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रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - कृपया सभ्यता का परिचय दें

चिन्ता से मुक्ति पाने के लिए हम एक अदद दीवार की ओर मुँह करके, दोनों पैरों पर “विश्श्श्राम्..” की मुद्रा में आए और आगे की कार्रवाई शुरू करने ही वाले थे कि देखते हैं कि लगभग आँखों की ऊँचाई पर दीवार पर एक कागज चिपका है, जिस पर मोटे अक्षरों में लिखा है- ‘कृपया सभ्यता का परिचय दें।’ यह देखकर हमने कुछ लमहों के लिए चिन्ता छोड़ चिन्तन का रुख किया। बहुत सोचने पर भी समझ नहीं आया कि सभ्यता को कहाँ से पकड़ लाएं, ताकि उसका परिचय दिया जा सके। बहुत दिनों से सभ्यता कहीं दिखी भी नहीं। बल्कि अब तो रफ़्ता-रफ़्ता हम यह भी भूल गए हैं कि सभ्यता है किस चिड़िया का नाम!

देर तक खोपड़ी खुजलाने पर याद आया कि स्कूल-कॉलेज में बहुत सी मानव-सभ्यताओं के बारे में पढ़ा था- नील नदी की सभ्यता, मेसोपोटामिया की सभ्यता, चीन की सभ्यता, सिन्धु घाटी की सभ्यता, दज़ला-फरात की सभ्यता। ये सारी सभ्यताएँ नदियों के किनारे पनपीं और फिर नदियों द्वारा ही लील ली गईं। इधर हम हैं कि अपनी नदियों को ही लीलने पर आमादा हैं। बहरहाल.. अपने गंगा-जमुना के दोआबे में भी बनारस जैसे दुनिया के सबसे पुराने नगर हैं। किन्तु दोआबे में ऐसी किसी सभ्यता का पुरजोर ज़िक्र नहीं मिलता, जिसे नील और सिन्धु घाटी की सभ्यताओं के समकक्ष खड़ा किया जा सके। अलबत्ता यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति... के क्रम में अपने इस दोआबे में अवतारी पुरुष खूब हुए। कभी राम बनकर तो कभी कृष्ण बनकर। लेकिन ये लोग यहाँ सभ्यता की मौजूदगी के कारण, उसके स्वाभाविक उत्पाद या बाइ-प्रोडक्ट के रूप में नहीं पैदा हुए, बल्कि असभ्यता, अधर्म, अनाचार आदि के अतिरेक की प्रतिक्रिया-स्वरूप इन्हें मज़बूरी में या परिस्थितिवश अवतरित होना पड़ा- परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्, धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे। जैन और बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महावीर जी और महात्मा बुद्ध भी यहीं, इसी दोआबे में पैदा हुए। किन्तु उन्होंने जिन अहिंसावादी धर्मों का प्रवर्तन किया वे हिन्दुओं के हिंसक, यज्ञ और कर्म-काण्ड-प्रधान धार्मिक लोकाचारों की प्रतिक्रिया तथा उस समय के कृषि-बहुल समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप थे।

तो ऐसे प्रान्तों में जहाँ खुद भगवान लोगों को धर्म की संस्थापना के लिए खुत अवतरित होना पड़ता है, वहाँ दीवार पर पर्चा चस्पा देखकर हम सभ्यता को कहाँ से पकड़ कर लाएं कि उसका परिचय किसी से कराया जा सके?

पहले कोई गलती हो जाती थी तो बड़े-बुजुर्ग और जानने-पहचानने वाले लोग ताने देते थे- स्कूल में पढ़ने जाते हो तो मास्टर लोग वहाँ यही सिखाते हैं क्या? स्कूल में कोई गलती करो तो मास्टर ताने देते थे- घर वालों ने यही संस्कार दिए हैं क्या? अब समय बदल गया है। अध्यापकों और अभिभावकों को अब इस लानत से बरी कर दिया गया है। सभ्यता और संस्कार की कमी होने पर अब मास्टरों और घरवालों, दोनों को कोई ताने-वाने नहीं देता। बल्कि सारे ताने-मेहने सहने के लिए अब टेलीविजन, फिल्में, इंटरनेट आदि ढेरों दूसरी चीज़ें आ गई हैं। कोई भी गलत काम होता दिखे, उसका ठीकरा इन्हीं में से किसी के नाम फोड़ दीजिए। इसके बावजूद इनमें से कोई भी चीज उठाकर घर या समाज से बाहर नहीं फेंकी जाती- न टीवी, न इंटरनेट, न फिल्में, न गंदी सीडियाँ, न मोबाइल फोन। यानी हमने गंदगी के साथ सामंजस्य बिठाकर रहना सीख लिया है। इसमें हम माहिर हैं। हम चिकने घड़े हैं, गंदगी हमारा क्या बिगाड़ लेगी!!

पर सभ्यता का सवाल तो अपनी जगह कायम है। हम बत्ती लेकर उसे खोज रहे हैं। मरजानी सभ्यता कहीं दिखाई नहीं पड़ती। सच तो यह है कि सभ्यता किसी की बांदी या गाय-बछिया तो है नहीं कि अँगने-दरवाज़े पड़ी रहेगी। उसे अर्जित करना पड़ता है। बहुत सलीके से सजा-संवारकर, सहेजकर रखना पड़ता है। सभ्यता सीखने के लिए प्राचीन काल से ही भारत के लोग अपने बेटों को अच्छे गुरु-जनों के आश्रम भेजते रहे हैं। सबको जाना पडा, चाहे राम रहे हों या कृष्ण, पाण्डव रहे हों या कौरव, देवता रहे हों या दानव। सभ्यता चाहिए तो गुरु के पास जाओ, वरना बिना पूँछ के पशु बने बण्ड की तरह घूमो। बेटियों के लिए वैसी व्यवस्था तब नहीं थी और यह माना जाता था कि वे पैदाइशी सभ्य होती हैं। दरअसल तब की बेटियाँ इतनी ज्यादा सभ्य मानी जाती थीं कि बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र को उनकी सभ्यता की रक्षा करने का प्रावधान किया गया। इसकी उलट मान्यता भी रही तो कोई आश्चर्य नहीं (स्त्रीणां स्वातंत्र्यं न अर्हति)। खैर.. बालकों को सभ्य बनाने की व्यवस्था तो अपने यहाँ रही है और उसके प्रमाण हैं।

तो अब ऐसा क्या हो गया कि बड़े-बड़े नामी-गिरामी गुरु-घण्टालों के रहते भी लोग सभ्य नहीं रहे, और यदि हों भी तो सभ्यता का परिचय नहीं देते? जबसे दीवार पर लिखा देखा है, बस यही सवाल हमें निरन्तर मथ रहा है। मंथन की प्रक्रिया पूरी होती और हमारे मन के महासागर से निष्कर्षों के रत्न निकलना शुरू होते, उससे पहले ही हमारे तालीम और तहज़ीब के शहर, यानी लखनऊ में दिन-दहाड़े गोली मारकर दो लोगों की हत्या कर दी गई। जिस लखनऊ को हासिल करने के लिए अंग्रेजों को वाज़िद अली शाह से कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा और खून की एक बूँद ज़ाया किए बिना, जिसकी सत्ता हिन्दुस्तानियों के हाथ से अंग्रेजों के हाथ चली गई, उसी अमन-पसन्द लखनऊ में दो-दो रुपल्ली के लिए खून हो जाते हैं। लेकिन इनमें से एक खून दो रुपल्ली की प्रतीकात्मक आन-बान-शान के लिए नहीं, बल्कि तेरह लाख रुपये की मोटी रकम लूटने के लिए हुआ। कारण? चुनाव आ रहे हैं। पैसों का जुगाड़ करना है। दूसरा खून रंजिशन हुआ। जैसे आर्कमिडीज को कपड़े उतारकर बाथ-टब में घुसते ही उत्प्वालन बल का सिद्धान्त हाथ लग गया था, वैसे ही दिन-दहाड़े हुई इन दो हत्याओं की खबर सुनते ही हमारे सवाल का जवाब हमें सूझ गया। यूरेका... सभ्यता तो यह रही!!

पाठक सोचेंगे, क्या फालतू बात है! लूट, डकैती और हत्या में सभ्यता कहाँ! यह तो बर्बरता है!

हमारा कथन है- यही तो हमारी सभ्यता है। अपने मतलब के लिए दूसरे का गला काट लो। भूखे भिखारी और विपन्न आम आदमी के मुँह का निवाला छीनकर अपने कुत्ते को खिला दो, या नाली में फेंक दो। किसी को चैन से न रहने दो। अपनी प्रभुता दिखाने के लिए सबकी नींद हराम किए रहो। सीधी राह जाते भले आदमियों पर अपना रौब ग़ालिब करो और उन्हें रात-दिन आतंकित किए रहो। देश को लूटो और अपना घर भरो। अपने घर में जगह कम पड़ जाए तो विदेश में कोई घर या दूसरा ठिकाना ढूंढ़ो और उसे भरो। चाहे उस लूट के माल को निकालने भर का जीवन भी अपने पास शेष न हो, दरवाज़े पर यमदूत की दस्तक सुनाई दे रही हो, किन्तु मरते दम तक लूटो और विदेश में रखी अपनी ऐशगाह में ले जाकर भरो। यह उत्तर-मध्यकालीन नादिरशाही ही हमारी सभ्यता का आधुनिक चेहरा है। आलेख के आरंभ में हमने दुनिया की कुछ खास-खास नदी घाटी सभ्यताओं का ज़िक्र किया था। तो अपने देश की इस समकालिक सभ्यता को हम क्या कहेंगे? इस प्रपत्ति का जनक तो नहीं, किन्तु उद्घाटक होने की हैसियत से नामकरण का यह विशेषाधिकार मेरा है और मैं कुख्यात डकैतों की कर्म-भूमि चम्बल के बीहड़ों से साम्य के आधार पर इसे ‘चम्बल घाटी की सभ्यता’ नाम देता हूँ। अब मैं किसी भी दीवार पर चिन्ता-मुक्त हो सकता हूँ। मैंने सभ्यता का परिचय दे दिया है।

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akhilesh chandra srivastava

वाह भाई रामबृक्ष जी आखिर आपने
सभ्यता को ढूँढ ही निकाला और चटपट
उसका अनोखा नामकरण कर उसका
परिचय भी देकर चिंतामुक्तभी हो गये
सुंदर व्यँग के लिये बधाई और साधुवाद

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