सोमवार, 31 मार्च 2014

मंजरी शुक्ल की कहानी - स्वयंसिद्धा

उसके नाम के बिना शायद में कभी अपना वजूद सोच भी नहीं सकती थी ,फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि वो मुझसे मानसिक तौर पर जुदा हो गया I शारीरिक जरूरतें तो पूरी करनी ही थी आखिर जानवर  जो था पर इतना भी पशु नहीं था कि बाहर मुंह मारने जाता क्योंकि उसमें  हज़ार तरह की बीमारियों का खतरा जो था I तो तन के स्तर पर एकतरफा सम्बन्ध हमेशा ही चलते रहे चाहे मर्जी हो या ना हो I  एक आज्ञाकारी कुतिया की तरह सदैव एक हड्डी पर दौड़कर मैं उसकी सेवा में अपना बदन नुचवाने के लिए पहुँच जाती I बरबादियों के शेर और ज़लालत भरी कहानियाँ पढने में मुझे अजीब सा सुकून मिलता  ...लगता कि चलो इस दुनियाँ में कोई तो दूसरा ऐसा है जिसने ये भोगा हैं या फिर किसी को अपने सामने इस नर्क में बिखरते देखा हैं वरना वहीँ भावनाए, वही संवेदनाएँ और मेरे बहते आंसूओं  ने उन कहानियों के पात्रों को कैसे जीवित कर दिया जिन पर सिर्फ मेरा ही हक़ है I 

बचपन में जब ये पता ही नहीं था कि दर्द क्या होता है और वो कैसा होताहै तो माँ को रोते देखकर बड़ा आश्चर्य होता था I सोचती थी कि माँ हर समय क्यों हम लोगों से छुपकर मुँह में पल्लू ठूँसकर रोती हैं I खाना तो तीनों बार हमारे साथ ही खाती हैं I शायद स्कूल की छुट्टी में भूख से बिलबिलाते पेट में रोटी से ज्यादा कभी कुछ पाने की आकांशा ही न रही I पिताजी को तो महीनों घर आते नहीं देखा था , कहाँ रात गुज़ारते थे वो ये तो शायद मुझे और माँ के अलावा सारे मोहल्ले को मालूम था I माँ को मैंने कभी उनसे सवाल जवाब करते भी नहीं देखा I  हाँ,,जब भी कभी पूछा तो उसने अपने फटे ब्लाउज के साथ गोरी पीठ आगे कर दी जिस पर बेल्ट की मार के नीले निशान पड़े रहते थे I पर जब उन लाल और नीले निशानों को देखने के बाद भी मैं जब कुछ नहीं समझ पाती तब भी उनकी सूजी लाल आँखें देखकर आगे कुछ जानने की हिम्मत नहीं कर  पाती और उन्हें रोता देखकर उनके गले से लिपटकर खुद भी रोने लगती I  मेरी माँ ने तो घर के बाहर की दुनियाँ से जैसे  नाता तोड़कर घर में ही शिवालय बना लिया था और स्थापित कर दिया था मेरे राक्षस जैसे बाप को , जिसकी लगता हैं प्राण प्रतिष्ठा  करना भूल गई थी और इसलिए केवल उस मंदिर में भक्त ही रह गया था I 

माँ हमेशा से मुझे मुझे फूलों में रखने का ख्वाब देखती थी I मेरा रूप देखकर कहती कि तू जो भी चाहेगी वही होगा और इसलिए बड़े ही प्यार और दुलार से मेरा नाम रखा था - स्वयंसिद्धा I फिर मेरे काले घने बालों कि छोटी गूंथते हुए मुस्कुरा के कहती - " तुझे लेने तो कोई सुन्दर सा राजकुमार आएगा और खुबसूरत से सफ़ेद घोड़े पर बैठा के ले जाएगा  I और मैं ताली बजाकर खुश होती हुई जैसे परीलोक में पहुँच जाती और शायद वहीँ  से सफ़ेद रंग का घोडा भी मैं पसंद करने  लगी थी I एक दिन तो क्लास में टीचर ने टोक भी दिया था कि क्या तुम्हें  सफ़ेद रंग के अलावा कोई रंग नहीं पता हैं I सफ़ेद भालू,सफ़ेद कुत्ता और यहाँ तक कि तुम्हारा तो ब्लैक बोर्ड भी सफ़ेद रंग का होता हैं I और फिर  क्लास में हँसी का फव्वारा फूट पड़ा था और सारे बच्चे  पेट पकड़कर हँसते हँसते मानों पागल हो गए थे I और मेरा मन कर रहा  था कि टीचर को अपना सफ़ेद रंग का जूता फेंक कर मार दूँ I पर मन में जैसे ही मेरे सफ़ेद घोड़े वाला राजकुमार का मुस्कुराता चेहरा नज़र आया मेरा सारा गुस्सा अगले ही पल काफूर हो गया  I 

पर विधाता को तो जैसे कुछ और ही मंजूर था I  सफ़ेद घोडा तो आकाश से आया पर मुझे नहीं मेरी  माँ को अपने साथ ले जाने के लिए और पलक झपकते ही उन्हें उड़ा ले  गया सफ़ेद बादलों के पीछे ...जहाँ पर मैंने बहुत आवाज़ लगाई साथ जाने की, पर घुंटी -घुंटी चीखों के अलावा मेरे मुँह  से कुछ नहीं निकला और फिर काले भैसें पर सवार जैसे यमराज ने मुझे इस जीवन को जीने में ही मृत्यु को विवाह पर उपहार के तौर पर दे दिया था जिससे में तिल-तिल कर के मरू... मेरी अभिलाषा भी पूर्ण हो जाए और उनका वरदान भी I आज फिर मेरा पति जो बाहर की दुनियाँ में एक महापुरुष था और सभी उसे आदर से रंजन जी कहकर बुलाते थे , घर की देहरी पर आते ही वो जूतों के साथ उस " जी" से जुड़ी उन  तमाम उपमाओं का जामा भी बाहर उतार आता और फिर शुरू होता उसकी कुंठित मानसिकता के पीछे का भयानक सच लातों और जूतों के साथ , जिन्हें भोगने के बाद मैं अपने उस स्टोर रूम में पहुँच जाती जहाँ पर मैंने सबसे छुपाकर अपनी कल्पनाओं की एक अलग दुनियाँ  बसा रखी थी I जहाँ पर किताबों की नीली स्याही से पात्र निकल कर मेरे दुःख के बराबर के हिस्सेदार होते थे I वे मेरे आँसूं पोंछते और अपनी व्यथा कहते I कई बार तो हम सब एक साथ घंटों चुपचाप बैठे रहते I भला आँखों से ज्यादा दर्द की भाषा कौन बोल पाया हैं I 

पर इन्हीं सब के बीच एक परिवर्तन हुआ कैसे और कब I बिलकुल झटके ...अचानक... अगर सोचा जाए तो मानों एक पल में प्रलय का आना,या फिर तारे का टूटना या संगीत का सप्तम सुर..सब जैसे थम गया जब अचानक वो एक दिन रंजन के साथ मेरे " घर " आया I कुछ ख़ास आकर्षण नहीं था उसमें पर शायद किसी भी औरत को मानसिक तौर पर जीतने  की कला उसमें थी Iउसकी बातें,उसकी सोच और उसका स्त्री जाती के प्रति सम्मान देखकर मैं अभिभूत हो गई I  धीरे- धीरे मेरे कमरे के कहानी के पात्र उन कागजों में  सिमटते  चले गए और फिर ना जाने कहाँ  विलीन हो गए I उनकी जगह पर आकर बैठ गए हँसते , खिलखिलाते , हौले से गुदगुदाते प्रेम में डूबे हुए वो हसीन  चेहरे जो हक़ीकत में तो क्या मेरे सपनों में भी कभी मुझे नहीं दिखे थे  I 

धीरे - धीरे रंजन के घर आने का मैं इंतज़ार करने लगी क्योंकि "वो" सिर्फ़ उसी के साथ आता था I अचानक एक दिन वो अपनी ढेर सारी किताबों को एक पन्नी में लपेटे हुए आया और मुझे  हिफ़ाजत से रखने को बोल कर तीर कि तरह बाहर चला गया  I कुछ नहीं समझ पाते हुए भी मैंने उन्हें सहेज कर रख लिया I हालत अब ये हो गई थी कि सारा काम निपटाकर मेरी आँखें सूनी उदास सडकों पर ठहर जाती, जिनका वजूद बिना उसके क़दमों की आहत के बेकार  था I कई बार में रोती और अपना सर धुनती कि वो मुझसे मिला भी तो उम्र के उस पड़ाव में आकर जहाँ पर केवल उसके एहसास को मैं दूर से ही महसूस कर सकती थी I धीरे-धीरे वो मुझसे बिना कुछ कहे और पूछे दर्द की गोलियाँ मेरे हाथों में पकड़ा देता था जिन्हें मैं अपने आँसूं रोकते हुए कस कर मुट्ठी में पकड़ लेती I मेरे तन की सिरहन को शायद कभी वो जान ही नहीं पाया  या अगर जाना होगा तभी मेरे पास नहीं आया होगा I मेरे शरीर के साथ मेरे मन के इतने गहरे ज़ख्म उसे दिखते कैसे थे ..कई बार पूछना चाहा पर अब तो पीड़ा की चिंगारियों ने लावे का रूप ले लिया था और उसे मैं बहने से रोकने में  नाकाम सिद्ध हो रही थी I 

फिर  एक दिन उसका फ़ोन आया कि जिस गन्दी पन्नी में अखबार  के अन्दर उसके पन्ने हैं उन्हें मैं पढ़ लूँ ,क्योंकि वो हस्पताल में भर्ती हैं  I मेरे आगे जैसे पूरा कमरा  घूमने लगा I बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए  मैं  फर्श पर ही बैठ गई I कब..कहाँ.. कैसे ..ये सारे  सवाल मेरे हलक में ही फंस के रह गए I मैं कुछ बोलू इसके पहले ही उसने फ़ोन काट दिया I  मैं ना जाने कितनी देर तक वहीँ पर चेतना शून्य होकर बैठी रही I तभी अचानक रंजन आया और मेरे हाथ में अण्डों की थैली पकड़ाता हुआ बोला- " अमृत मर गया I "

मेरी आखों मैं आई हैरानी भाव को देखता हुआ वो आगे बोला  -" अरेये वही मेरा दोस्त जो हमेशा मेरे साथ घर आता था I "

और सुनो , "जरा चार अंडे का आमलेट तो बना देना I "

मैं आँख फाड़े उसे देखती रही I मेरे सामने ये कौन था जो ना  तो इंसान था और ना  ही पशु I मैं झटके से उठी और जीवन में पहली बार बिना मार की परवाह किये बगैर अपने कमरे की ओर दौड़ी I कुण्डी बंद करने के बाद मैंने वो हजारों पन्नों का मोटा बण्डल निकाला  I एक के बाद एक पन्ना खुलता गया जिस पर मोतियों जैसी लिखावट में अनगिनत बार बस एक ही लफ्ज़ लिखा गया था -" स्वयंसिद्धा "  

मंजरी शुक्ल  

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  1. अति सुन्दर ,रौंगटे खडे होने जैसे अनुभव लिए ,एक सांस में पढ़ गयी में स्वम् सिद्धा.लेखिका को ढेर सी बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. akhilesh chandra srivastava12:45 pm

    मंजरी शुक्ला जी की कहानी स्वयं सिद्धा थोड़ी
    अस्पष्ट सी कहानी है बहुत कुछ लेखिका के
    अंतस में ही रह गया वैसे कहानी लिखने
    का अन्दाज़ तो प्रभावशाली है पर क्या
    कहना चाहतीं है कहानी का शिक्षा और उदेश्य
    स्पष्ट नहीं हो पाया अच्छे प्रयास के लिए मेरी

    उत्तर देंहटाएं

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