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कुबेर की लघु व्यंग्य कथा - विलुप्त प्रजाति का भारतीय मानव


उस दिन यमराज के पास और एक विचित्र केस आया। केस स्टडी करने के बाद यमराज
को बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ। उन्हें लगा कि इस केस को ईश्वर की जानकारी में
लाना जरूरी है। केस को लेकर वह दौड़ा-दौड़ा ईश्वर के पास गया। कहा -
’’प्रभु! आज बेहद शुभ समाचार लेकर आया हूँ; सुनकर आपको भी सुखद आश्चर्य
होगा।’’
ईश्वर ने मुस्कुराकर कहा - ’’तब तो बिलकुल भी विलंब न करो यमराज जी, सुना
ही डालो।’’
यमराज ने कहा - ’’प्रभु! जिस भारतीय प्रजाति के मनुष्य को हम विलुप्त समझ
लिये थे, वह अभी विलुप्त नहीं हुआ है। देखिये, सामने खड़े इस मनुष्य को।
साथ ही साथ इसके बहीखाते को भी देखते चलिये।’’
पहले तो ईश्वर ने उस अजूबे मनुष्य को निगाह भर कर देखा, फिर जल्दी-जल्दी
उसके खाते के पन्नों को पलटने लगा। खाते में उस मनुष्य के सम्बंध में
निम्न विवरण दर्ज थे -
नाम - दीनानाथ
पिता का नाम - गरीबदास
माता का नाम - मुरहिन बाई
(ईश्वर की बहीखता में मनुष्य की जाति, वर्ग, वर्ण, देश आदि का उल्लेख नहीं होता।)
पता ठिकाना - जम्बूखण्ड उर्फ आर्यावर्त उर्फ भारतवर्ष उर्फ भारत उर्फ
हिन्दुस्तान उर्फ इंडिया।
(एक ही स्थान के इतने सारे नामों को पढ़कर ईश्वर की बुद्धि चकराने लगी।)
हिम्मत करके उसने आगे की प्रविष्टियाँ पढ़ी। बही खाते के बाईं ओर के (आवक
अर्थात पुण्य वाले) सारे पन्ने भरे पड़े थे परन्तु दाईं ओर के (जावक
अर्थात पाप वाले) सारे पन्ने बिलकुल कोरे थे। ईश्वर को बड़ी हैरत हुई। अंत
में बने गोशवारे को उन्होंने देखा जिसमें संक्षेप में निम्न लिखित बातें
लिखी हुई थी -
झूठ बोलने की संख्या - शून्य
चोरी, धोखेबाजी अथवा ठगी करने की संख्या - शून्य
आजीविका के लिये भीख मांगने की संख्या - शून्य
अपने स्वार्थ, सुख अथवा स्वाद के लिए दूसरे प्राणियों को दुख देने, पीड़ित
करने अथवा हत्या करने की संख्या - शून्य
अपने स्वार्थ, सुख अथवा स्वाद के लिए, धर्म के नाम पर शब्दों का प्रपंच
रचकर, लोगों को ठगने, लूटने, दिग्भ्रमित करके उन्हें आपस में लड़वाने की
संख्या - शून्य
ईश्वर और धर्म के नाम पर लोगों को देश, जाति अथवा संप्रदाय में बाँटने का
काम करने की संख्या - शून्य
बहीखाता पढ़कर ईश्वर के मन की शंका और गहरी हो गई। उन्होंने यमराज से पुनः
पूछा - ’’क्या यह मानव वाकई भारतीय है?’’
यमराज ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा - ’’मैंने इसके बारे में बहुत
बारीकी से जांच किया है, प्रभु! यह भारतीय ही है। संभालिये इसे और मुझे
आज्ञा दीजिये।’’
’’ठहरिये यमराज जी!’’ ईश्वर ने कहा - ’’इसके सम्बन्ध में हमारी योजना अलग
है। इस विचित्र मानव को वापस पवित्र देवभूमि भारत भेज दीजिये। वहाँ किसी
अजायब घर में इसे सुरक्षित रखवा दीजिये। इसके पिंजरे के बाहर सूचना-पट
टंगवा दीजिये जिसमें लिखा हो - ’विलुप्त प्रजाति का भारतीय मानव’।
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KUBER
Email - kubersinghsahu@gmail.com
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आपकी लिखी रचना बुधवार 02 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

बढ़िया रचना , रविशंकर सर धन्यवाद !
नवीन प्रकाशन -: बुद्धिवर्धक कहानियाँ - ( ~ त्याग में आनंद ~ ) - { Inspiring stories part - 4 }

अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव

भाई अपने सही कहा इस विलुप्त प्रजाति का भारतीय
मानव अब इस देश में नहीं पाया जाता यमराज जी का आश्चर्यचकित होना और भगवानजी के पास ले जाना
फिर भगवान जी का उसे संग्रहालय में रखने का आदेश
देना इस सुन्दर व्यंग के महत्वपूर्ण अंग हैं बधाई

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