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प्रमोद यादव का व्यंग्य - हैप्पी होली

हेप्पी होली / प्रमोद यादव

‘गुरूजी.. एक बात कहूँ ?‘ भोला ने भंग की तरंग में झूमते कहा.

‘ हाँ..हाँ..कहो..बेशक कहो..’ मैंने उसे बढ़ावा दिया.

‘गुरूजी.....इस बार होली और चुनाव “ हम साथ-साथ हैं” की तर्ज पर फगुनौटी फिजा में साथ-साथ प्रगटे हैं तो किसका मजा लें ?’ उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे घूरा.

‘ ये तो तुम्हारी मर्जी है भोले..पर हमारी ही सुनना है तो यही कहेंगे-चुनावी होली ही खेलो...हर साल तो रंग,अबीर,गुलाल उड़ाकर मजा लेते ही हो..इस बार नेताओं के साथ, नेताओं की तरह एक-दूजे पर कीचड़ उछाल होली खेलो..’

‘ आपने मेरे मुँह की बात छीन ली गुरूजी...पर कैसे ? मैंने तो आज तक किसी नेता को नमस्ते तक नहीं किया..किसी पार्टी के दफ्तर नहीं गया..किसी से कोई काम नहीं करवाया.. किसी को कभी रिश्वत नहीं दिया..ना ही किसी नेता ने मेरा कोई काम किया..अब एकाएक होली कैसे खेलें और किस पार्टी के नेता से खेलें ? वह हताश सा हो गया.

‘ पहले ये बताओ भोले. तुम्हें ये लाइन ( नेतागिरी वाला ) पसंद है या नहीं ?’.

‘ सौ फीसदी पसंद है गुरूजी...इनके ठाठ-बाट देखकर चकित रह जाता हूँ..कई-कई नेताओं को देखा है-एकदम झक सफ़ेद कुरता-पाजामा पहने.. जैसे- आसमान से आया फ़रिश्ता..दिन भर हाथ जोड़े..तुम्हीं हो माता..पिता तुम्हीं हो के अंदाज में...इस आफिस से उस आफिस...इस मोहल्ले से उस मोहल्ले विचरते...बेपरवाह गोल्लरों की तरह.. .चेहरे पे हमेशा लम्बी मुस्कान लिए ...बिनाका फ्लोराइड वाला.. और घोर निश्चिंतता लिए सेवाभाव से ओत-प्रोत..मदर टेरेसा जैसे.. कभी समझ नहीं पाया कि ऐसे ऊँचे ठाठ-बाट के लिए इन्हें पैसा कौन देता है ?’

‘ यही तो राज की बातें है भोले...राजनीति में पैसा अपार है.. पर दिखता नहीं.. छोटा से छोटा नेता भी जानता है कि उसे कहाँ से और किस तरह दुहना है..अब तो अदना सा कार्यकर्त्ता भी पार्टी पकड़ते ही दोहन शुरू कर देता है..धीरज का अब ज़माना ही ना रहा..’ मैंने अपना राजनितिक ज्ञान बघारा.

‘ ठीक कहते है गुरूजी..धीरज तो कहीं है ही नहीं..मेरे घरवाले भी कहीं धीरज से काम लिए होते तो आज मैं भी नेता होता..मंत्री होता..फ़रिश्ता होता..‘

‘ वो कैसे ?’ मैंने पूछा.

.’ छुटपन में एक बार वार्ड मेंबर के चुनाव में अन्य बच्चों के साथ टाफी के लालच में प्रचार करने एक चुनावी जीप में चढ़ गया.. लौटने पर घर में मेरी अच्छी-खासी पिटाई हो गई ..’ वह दुखड़ा रोने लगा.

‘ बस..इत्ती सी बात पर पिटाई हो गई ? ‘मैं हैरान हुआ.

‘ हाँ गुरूजी... उस जमाने के एक छुटभैय्ये नेता ने उस दिन घर आकर बाबूजी से मेरी शिकायत कर दी कि अपने लाडले को सम्हालो..किसी दिन यह बहुत बड़ा नेता बन जाएगा.. बाबूजी ने पूछा कि क्या गजब ढाया इसने ? तब उन्होंने बताया कि हमारी जीप में बैठकर चुनाव प्रचार कर रहा था और खीसे में विरोधी पार्टी का बिल्ला लगाये बैठा था....बड़ा दुस्साहसी है आपका लड़का... बस..पिटाई के साथ बाबूजी ने एलान कर दिया कि कभी भूले से भी किसी नेता या पार्टी के साथ दिखूं तो खैर नहीं....मेट्रिक निकला नहीं कि नौकरी लगा दी ताकि मैं नेता या मंत्री ना बनूँ...और इस तरह मैं चुक गया..नेता और मंत्री बनने से..’

‘ कोई बात नहीं भोले....विधि के विधान को भला कौन टाल सकता है ? पर तुम चाहते तो अपनी मंशा पूरी कर सकते थे-अपने बच्चों को इस लाइन में धकेल के..’ मेरी बात पूरी भी नहीं हुई कि वह रुआंसा हो बोला-

‘विचार तो ऐसा ही कुछ था..पर पत्नी मुझे धकेलने तैयार खड़ी थी..उसका कहना था कि नेताओं की तरह ( और कुछ-कुछ मेरी तरह ) बच्चों को भ्रष्ट नहीं बनाना है..चुपचाप इन्हें पढ़ाकर कोई ढंग की नौकरी लगाओ..और वही मैंने किया..जोरू से भला कोई कभी जोर-जबरदस्ती कर पाया है.. देवतागण तक फेल रहे तो मैं भला किस खेत की मूली ?..बस दोनों भाई नौकरी की नकेल में बंधे जिंदगी गुजार रहे..’ वह पछतावे के अंदाज में बोला.

‘ कोई बात नहीं भोला..दिल छोटा मत करो..जो होना है वो होकर रहता है..अब मुझे ही देखो..मेरे दोनों बच्चे निपट गधे....पढ़ते ही नहीं थे..तब पत्नी बोली- इन्हें ऐसी जगह डालो जहाँ कुछ हो ना हो.. पर पैसा जरुर हो....वो भी अपार..तो मैंने इन्हें बचपन से ही राजनीति में डाल दिया..यह बिना पूँजी का धंधा है..जोरू की बात भला मैं भी कहाँ टाल सकता था..आज दोनों बेटे निगम में पार्षद हैं...एक सत्तारूढ़ पार्टी में तो दूसरा-विरोधी पार्टी में..हर पांच साल में सरकार बदलती है पर मेरे यहाँ कुछ नहीं बदलता..ना ही मेरे लड़के न मैं ..क्योंकि हर बार मेरा एक बेटा सत्ता में होता है..और दूसरा विपक्ष में .तुमने “ सोने में सुहागा ” वाला मुहावरा तो सुना ही होगा..किसी दिन घर आके देख भी लेना .एक सोना है तो दूसरा सुहागा...इनके चलते हर काम आसानी से निपट जाता है..अपना भी और गैरों का भी..गैरों के काम निपटाने थोड़ी- बहुत दान-दक्षिणा ले लेता हूँ....ऐसा ना करूँ तो भीड़ ही लग जायेगी काम करवाने वालों की...’

‘ ठीक कहते हैं गुरूजी..जब बड़े-बड़े साधू-संत,महात्मा को दान - दक्षिणा से गुरेज नहीं तो आप क्यों करें ? उसने हामी भरते कहा.

‘ तो बताओ भोला..चुनाव के टिकट घोषित होने लगे हैं..पक्ष-विपक्ष दोनों चिंतन-मंथन में व्यस्त हैं..कई सौभाग्यशालियों के टिकट तय.. तो कुछ बदनसीबों के कट गए हैं..जिन्हें मिली वे अभी से समर्थकों के साथ होली मनाते रंग-गुलाल से सराबोर हैं..भूल गए कि अभी मतदान भी होना है..गिनती भी होनी है..अक्सर देखा गया है कि गिनती के वक्त गिनती के लोग ही रह जाते हैं..जो गायब होते हैं वे विजयी पार्टी के जुलूस में चेहरों पर रंग-गुलाल लगाये “ बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना “ जैसे धमाल करते दिख जाते हैं...जिनकी टिकट कट गयी ,वे कटे पेड़ की तरह जमीं पर धाराशायी....उन्हें लगता है – होली की जगह मुहर्रम कैसे आ गया..समर्थक मायूस हो धीरे से परकटे ( टिकट कटे ) को छोड़ टिकट वाले की टोली में ऐसे जा घुल-मिलते हैं जैसे दूध में चीनी ..उन्हें मालूम है कि कटे पेड़ से कोंपल निकलने में पांच साल तो लगेंगे ही..कौन कमबख्त इतने साल इन्तजार करे ?..जमाना ऐसा है कि कोई प्रेयसी एकाध घंटे इन्तजार करवा दे तो प्रेमी प्रेयसी बदलने की सोचने लगता है..ऐसे में पांच साल..उफ़..तौबा-तौबा.. ‘

‘ठीक कहा गुरूजी.. दुःख की घडी में अपने तक साथ छोड़ देते हैं..पर यही दुनिया की रीत है..’ उसने लम्बी गहरी सांस छोड़ते कहा.

‘ भोले लगता है ..कोई गहरी चोट खाए हो..’ मैंने उसे धीरे से छेड़ा. .

‘नहीं गुरूजी..ऐसा कुछ भी नहीं..’ उसने शर्माते हुए कहा.

‘ अब बता भी दो यार..होली है..इस मदमाते मौसम में श्लील-अश्लील का भेद खतम हो जाता है..’ मैंने समझाया.

‘ दरअसल बात यूँ है गुरूजी कि जवानी के दिनों में मेरे दोस्त अक्सर कहते कि कोई लड़की तुझे कभी घास नहीं डालेगी..लेकिन एक दिन एक लड़की ने डाल दी..मैं फागुन की तरह बौरा गया..एक दिन उसने कहा- कब तक इन्तजार कर सकते हो ?.मैंने कहा- जीवन भर..’

‘ फिर ?’

‘ फिर क्या ?..इन्तजार ही करता रहा..एकाएक वो कहाँ गायब हुई ..पता ही न चला..मेरी शादी हो गई..बच्चे हो गए. सर पर चाँद भी निकल आया..पर मेरी चाँद न जाने किस बदली में छिप गई कि कभी निकली ही नहीं.. सच कहूँ- आज भी उसका इन्तजार है..समझ नहीं आता लोग इतने अधीर कैसे हो जाते हैं..पांच साल भी इन्तजार नहीं कर पाते..मुझे देखो..आज भी प्रतीक्षारत हूँ..’

‘ वाह भोले..तुसी ग्रेट हो यार..तुम्हारे इस जज्बे को मेरा सलाम..तुम्हारे जैसे लोग राजनीति में होते तो कभी दल-बदल की नौबत नहीं आती..काफी स्वच्छ सरकार होती ..खैर..चलो मुद्दे पर आयें..बताओ..कैसे चुनावी होली खेलोगे ? सबसे पहले तो तुम्हें पार्टी और नेता चुनना होगा..किस नेता या पार्टी के साथ होली खेलना चाहोगे ?’

‘ हमारे लिए तो सब बराबर है गुरूजी.. क्या पक्ष और क्या विपक्ष..पर फायदा तो पक्ष में ही होता है..’

‘ ठीक कहा तुमने..सबसे पहले तो आपको कार्यकर्त्ता बनना होगा..सत्तारूढ़ पार्टी के दफ्तर जाकर नेता के सामने हाथ जोड़ बताना होगा कि पूरी निष्ठां और समर्पण के साथ काम करोगे ..दरी बिछाने से लेकर भीड़ जुटाने का काम करोगे ..चिल्ला-चिल्लाकर नारे लगाने से लेकर प्रदर्शन -धरने का प्रदर्शन करोगे ..भूख-हड़ताल में रहते पुलिस के डंडे प्रेमपूर्वक खा लोगे..आदि आदि....नेता अगर संतुष्ट हुआ तभी आगे दाल गलेगी..और दाल गलेगी तो “भात” का प्रबंध आप ही आप होने लगेगा..’ मैंने समझाया.

‘ गुरूजी ये तो वही बात हुई कि कोई पचहत्तर साल का बूढ़ा मोबाईल को लाइफ-टाईम रिचार्ज कराए..इतना सब करते तो मर ही जाऊँगा..शार्टकट रास्ता बताएं..कीचड़ उछालने की कभी आदत नहीं..फिर भी होली के पावन पर्व पर उछाल ही लूँगा..पत्नी से बहुत कुछ सीखा है.. महिला-नेत्रियों की कामयाबी का राज भी शायद यही है..मुझे तो एकदम से बड़े नेता बनने की तमन्ना है..मुझे राजनीति के ख़ास टिप्स दें..’

‘ खास टिप्स से एक जोक याद आया है..एक बेटा अपने राजनीतिज्ञ बाप से यही पूछता है तो बाप कहता है- जा छत पर चला जा..फिर बताता हूँ..बेटा छत पर चला जाता है..नीचे से बाप कहता है- अब कूद जा..बेटा घबराकर कहता है- कूदूंगा तो हाथ-पैर नहीं टूट जाएगा ? बाप कहता है- मैं हूँ ना..पकड़ लूँगा..बेटा धडाम से कूद जाता है..बाप हट जाता है..बेटा चोट से कराहते पूछता है- आप हट क्यों गए ? तब बाप कहता है- ये बताने के लिए कि राजनीति में अपने बाप पर भी भरोसा मत करो...यही राजनीति का पहला पाठ है..’

‘वाह गुरूजी ..बात तो आपने पते की कही..अब ये बताएं..आप पर भरोसा करूँ कि नहीं ? क्या मुझे नेताओं के साथ कीचड़-उछाल होली खेलनी चाहिए ? ‘ उसने मेरी ओर देखा.

मैंने जवाब दिया-.

‘ नहीं भोले.. सीरियसली कहूँ तो अब इस उमर में यह शौक न पालो तो ही अच्छा..वैसे भी आम से ख़ास बनने की कवायद अच्छी नहीं.. आम हमेशा आम रहे तो बढ़िया..ख़ास बनकर तो केवल बदनामी ही मिलनी है...घपले-घोटालों की बदनामी,भ्रष्टाचारी होने की बदनामी, अकूत काले-धन कमाने की बदनामी, सेक्स-स्कैंडल की बदनामी, बुढापे में डी.एन.ए.टेस्ट की बदनामी...आदि..आदि..आदि...हालांकि राजनीति में बदनामों को ही नाम वाला कहते हैं..वो एक गीत है न- जो है नामवाला वही तो बदनाम है..तो भोले..घर-परिवार, यार-दोस्तों के साथ होली खेल बची-खुची जिंदगी को रंगीन करो ..इस बार पत्नी को पिया समझ इन्तजार ख़तम करो...’

‘ ठीक कहते हो गुरूजी..अभी तक तो पत्नी के साथ होली खेली..इस बार प्रेयसी के साथ खेलूँगा..पर पत्नी को प्रेयसी के रूप में देखने दो गिलास भांग और चढाने होंगे..चलता हूँ..भांग घोटना है..आप भी चाहें तो मेरे घर चलकर भांग का आनंद उठायें..अपनी पत्नी को प्रेयसी समझ होली का लुत्फ़ उठायें..’

‘ नहीं यार...ऐसी मेरी किस्मत कहाँ ? मैंने तो शादी ही प्रेयसी से की है .. पत्नी बनते ही प्रेयसी लुप्त हो गई..पूरे का पूरा हंडी भी गटक लूँ तब भी पत्नी ही दिखेगी..आज तुमने पुरानी यादें हरी कर मुझे लाल कर दिया..अब इस पर और कोई रंग चढ़ने वाला नहीं..चलता हूँ हेप्पी होली..’

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- प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

मोबाईल- 09993039475

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अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव

वाह प्रमोद जी हैप्पी होली भाई क्या खेली वो आपका भोला क्या सीखा यह तो वो ही जाने पर दो गिलास भांग
के बाद बीबी प्रेयसी जैसी दिखती है ये मैंने जरूर सीखा
हाँ ये और बात है कि इस नुस्खे को आजमाने को मेरी
पत्नीजी अब रही नहीं वो दो साल पाहिले ही परलोक
सिधार गयीं पर वो पहिली मुलाकात से जो मेरी प्रेयसी
बनी तो शादी के बावजूद प्रेयसी ही अपनी अंतिम साँस तक रहीं भांग के साथ भी और बिना भांग भी मस्त उत्तम
लेखन के लिये हमारी बधाई

श्री अखिलेशजी, होली की आपको हार्दिक बधाई...रचना पर टिपण्णी के लिए शुक्रिया..वैसे सही कहा आपने-प्रेयसी शादी के बाद भी प्रेयसी ही रहती है और पत्नी ताउम्र पत्नी पर भांग पी कल्पना करने में क्या बुराई है..पुनः आभार कि आपको रचना पसंद आई...प्रमोद यादव

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