रविवार, 23 मार्च 2014

बच्चन पाठक 'सलिल' का आलेख - गत शतक में जमशेदपुर का साहित्य जगत

गत शतक में जमशेदपुर का साहित्य जगत
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-- डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'
जमशेदपुर में अपने ढंग से साहित्यिक हलचल होती रहती है । पिछले दशक में भी साहित्यिक सन्नाटा नहीं रहा । साहित्य के साथ साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भी साहित्यकारों की भूमिका रही । पिछले दशक में एक नई पीढ़ी भी उभरी, जिसमे काफी संभावनाएँ हैं ।

प्रकाशन महंगा हो गया है । प्रकाशक साहित्यकारों से पूर्णव्यय लेकर पुस्तकें छापते हैं और लेखकों को कुछ प्रतियाँ थमा देते हैं । मूल्य भी सैकड़ों रुपये रहता है । इससे पुस्तकें बेचना साहित्यकार के लिए संभव नहीं होता । ऐसी अवस्था में एक दो प्रकाशन के बाद साहित्यकार का शिथिल हो जाना स्वाभाविक है ।

नगर के दैनिक पत्रों से साहित्य का स्तम्भ गायब हो चुका है । दो चार मासिक पत्रिकाएँ ही कविता-कहानी प्रकाशित करती हैं पर उन्हें भी अपनी पत्रिका को विज्ञापन आश्रित और समाचार प्रधान बनाना पड़ता है । ऐसी पत्रिकाओं में 'झारखण्ड जन संचार', 'इस्पात भारती', 'झारखण्ड प्रदीप' और 'पूरी दुनिया' उल्लेख्य हैं ।

अपने प्रकाशन के कुछ वर्षों बाद तक दैनिक जागरण और हिंदुस्तान ने काफी साहित्यिक सामग्री प्रकाशित की । इन पत्रों में डॉ सी भास्कर राव, डॉ सलिल, जय नंदन, मनोहर लाल गोयल, प्रेमचंद मंधान, विजय शर्मा, पद्मा मिश्रा, लक्ष्मी रानी लाल, गीता दुबे आदि छपते रहे । कुछ रचनाओं की चर्चा राज्य स्तर पर भी होती रही ।

आशा का आकाश ( डॉ आशा गुप्ता), आकाश फूल (प्रेमलता ठाकुर), परिवर्तन की ओर (हरि वल्लभ सिंह आरसी), सपनों के वातायन (पद्मा मिश्रा), किरणों के इन्द्र धनुष (राजदेव सिन्हा), प्रिये (मनोज कुमार पाठक), मुझे कुछ कहना है (सुभाष पाल) आदि कुछ उल्लेख्य कविता-संग्रह प्रकाशित हुए ।

कुछ संग्रहों का भी प्रकाशन हुआ । डॉ त्रिभुवन ओझा, विनायक राव, श्री राम पाण्डेय 'भार्गव'आदि ने गीता से सम्बंधित अपने विचारों को पुस्तकाकार प्रकाशित किया । डॉ मुकुल खंडेलवाल के शोध-निबंध का संकलन 'चिंतन पुष्प' के नाम से प्रकाशित हुआ । शोध पत्रिका के रूप में 'इस्पातिका' के भी कुछ अंक अच्छे रहे ।

नगर में गत दशक में भोजपुरी संस्थाओं की बाढ़ आ गई । इनमे से कइयों के नाम के पहले 'विश्व' लगा हुआ है पर प्रकाशन की दृष्टि से केवल जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद् ही सक्रिय रही । एक दशक में इसमें लगभग बीस पुस्तकें प्रकाशित की, जो विभिन्न विधाओं से संबंधित हैं ।

प्रेमचंद मंधान का असामयिक निधन इस दशक की एक साहित्यिक ट्रेजेडी थी । वे एक कुशल संपादक, ग़ज़लकार, मंचीय कवि एवं साहित्यिक कार्यक्रमों के सफल आयोजक थे । गुरवचन सिंह, राम सेवक 'विकल' और निर्मल मिलिंद भी सदा के लिए हमें छोड़कर चले गए ।

कई संस्थाएं साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन करती रही । इनमे प्रमुख हैं-- प्रगति लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, दिनकर परिषद्, बेनीपुरी परिषद्, सहयोग, अक्षर कुम्भ और तुलसी भवन साहित्य समिति आदि । यदा कदा कुछ मौसमी संस्थाएं भी बनती-मिटती रहीं ।
झारखण्ड सरकार के राजभाषा विभाग ने नगर के साहित्यकारों को राज भाषा सम्मान प्रदान किया । यह सम्मान प्राप्त करने वाले हैं-- डॉ बच्चन पाठक 'सलिल', डॉ सी भास्कर राव एवं जय नंदन ।
जहाँ साहित्यिक पत्रिकाएं दम तोड़ रही हैं, वहीँ देश-विदेश से प्रसारित ऑन लाइन पत्रिकाओं ने अपनी भूमिका का निर्वाह किया है । श्री श्यामल सुमन, बच्चन पाठक 'सलिल', पद्मा मिश्रा और मनोज 'आजिज़' इन पत्रिकाओं में खूब छप रहे हैं और भारत के अतिरिक्त इंग्लैंड, कनाडा और खाड़ी देशों तक नगर के साहित्यकार चर्चित हो रहे हैं ।
ग़ज़ल के क्षेत्र में नन्द कुमार 'उन्मन', उदय प्रताप 'हयात', शैलेन्द्र पाण्डेय 'शैल' और मनोज 'आजिज़' ने अच्छी ख्याति पाई है ।
दोहा छंद को पुनर्प्रतिष्ठित करने में बाल कवि 'हंस' प्रतिबद्धता पूर्वक लगे हैं । इनके संग्रह हंस के दोहे, समय भारती और धर्म भारती चर्चा में है ।
सैकड़ों नए पुराने रचनाकार अपने अपने ढंग से साधना रत हैं, जिनमे कुछ के नाम हैं-- आनंद बाला शर्मा, ज्योत्स्ना अस्थाना, गीता नूर, कल्याणी कबीर, डॉ रागिनी भूषण, त्रिपुरा झा, पुष्पा तिवारी, सरोज कुमार सिंह 'मधुप', वरुण प्रभात, देवेन्द्र सिंह, भंजदेव व्यथित, पंचानन सिंह तोमर, डॉ अरुण सज्जन, गंगा प्रसाद अरुण, अरविन्द विद्रोही, मनोकामना सिंह अजय,अरुण अलबेला, अनिरुद्ध त्रिपाठी, डॉ संध्या सिन्हा, डॉ जूही समर्पिता, रवि कान्त मिश्रा, गजेन्द्र वर्मा 'मोहन' आदि । 

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