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श्याम यादव का व्यंग्य लो आ ही गया चुनावी मौसम

तझड़ सावन बसंत बहार ...... एक बरस के मौसम चार ........ फ़िल्मी गाने की ये  पंक्तियों को लिखने वाले  गीतकार .... पांच साल में होने वाले चुनाव के मौसम को भूल गये  .चुनाव का ये मौसम अब आ गया .... इस मौसम में मन बड़ा प्रसन्नता का अनुभव करने लगता है उनका ,जो चुनाव लड़ने के लालायित रहते है और उनका भी ,जो चुनाव लडाने के एक्सपर्ट होते है . दोनों ही इस मौसम के लिए  वैसे ही तरसते है जैसे सावन की बूंद के लिए पपीहा तरसता है .  वैसे इस चुनावी  मौसम  का चक्र पांच सालों   का निर्धारित है मगर अब अन्य मौसमों की तरह   ये भी बेईमान हो गया है . कभी विधानसभा तो कभी उपचुनाव और कभी लोकसभा के नाम पर देश में ये मौसम कहीं  ना कहीं छाया  ही रहता है.                                                                                                                                                                                                                                        

चुनाव  के इस  मौसम में सबसे ज्यादा पूंछ परख  मतदाताओं की होती है . मतदाता को इस मौसम के आने का पूर्वाभाष हो जाता है . बार बार उनकी गली मोहल्ले में नेता और उनके पठ्ठों का आना .  उन तमाम समस्याओं  का तुरंत  सुलझ जाना जो सालों से बे हल रह कर बे-हाल करती है . छोटे छोटे बच्चों को नेताओं की  गोद में  शरण मिलना  यानी बिन मांगे मोती मिले  जैसे ऐसे कुछ  संकेत होते है जिससे  मतदाताओं को चुनावी मौसम का पता चल जाता है . इस मौसम की तासीर बड़ी अच्छी होती है . नीम की निबोली का कडवापन  तो  गायब हो जाता है , इस पार्टी का हो या उस पार्टी का या बीच में वोट काटने के लिए खड़ा होने वाला बागी उम्मीदवार सबकी ज़ुबानी शहद टपकना शुरू हो जाता है . इस मौसम में इन नेताओं को ना गर्मी का अहसास होता है ना सर्दी का .  भूख प्यास  से दूर  आरामदेह  वाहनों में चलने वाले ये नेता गली कूंचे तक  की नाप ले लेते है .  इनकी सेहतें माशाअल्लाह बन जाती है बिना जिम जाए भी . और  नोटन्किया ऐसी कि वालीवुड का कलाकार भी मात खा जाय .  मतदाता की क्या बिसात ?       

                                                                                                                                             चुनाव का मौसम आते ही वादों का मौसम भी आ जाता है .  वादों और चुनाव का चोली दामन का साथ होता है .वादे बिना चुनाव नहीं होते . नेता वादे करते है और उन वादों पर मतदाता यकीन  करता है . वोट देता है फिर वादे तोड़ दिए जाते है .  वादे किये ही तोड़ने के लिए किये जाते है . इतने सालों तक आपसे ना जाने  किस किस तरह के कितने वादे  किये गए होंगे.  वादे बिना चुनाव में मजा  नहीं आता . ना नेता को ना मतदाता को . अब चुनाव आयोग है कि इन वादों पर भी प्रतिबन्ध लगाने जा रहा है .

चुनाव का ये मौसम किसी के लिए हरियाली और खुशहाली बन जाता है तो किसी के लिए दुःख का पहाड़ बन कर टूटता है . जिसको जितना होता है वो जीत ही जाता और हारने वाला हार . चुनाव के मौसम का कहर उस बेचारे सरकारी कर्मचारी से पूछो जिसकी डयूटी दूर दराज गाँव में लगा दी जाती है और  येन केन प्रकारेण भी उसकी वो डयूटी कैंसल नहीं होती और वो  मन ही मन कोसता हुआ चुनाव कराने “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना”की तर्ज पर निकल जाता है .  दुःख तो हारने वाले को  भी होता है .अपने हारने से ज्यादा दुःख उसे इस बात का होता है कि उसके सामने वाला जीत कैसे गया?

©श्याम यादव  २२ बी, संचार नगर एक्सटेंशन इंदौर 452016

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सटीक लिखा है आपने!!

अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव

श्यामजी चुनाव अब कोई मौसम नहीं बल्कि विशुद्ध धंदा
है यह पार्टी वोह पार्टी या सिधांत कुछ भी नहीं कलतक
जिसे सांप्रदायिक कहते थे आज पाला बदलकर उसी
की गोद में बैठ गये सिध्हान्त गया तेल लेने बेशर्मीओढ़
ली और धंदा सबका चमकता है पेड भीड़ शामियाना
वाला लाइट वाला दरीवाला जोउसे लूटते हैं जो सबसे
बड़ा लुटेरा है और जनता हमेशा की तरह बस लुटती ही
है खैर सामयिक विषय पर लिखने के लिये बधाई

बेनामी

कस्मे वादे प्यार वफा ये सब वादे है वादोँ का क्या

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