सोमवार, 31 मार्च 2014

देवेन्द्र सुथार की लघुकथा - गलत तस्वीर

गलत तस्वीर

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शहर की मुख्य सडक पर डाकघर के बाहर कूडाघर बरसोँ से बना हुआ था। कचरे की
पेटी के बाहर कचरा बिखरा रहता था। उसमेँ कुत्ते,बिल्लियां,गाएं और इंसान
मुंह मारते रहते थे। ऐसे मंजर शहर मेँ जगह-जगह देखने को मिल जाते थे। यह
कोई नहीँ बात नहीँ थी। नई बात तब बनी,जब स्कूटर पर सवार राहगीर ने एक
विदेशी सैलानी को फटेहाल आदमी को कूडेदान मेँ से खाना बीनते हुए का फोटो
खीँचते हुए देख लिया।
'नो-नो...यह आप क्या कर रहे हैँ? आप भारत की गलत तस्वीर पेश करना चाहते हैँ।'
'मेरे देखे तो यही सही तस्वीर हैँ',सैलानी ने कैमरा गले मेँ लटकाते
हुए कहा,'आप लोग कुछ करते क्योँ नहीँ?'
'यह हमारा काम है क्या? सरकार ही निकम्मी है!' और उसने स्कूटर दौडा दिया।

-देवेन्द्र सुथार,बागरा,जालोर (राज.)।

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