रविवार, 23 मार्च 2014

पखवाड़े की कविताएँ

जसबीर चावला

ठेके पर लोकतंत्र
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निकाह तलाक में बदले जो क़ुबूल थे
सप्तपदी ने गरिमा खोई
'आनंद कारज' ने मैली चादर ओढ़ी
अवैध 'मैत्री क़रार' गुजरात से चल किस मुक़ाम आया
कहां मैत्री हुई कहां क़रार
दल बेचैन बेक़रार
बिन रिलेशन 'लिव इन' हुआ
कई बच्चों सहित गये
कहीं बगल बच्चे पीछे छूटे
विवाह से पहले हनीमून मना
कोई मर्दानगी टेस्ट पर अड़ा
गरिया रहे थे जो बरसों
वे बेमेल भी एक हुए

गाँठें खुली नये गठबंधन बने
नैतिकता अप्रसांगिक हुई
'छिनरा छिनरी से मिले हंस हंस होय निहाल'
संबंधों ने बदल दी परिभाषा
लोकतंत्र का क्या हुआ
चुनाव बिगड़ा दाम्पत्य हुआ

***
सपनों का सौदागर नहीं देशद्रोही
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मेरा नाम किसी लिस्ट में नहीं आया
न जाँच हुई
न लोकायुक्त का छापा
शपथपत्र नहीं दिया किसी ने कभी मेरे ख़िलाफ़
निशान नहीं पाये गये किसी वारदात मे
मैं कहीं शामिल ही नहीं था
साफ़ सुथरे हाथ

वे सदा सबूतों के अभाव मे बरी हुए
बाइज़्ज़त
हाथ रंगे नहीं पाये गये उनके
उस्ताद थे हाथ बदलने में
दस्तानें चढ़ाने में माहिर
दस्तानों की पोरों में उँगलियों के निशान नहीं होते
बेदाग़ छूटते

मैं कैसा देशभक्त
न अख़बारों में ईमानदारी के विज्ञापन छपे
टीवी चेनलों पर न प्रशस्ति गान
न ढिंढोरा पीटा
न ठिकानें लगाये अरबों रुपये उन जैसे
न्यायालय कभी संज्ञान नहीं लेता

वे ज़मीन से जुड़े
देश एक टाऊनशिप है उनके लिये
लोभ से बना बिग बाजार
दलाली है
जहाँ सपनें बिकते हैं
उनकी भूख बड़ी है

मैं संसद में रुपये लहरा न सका
न पैसे लिये प्रश्न पूछने के
आकाशीय तरंगों से पातालीय गैस
पनडुब्बी से कामनवेल्थ
कहीं नहीं मैं

कैसा देश भक्त
बुल्लेशाह कहता रहे
'बुल्ला की जाणां मैं कौण बुल्ला की जाणां'
मैं जानता हूँ मैं कौन हूँ
सपनों का सौदागर नहीं
देशद्रोही हूँ इनके लिये

****

मुझे जीने दो
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मैं दंगे में मरा हूँ कई बार
मारा जा रहा हूँ रोज
किस शहर प्रांत की बात करूँ
आँख के पटल पर सब हैं
नाम तो लो
                                                     
भिवंडी में मरा
अकेला नहीं
परिवार घर पेट हुनर के साथ मरा हर जगह
लक्ष्मणपुरबाथे कंधमाल झज्जर में
मुरादाबाद भागलपुर में मरा
दिल्ली मुंबई गुजरात में
अभी मुज्जफरनगर में फिर मरा
और उसके बाद भी
गिनते जाओ
एक..दो..सौ..दो सौ....
ये अब नाम भर हैं दोहराने के
जैसे बड़े तूफ़ान का कोई नाम होता है
चौरासी बानवें दो हज़ार दो...
९/११ के समान ये है दंगे की पहचान के साल
सैंतालिस के बाद मैं इक गुमनाम आँकड़ा भर हूँ
गृह मंत्रालय की किसी बिसरी फ़ाइल में

मारा जाता हूँ रोज हिंदू मुसलमान के नाम
कभी सिख ईसाई दलित के नाम
चोपाये के नाम
पहिचान के साथ बिना पहचान
आत्मा निरंतर कुचली जाती है
कुरेदे जाते ज़ख़्म मेरे
रंगनाथ श्रीकृष्ण लिब्राहन आयोगों में
शपथ पत्र अदालतों में
एड़ियाँ रगड़ता न्याय
बेताल सा उड़ लटक जाता है सरकारी पेड़ों पर
मैं फिर से मार दिया जाता हूं
दफ़्न कर दिया जाता हूँ न खुलने वाली अलमारी में

रैलियाँ सम्मेलन टीवी की बहसें
नश्तर चुभोते हैं
तेज़ाबी बारिश में नहला दिया जाता
शरीर आत्मा बँट जाती
कौन आँखे पोंछे
अब क़लम की नोक टूटी

मरते मरते बस इतना कहना है मेरा
मैं जीना चाहता हूँ
मैं भी जीना चाहता था

***

परहेज़
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न गुड़ दिया
न गुलगुले
परहेज़ करता
किससे
अब परहेज़ है
तुमसे
...?

***

चुप्पी
-----

क्या नहीं टूटा
इन दिनों
संस्कार
परिवार
समाज
रिश्ते
वर्जनाएं टूटी

बस
न टूटी
उसकी
चुप्पी

***

राम की माया
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राम जी की कृपा
रामकृपाल रामविलास रामदास
'उदित'हो गये
'भागीरथ'प्रयत्न किया
'मन मुदित हो गये

बरसों जम कर कोसा
शब्दबाण चलाये
'मिठी लगे तेरी गारी रे'
किसी ने छेड़ा
कुपित हो गये

***

रीढ़ की हड्डी:दलबदल
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पहले ही कम थी रीढ़ की हड्डीयां
कुछ लग गई उन्हें बनना था जिन्हें केचुआा
तनते कैसे
रेंग रहे हैं
बिना किसी शर्म हया के
आना जाना चल रहा
दल से दल में
दलदल में

 

मनोज 'आजिज़'

दो ग़ज़लें
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                १ 

हर ग़म का कुछ राज है
हर राज का कुछ राज है

बेदाग़ रहना मुश्किल है
हर शख्स परेशां आज है

रिश्तों की गर्मी अब कहाँ
सिमटा हुआ हर अंदाज है

हर सिम्त ख़िलाफ़त, रंजिश है
हर्ज़ बयां करती हर आवाज़ है

किस राह सुकूँ है 'आजिज़'
कौन सा कैफ़ी तख्तो-ताज है


               २

क्यूँ ख़ुद से कोई अंजाँ रहे
जाँ रहते बेजाँ रहे

बस मुकद्दर पे यकीं ठीक नहीं
इलहामे-दिल जरुर जवाँ रहे

इस कदर तहज़ीबे हयात हो
कि पस्ती में जोश रवाँ रहे

मंज़िल पे नज़र हो हर हाल
रुकना नहीं आंधी तूफां रहे

हर ग़म को सलाम कर 'आजिज़'
कि ग़म को तुम याद रहे 
 

संपर्क- आदित्यपुर-२, जमशेदपुर-१४
फोन- 9973680156 

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श्याम डांगी
(1)
गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये

परिंदो संग हर मस्तियां छोड़ आये
गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये
यूं तो इक घर की दहलीज छोड़ी थी हमने
लगता है अब कई बस्तियां छोड़ आये
उलझनों की ये शब अब नहीं बिताई जाती
आम की छांव तले निंदिया छोड़ आये
अब कोई दिल को अच्छा नहीं जंचता है
सर जो वादे की एक बिंदिया छोड़ आये
शहर के कुछ समंदर नहीं पार होते
हौसले की जो हम कश्तियां छोड़ आये
                                    
(2)
   (जख्म)
इक दिन अलसुबह
कुछ नज्म लिखी थी
पुराने जख्मों में
डूबों डूबों के
बेचारे समंदर के
दोनों तरफ
एक तरफ
सुनहरी धूप से
दूसरी तरफ,
काले घुप अंधेरे से।

सदियों बाद
आज फिर
वही पुरानी डायरी
हाथ लगी है
नज्मों की।

मैं देख बहुत बहुत हैरान था
कि डायरी में नज्म गलने लगी थी
और हौले हौले बनने लगी थी
तीखी और एकदम नशीली शराब।
पर गंध से कुछ पता नहीं चल रहा था
कि रम थी के व्हिस्की या फिर देसी।

अब रात होते होते
दिमाग पर चढऩे लगी थी
वहीं पुरानी नज्मों की
कच्ची पक्की शराब।
पी कर जिसे झुमता रहा
मैं कुर्सी पर बैठे बैठे
एक सदी तक
और अचानक सुबह हो गई।

अब फिर से
मैं उन्ही जख्मों में खो गया था
जिसके ख्यालों में डूब
घूम आया था पूरी जन्नत।

सच कहूं तो शायरों को
कहां फिक्र होती है
खुद के जख्मों की।
उसे तो आदत पड़ी है
अपने जख्मों को समेट
पराये जख्मों पर
मरहम लगाने की।

और अब तक मैं यही ख्वाब तो
देख रहा था कि
नज्मों के जख्म भर जाए।
पर अब सोचता हूं
जख्म किसी के भी हो
जख्म कैसे भी हो
क्या उन पर परदे किए जा सकते है।
या यूं कहूं कि क्या जख्म भरे जा सकते है।

(3)
यार तेरे मोहल्ले की लड़की....
यार तेरे मोहल्ले की लड़की
जमाली हूर लगती है
जरा दो चार बात तो करा दो
उस सांझ की सांवली लड़की से।

फिर उससे कोई दिले रिश्ता थोड़े कायम करना,
बस मुझे तो चेहरे के कुछ हसीन फसाने पढऩे है
जो मैं अभी तक पढ़ नहीं पाया हूं।
और देखी है जो मौजा
मगर बहुत ही बेमंजर
गुफ्तगू है किसी से
मगर बहुत ही बेजिगर

सच कहूं तो कहां कहां नहीं ढूंढा
उन बेखबर, मस्त फसानों को।
चांद में, सुबह में, शब में, ओस में
बादल और ख्वाबों में भी।
और जिसे ढूंढा है गालिब की गजलों में
फैज के नज्म ठिकानों में
मीर के दीवान में
साहिर के अफसानों मे।

अब उसका पता क्या दूं
यूं समझो की यहीं रहती है
यहीं रहती है वो
जैसे मेरे दिल के किसी कोने में
कहीं रहती है वो
और जिसे देखा था मैने
कभी मेरे ख्यालों के मोहल्ले में
जिसकी गली गुजरती है
इस दिल से उस दिल से
या यूं कहूं की हरेक दिल से।

यार मिला दे उस जमाली हूर से
सच कह रहा हूँ
इक नज्म इक सदी से ठहरी है
कोई रंगीन बात उससे हो जाए
तो वो ठहरी नज्म संवर जाए
जिसमें अभी सिवाए दर्द कुछ नहीं हैं
(4)
         (चांद)
घासफूस में जब से छिपा है चांद
गांव में एक उस्ताद, खलीफा है चांद
फूलों की क्यारियों से घर की मुंडेर तक
मेरे गांव में कहां कहां न छूपा है चांद
जैसे शाम नानी ने सुनाई हो नई कहानी
वैसे नई कहानी का पुलिंदा है चांद
खेती का जब से काम-धाम संभाला है
बेचारा थका हारा-सा लगता है चांद
नीम की टहनियों पे अलसुबह
किस दिन न बंदरो-सा उछला है चांद
कोने में पड़े पुराने पोकरों में ज्वार-सा
क्यूँ पिछली एक सदी से छिपा है चांद
(5)
औरत होने के लिए........ !

कितने पशेमान कपड़े पहने है,
उस आसमानी लड़की ने।
 
जो
फुदक रही है आसमान की छाती पे
झूम रही हैं मेहताब के सूफ़ी गीतो से
खेल रही हैं आकाशगंगा के अनगिनत खिलौंनो से।
एक दिन जिसे जमीं की कूचा आके
बनना है कल की संघर्षशील औरत
पहनना है हया के मैले कुचले कपड़े
खेलना है नंगी लाशो  के खिलौंनो से
होना है हवस के दरिंदो के हवाले
जीना है घूट घूट के
मरना है सहम सहम के।
आखिर क्यूं समझ नहीं पाती एक औरत
दुनिया के पाशविक जादु को
क्यूं पढ़ नहीं पाती है,
मिरात के पिछे छिपी संगीन तस्वीरो को
क्यूं बन जाती है, एक औरत संघर्ष की प्रतिमूर्ति
क्यूं ताउम्र जुझती रहती है
अपने अस्तित्व के लिए औरत
  औरत क्यूं अपने आंचल की आखिरी खुशी  भी
बांट देती है असंख्य लोगों को
और क्यूं औरत एक दिन हार के
लौट जाती है अपनी उसी अफ़लाक दुनिया में।

कितनी असीम ज़हमत सहती है औरत
झोंक देती है कई सदियां
नाप देती है अनंत आसमानों को
तय करती है फ़लक से जमीं की दूरी।

हाय!
कितनी दूरी नापती है,
कितना संघर्ष करती है
एक औरत
औरत होने के लिए।
(6)
कुछ ख्चाब अब भी जिंदा है तेरी आगोश की सदाओं के
कुछ जख्म अब भी झुम रहे है तेरी माशुक सी अदाओं के
पहलू में आना है तो आ पहलू से जाना है तो जा तेरी मर्जी
कि तीर मुझे मरते दम तक झेलना है तेरी काली निगाहों के
कुछ गम अब आना बाकी है कुछ ख़ुशी जाना बाकी है
कितने सितम सहना पड़ते हैं हम आशिक को बलाओं के
हम दीवानें अब उड़ भी नहीं सकते आजाद परिंदों की तरह
बताओं कब तक यूं ही जहमत उठाऐंगे तेरी गिलाओं के
अश्क अब भी बाकी है मेरी हंसती हुई आंखों के अंदर
पर घाव यूं नहीं छुपते हैं मेरे यार मोहब्बत में दगाओं के ।
                                                   
(7)
आज फिर उदासी कि कोंपले
पनपने लगी है दिल में
आज फिर शाम का सूरज
उग आया है उन उदास आँखों में
आज फिर कोई आएगी मयखाने से
कोई जख्मी जाम पिलाएगी मयखाने से
आज फिर सरजाम का दर्द
उठने लगा है गम के माथे से
आज फिर जहराब मचलने लगा है
आरजू के दरीचों से
इतनी तलव्वुन तो न देखी थी पहले
ये सनम तेरे सनमखाने में
इतने सितम तो न उगे थे पहले कभी
ये वस्ल के मयखाने में
इतने मजरूह तो न हुए थे पहले कभी
ये दिल-ए-अफ़साने में
अब सोचते है जो हुआ सो हुआ
ये सब होता है जाने में अनजाने में .
(8)
कल शाम तेरे मौज़ा से एक परिंदा आया था
कह रहा था तुम बहुत तनहा हो
किसी चाँद की तन्हाई और तुम्हारी तन्हाई में रत्तीभर फर्क नहीं था
तुम भी रहा तकती रहती हो चाँद की तरह इस पहर से उस पहर तक
झाड़ू, बर्तन, कपडे सब शिकायत कर रहे थे
कह रहे थे कि कुछ काम नहीं है इस मौसिकी को
कुछ तो करे
पर भला कहाँ करती है
ये कोई काम
खाना पीना कुछ नहीं
बस कुछ ख्वाब आते है आधी रात को
जिन्हे बटोर लेती है सुबह तक
और खा लेती है सहर को
दोपहर और शाम को
चबा लेती है उन्ही ख्वाबो को
और फिर आधी रात से बटोरने
लग जाती है अगले दिन के लिए 
ख्वाबो के फ़ास्ट फ़ूड
आंसू भर आये थे सुन के मुझे
और उस परिंदे की .

(9)
(मेरे अंतर्मन का घर)
वही गहर है जहा बस्ता है
पापा का सफ़ेद साफा
माँ का पुराणी डांट
और दादा
केवल यही नहा है
इन पराने घरो में
इन्ही घरो में बस्ती
गोरे अंग्रेजो की
यातनाये
लेकिन फिर भी
यही घर है मेरे
अंतर्मन का घर
(10)
गम का एक टुकड़ा है
तुम्हारे दिल में तसल्ली होगी
कि मैं तुम्हारे बिना जी लूँगा
मेरी आँखों में छिपे लाखो सदियों आंसू
तुम्हारे कुछ महीनो का गम सोख लेगा
लेकिन तुम यह नहीं जानती हो
कि हम जिस मजहब में पैदा हुए है
वहां इस गम कि कोई तासीर नहीं है
दो पल का गुबार है या यूँ कहु कि
एक हवा का झोंका
जब में देखता हूँ कई दिनों से
बीमार है दादा
मगर फिर भी
आज तक लड़ है दादी के लिए
अपने अमर प्रेम लड़ाई
बेचारी दादी को गुजरे एक अरसा हो गया है
लेकिन ख़त्म नहीं हुई लड़ाई
यही एक गम का टुकड़ा है दिल में
मेरे दादा के लिए दिल में
और यही सोचते रहते अँधेरे में बैठे बैठे.


-------------------,
चन्द्र कान्त बन्सल
बक्श

शेर के सामने आने पर जो अकेला छोड़ के भाग जाये
ऐसा डरपोक साथी न बक्श भले साथ कोई दुश्मन सयाना बक्श.

लगा है हुस्न पर पहरा और है इश्क पर भी पाबन्दी
हुस्न और इश्क का मिलन बक्श साथ कोई खुबसूरत सा बहाना बक्श.

वो उससे मिलना हफ़्तों में महीनों में एक बार कम लगता है
भले उसकी गली की दरबानी बक्श मगर रोज़ का आना जाना बक्श.

वो अपने वस्ल की हर बात बात बता देता है अपने हमजिगर को
मेरे महबूब को थोडा तो शर्माना बक्श उसे कोई तो राज़ छुपाना बक्श.

कभी आंधी कभी तूफान कभी सूखा कभी बाढ़ क्या है मन में तेरे
अब हमें तू और सताना बक्श अब हमें तू और आजमाना बक्श.

ये हिंदुस्तान लगता है भूल चुका है अपनी आज़ादी की जंग
अब इसे कोई नया भगत सिंह बक्श इसे कोई नया कौमी तराना बक्श.

मुझे अपने इन अशआरों पर किसी की भी वाह वाह नहीं चाहिए 
इसे लोगों के दिल में उतरना बक्श इसे उनके होठों पर गुनगुनाना बक्श.

ये मेरी गज़ले जो चल पड़ी है आजकल मैखानों में रक्कासाघरों में
इन्हें अंदाजे मैकशी न बक्श इन्हे अंदाजे सूफियाना बक्श.

जब हमराही अपना साथ छोड़ दे और रास्ते में ही थम जाये
उसे हमारा साथ निभाना बक्श या हमें उसका साथ निभाना बक्श. 

        ज़ख्म
 
जो जख्म तूने दिए है सब के सब है कमाल के
मैंने भी अब तक सारे के सारे रखे है संभाल के.

जा देख आईने में अपना असली हुस्ने जमाल देख
क्या है शहर में चर्चे तेरी इस नयी सूरते हाल के

ये बकरा जिबह करना तेरा पेशा होगा तो होगा
हम न कभी मुरीद रहे न झटके के न हलाल के

तेरे हर सवाल का जवाब दे दिया है हमने लेकिन
तेरे पास नहीं है जवाब हमारे एक भी सवाल के

इन सियासतदानो से देश बचाने की उम्मीद कैसी
जो ताबूत तक बेच गए अपनी सीमाओं के लाल के

हममें भी जहरीले नागों के फन को कुचलने का हुनर है
ऐसे ही नहीं रखते है हम सांप आस्तीनों में पाल के

मेरे क़त्ल को खुदकुशी साबित करने वालों यह हो न पायेगा
कैसे मिटाओगे मेरे चेहरे से निशान मेरी खुद्दारी के जलाल के   

कल रात फिर धर्म और सियासत मिल बैठे है गुप चुप
संभल जाओ शहर वालों यह आसार है नए बवाल के

जब बेईमानी सरे बाज़ार बड़े जोर शोर से बिके
अपनी नेकनीयती मत दिखाओ वहां खीसे से निकाल के

आइनो के इस शहर मे भला पत्थर कौन खरिदेगा
पण्डित मौलवी पादरी सब यहां है पंछी एक ही डाल के 


चन्द्र कान्त बन्सल
निकट विद्या भवन, कृष्णा नगर कानपूर रोड लखनऊ
------------------.


अमित कुमार गौतम ''स्वतन्त्र''
      विश्व लाड़ली

विश्व कि तुम लाड़ली हो!
जगत कि कल्याणी हो!!
इस जगत में तुम सताई हो!
फिर भी समाज को बचाई हो!!

                                                       अपने ही जगत में लाड़ली!
                                                       प्रेम व्यावहार कि पराई हो!!
                                                       फिर भी सारा बोझ लाड़ली!
                                                       अपने सिर ले आई हो!!

तेरे साथ कितना अन्याय लाड़ली!
फिर भी सबको अपनाई हो!!
जब भी संकट मडराई है लाड़ली!
तुम तीर तलवार चलाई हो!!

                                                        तुम ही जग कल्याणी माँ हो!
                                                        तुम ही विश्व लाड़ली हो!
                                                        गर्व जगत को होता तब से!
                                                        जब से वीर साहसी बनती आई हो!!

                                                                                        अमित कुमार गौतम ''स्वतन्त्र''
                                                                                ग्राम-रामगढ न.२,तहसील-गोपद बनास,
                                                                                जिला-सीधी,मध्यप्रदेश,पिनकोड-486661

-----------.
मुरसलीन साकी   
फिर सियासत शुरू हो गई है।

झूठे वादों का दीपक जला के
फिर सियासत शुरू हो गई है।
               
                आने जाने लगे हैं भिखारी
                जिनकी करतूतों से दुनिया हारी
                झूठे सपने वफा के दिखा के
                        फिर सियासत शुरू हो गई है।

पहले दंगे कराते हैं मिलकर
फिर लगाते हैं इल्‍जाम किनपर
एक दूजे पे उंगली उठा के
                        फिर सियासत शुरू हो गई है।

                कितने हमदर्द बनकर हैं आते
                साथ में वो नमक भी हैं लायेे
                जख्‍मों पर देखो उसको लगा के
                            फिर सियासत शुरू हो गई है।

00000
हम कैसे कहें बिन तेरे सनम हम कैसे गुजारा करते हैं
जब रात गये दिल रोता है अश्‍कों से बुझाया करते हैं।
           
इल्‍जाम के पन्‍नों पर उसने एहसान कलम से लिखे थे।   
            उन सारे खतों को पढ़कर हम रो रो के चलाया करते हैं।

वीरान हुई दुनिया मेरी और प्यार भरा दिल टूट गया।
सुनते हैं किसी के दिल की वो महफिल को सजाया करते हैं।
           
            हम कैसे कहें यादों के दिये हम कैसे जलाया करते हैं।
            जब चांद फलक पर आता है जस्‍वीर बनाया करते हैं।

इक भूल हुई थी बस हमसे क्‍यों मेरा नशेमन लूट लिया
वीरान शिकस्‍ता मदफन तो दुश्‍मन भी बचाया करते हैं॥
00000000
अश्‍क आंखों में आते रहे रात भर
जख्‍म दिल मुस्‍कराते रहे रात भर।
                सुबह होते ही जिनको कि था डूबना
                अनको साहिल बुलाते रहे रात भर॥
तेरे दीदार के वो मनाजिर हसीं
ख्‍वाब में आते जाते रहे रात भर॥
                जो था जालिम सितमगर जमाना उसे।
                दर्द दिल हम सुनाते रहे रात भर॥
मुरसलीन साकी   
लखीमपुर-खीरी उ0प्र0
..........................
कवि-कल्‍याण
․․․नारी को समझो ․․․

ये नारी नहीं है इतिहास की ।
कड़ी समझो आज के समाज की ॥
ठोकर नहीं है इस राज की
प्‍यासी जरूर है स्‍वाभीमान के ताज की
गीत है कोई चीज नहीं साज की
समझलो -नई पीढ़ी के लोगो
संस्‍कारिनी जिसका नाम
वंश वाहिनी जिसका काम
श्रृंगार है जिसका नाम
दुलार है जिसका काम
रक्षक बनना जिसका नाम
परवरिश करना जिसका काम
सबकुछ सहना जिसका नाम
सहकर कुछ भी न कहना जिसका काम
शुरू हो सुनहरी सुबह 
तो सुनहरी हो घर की शाम
अरे,मॉ है जिसका नाम
हॉ मॉ ही है इसका नाम ।
हॉ मॉ ही है इसका नाम ॥
․․․․कहे कल्‍याण सन्‍देश․․․․
समझो,सृष्‍टी का गहना है एक नारी
क्‍योकि ये तो कदर करती है
घर मे काम-काज की
समाज के लोक लाज की
समझ भी रखती है
समाज के बेसूरे राग की,
न जाने तुम कब समझोगे कि
ये तो स्‍वच्‍छ नारी है आज की
अरे अब तो रक्षा करलो तुम- इस देश में
तुम इस घूंधटरूपीे समाज की,
वरना्‌ इन्‍तजार करते रह जावोगे
हर सुनहरी सांझ की-हर सुनहरी सांझ की
ये नारी नहीं है इतिहास की ।
कड़ी समझो आज के समाज की ॥
अब तो कड़ी समझो आज के समाज की ॥।


कवि-कल्‍याण
(कल्‍याण सिंह चौहान)
....................
सुनील संवेदी
जिंदगी क्‍यों उदास रहती है


जिंदगी क्‍यों उदास रहती है
तू कभी दूर. दूर रहती है
तो कभी आसपास रहती है।
जिंदगी क्‍यों उदास रहती है।

पत्‍थरों के जिगर को क्‍या देखें
ये भी चुपचाप कहा करते हैं।
यूं पड़े हैं पड़ी हो लाश कोई
ये भी कुछ दर्द सहा करते हैं।
बेकरारी है ख्‍वाहिशें भी हैं
उनसे मिलने की प्‍यास रहती है।
जिंदगी क्‍यों उदास रहती है॥

चंद रंगीनियों से बांधा है
ज्‍यों मदारी का ये पुलिंदा हो,।
आसमानों की खूब बात करे
बंद पिंजरे का ज्‍यों परिंदा हो,।
हो मजारों पे गुलाबी खुश्‍बू
बात हो आम, खास रहती है।
जिंदगी क्‍यों उदास रहती है॥

क्‍यों सितारों में भटकती आंखें
क्‍यों जिगर ख्‍वाहिशों में जीता है।
क्‍यों जुंवा रूठ.रूठ जाती है
क्‍यों बशर आंसुओं को पीता है।
क्‍यों नजर डूब. डूब जाती है
फिर भी क्‍यों एक आस रहती है।
जिंदगी क्‍यों उदास रहती है॥

रात भर रोशनी में रहता हूं,
अब तलक रौशनी नहीं देखी।
चांद निकला है ठीक है यारों
पर अभी चांदनी नहीं देखी।
और क्‍या देखने को बाकी है
जिंद में जिंदा लाश रहती है।
जिंदगी क्‍यों उदास रहती है॥

             सुनील संवेदी
समाचार संपादक, हिन्‍दी दैनिक ‘जनमोर्चा'
                   बरेली, यूपी
   ------------------,
मोतीलाल
सामर्थ्य तो तब भी था
जब तुम भटकते रहे थे
जंगल जंगल
और ढूँढते रहे थे
कोई पेड़ या फिर गुफा ।

सामर्थ्य तो तब भी था
जब नहीं जानते थे तुम
फसल और आग के बीच की दूरी
शब्द और भाषा की धूरी ।

सामर्थ्य तो तब भी था
जब तुम खोल नहीं पाते थे
अपनी आंखें
और ढूँढते रहते थे
स्तन पान के लिये
अपनी माँ की छाती का छाया ।

वही सामर्थ्य का दंभ
नहीं रहा तुम्हारे पास
जब भाषा की लाठी टूटती रही
तुम्हारे आसपास
मूक बने रहे तुम
नहीं समझ सके
भाषा की शक्ति
फिर शिथिल पड़ गये तुम
जब टूट पड़ी
पश्चिम की भाषा
और पश्चिम की स्वाद संस्कृति
उसी समय
तुम क्यों नहीं थाम ली लाठी ।

अब जब तुम तिलमिला रहे हो
अपनी सामर्थ्य दिखाना चाहते हो
तब बड़ी देर हो चुकी है दोस्त
यह पश्चिम की हवा
तुम्हारे बंद कमरे के बावजूद
सर चढ़कर बोल रही है
तुम्हारे पोता पोती के चेहरे से ।

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* मोतीलाल/राउरकेला

संपर्क:  बिजली लोको शेड , बंडामुंडा
          राउरकेला  - 770032 ओडिशा

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जय प्रकाश भाटिया
मेरा भारत महान
 
भारत माँ  के चरण धो रही निर्मल पावन गंगा,
सर पे जैसे ताज़ सुशोभित,उज्जवल कंचनचंगा,
विंध्याचल और कैलाश सरीखे , जिसके ऊंचे काँधे,
अड़िग हिमालय प्रहरी जैसा,यहाँ दुश्मन कैसे झांके,
पूर्वांचल में बहती ब्रह्मपुत्र , लेकर अमृत की धारा,
दक्षिण में कृष्णा कावेरी, प्रकृति का अनमोल नज़ारा , 
माँ की पवित्र गोद जैसी है ,यहाँ पर कितनी नदियां,
जिनका करें गुणगान यहाँ तो, बीत जाएँगी सदियां,
पाप विनाशक मुक्ति दायिनी ,हरिद्वार'हर कि पौड़ी'
ममता के विशाल सागर की , जननी ‘गौ मुख’ गंगोत्री,
गंगा यमुना सरस्वती मिलन , कितना पवित्र है संगम,
देवों और ऋषियों का कुम्भ में, देखो यहाँ दृश्य विहंगम 
पूरब से पश्चिम तक करता, विशाल सागर आलिंगन,
सोने के प्रतिरूप चमकता खेतों में अन्न का कण कण ,
वेद  ग्रंथो में अथाह ज्ञान है,निहित इनमें जीवन का सार,
श्रीकृष्ण की गीता ही दर्शाती ,सब जीवन कर्मो का आधार,
हरियाली खेतों में छाये, यहाँ फूलों से उपवन महकाएं,
गौ माता की पूजा करके ,  अपना जीवन सफल बनायें,
आओ हम सब मिल कर, अपनी धरती को स्वर्ग बनायें,
अब कहीं ना फैलने दे प्रदूषण, घर आँगन में वृक्ष  लगाएं,
घर घर हो प्रकाश अलोकिक, मिल शुद्धता के दीप जलाये,
संस्कृति की धरोहर यह धरती यहाँ रह कर पुण्य कमाएँ,
पर्यावरण की रक्षा के हित , नदियों में दूषित जल न बहाएं,
स्वच्छता में ही ईश्वर है, इस सत्य को हम मिलकर अपनाएं ,
--------------------.
रामदीन
‘‘अर्द्धसत्‍य''
‘विश्‍वास घात'
हुआ कतल जब अरमानो का, दगा दे गया जब विश्‍वास॥
टकरायी साम्राज्‍य संत से, मन में लेकर एक विश्‍वास॥
नमन करो उस शिशु बाला को, जिसने सबको जगा दिया॥
ढोगी, कपटी, ठग, दंभी की, चाल से सबको जगा दिया॥
अपने अद्‌भुत कर्मो का, यह एक अनोखा मेल है॥
जिसमे आज बाप के पीछे, बेटे को भी जेल है॥
पर उपदेश कुशल बहुतेरे, खूब निभाया आपने॥
बेटे को चैम्‍पियन बनाकर, खूब नचाया आपने॥
झूठ, कपट, छल के नाना भी, पानी भरते द्वार तुम्‍हारे॥
गुंडों के सरताज तुम्‍ही हो, चोर उचच्‍के तुमसे हारे॥
रिश्‍ते नाते सब विसराये, पर कतरे फिर आपने॥
धन दौलत के मद में गोते, खूब लगाये आपने॥
सारे हथकंडे अपनाये, बेशर्मी सब पार कर गये॥
महिला डाक्‍टर के चक्‍कर में, सब मर्यादा तार कर गये॥
अन्‍ध भक्‍त सब निजी स्‍वार्थ, मेंं यहाँ वहाँ मडरायें है॥
धक्‍कम धक्‍का खूब कर रहे, धन पर आँख गड़ाये है॥
पेट काटकर निज बच्‍चों का,खूब खिलाया भक्‍तों ने॥
ढोंग और पाखण्‍ड देखकर, आह निकाली भक्‍तों ने॥
पिछले कुछ वर्षो से अब कुछ, नई बयारी ढलकी है॥
धर्म से लेकर राजनीति तक,मर्यादा कुछ छलकी है॥
अपने बच्‍चों के भविष्‍य हित, तर्क ज्ञान में चूर रहो॥
अब भी चेतो देश वासियों, पाखंण्‍डों से दूर रहो॥

-रामदीन
जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी
कृष्‍णानगर कानपुर रोड,लखनऊ
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वीणा पाण्डेय
मातृत्व की पूंजी
माँ !
हाँ -माँ हूँ मैं,
स्नेह सिंचित पर -
'अभिशप्त-सुधा-सागर
ना मैं स्वार्थी हूँ,ना ही स्वार्थ की पोषक ,
फिर कैसे रखती तुम्हे
निज स्वार्थ के लिए -
ता-उम्र आंचल की छाँव में ,
जबकि  तुम्हे सीने से लगाकर
पहुँचती है ठंडक कलेजे को,
रोम रोम हर्षित हो उठता है -
तुम्हारी मंद मुस्कान से  , , ,
किन्तु यथार्थ ?
मातृत्व से परे जीता  है ,
आंधी-ओले-पतझड़ से जूझकर ,
मुझे पीना ही होगा -
''मातृत्व का नीर ''
समेटना होगा आंचल -स्नेह का,
और -तुम्हे स्वयं ही लड़ना होगा ,
इस  विकृत  युग से - -
शूल,धूल,संघर्ष -झंझावातों से
रु-बी-रु , होकर निखरना होगा,
पानी होगी एक मुस्कान , ,
तुम्हारा सफल होना ही -
इस युग में  मानी जायेगी- -
शायद - -''मातृत्व की पूंजी ''
--वीणा पाण्डेय
जमशेदपुर  ,,

8 blogger-facebook:

  1. बहुत बहुत कुछ है इन सुंदर रचनाओं में ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. manoj ji or vina mere shahar se hain inhe lagatar sunti rahi hun --in bemisal kavitaon -gjlon ke liye aseem shubhkamnayen -padma mishra

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर रचनाओ के साथ सजी है, इस पखवाड़े की कविताए ... सभी रचनाकारों को खूब खूब शुभकामनाए ...
    धन्यवाद

    - उमेश मौर्य

    उत्तर देंहटाएं
  4. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव1:45 pm

    भाई वाह जसबीर जी तुसी बस छा गये आपकी एक से बढ़कर एक कवितायेँ पढता गया बिंदास इमानदार और
    और सच बोलने और लिखने के दम से भरपूर अन्य
    सभी सपनो और कल्पनाओं की उडान वाले लगे जिन्हें
    देश से उसकी समस्याओं से कोई सरोकार नहीं वो
    आग लगी हमारी झोपडिया में हम गावें मल्हार की तर्ज़
    पर इश्क फरमा रहें है या काल्पनिक दृष्यों का सृज़न
    कर रहें हैं भगवान उन्हें विवेक दें जस्वीर जी हमारी बधाई
    स्वीकार करें

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रिय अखिलेश जी,आपकी टिप्पणी के लिये आपका आभारी हूँ.मेरा मानना है कि न केवल कविता को बल्कि साहित्य की अन्य विधाओं को आज जनोन्मुखी होना चाहिये.कविता के समाजिक सरोकार होने चाहिये.हांलाकि कविताओं के अन्य पक्षों का अपना महत्व है और अच्छी लालित्यपूर्ण कविताएँ भी खूब लिखी और सराही जाती हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्रिय अखिलेशजी,आपकी टिप्पणी के लिये आपका आभारी हूँ.मेरा मानना है कि न केवल कविता को बल्कि साहित्य के सभी पक्षों को आज जनोन्मुखी होना चाहिये.कविता के सामाजिक सरोकार तो होना ही चाहिये.हांलाकि लालित्यपूर्ण कविताएँ भी आज खूब लिखी और पढ़ी जा रही हैं और उनका अपना महत्व है,जिसे नकारना नहीं चाहिये.

    उत्तर देंहटाएं

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