शनिवार, 1 मार्च 2014

पखवाड़े की कविताएँ

जसबीर चावला


एक लोकतंत्र मरा सा एक संसद मैली सी
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फिर शर्मसार हुआ लोकतंत्र
उसके पहले उसके भी पहले कितनी बार हुआ
अर्थ खो चुकी शर्म
संसद की आँखों में धूल नहीं मिर्चें झोंकी
जो कहीं नर्व गैस होती
'ओम शनरिक्यो' छ़ोड़ चुका है टोकियो की ट्रेनों में
'शोको अशारा' के झंडे तले
किसी ने नाम दिया इतिहास का काला दिन
संसद के स्याह सफ़ेद का हिसाब करें
क्या इसी बचे के हक़दार हैं हम

लोकतंत्र की हत्या
ख़ून बहा
बार बार मरा लोकतंत्र
कहते हैं यह धब्बा है
विधायिका की चादर पर कितने काले धब्बे
अब चादर ही नज़र नहीं आती
टूटे माईक रोती कुर्सियाँ
अब कौन कहे
'दास कबीर जतन से ओड़ी ज्यों की त्यों धर दिनीं चदरिया'
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और कितने टोबा टेकसिंह
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ज़मीन बँट चुकी
मुल्क का बँटवारा पूरा हुआ
मंटो तुमनें लिखा
'उधर खरदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था
इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान
दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था
टोबा टेक सिंह पड़ा था'

टोबा टेकसिंह याने बिशन सिंह
गाँव टोबा टेकसिंह का पागल किसान
पड़ा है आज भी वहीं
मुल्कों के दरमियाँ
नो मेन्स लेंड
ढूँढ रहा अपनी पहचान

सरहदों पार
और भी बँटवारे हुए
सूबेदारो ने बना लिये इलाके
अपनी सरहदें
अपने कानून
मजहबी सियासी बँटवारे
ढेरों नो मेन्स लेंड
कई और टोबा टेकसिंह
ढूँढ रहे बेटीयां
मर्दों की नज़र चढ़ी रूपकौर अायशा
माई मुख्तार निर्भया
अपनी ज़मीन अपना आसमान
अजीबोग़रीब आवाज़ में बड़बड़़ा रहे
'औ पड़ दि गड़ गड़ अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दि दाल आफ दी लालटेन'
'हिंदुस्तान पाकिस्तान दुर फिटे मुंह'

'टोबा' तो सचमुच पागल था
ये राजनैतिक दिमाग़ी मरीज़
बाँहें उठा रहे
गड्डमड्ड आवाज़ों में चीखते
लहरा रहे परचम
मुल्क भर में चिल्ला रहे
'औ पड़ दि गड़ गड़ अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दी दाल आफ नफरत फ़िरक़ापरस्ती'

***
( टोबा टेकसिंह : हिन्दी साहित्य को गौरवान्वित करने वाली सआदत हसन मंटो की विशेष कहानी )

इन्द्रप्रस्थ का जंगल
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कौन नहीं इस जंगल में
शिकार का पीछा करते शेर तेंदुए बाघ भेड़िये
गोलबंदी कर हमला करते
शातिर सियार पूँछ कटी चालाक लोमड़ीयां
हँसते लकडबग्घे
भागते खरगोश हिरण
मद मस्त बिगड़ैल हाथी
भिड़ने को तैयार गैंडे भालू
ऊँचाई के फलों को चट करते ऊंचे जिराफ
सब कुछ निगलते अजगर नाग मगरमच्छ
मुर्दाखोर गिद्ध
हाँफता सनसनी फैलाता विकट जंगल
हिंस्र गुर्राहटें गला घुंटती कातर आवाज़ें

होगा रोम में रोम का क़ानून
जंगल में जंगल का क़ानून नहीं चलता
बंदरबाँट होती है
खरगोश की मांद पर शेर हिरण के सांझा पैर चिन्ह
दोनों के मुंह लगा ख़ून
नीलगाय और तेंदूओं की जुगलबंदी
रीछ बाघ बकरी एक ही घाट
कौन किसके साथ जायेगा
आधा या पूरा खायेगा
प्रकट गुप्त संधियाँ समझौते गुटबंदियां
रेवड़ों की अदलाबंदी
शिकार सेक्स का न कोई वक़्त मौसम महीना
जंगल भी नहीं जानता
कब संधि रेत का घरौंदा हो जाये
यहाँ राजनीितराज और कानून चलता है

शांतता जंगल चालू आहे
तुमने भी तो देखा है टीवी पर
'इन्द्रप्रस्थ' के इस जंगल को

***

कबीर तुम आज पैदा होने से बच गये
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कबीर तुम पैदा हुए कोई पाँच सौ साल पहले
ठीक ही हुआ
आज होने से तो बच गये

क्या आज कह सकते
'बार बार के मूँडते भेड़ न बेकुंठ जाय'
'पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजौं पहार'
'कंकर पत्थर जोड़ के मस्जिद लई चिनाय'
इतनी ग़ुस्ताख़ी
'रासुका' लगता जेल जाते
सुर्खीयां बनती
धार्मिक भावनाओं को ठेस शांतिभंग
जातियों में तनाव
हिंसा भड़काऊ लेखन
मुल्ला पंडित को लताड़
तुम तड़ीपार होते जेल जाते

तुमसे पहले कई हुए
बुद्ध निर्वासित हो कहीं जापान कोरिया जा बैठे
महावीर पूजक अदालतों में
सिख नहीं सुनते नानक की बात
पैग़म्बर के बंदों की और सतत उँगलियां
गांधी जमे नहीं कि धो दिये गये

वे सब तो शांत थे सौम्य
तुम बेख़ौफ़ अक्खड़ कड़वी ज़ुबान
सधुक्कड़ी भाषा में ललकारते
'मसि कागद छूवो नहीं क़लम गही नहिं हाथ'
'कबीरा आप ठगाईये'
'घर फूँक' तमाशावाले
गढ़ी मूर्तियाँ परंपराएं त़ोड़ते
तुम्हें कौन सहता
कर दिया इतिहास के हाशिये
बैठा दिया मंदिर मूर्ति बना
अब कौन 'कबीर' गाता है चोपालों पर

कबीर तुम सचमुच बच गये आज पैदा होने से
'जसबीर' तुम्हें छोड़ेगा कौन

***

अब धर्मयुग है आया
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सतयुग त्रेता द्वापर अतीत हुए
कलयुग भी गया
'धर्म'युग आया
शोर बन धर्म हवा में गरज रहा
संचारी बना
डेसीबल की हदों के पार
कानों से अनचाहे टकराता

फहर रहीं धर्म पताकाएँ
अछूता नहीं प्रकृति का अँगना
वायु अग्नि जल दूषित
सड़क बग़ीचे
धर्म के मारे
क़ानून पर भारी आस्था
पर्यावरण पर सवार धर्म

ठेले पर घर  पहुँचे भगवान
सीढ़ियां / लिफ़्ट के कोनें में धर्म
पीक से रक्षा करता
उपग्रह प्रक्षेपण में धर्म
फ़ेसबुक सेलफ़ोन बनें धर्मवाहक
मंत्र आयतें गुरबाणी

प्रवचनों की बहती अविरल गंगा
धर्म की जय अधर्म का नाश
पापी अधर्म ढीठ बना
न बहता न हटता 

जो दिख रहा वही बिक रहा
'मार्केटिंग' चल रही
मुक्तसर सी बात
बुरी मुद्रा खूब चलन में
अच्छी हो गई बाहर

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घड़ियाली आँसू
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'झूट टाईम्स'
विज्ञापन छपा
धाँसू

तुरंत चाहिये
दल को
कुछ घड़ियाल
जो बहा सकें
मोके बेमोके
आँसू

***

अंत्योदय
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अंतिम साँस तक लड़ेंगे
अंतिम के लिये
अंत्योदय
हमारा लक्ष्य
अंत वाले का उदय
तब होगा
पहले का हो जब
पहला मैं हूँ

भला गिनती कहां अंत से शुरू होती
मज़ार के पहले दिया घर में जलता है

***

श्रमायुक्त
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अंग्रेज़ी में लेबर कमिश्नर
हिंदी में श्रमायुक्त
श्रम तो करता है
'शरम' कैसी
श्रमिक भी श्रम से पैसा कमाता है

प्रधानमंत्री ने कभी कहा था
पैसे पेड़ पर नहीं लगते
ठीक कहा
पैसा गुप्त संधियों से आता है
अंदरखाते
गुपचुप जमावट
'श्रम' लगता है
जरा कमिश्न-'र' तोड़ो
बाकी कमीशन ही बचता है

( लोकायुक्त छापे में अधिकारी धरे गये )

***

Jasbir Chawla. 48,Adityanagar
A B Road.Indore 452001
chawla.jasbir@gmail.com

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विजय वर्मा


भोजपुरी  हाइकु  [ होली ]

आइल होली
बिके पिचकारी,आ  
बरसे रंग.
 
चाहे बुढ़वा
आ चाहे लरिकन
सभे उमंग

नईकी भाभी
बहुत पोतइली
भइली तंग

छोटकी साली
बड़ी नखराली ,बा
छिड़ल जंग।

रंग छुड़ाई
त कम पड़ जाई
यमुना-गंग

भांग चढ़ा के
सड़क पे सुतल
नंग- धड़ंग।

दरोगाईन
भौजी से ,बोल तनी
के लिहें पंग। 

 

 

 

 

 

 

 

v k verma,chem lab,d.v.c.,btps.
kharangajhar,jsr.
vijayvermavijay560@gmail.com
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सतीश कुमार यदु

होली हुड़दंग
मदमाती अंग-अंग,
कैसी ये उमंग।
मन में उठ रहे हैं, पल-प्रतिपल तरंग,
आ गई इठलाती होली हुड़दंग॥

खेलेंगे होली संग-संग,
बच्‍चे, बुढ़े और ''यंग''।
उड़ेगी अबीर और घुलेंगे रंग,
नजारा-ए-होली लगता है जंग;
रंगरसिया खाएंगे पान संग लाइची-लंवंग॥

मदमाती अंग-अंग,
कैसी ये उमंग।
मन में उठ रहे हैं, पल-प्रतिपल तरंग,
आ गई इठलाती होली हुड़दंग॥

चलेगी दौर भांग पे भांग,
किन्‍तु शालीनता न हो भंग।
देखकर कोई भी रह जाए दंग,
नुक्‍कड़ के बच्‍चे नंग-धड़ंग;
मस्‍ती में डूब, करते हैं तंग॥

मदमाती अंग-अंग,
कैसी ये उमंग।
मन में उठ रहे हैं, पल-प्रतिपल तरंग,
आ गई इठलाती होली हुड़दंग॥

ओढ़ी चुनरिया सतरंग,
कुंदन सी देहमयी अंतरंग।
बजती है चहुँ ओर ढ़ोल-मृदंग,
हो रहे जैसे प्रेमोत्‍सव पर रागरंग;
जैसे हो जग में नंद, अनंग॥

मदमाती अंग-अंग,
कैसी ये उमंग।
मन में उठ रहे हैं, पल-प्रतिपल तरंग,
आ गई इठलाती होली हुड़दंग॥

चाहे किसी की कट गई हो पतंग,
दिख रहे हैं सभी मतंग।
हर एक लग रहे है दंबंग,
अस्‍तु मानवता का मुख न हो बदरंग;
अब की होली सूख-सूर्य का उदय हो रंगारंग॥

मदमाती अंग-अंग,
कैसी ये उमंग।
मन में उठ रहे हैं, पल-प्रतिपल तरंग,
आ गई इठलाती होली हुड़दंग॥

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एस. के पाण्डेय


व्यंग्य कविता
बिल्लू की सरकार


 
                (१)
 
आया जब मौसमें चुनाव ।
जीतने का सोचैं हर दांव ।।
बदले अपना हाव- भाव ।
बिल्लूजी घूमें गाँव-गाँव ।।
 
            (२)
 
चाहे चूहा या खरगोस ।
मिलते सबसे बड़े जोस ।।
डरने की न कोई   बात ।
समझो बीती दुःख की रात ।।
 
             (३)
 
होगा अब सबका विकास ।
जुल्मी का समझो हुआ नास ।।
सुबिधायें होंगी आस-पास ।
बस अमन-चैन व अन्य आस ।।
 
            (४)
 
होंगी पूरी जो गए जीत ।
सब अपने हो सब बड़े मीत ।।
होनी चहिये खुब बड़ी जीत ।
गाओ मिलके अब नया गीत ।।
 
            (५)
 
चूहे खरगोस सब इधर-उधर ।
कहते बिल्लू गया सुधर ।।
कहता है न कोई डर ।
समझो मेरा अपना घर ।।
 
           (६)
 
बन गयी बिल्लू की सरकार ।
चहिये जबकि करारी हार ।।
भूल गया वादों की बात ।
सूझे अब ज्यादा  खुराफात ।।
 
              (७)
 
हो गया अब जादा खतरनाक  ।
पहले थी क्या उसके नाक ?
उसके चमचे भी चालक ।
जमायें दिन-दिन अपनी धाक ।।
 
               (८)
 
आगे का अब सुनो हवाल ।
खुद तो हो गया मालामाल ।।
बुरा हो गया  सबका हाल ।
पहले से भी बिगाड़ी चाल ।।
बिल देखे तो पानी डाल ।
चूहों को अब लेय निकाल ।।
 
              (९)
 
चूहों से कहते खरगोस ।
भय्या सारा अपना दोष ।।
खो बैठे थे हम सब होश ।
राम बचाए बचिए दोस ।।
 
            (१०)
 
सुना है कुछ जन लेकर नोट ।
दे दिए बिल्लू अपना वोट ।।
दिखी न पहले कोई खोंट ।
अब लागे काहे को चोट   ?
 
               डॉ. एस. के पाण्डेय,
               समशापुर (उ.प्र.) ।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो
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मनोज 'आजिज़'

(बाल-कविता)
तोते से सीख
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एक  तोते को देख अकेला
अंतर-मन  में क्रंदन है,
मिल जाए उसे भी,अपनी जोड़ी
बस ,यही हमारा बंदन है ।
निश-दिन करता जीवन संघर्ष
आत्म-सुख न वो पाता है,
देख उसका भी हृदय पसीजता
जब कोई जोड़ा , आता-जाता है ।

एक सीख तो वह भी देता
संघर्ष में सब अकेला है,
मन हार कर बैठ न जाना
जब जागो तब बेला  है ।
निर्मल नभ में उड़ता पँछी
उसे देख यह सोचता है,
विरह में कैसे जीवन्त है वह
हर क्षण को सुख में बदलता है ।
आदित्यपुर, जमशेदपुर
झारखण्ड
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राजीव आनंद
चंदा मामा

चंदा, मामा है न दादी ?
पापा कहते है ये सब बकवास है
चंदा एक उपग्रह है !
चांदनी ने कहा, पापा
दादी आपसे बड़ी है
उनसे पूछ लो
चंदा मामा है कि नहीं ?
है न दादी
पापा को समझाओ

दादी ने पापा को समझाया
चंदा उपग्रह नहीं
चांदनी का मामा है
खबरदार जो उसके मासूम
दुनिया में दखलअंदाजी किया
अभी चांदनी मासूम है
चंदा को उसका मामा ही रहने दो
जो गुड़ के पुए पकाता हो
और चांदनी को प्याली में खिलाता हो !

 

प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंड़ा
गिरिडीह-815301
झारखंड़
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-विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र '


घर अन्दर सर्दी लगे, बाहर तीखी धूप
मन उन्मादी हो गया, लख बासन्ती रूप
लख बासन्ती रूप, खेतों में बिखरा सोना
खिली प्रकृति चहुँओर, हो गया जादू-टोना
कहे 'व्यग्र ' कविराय, आश जीने की जागी
दुखी शीत से जीव, बने थे सब हतभागी ।

धीरे-धीरे शीत अब , जाने को बेताब
सूरज ने नरमी तजी, तीखे हुये जनाब
तीखे हुए जनाब , छांव अब लगती प्यारी
जो थी हवा कटार, लगे अब न्यारी-न्यारी
कहे 'व्यग्र ' कविराय, ऋतु गर्मी की आई
तज के गरमागरम, ठण्डे ने धांक जमाई ।
                 
         गंगापुर सिटी, स.मा.(राज.)322201
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अनिल उपहार "काव्यांजलि"


नेह निमंत्रण ------------
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सांसों  के  मधुबन  में  अब  भी
गीत  कुंलाचे  भरते  रहते  |
छंद  और  व्याकरणी  पैमाने
नव  सृजित  अनुप्रास  से  बहते  |
हर  प्रतीक्षा  आगमन  की
राह  सी  दिखती  रही  |
द्वार,  आँगन,  देहरी,  संग
मधुमास  पल  लिखती  रही  |
धडकनों  की  पालकी  से
हर  बार  मन  तुमको  निहारे  |
गीत, कविता, छंद, ही  क्या
खुद  गज़ल  तुमको  सँवारे  |
नेह  निमंत्रण  तुनको  है
नव  गीत  अधर  पर  तुम रख दो |
जीवन  के  रेखा  चित्रों  में
आकर  बासंती  रंग  भरदो  |
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अस्मिता------------
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हर बार देती रही
अग्नि परीक्षा |
जैसे स्त्री होना गुनाह रहा उसका,
मनु के विधान की तरह
समझा गया सभी बुराइयों की जड़,
कभी जाति के नाम पर
तो कभी
धार्मिक कर्मकाण्डों,
आडम्बरों के नाम पर |
झोंक दी गई,बलि कर दी गई
उसकी अस्मिता |
पुरुष बन सकता है
पिता होते हुए भी सब कुछ
वह माता बनकर
कुछ और क्यों नहीं बन सकती ?
बचपन में पिता की चौकसी
युवावस्था में पति का पहरा
और
बुढ़ापे में पुत्र रखे उस पर नज़र
जैसे वह जन्म जात अपराधिनी हो |
कभी उसे रमणी,कामिनी,भोग्या
पदवी से विभूषित किया गाया |
तो कभी,जिस्म के व्यापार में
धकेल दिया गया |
हमें ही आधार बना
कविता देती रही
अनुभूतियों को दस्तक |
वैचारिक शून्यता और
आस्था का अभाव
क्या दे पायेगा ?
हमारी अस्मिता को नया  आकाश |

नयापुरा रोड, पिडावा (राजस्थान )
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मनोज 'आजिज़'


आज बसंत है
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आम है, जाम है, महुआ, पलाश है
सब में फूल मंजर, हवा में सुबास है
फागून महीना बसंत का डेरा
मादक मन, हृदय में उच्छ्वास है ।

गीत है, मीत है, कितनी पुरानी रीत है
खेल है रंगों का, जन-जन पुलकित है
पीले हैं पत्ते कहीं तो हरे का लेप है
डाल-डाल, मन का तार-तार में संगीत है ।

कहीं कोयल की कूक, कहीं भौंरों का तान
फूलों की मुस्कान भरता अवचेतन में प्राण
अलौकिक मदिर है ये बसंत रस
खो जाऊँ कहीं ये करता आह्वान ।

पतझड़ के बाद दिन रसवंत है
निष्प्राण, शुष्क भी अब बलवंत है
सीख देती है धरती हमें--आशा न खोओ
कल शीत था तो आज बसंत है ।

पता-- आदित्यपुर, जमशेदपुर-१४
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डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'


मातृभाषा दिवस ( २१ फ़रवरी)

माता के दूध के समान
मातृभाषा भी होती है
मीठी, स्वाभाविक एवं गुणकारी ।

मातृभाषाएँ संस्कृति की रक्षक हैं
इतिहास की धरोहर हैं
समेटे हैं अपने में इतिहास के पृष्ठ
आदिम काल से आजतक के ।

विश्व की आधी भाषाएँ और बोलियाँ
आज हो गयी हैं विलुप्त
और अन्य अनेक खड़ी हैं
लोप होने के कगार पर ।

युनेस्को को धन्यवाद्
इधर संसार का ध्यान दिलाया है
चाक चिक्य की जिंदगी में
लोगों में मातृभाषा की रक्षा का
विचार आया है ।
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चन्द्र कान्त बन्सल


अलग

कभी इंकार से अलग कभी इकरार से अलग
तेरा रूठना है दिलबर तेरे इसरार से अलग.

उसकी मेरे लिए दीवानगी मेरी समझ से बाहर है
करता है मुझे प्यार वो मेरे प्यार से अलग.

उसका दोस्त हर बार मिलता था तो कुछ भी न था
जाने क्यों वो लगने लगा मुझे हर बार से अलग.

जब भी मैं कहता हूँ वो मुस्कुरा के रह जाता है
वो मेरा कहना कि लग रहे हो तुम उस बार से अलग.

सिर्फ मैं ही नहीं सारा जमाना भी उसका दीवाना है
कुछ बात है उसमे ऐसे ही नहीं है वो कई हज़ार से अलग.

ज़रूरत नहीं है उसको तीर की तलवार की और खंजर की
कर सकता है वो क़त्ल हथियार से अलग बिना हथियार से अलग.

वो आईने में देख के बोला बतलाओ कौन बेहतर है
सच में वो आईने में लग रहा था मेरे यार से अलग.

बड़ी आसानी से उसे किसी भी महफ़िल में पहचान लोगे उसको
वो बहुत ही सीधा सादा है किसी भी शाहकार से अलग.

मेरा महबूब कोई और नहीं ये मौसम है ये हवाए है ये घटाए है
जो दिखलाता हर बार जमाल है किसी भी बार से अलग.


शायद

शायद वो मुझसे अलहदा भी है और नहीं भी है
शायद वो ही मेरा आशना भी है और नहीं भी है.
 
मैंने उसके साथ देखा है सिर्फ हवायों को फिज़ाओ को
शायद मेरा महबूब वाकई तनहा भी है और नहीं भी है.

मैं उससे कुछ भी करने को कहूँगा तो वो न नहीं करेगा
शायद ये मेरा दावा पक्का भी है और नहीं भी है.

कल रात मैंने देखा था उसको अपने एक रकीब के साथ
शायद ये मेरी नज़रों का धोखा भी है और नहीं भी है.

अब वो मुझसे बातें करता है एक अलग ही अंदाज़ में
शायद उस पर जवानी का असर हुआ भी है और नहीं भी है.

जब जब मैं करता हूँ इज़हारे इश्क वो फिर फिर पूछ बैठता है
शायद मेरा महबूब कम सुनता भी है और नहीं भी है.

वो आया मेरी जानिब मेरी ओर देखा भी और मुंह फेर के चला गया
शायद वो मुझसे बेहद खफा भी है और नहीं भी है.

कई अरसा हुआ लेकिन मैं उसको भूल नहीं पाया अब तक
शायद उसका दिया हुआ ज़ख्म ताज़ा भी है और नहीं भी है.

मत पूछ तेरे सिवा किस किस से प्यार किया है मैंने
शायद तू मेरा इश्क पहला भी है और नहीं भी है.

वो न बोल के दौड़ के चढ़ गया चलती गाड़ी में
शायद ये उसका आखिरी फैसला भी है और नहीं भी है.

 


निकट विद्या भवन, कृष्णा नगर कानपूर रोड लखनऊ
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     अमित कुमार गौतम''स्वतन्त्र''


उठो नौ जवानों

उठो
नौजवानों।
सबेरा होने वाला है।।
ये सूरज की
पहली किरण से ।
बदल दो
दुनिया को
अपनी नजर से ।।
तुम हो देश के
नौजवानों में एक।
जल्दी करो
समय बीत जायेंगे अनेक।।
तुम अभी
जवान हो।
देश के
नौजवान हो ।।
दिखा दो
अपने जान का हुनर ।
हटा दो
सामाजिक
बुराइयों का कहर।।
ये ताकत
बस तुम्ही में है,
तुम्ही में है।
चल पड़ो
आगे बढ़ो
सबेरा हो जायेगा।।
सूरज की
पहली किरण
निकल जायेगा।
उठो
नौजवानों
सबेरा होने वाला है।।
                          
                              
ग्राम-.रामगढ नं2़,जिला-सीधी.
तहसील-गोपद बनास (म़.प)्र486661  
Xxxxxxxxxxxxxxxx

मुरसलीन साकी

 

रात अश्कों भरी ये गुजर जायेगी।
जख्म भर जायेंगे नींद आ जायेगी।

            फिर वो यादों के पल साथ होंगे मेरे।
            मेरे ख्वाबों की बस्ती संवर जायेगी।

फिर वो कश्ती वो दरिया वो जुल्फें तेरी।
चांदनी  रात  फिर  नूर  बरसायेगी ।।

            वस्ल की रात भी वो हिजाबी नजर
            तेरी पाकीजगी फिर नजर आयेगी।

खत्म हो जायेगें ये मनाजिर हसीं।
आंख खुल जायेगी शब गुजर गायेगी
  
लखीमपुर-खीरी उ0प्र0
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कवि-कल्‍याण


--पूरा कर मतदान--
अबकी बार पूरा करो मतदान ।
चाहे कन्‍यादान या हो क्षमादान
चाहे हो रक्‍तदान या श्रमदान
लोकतन्‍त्र में अगर है कोई बड़ा दान
काम आये ये वरदान्‌
मिले लोकतन्‍त्र को सम्‍मान
जिस पर हो देश को अभिमान
दिखा दो इस दुनिया को
अबकी बार पूरा कर मतदान
पूरा कर मतदान ॥

  --
---बहू की शर्त----
सास लंगड़ी हो चिल्‍लाये, पर चल न पाये
ननद गूंगी हो बोलना चाहे, पर बोल न पाये
ससुर अन्‍धा हो देखना चाहे, धन उसका है अन्‍धा- देख न पाये
पति ऐसा जो रोज कहे आ जा मेरी चन्‍दा
अब तू ही है इस घर की सुनन्‍दा
सबका काम छोड़ दें- आ पास बैठ मेरी राधा
ये तीनों तो यूं ही करेंगे
कोई गीत ही सुना दे आधा
यही मेरी शर्त है
न घर पे कोई आयेगा 
न अब कोई सतायेगा
देखते जाओ
अब केवल तू और मैं
दूसरा कोई अब घर में न रह पायेगा
---कहे कल्‍याण सन्‍देश---
अरे बावरी आज की बहू
सास न होगी दुलार कौन करेगा
ननद न होगी श्रृंगार कौन करेगा
ससुर न होगा  -तो बहु तेरा मान कौन करेगा
ये तीनों से ही तो पूरा परिवार होगा
परिवार में सिर्फ पति
ये मोह तुमको छोड़ना होगा
इस भटकते रास्‍ते को छोड़ना होगा
टूटते रिश्‍ते -अब जोड़ना होगा
ये गलत है शर्तों का रास्‍ता
बहू इसे अब छोड़ना होगा
यही मेरे देश की रीत है
और धर्म निभाना ही
बहू,मेरे देश का राष्‍ट्र गीत है
ये गलत है बहू शर्तों का रास्‍ता
रास्‍ता ये अब छोड़ना होगा
टूटते परिवार को फिर जोड़ना होगा ।
टूटते परिवार को फिर जोड़ना होगा ॥

(कल्‍याण सिंह चौहान)
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प्रभात "परवाना"


हौसला आजमा ले, फिर मुकद्दर भी लेंगे
इस कश्ती पे तूफां का, असर भी देख लेंगे
दरिया भी हमने, तनहा ही नापा था
अब हम समंदर का, सफ़र भी देख लेंगें

दर दर पर भटकते, फिरे है उम्र भर
एक तेरा बचा है, ये दर भी देख लेंगें

आज दुश्मन के हाथ, दवा देखी है
अब दोस्त के हाथ पत्थर, भी देख लेंगें

चलो सो जाते है, कफ़न ओढ़ कर
इस बहाने खुदा का, घर भी देख लेंगें

 


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सीताराम पटेल

मछलीघर
1:-
कलमकार
कलम हथियार
प्रेम स्वीकार
2:-
प्रेम बंधन
अदृश्य डोरी बंधा
समाधि सधा


3:-
अनोखी गली
जिसमें दो समाए
एक बनाए
4:-
तन छुआती
मानस ललचाती
अनोखी अदा
5:-
मिट्टी का तन
जग सारा सपन
पल में टूटा
6:-
टाईम पास
लिया बाँहों में फाँस
झूठा नाटक
7:-
हँसी ठिठोली
चेहरा में रंगोली
कैसी है होली
8:-
रसमलाई
दाँत पीड़ा बताई
खाओ मिठाई
9:-
ऑखों में आँसू
कैसे सहूँ जुदाई
प्रेम मिलन
10:-
हमारा प्यार
बने एक मिसाल
तप्त अंगार
11:-
जलता दिया
रावण कैद सिया
पुकारे पिया
12:-
तुम कहती
सबसे बड़ा पैसा
सच  है ऐसा
13:-
अमृत पान
देवता सब किए
दानव जीए
14:-
समरसता
सच समर सत्ता
चुनावी जंग
15:-
ठंढा शर्बत
गर्मी से रखे दूर
पीना जरूर
16:-
मछलीघर
हाँपती मछलियाँ
जीने की इच्छा
17:-
आओ बनाएँ
एक अनोखी पूल
मानव मेला
18:-
अद्भूत जूस
पीते आए सुरूर
न होंगे दूर
19:-
चुमा चाटना
चाकलेटी बदन
यही जीवन
20:-
शिश्न उदर
इतना ही जीवन
उठें ऊपर
21:-
राधिका रानी
हुई प्रेम दीवानी
नेहा निशानी
22:-
शादी विवाह
करें सब निर्वाह
चलें ये राह
23:-
प्रेम करते
पकड़ाए दो प्रेमी
कैदी है दोनों
24:-
मधुर बोली
दिल लगाए गोली
कहाँ रसीली   
25:-
बसंत दूत
गाकर दी संदेश
मदन मित्र
26:-
फूलों का हार
पकड़ी है दूतिका
नयन योग
27:-
कनककाया
कलेजा में समाई
बहुत भाई
28:-
प्रणय भोग
नहीं होगा रोग
कपटी जोग
29:-
खट्टा अंगूर
कहे सब के सब
न मिला भाव     
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धर्मेन्द्र निर्मल

अब के फागुन

कोर में अंगोछी के बॉध लेजा मीत।
बॉट देना हर मन में पावन यह प्रीत।।

    अशेष न पर बन गया हूं शहर गॉव से घट के
    मनुजों के मरूथल में नेत्र नेह को भटके
    मौसम ने छीन लिए अधरों के गीत।।

कोयल की तान पर थिरकती अमराई
गंध लिए नदियों के ताल में पुरवाई
लुका-छिपी करते स्मृति से पछीत।।
   
    शब्दों का पथराव सदा शंकित मन
    हो चली हवाएं भी बहुत बदचलन
    इससे तो गॉव भला भैंगी अमरीत।।

कर फसलें श्रृंगार झूमें गेंद कलियॉ
अब भी भटका जाती बचपन की गलियॉ
जाता है गालों को नहला अतीत।।

    गोधूलि से टूट गया बेला का नाता
    सुबह को जगाते अब हार मुर्गा खाता
    युग बीते शाम सुने पंछी संगीत।।

कहना सुखवा रखे होरा फागुन में
लाज भी है नाचने को आकुल सगुन में
उनको भी छेड़े गये बरसों बीत।।
   


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मोहसिन ख़ान


‘भूख और सौदा’
 
पिलाती है जब कुतिया दूध
अपने पिल्लों को
तब मुझे चिंता नहीं होती है ।
क्योंकि उनके लिए दूध
रिस रहा है कुतिया की छाती से,
किसी कंपनी के पैकेट में बंद
किसी दुकान से
नहीं खरीदा जा रहा है !
अच्छा है कुतिया के लिए कि
वह दूध नहीं खरीदती है
और भी अच्छा यह है कि
उसे दूध का आज का भाव नहीं पता !
दूध का भाव तो
भैंसों और गायों को भी नहीं मालूम,
वरना या तो वह अपना दूध
बढ़ा देतीं या घटा देतीं ।
दूध का भाव तो उस बच्चे को भी नहीं पता
जो ग़रीब के घर पर पैदा हुआ है
जिसकी माँ की दूध शिराओं में
इतना दूध नहीं कि
पिला सके उसे भरपेट !
उसके पास इतना भी दूध नहीं
कि शिव लिंग पर चढ़ाकर
उनसे बदले में दोगुना दूध माँग ले ।
ग़रीब का बच्चा
अपनी माँ की छाती का
लटका हिस्सा अब केवल
चुसनी की तरह चूस कर
परेशान होकर सो जाता है ।
उसे नहीं पता कि
उसके मुँह में दूध क्यों नहीं आरहा है,
दूध किस जगह सुखा दिया गया है
और किस जगह बन रहा है, बह रहा है ! 
 
मुझे तो इस श्वेत क्रान्ति में
साज़िश की एक बू आती है
जिस तरह सफ़ेद को काला किया जा रहा है,
यह किसी अंधकार से कम नहीं
अब काले दास्तान पहनकर
दूध की दलाली का व्यापार
किया जा रहा है
या दूध की दलाली में
हाथों को सफ़ेद रंगा जा रहा है ।
सरकार को पता है
लोगों की जेबों में पैसा है
जब मरने लगेंगे तो जेब का पैसा
झाड़ ही देंगे आख़िर
बस देश का अर्थशास्त्र न गड़बड़ाए,
भले ही बच्चों की भूख का सौदा हो जाए ।
दलालों ने सरकार के मुँह में
सम्पत्ति का थन ठूँस दिया है
सरकार बड़े मज़े से थन चूस रही है
और उबासी लेते समय कह रही है
हमारा देश विकास कर रहा है !
हम आने वाले वर्षों में,
विश्व की महाशक्ति होंगे !
भूख और शक्ति का यह
नया समीकरण और सूत्र
अखबारों, टी. वी. के समाचारों
और अफ़वाहों से
हमारे बीच
इस तरह धँस गया है
जैसे अन्धे के भीतर
कोई काल्पनिक संसार बन जाता है !
 
डॉ. मोहसिन ख़ान 
अलीबाग (महाराष्ट्र)

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  1. बहुत सारी उम्दा रचनाऐं कुछ पढ़ी कुछ धीरे धीरे पढ़ी जायेंगी :)

    उत्तर देंहटाएं
  2. रचनाकार संगढन को धन्यबाद, जो अच्छी से अच्छी कविताओ का चुनाव कर प्रकासन किया!!
    सभी कविताये अच्छी है !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव1:38 pm

    सभी कवितायेँ सुंदर और मनभावन हैं पर जसवीर
    चावला की बिंदास कविताओं ने विशेष प्रभावित किया
    सभी रचनाकार प्रसंशा और बधाई के पात्र हैं

    उत्तर देंहटाएं

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