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अशोक गौतम का व्यंग्य - हर वोटर एक माल

कल तक अपने जिस मुहल्ले में हफ्तों रेहड़ी वाले के दर्शनों को आंखें तड़प जाती थीं , आज चिड़ियों के चहकने से पहले ही बिस्तर में दुबके दुबके रेहड़ी वाले की आवाज सुनी तो पहले तो सोचा कि कोई सपना देख रहा होंऊ। रेहड़ी वाला गला फाड़ फाड़ चीख रहा था ,‘ साडि़यां ले लो! प्रेशर कुकर ले लो! पतीले ले लो! डिनर सेट ले लो! कंबल ले लो! बेड शीट्स ले लो। मोबाइल फोन ले लो। टीवी ले लो! जो चाहे ले लो! मुफ्त में ले लो!’ उसकी आवाज सुन मैं फिर बिस्तर में दुबके सोचने लगा,‘ यार, मुफ्त में?? मुफ्त में तो यहां आज प्यार भी नहीं मिलता! और एक ये रेहड़ी वाला है... कहीं सुबह सुबह उल्लू ता नहीं बना रहा होगा? बना रहा होगा तो बनाता रहे? अब तो मैं ये भूल ही गया हूं कि कभी मैं मानुस जात में पैदा हुआ था!

रेहड़ी वाले ने फिर फटी आवाज दी,‘ थालियां ले लो! परातें ले लो! गैस सिलेंडर ले लो! जो चाहे ले लो!’ जब मैंने गैस सिलेंडर की आवाज सुनी तो मैं बिस्तर छोड़ झट खड़ा हो गया। असल में घर का गैस सिलेंडर चार दिनों से खत्म था और पड़ोसी की दया पर चूल्हा जल रहा था। एजेंसी वाले रहे अपनी मर्जी के! आनन फानन में आधा पौना कुरता पैजामा पहना और दो दो सी‍ढ़ियां घुटनों दर्द होने के बाद भी एक साथ उतर गया। सामने देखा तो रेहड़ी वाला! ऊ लाला!

रेहड़ी क्या मानो वह रेहड़ी में पूरा ट्रक ही भर लाया था, ठसाठस। मैंने उसकी रहेड़ी पर नजर दौड़ाते पूछा,‘ भाई साहब! बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?’

तो उसने लच्छेदार लहजे में कहा,‘ एक नहीं हजार पूछो! जो पूछना है दिल खोलकर हजार बार पूछो! हम आए ही आपके लिए हैं। पूछने का हक आजकल तो कम से कम आपका बनता ही है। ये सब सामान जो आप देख रहे हैं न, सब आपके लिए ही है। जो चाहो उंगली लगाओ और अगले क्षण अपने घर में पाओ !’

‘पर साहब मैं तो पेंशन में रो पीट आटा दाल ही खरीद सकता हूं,’ मैंने अपनी मजबूरी न चाहने के बाद भी जाहिर कर ही दी।

‘आप बस किसी एक माल को हाथ तो लगाइए बस! हाथ लगाते ही माल आपका। कोई पैसे नहीं। कोई हीडेन चार्जेज नहीं!’

‘कोई चार्जेज नही? मतलब! बिन पैसे माल अपने देश में कबसे बिकने लगा? यहां तो किसीसे बात करने के भी पैसे लगते हैं।’

‘पर हम नहीं लेंगे! हम तो बस माल बांटने आए हैं,’ कह उसने मेरी आंखों में माल लेने की ललक जगाई तो मैंने पत्नी के पास पिछले चार सालों से एक ही साड़ी होने के चलते उससे पूछा, ‘तो भाई साहब! ये वाली साड़ी कैसे दी?’

मेरे कहने भर की देर थी कि उसने आव देखा न ताव, साड़ी थैले में डालता बोला, ‘लो साहब , ये साड़ी आपकी हुई, अब जैसे चाहो पहनो! और कहिए, आपको क्या चाहिए?’

‘पर इसका रेट तो बता देते?’ मैंने कांपते हाथों में साड़ी वाला थैला मुश्किल से संभालते कहा तो वह हंसते हुए बोला,‘ कमाल है साहब! हम आपको कुछ देना चाहते हैं कि आपके हाथ कांप रहे हैं। कैसे वोटर हैं आप भी ? बस, आप माल को हाथ लगाते जाइए, हम आज आपको देने आए हैं, बस! आप भी क्या याद करेंगे कि .....’

‘ पर फिर भी??’

‘ आप पूछ ही रहे हैं तो बताओ, आपके घर में कितने वोटर हैं?’

‘ ले देकर हम चार हैं! पर बीवी ने आजतक वोट पाया ही नहीं!’

‘क्यों?’

‘कहती है वोट पाने जाने में समय बरबाद क्यों करना, जितनी देर वोट पाने को खराब करनी उतने को चार सीरियल निकल जाते हैं। ’

‘गलत बात! सारे नेता चाहे एक से हों पर वोट जरूर पाओ! अपने लिए न सही तो न सही, पर हमारे लिए तो सही! तो मतलब आपके घर में जिंदा तीन वोट हैं?’

‘ हां, मेरे जिंदा रहने तक तो यही समझो!’

‘ तो इसका मतलब आप तीन चीजें ले जा सकते हो मुफ्त में!’

‘मुफ्त में? मतलब?’

‘मतलब, हर माल एक वोट!’

‘पर मैंने तो सुना है कि वोट अमूल्य होता है?’

‘ अरे सब बकवास है। यहां कुछ भी अमूल्य नहीं। सबका मोल भाव है। यहां राख से लेकर लाख तक सब बिकाऊ है। भगवान भी! जो सुने पर विश्‍वास करते हैं वे अंधेरे में जीते हैं। असल में जिओ मेरे यार असल में!’

‘मतलब!’

‘ मतलब संसद से लेकर पगडंडियों तक सब बिकाऊ! चुनाव के सीजन में देश में हमने एक अभियान चला रखा है कि हम अपने हर वोटर को उसका मन माफिक एक माल मुफ्त में देंगे। उनसे माल का एक पैसा भी नहीं लेंगे! कमाने के लिए तो चुनाव के बाद टाइम ही टाइम होता है। बस एक बार जीत जाएं! घर में वोटरों के हिसाब से आप कोई से तीन आइटम फ्री में पूरे अधिकार के साथ ले जा सकते हैं।’

‘मतलब, मैं समझा नहीं!’

‘ मतलब ये कि जो आपको सबसे जरूरी लगे या आप अपनी जरूरत के हिसाब से तीन आइटम हमारी पार्टी की ओर से शौक से सीना चौड़ा कर घर ले जाइए प्लीज!’

‘ और जो ये गैस सिलेंडर ले जाना हो तो ?’ मैं मुद्दे पर आया तो वह बोला, ‘ साहब , ये तो उनके लिए हैं जिनके घर में कम से कम बारह वोट हों। आप अपने घर की वोटों के हिसाब से माल देखें तो मेरे और आपके मतलब दोनों के लिए बेहतर होगा! पर हां ! जिस तरह हम आपको ईमानदारी से माल दे रहे हैं आप हमें ईमानदारी से वोट हमें देंगे, ऐसी हम आपसे उम्मीद करते हैं।’

‘उम्मीद!!’ मुझे भीतर ही भीतर हंसी आई तो वह मेरे भीतर की हंसी को रोकता बोला,‘ हां! उम्मीद! हम सब इस देश में उम्मीद के सहारे ही तो चले हैं।’

‘ पर ये प्रेशर कुकर, ये साड़ी , ये कंबल? इसकी क्या गारंटी है कि...?’

‘ पूरी गारंटी है साहब! मजाल साड़ी में से कोई ऐरा गैरा भीतर झांक सके। ये कंबल! इसे मरियल से मरियल वोटर तो वोटर, अगर सर्दियों में सर्दी भी ढक ले तो उसे भी सर्दी न लगे! जो और हमारे प्रेशर कुकर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बिन गैस के भी खाना तैयार कर देता है। बस, बुझे चूल्हे पर हमारा कुकर रखो और खाना तैयार! हमने इसे केवल अपने वोटरों के लिए चुनाव में बांटने के लिए विशेष रूप से डिजाइन करवाया है। पर एक बात से सावधान आपको जरूर करना चाहूंगा!’

‘ किस बात से ?’ मैंने प्रेशर कुकर एक बगल में तो दूसरी बगल में कंबल , साड़ी ठीक वैसे जैसे कई दिनों का भूखा कुत्‍ता रोटी का टुकड़ा दांतों में दबाता है दबा पूछा तो वह बोला, ‘इस बात से कि इसके बाद दूसरी पार्टी का प्रेशर कुकर गलती से भी मत लेना। वह उसमें दाल डालने से पहले ही फट सकता है। प्रेशर कुकर ही क्या? उनका सारा माल बोगस है। क्या फायदा , जो जान जाए तब पछताए , ’ और वह मुझे तीन वोट के बदले मेरी पसंद की तीन आइटम थमा आवाजें देता आगे हो लिया,‘ मन चाहा माल ले लो! पर माल पर वोट ले लो !’

अशोक गौतम,

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

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akhilesh chandra srivastava

अशोक जी है वोटर ऐसा मॉल है जो केवल
सीजन में बिकता है और उसके बहुमूल्य
वोट को चालाक राजनीतिज्ञ बहुत ही सस्ते
में प्राप्त कर लेता है और क्योकि वोह वोट
का मूल्य चुकाता है उससे कईगुना भ्रष्टाचार
कर वापसअपना पैसा प्राप्त कर लेता है और
जनता तब अगले चुनाव सिर्फ रोती रहती
है यदि जनता जागरूक हो और प्रलोभन को
ठुकरा अच्छे और सही लोगों को चुने तो
भला उसका ही होगा व्यँग लिए मेरी
हार्दिक बधाई

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