बुधवार, 19 मार्च 2014

सुशील यादव का सामयिक राजनीतिक व्यंग्य : ‘आप’ तो ऐसे न थे ........!

आप’ तो ऐसे न थे ........!

‘आप’..... में कितनी खूबियाँ थी क्या कहें ?

सुबह –सुबह उठ के ‘झाड़ू’ लगा लेते थे । गाय को चारा-भूसा हमारे उठने के पहले खिला देते थे । आपको झूठ बर्दाश्त नहीं होता था । झूठ के खिलाफ आपका सत्याग्रह दो समोसों के साथ टूटते हर पडौसी ने देखा है ।

वो हमारी प्यार भारी नोक-झोंक वाले दिन न जाने कहाँ गए ?

मुझे अच्छी तरह से याद है ,जब हम पहली बार मिले थे तो आपने क्या –क्या वायदे किये थे । रामलीला देखने के बहाने हम मिल लिया करते थे ।

आपने कहा था हमारी जिन्दगी में महंगाई कोई अहमियत नहीं रखेगी । हम हर जुर्म से लोहा लेंगे । आज आपको कबाड़ इकट्ठा करते देख दुःख होता है ।

आप-ने वचन दिया था,चाहे कुछ भी हो जाए ‘खडूस’ पडौसियों से संबंध नहीं रखेंगे । पतली दाल खा लेंगे मगर तंदूर की मुर्गी को ताकेंगे नहीं ?कोई दिखावा ,कोई नुमाइश नहीं होगी । जैसे सब रहते हैं वैसे जियेंगे ,क्यां कि ‘सब के साथ’ जीने का मजा ही अलग है ? कहाँ गए आप-के वादे ?

माना कि आपके ‘सपने’ विराट थे ,मगर ‘विराट …..’ भी बेचारा कई बार जीरो में आउट हो जाता है । हर बाल में ‘हिट’ करने वाला शर्तिया ये नहीं कह सकता कि उसकी सेंचुरी मुक्कम्मल होगी । धुरंधर बालर-फिल्डर से गेम निकाल ले जाना कभी-कभी किस्मत का खेल होता है,ये आप मानने से कतराते क्यों हैं ?

आमीन ....

सुशील यादव :न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ ग )

5 blogger-facebook:

  1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव9:44 am

    बहुत जल्दी घबडा गये सुशील जी पाहिले तू होता था तडाक होता था आप तो अभी अभी झाडू हाँथ में लेकरआयें हैं और दिल्ली में सफलता का झंडा लहराने के सफल प्रयोग के बाद यह नवजात पार्टी पूरे देश में
    गंदगी और भ्रष्टाचार और गंदगी दूर करने झाडू लेकर
    निकली है और मुकाबला भी किनसे जो भ्रष्ट व्यवस्था
    को न केवल चला रहे हैं बल्कि धुरंधर लोग हैं ऐसे में
    हम गैरराजनीतिक लोग जो भ्रष्ट व्यवस्था से ऊब और
    थक चुके हैं पूरी आशा और विश्वास से आप की ओर
    देखते हैं क्योकि इसी पार्टी ने स्थापित भ्रष्ट पार्टियों से
    लड़कर हमें अच्छा जीवन जीने की आस बधाई है
    केवल 49दिन साझा सरकार और प्रबल भ्रष्ट विरोधियों
    से घिरी सरकार से लोग वो उम्मीद करते हैं जो पूर्ववर्ती
    सरकार अनेक सालों में भी न कर सकी

    उत्तर देंहटाएं
  2. हमारे यहाँ ब्रज में एक कहावत है , आपके यहाँ भी होगी ! बंद मुट्ठी लाख की और खुल गयी तो ख़ाक की ! प्यार से धोया है आपने "आप " को ! और श्री अखिलेश जी , आपने कहा 49 दिनों में काम कर दिए , एक दो के नाम भी बता देते तो समझ पाने में आसानी हो जाती ! मुझे लगता है आप फ़र्ज़ी और 49 दिनों के भगोड़े के नेशनल हीरो बना देना चाहते हैं !

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    उत्तर
    1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव2:06 pm

      माननीय सारस्वत जी अनुरोध है कि मेरे
      लिखे को केवल एक ही बार ध्यान से पढिये और बिना पढ़े निष्कर्ष में मत कूदिये भाई
      मैंने कहाँ लिखा है की उस सरकार ने बड़े
      बड़े काम किये मैंने लिखा है कि साझा सरकार की मजबूरी और मात्र 49दिन
      किसी भी सरकार को कुछ भी कर पाने
      के लिये अपर्याप्त थे इस नवजात पार्टी का
      मुकाबला धुरंधर लोगों से है जो हर तरह
      के पै तरो से लैस हैं इसकी असली ताकत
      ह जैसे गैर राजनीतिक लोग ही हैं जो भ्रष्टाचार और गन्दी राजनीति से ऊब चुके
      है ऐसे में यह पार्टी आशा की एक किरण ही तो है

      हटाएं
  3. धन्यवाद। आप लोग ऐसे तो न थे?

    उत्तर देंहटाएं

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