सोमवार, 31 मार्च 2014

अशोक बाबू माहौर की कहानी - छोटी गंगा

छोटी गंगा (कहानी)

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`कोई मेरे घर को,स्वर्ग बना दे 

     तोड़कर तारे आसमाँ से,जमीन पर ला दे`

भानु सुबह-सुबह यही पंक्तियाँ दोहराते रहते,कभी मंदिर में कभी सड़कों पर किन्तु इन्हें पूरा करने वाला कोई                 नहीं था.

     बड़े बहू बेटा भानु को परेशान किया करते,खाने पीने तक की सुधि भी नहीं लेते.बूढ़ा शरीर था कब तक साथ दे सहारे की जरूरत थी,सहारा कौन दे यही चिंता दिन रात सताए जा रही थी,जो नजरें बची थी छोटे बेटे पर टिकी थी शायद वही कुछ कर दिखाए.

     माथे पर हाथ रखे भानु सोच रहे थे `बस छोटे बेटे की शादी हो जाए,मैं समझूँगा गंगा नाह कर लिया`.

    `राम...राम ...सहाब`दो आदमी सामने आये बोले.

    `राम ...राम ..`. भानु ने झुककर कहा.

    `मैंने आप लोगों को पहचाना नहीं,कहाँ से आ रहे हो`.भानु बोले.

    `हमें पहचानने की जरुरत नहीं है,हम आपका लड़का देखने आए हैं पडोसी गाँव से` एक ने जवाब दिया.भानु का चेहरा गुलाब की तरह खिल गया उसे ऐसा लग रहा जैसे खुशियाँ खुद चलकर घर आईं हैं.अपने कुर्ते की जेब से बीड़ी तम्बाकू निकालकर उन्हें थमा दी और बैठने के लिए चारपाई लगा दी.

     `बेटा अंदर से ठंडा पानी ले आना,मेहमान आए हैं` भानु आवाज लगाते बोले.

     `जी दादा अभी लाया` अंदर से आवाज आई.

     `और सुनाओ क्या हालचाल हैं?` भानु ने नम्रता से पूछा.

     `ये लीजिये दादा जी,मैं पानी भर लाया,चाय नास्ता अभी तैयार हो रहा है`. बेटा अचानक बोला.

     भानु ने इशारा करके लड़का दिखा दिया.सभी को लड़का पसंद आया बोले, `आपका लड़का हमें पसंद है,आप चाहे तो लड़की देख सकते हैं`.

     `कैसी बात करते हो हम ठहरे पुराने ख़यालात के लड़की नहीं देखेंगे रिश्ता वैसे ही पक्का कर दें`. भानु ने हाथ  जोड़कर विनती की.

     अचानक मेहमान खड़े हुए `आज्ञा दीजिए हम चलते हैं सहाब`

     `ऐसे कैसे चाय नास्ता करके जाइए`

     `नहीं ...नहीं ...अब नहीं हम कुछ भी नहीं खा पी सकते `

     बड़े धूम धाम से शादी कर दी.चर्चायें खूब छाई रही लोगों की जुबान पर कि गाँव में कोई शादी हुई हैं.बहू भी अच्छे घराने की निकली कुछ ही दिनों में सारा माहौल समझ गई.ससुर(भानु )का अच्छी तरह ख्याल रखने लगी,समय पर खाने पीने का इंतजाम कर देती,कभी-कभी पैर भी दबा देती.

     ससुर जी बहुत खुश थे क्योंकि जो प्रार्थना की थी मंदिर में आज पूरी होती नजर आ रही थी,भानु उसे गंगा जैसी मानने लगे क्योंकि उसके विचार पवित्र गंगा की तरह थे?.

     एक दिन की बात हैं बहू ससुर जी के लिए भोजन ले जा रही थी कि जिठानी मुँह ऐंठती भौंह चढ़ाती बुदबुदाई `बड़ी आई महारानी सेवा करने वाली,बहुत देखीं हैं ऐसी पहले ढोंग रचती हैं बाद में समेटकर सम्पति गायब हो जाती हैं`.

     बहू का उत्साह जगा दो कदम आगे बड़ी किन्तु ससुर ने रोक लिया `जाने दे बहू ये तो उसकी रोज की आदत है बुरा नहीं मानते,तुम सझदार हो` ससुर की बात मानकर कदम पीछे खींच लिए.

     जिठानी की आदत दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी कभी-कभी हरकतें हदें पार कर जातीं.एक दिन जिठानी सुबह-सुबह गन्दी गालियाँ बक रही,बहू को सहन नहीं हुआ उसने भी अपना मुँह खोल दिया,खरी खोटी सुना डाली.

     अचानक ससुर जी की तबियत ख़राब हो गई कई डॉक्टरों हकीमों को बुलाया किन्तु कोई सुधार नहीं उन्हें लगा अब अंतिम समय आ गया.बड़े बहू बेटे को बुलाया किन्तु उन्होंने आने से मना कर दिया,पास खड़े छोटे बहू बेटे ने धीरज बँधाई.

     छोटी बहू पैर दबा रही थी,बड़ी बहू खड़ी दरवाजे पर बक-बक कर रही `चलो अब बला टली,सारी रात   खाँसता है न सोता है न सोने देता है,जीना हराम कर रखा है`.

     भानु ने पल में जान लिया जरूर गाली दे रही है मुँह अपना घुमा लिया आँखों में आँसू भर बोले, `बहू घर का ख्याल रखना तुम्हीं लक्ष्मी हो,तुम्हीं गंगा हो`.

     बहू ने भी अपना सर हिला दिया.

     सारी सम्पति मरने से पहले भानु ने अपने छोटे बहू बेटे के नाम कर दी. 

                                       अशोक बाबू माहौर 

                                       ग्राम -कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह, जिला

मुरैना (म.प्र.) 476111 

             

                                       ईमेल ashokbabu.mahour@gmai.com

1 blogger-facebook:

  1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव8:59 am

    माहौर साहब आपकी कहानी अच्छी और शिक्षाप्रद है
    बहुत कुछ कहती है कि आजकल बूढ़े सास ससुर
    नयी पीड़ी को किस कदर असह्य होते जा रहें हैं अच्छी
    कहानी के लिये हमारी बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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