रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

महावीर सरन जैन का संस्मरण - प्रो॰एन॰ई॰विश्वनाथ अय्यर: स्मृतियों को नमन

प्रो॰एन॰ई॰विश्वनाथ अय्यर: स्मृतियों को नमन

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

डॉ. गोपीनाथन के कारण दक्षिण के एक प्रमुख हिन्दी सेवी आचार्य और लेखक प्रो॰एन॰ई॰विश्वनाथ अय्यर के दुखद निधन का समाचार यहाँ अमेरिका में प्राप्त हुआ। श्री प्रो॰एन॰ई॰विश्वनाथ अय्यर से मेरी पहली मुलाकात केरल के एर्नाकुलम में दिसम्बर, 1965 में हुई थी। उन दिनों केरल विश्वविद्यालय का हिन्दी विभाग त्रिवेन्द्रम (तिरुवनन्तपुरम) में न होकर एर्नाकुलम में स्थित था जिसके अध्यक्ष प्रोफेसर चन्द्रहासन थे। उन्होंने केरल विश्वविद्यालय के तत्वावधान में विश्वविद्यालयों के हिन्दी प्राध्यपकों की संगोष्ठी आयोजित की थी। केरल विश्वविद्यालय की ओर से भारत के विश्वविद्यालयों को पत्र भेजकर यह अनुरोध किया गया था कि वे अपने विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के एक प्राध्यापक को संगोष्ठी के लिए प्रतिनियुक्त करें। प्रतिनियुक्त प्राध्यापक से यह अपेक्षा की गई थी कि वे संगोष्ठी में किसी विषय पर शोध निबंध का वाचन करें। मैंने इस संगोष्ठी में जबलपुर के विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया और “भारतवर्ष में अन्य भाषा शिक्षण की समस्याएँ” शीर्षक शोध निबंध का वाचन किया। इसे केरल की सचित्र हिन्दी पत्रिका “युग प्रभात” ने प्रकाशित किया (वर्ष 10, अंक 10, मार्च, 1966, पृष्ठ 15 – 18)। इस संगोष्ठी में प्रोफेसर चन्द्रहासन ने हिन्दी एवं मलयालम के कुछ रचनाकारों को भी आमंत्रित किया था। हिन्दी के जो रचनाकार इस संगोष्ठी में सम्मलित हुए, उनमें रामधारी सिंह दिनकर, मोहन राकेश एवं राजेन्द्र यादव प्रमुख थे।संगोष्ठी के बाद प्रोफेसर चन्द्रहासन के सहयोगी डॉ. एन. ई. विश्वनाथ अय्यर ने यह प्रस्ताव रखा कि हम त्रिवेन्द्रम रुकते हुए कन्याकुमारी की भी यात्रा करें। उनके सौजन्य के कारण ही हम सात आठ लोग एक दल के रूप में केरल के तिरुवनंतपुरम एवं कन्याकुमारी आदि स्थानों की यात्रा कर सके। हमारी यात्रा की सम्पूर्ण योजना एवं व्यवस्था का दायित्व उन्होंने सहज उल्लास के साथ निबाहा। राजेन्द्र यादव के प्रसंग से मैं इसका उल्लेख पहले कर चुका हूँ। ( रचनाकार: महावीर सरन जैन का संस्मरण - राजेन्द्र यादव : खट्टी मीठी यादें http://www.rachanakar.org/2013/10/blog-post_1090.html#ixzz2vb5ZDoAi)

मुझे एर्नाकुलम में विश्वनाथ अय्यर का अतिरिक्त स्नेह-भाव परिलक्षित हुआ। इसका कारण सम्भवतः यह था कि उन्होंने नन्द दुलारे वाजपेयी के निर्देशन में आधुनिक हिन्दी मलयालम काव्य पर सागर के विश्वविद्यालय से शोध-कार्य सम्पन्न किया था और मैं सागर के नजदीक जबलपुर के विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व कर रहा था। प्रस्तुत लेख लिखते समय मेरे मन में उनके आत्मीय व्यक्तित्व का बिंब उभर रहा है। उनके व्यक्तित्व की शालीनता एवं उदात्त उत्कृष्टता की छाप मेरे मन पर अंकित है। मैं उनकी आत्मा की सद् गति की कामना करता हूँ तथा प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि वह उनके परिवार के सभी सदस्यों को इस शोक को सहन करने की शक्ति प्रदान करे।

हम सब जानते हैं कि भारतीय साधना परम्परा के अनुसार मृत्यु यात्रा का एक पड़ाव है - नवीन जीवन प्राप्त करने का उपक्रम। गीता का वचन है :- 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु ध्रुवं जन्म मृत्स्य च'। वैसे भी जितना कार्य उन्होंने सम्पन्न किया है, उनका कार्य उन्हें सदा अमर बनाए रखेगा। मगर जब कोई आत्मीय दिवंगत होता है तो बुद्धि कुंठित हो जाती है तथा मन में संचित दिवंगत की स्मृतियाँ प्रखर हो उठती हैं। मन का शोकाकुल होना सहज होता है। अब धीरे धीरे मित्र उस पार की यात्रा के लिए विदा हो रहे हैं। विदा तो सबको होना ही है। संतोष का कारक यह भाव ही होता है कि आत्म-शक्ति कभी नष्ट नहीं होती, उसका रूप बदलता रहता है। अगले जन्म में क्या होगा। कौन बता सकता है। सम्भवतः ऐसे ही क्षणों को ध्यान में रखकर बच्चन ने लिखा होगा – “ इस पार प्रिय तुम हो, मधु है, उस पार न जाने क्या होगा”।

जब मैंने सन् 1992 में, जबलपुर के विश्वविद्यालय से आकर भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक का पद-भार ग्रहण कर लिया तो मेरी केरल की यात्राएँ अधिक होने लगीं। इस कारण मेरी प्रो॰एन॰ई॰विश्वनाथ अय्यर से मुलाकातें भी अधिक होने लगी। प्रो॰एन॰ई॰विश्वनाथ अय्यर हमारे संस्थान के मण्डल के सदस्य थे। इस कारण उनका आगमन आगरा होता था और इस कारण भी उनसे मुलाकातें होती थीं।

प्रो॰एन॰ई॰विश्वनाथ अय्यर न केवल कर्मठ अध्यापक और शोधक थे, वे ललित निबंधों के अनुपम रचनाकार भी थे। उन्होंने मुझे अपने ललित निबंधों की एक पुस्तक आगरा में उपहार में दी तथा आग्रह किया कि मैं उसे आद्योपांत पढ़ूँ। मैं इस समय चूँकि अमेरिका में हूँ तथा उक्त पुस्तक की प्रति मेरे पास यहाँ नहीं है, इस कारण उसका शीर्षक मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है मगर जहाँ तक स्मृति जा रही है उसका शीर्षक था: “ फूल और काँटे”। शीर्षक कुछ भी हो, मुझे पुस्तक के सभी निबंध बेहद पसंद आए। हमने भारत के महामहिम राष्ट्रपति जी के कर कमलों से उनको संस्थान के पुरस्कार से सम्मानित कराया। चयन समिति के सदस्यों को मैंने उनकी उक्त पुस्तक के निबंधों की गुणवत्ता की जानकारी दी तथा वह पुस्तक पुरस्कार पाने का निमित्त कारण बनी। जिन लोगों को प्रो॰एन॰ई॰विश्वनाथ अय्यर के निबंधों की पुस्तक प्राप्त न हो सके उनसे मेरा निवेदन है कि वे भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की “संस्कृति पत्रिका” के अंक 3, मार्च, 2002 के अंक में प्रकाशित प्रो॰एन॰ई॰विश्वनाथ अय्यर का “पर्यटन और भारतीय साहित्य” शीर्षक लेख अवश्य पढ़ें।

केरलीयों की हिन्दी सेवा विषय पर जिन विद्वानों ने कार्य किया है उनमें सबसे अधिक प्रामाणिक काम मुझे दो मित्रों का लगा है – (1) प्रो॰एन॰ई॰विश्वनाथ अय्यर तथा (2) प्रोफेसर जी. गोपीनाथन।

इस स्मृति लेख को लिखते समय उनके साथ जुड़े अनेक प्रसंग याद आ रहे हैं मगर समय का अभाव है तथा सब यादों को लिपिबद्ध करने की इस समय मुझमें सामर्थ्य भी नहीं है। सम्प्रति, मैं उनकी स्मृतियों को नमन करता हूँ।

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

855 DE ANZA COURT

C A 95035-4504

(U. S. A.)

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

अरुण कुमार झा

प्रो.एन.ई.विश्वनाथ अय्यर से मेरा परिचय उनके द्वारा हिंदी भाषा के हितार्थ लिखी गई पुस्तकों तथा समय समय पर राजभाषा विभाग की पत्रिका - 'राजभाषा भारती' में प्रकाशित उनके लेखों के जरिए रहा है | विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक हिंदी को अध्ययन की एक स्वतंत्र विधा मानने के उनके विचार का मैं प्रसंशक रहा हूँ |अनुवाद से संबंद्ध उनके कार्यों और सैद्धांतिक विमर्शों का जिक्र मैंने कई जगहों पर किया है | उनकी इन यादों को सादर नमन |

मुझे भी दिल्ली की एक सभा में उन के दर्शन का सौभाग्य मिला था । उन की पुण्यात्मा को नमन ।

प्रो॰महावीर शरण की विश्वनाथ अय्यर पर टिप्पणी पढ़ कर अच्छा लगा॰विश्वनाथ अय्यरजी यूनिवर्सिटी कालेज में हमारे अध्यापक थे,बाद में कोचीन विश्व विद्यालय केंद्र में करीब दो वर्ष मैं उन का सहयोगी रहा॰उस के बाद हम कालीकट,कोचीन या अन्य जगहों में सम्पन्न गोष्ठियों में मिलते थे॰लंदन के विश्व हिन्दी सम्मेलन में वे कुछ देरी से पहुंचे,तबीयत भी उतनी ठीक नहीं थी॰उस समय मैंने और शौरी राजनने मिलकर उन की समुचित व्यवस्था की थी॰लंदन यात्रा पर भी उनहों ने कुछ लिखा जो शायद प्रकाशित भी हुआ।उन के ललित निबंध ज्यादातर उन के अपने स्वाती प्रकाशन से प्रकाशित हुये,कुछ दिल्ली के प्रकाशकों के यहाँ से भी निकले॰उन के अनूदित उपन्यास बड़े रोचक हैं और अनुवाद पर लिखी गयी किताबें भी बहुत उपयोगी हैं॰हिन्दी जगत ऐसे हिन्दी सेवियों के साहित्य पर ध्यान दे तो उचित ही होगा॰ प्रो॰जी॰गोपीनाथन,कालीकट॰

स्वर्गीय विश्वनाथ अय्यर पर लिखी गयी डा॰महावीर सरन जैन की टिप्पणी अच्छी लगी,
विश्वनाथ ऐयर की रचनाओं पर हिन्दी जगत का ध्यान जानाही चाहिए॰

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget