्यस्त थे । मेहमानों का आना-जाना लगा हुआ था । कुछ मेहमान जरुरत से ज्यादा गम्भीर  लग रहे थे । कुछ हंसी-मजाक में मशगूल थे तो कुछ कोने में खड़े होकर हर सुन्दर महिला पर अपने साथियों के साथ तेज-भेदी नजरों से शारीरिक गठन पर चर्चा कर रहे थे । कुछ युवा-युवती अपने पोशाक को लेकर पसोपेश में थे । इसी बीच बारात पहुँच गई । दूल्हा को झाँक-झाँक कर देखने की होड़ सी लग गई । रात के ग्यारह बज रहे थे । ठंड जोरों पर थी पर आँगन में उत्सव का माहौल । गाड़ी निकलकर दूल्हा चलने ही लगा था कि कुछ महिलाएं अपनी नृत्य-कला दिखाने लगी । घूम-घूम कर, लचक-लचक कर और बेसुध खुद को भुलाकर ठुमके लगा रहीं थीं । किसी ने भी ऊनी कपड़े पहन नहीं रखे थे । सबकी पीठ लगभग खुली, सपाट । साड़ियाँ भी उस ठंड के लिए नहीं थीं । 

किसी ने कहा-- धन्य है प्रभु, इन्हें ठंड नहीं लगती ! 

पास ही खड़े एक बुजुर्ग ने कहा-- जी नहीं, इन्हें ठंड कैसे लगेगी? ये फैशन का उत्ताप है ।

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