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अशोक गौतम का व्‍यंग्‍य - उनके नाती से मुलाकात

ज्‍यों ही पता चला कि बाजार में आज गोभी सौ की पंद्रह और आलू पचास के दस किलो मिल रहे हैं तो मैं नंगे पांव ही बाजार जा पहुंचा। मैंने बाजार पहुंच आव देखा न ताव , पंद्रह किलो गोभी और दस किलो आलू एक बड़े से बोरे में डाल गधे की तरह लदा घर की ओर लचपचाती टांगों पर चल पड़ा । अभी बाजार से दो ही मोड़ घर की ओर हांफता चढ़ा था कि सामने सड़क पर कूड़े के ढेर के पास एक गधा मस्‍ती में बीड़ी फूंकता खड़ा दिखाई दिया तो मुझे अपने पर बहुत दया आई! यार! मुझसे अच्‍छा तो ये गधा है, जो गधा होने के बाद बिलकुल मजे में है और, एक मैं आदमी होने के बाद भी․․․ अभी मैं उसकी मौज के बारे में सोच ही रहा था कि सामने कूड़े के ढेर पर मुंह मारता गधा मुझे देखकर हंसने लगा तो मुझे बहुत गुस्‍सा आया, मोहल्‍ले वाले मुझ पर हंसे यह तो जायज है, पर अब ये गधा भी? जाना पहचाना हो फिर तो चलो उसे आप जैसे कैसे सहन कर लो! पर अब ये गधा भी? आखिर इसको कैसे पता चला होगा कि मैं सबके हंसने का आधार हूं?

जब मुझसे रहा न गया तो मैंने अपने कंधे से आलू गोभी की बोरी गृहस्‍थ को कोसते हुए वहीं पटकी और उस पर आग बबूला होते उससे पूछा,‘ जान पहचान के होते तो तो बात कुछ और होती, पर अपरिचित और वह भी गधे होकर तुम एक आदमी पर हंस रहे हो? इस बाबत पुलिस को सूचित करूं क्‍या? ' पर वह मजे से बीड़ी फेंक वैसे ही हंसता रहा तो मुझे उसके गधेपन पर गुस्‍सा होने के बदले दया अधिक आई! छोड़ यार गधा है! गधे के आगे बीन बजाने से क्‍या फायदा! तू गुस्‍से हो भी रहा है तो किस पर गुस्‍से हो रहा है? यार ,तू तो इससे भी अधिक गधा लग रहा है ,' अपने से कह मैं फिर नीचे उतारी आलू गोभी की बोरी उठाने को हुआ तो गधे ने मुझे रोकते कहा,‘ यार, गृहस्‍थी लग रहे हो?' जब मैंने इधर उधर देखा, आसपास कोई न दिखा तो मैं हैरान! तभी गधे ने फिर कहा,‘ चौंको नहीं! मैं ही बोल रहा हूं। शादी शुदा लगते हो?'

‘ तुम्‍हें कैसे पता ? क्‍या तुम मेरी बारात में गए थे?' मैंने चकित हो पूछा तो वह बोला,‘ नहीं! हम गधे हैं ,आदमियों की बारात में नहीं जाते। आत्‍मग्‍लानि होती है।'

‘तो फिर कैसे जान गए कि मैं शादी शुदा हूं?'

‘वैरी सिंपल! गधे की तरह जो लदे हो! अगर कुंवारे होते तो मेरी तरह․․․․' कह गधे न ठहाका लगाया तो मन किया कि उसकी ठहाका लगाने वाली जबान खींच लूं, पर आलू गोभी उठाने के बाद मेरी तो अपनी ही जबान खींची जा रही थी, सो मन मार गया। पता नहीं तब क्‍यों गधा होने के बाद भी उस वक्‍त मुझे उसमें बीवी से अधिक आकर्षण लगा और मैं न चाहते हुए भी उससे बातें करने के लिए वहीं बैठ गया! बातों ही बातों में मैंने उससे पूछा,‘ बाराबंकी के तो नहीं हो?' तो अबके चौंकने की बारी उसकी थी। सो वह चौंकता बोला,‘ हां, हूं तो बाराबंकी का ही, पर कैसे पहचान लिया तुमने!'

तो मैंने आधी पौनी मूंछों पर ताव देते कहा,‘ तुम क्‍या समझते हो कि केवल तुम ही उस्‍ताद हो, अरे मैं आदमी हूं आदमी! गधों को उनकी चाल से ही पहचान लेता हूं कि कौन गधा कहां का है। हूं तो मैं आदमी पर चौबीसों घंटे रहता तो गधों के बीच में हूं। पढ़े लिखे कितने हो?' मैंने आगे पूछा तो वह नाक भों सिकोड़ता बोला,‘ बीए पास हूं!'

‘हद है यार! फिर भी गधे ही रहे? बीए करके तो तुम्‍हें कम से कम पूरा नहीं तो आधा पौना आदमी हो जाना चाहिए था!'

‘ पर नहीं हो सका। हम मिडिल क्‍लासों के साथ बस यही एक दिक्‍कत है कि हम चाहे कितने ही पढ़ लिख क्‍यों न जाएं, पता नहीं क्‍यों फिर भी रहते गधे ही हैं?'

‘ अच्‍छा तो, एक बात और बताओ? उनसे तुम्‍हारा कोई रिश्‍ता तो नहीं ?' कह मैं उसकी आंखों में झांकने लगा।

‘क्‍यों??' गधे ने अबके हैरान होते पूछा तो मैंने कहा,‘ वह इसलिए कि तुम बहुत कुछ उनके पोते- नाती जैसे पता नहीं मुझे क्‍यों लग रहे हो,' तो वह ठहाका लगाता बोला,‘ हद है यार! गजब की स्‍मरण शक्‍ति है तुम्‍हारी! लगता है, गृहस्‍थी का भार ढोते ढोते अभी भी कुछ दिमाग तुममें शेष बचा है,' तो मुझे लगा कि यार, ये गधा तो मेरे से भी अधिक दुनियादारी का ज्ञान रखे है। राम जाने , फिर पता नहीं कैसे ये बेचारा गधा योनि में चला गया? शायद भगवान से इंडिया में भेजते हुए गलत रजिस्‍ट्रेशन हो गई होगी इसकी! तभी उसे लगा कि मैं अपने आप से कुछ कहने में व्‍यस्‍त हूं तो उसने पूछा,‘ अपने से कह रहे हो कुछ क्‍या?'

‘तुम्‍हें कैसे मालूम?'

‘मैं सब जानता हूं! भले ही गधा हूं।'

‘तो तुम अन्‍तर्यामी भी हो?'

‘ नहीं पता!'

‘ क्‍यों , अपने बारे तुम्‍हें कुछ नहीं पता?'

‘ नहीं, गधा जो हूं। इस देश में गधे गधे इसलिए हैं कि उन्‍हें अपने बारे में मालूम नहीं कि वे क्‍या हैं! उन्‍हें जिस दिन ये पता लग जाएगा कि वे क्‍या हैं, उस दिन देश में एक भी गधा गधा नहीं रहेगा,' उसने बुद्धिजीवी वाली बात की तो मेरे दांतों तले उंगली खुद ही चली गई!

‘ अच्‍छा तो एक बात बता , तुम कहीं उन वाले गधे के पोते नाती तो नहीं ? उनके गधे का विवाह किसके साथ हुआ था?'

‘क्‍यों? आदमी को तो आदमी पर विश्‍वास नहीं पर यार गधे पर तो तुम्‍हें विश्‍वास होना चाहिए, क्‍योंकि आदमी और गधे में एक यही बेसिक फर्क है कि आदमी आदमी होकर भी झूठ बोलता है जबकि गधा गधा होकर भी झूठ नहीं बोलता।'

‘ ऐसा क्‍यों?' मैंने सिमटते पूछा तो वह बोला,‘ गधों के शब्‍दकोश में झूठ, फरेब नाम के शब्‍द अभी तक शामिल नहीं हुए हैं। रही बात उनके विवाह की! तो उनका विवाह दिल्‍ली में एक सेठ की रूपवती नामक रूपसी से हुआ था। '

‘ फिर!!'

‘ फिर क्‍या! वहां भी मेरे दादा के साथ धोखा सा हुआ। वे मेरे दादा के दिमाग पर नहीं पंडित नेहरू से उनकी मुलाकात के बाद दूसरे चक्‍करों में पड़े थे !'

‘ फिर!!'

‘फिर उन्‍होंने पता नहीं कहां विवाह कर लिया। उससे उनके चार संतानें पैदा हुईं। दो मामे, एक मासी और․․․․'

‘फिर!!'

‘फिर क्‍या! नाना दिल्‍ली में ही कहीं सैटल हो गए। अच्‍छा धंधा था वहां उनका! पर बाद में जब अंतिम दिन आए तो बाराबंकी जाने की रट लगाने लगे!'

‘क्‍यों?'

‘रिश्‍तेदार बताते हैं कि वे बोलते थे, मैं चाहे लाख गधा हूं ,पर मेरी अंतिम इच्‍छा है कि मैं मरने के बाद अपनी मिट्‌टी में ही मिलूं!'

‘फिर!'

‘मेरी मां ने बागी हो एक सेठ से इंटर रेस मैरिज कर ली।'

‘गधे बाप ने रोका नहीं?'

‘रोका तो बहुत, पर मां नहीं मानी तो नहीं मानी! अपने को माडर्न जो कहती थी। नाना ने मां को बहुत समझाया कि हम गधे हैं गधे! हम कितने ही पढ़ लिख, पैसों वाले क्‍यों न जाएं पर अपना समाज बिरादरी अपने ही होते हैं। अपनी सभ्‍यता संस्‍कृति अपनी ही होती है।'

‘फिर!'

‘फिर क्‍या! नाना से विद्रोह कर मैरिज तो कर ली, पर बाद में पता चला कि जिससे मेरी मां ने मैरिज की थी वह पहले ही मैरिड था।'

‘ बड़ा दुख हुआ सुनकर! फिर!!'

‘ फिर क्‍या! वे इस सदमे को सहन नहीं कर पाए और उन्‍हें दिल का दौरा पड़ा!'

‘ वैरी सैड! फिर!'

‘ फिर क्‍या! सरकारी अस्‍पताल गए और वहां वही हुआ जो लगभग हरेक के साथ होता है।'

‘ भगवान उनकी आत्‍मा को शांति दें! फिर!'

‘फिर क्‍या! मां गर्भ से थी! उसे सेठ पर बहुत गुस्‍सा आया और एक रात वह उसके घर से चुपचाप मुझे पेट में ले बाराबंकी आ गई!'

‘ आह! फिर!'

‘फिर क्‍या! बाराबंकी में कुछ था तो नहीं। बड़े लोगों के घर झाड़ू पोंछा कर पेट पालती रही। जैसे कैसे उसके मैं पैदा हुआ। दूसरे गधों के साथ गिरता पड़ता बड़ा हुआ तो अपने गांव के लड़कों के साथ मजदूरी करने तुम्‍हारे शहर आ गया।'

‘फिर तुमने बीए कहां से की? मैंने सोचा कि मैंने गधे का झूठ आन द स्‍पाट पकड़ लिया तो वह मजे से बोला,‘ पत्राचार से!'

‘तो अब क्‍या इरादा है?'

‘गधा हूं! भार ढोने के अतिरिक्‍त और क्‍या करूंगा? जनता और गधे को इस देश में बस भार ही ढोना है। वह चाहे कितनी ही पढ़ लिख क्‍यों न जाए,' कि तभी मेरे मोबाइल पर घर से बीवी की घंटी बजने लगी, मैं परेशान सा हुआ तो उसने पूछा, ‘ किसका फोन है?? घरवाली का ही होगा! यार, ये मोबाइल भी न एक पंगा हो गया है। दो घड़ी अगर एक दूसरे से अपने सुख दुख बांटना भी चाहें तो भी नहीं बांट पाते,तंग कर देता है, ' उसने सिसकते हुए मेरे कंधे पर आलू गोभी की बोरी रखवाई और मैं उससे फिर मिलने का वादा कर घर आ गया।

अशोक गौतम,

गौतम निवास, अप्‍पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि․प्र․

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अच्छा व्यंग है

अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव

दोनों की सारी सारी बात कई कई बार पढ़ी पर समझ
नहीं पाया उनमे गधा कौन था वो जो बीड़ी पी रहा था
या वोह जो आलू गोभी का बोरा लादे था क्योकि मैंने
किसी गधे को बीड़ी पीते कभी नहीं देखा हाँ अलबत्ता
आलू गोभी का बोझ उठाये अक्सर देखा है और गधे
केवल बाराबंकी में ही नहीं हमारे सोलन में भी मिलतें हैं

iske liye gadhe ki aatam katha jaroor padhen, please. vaise gadhe to yater tater sarveter hain

dhanayad! iske saath ek gadhe ki atamkatha bhi dekhen. maja aayega

ashok gautam

akilesh ji. iske baad ek gadhe ki aatam katha padhen. bahut maja aayega

कृष्ण चन्द्र की एक गधे की आत्म कथा तो हमने भी पढ़ी है परन्तु श्री अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव द्वारा उठाऐ गए मुद्दे का जवाब नही है। हाँ एक हिन्दी के लेखक का टिप्पणियों का प्रत्युत्तर अंग्रेज़ी भाषा में देना किस मजबूरी का द्योतक है समझ से परे है

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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