रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

सैयद एस. तौहीद का आलेख - फाग़ हरेक जीवन में खुशियों के रंग लेकर नहीं आता

फाग़ हरेक जीवन में खुशियों के रंग लेकर नहीं आता
------------------------------------------------
फाग़ के दिनों में राजेन्द्र सिंह बेदी की फिल्म ‘फागुन’ याद आती है ।
फागुन गोपाल (धर्मेन्द्र) एवं शांता दामले (वहीदा रहमान) पति-पत्नी के
मार्मिक रिश्ते की कहानी हैं। बेमेल शादी के पहलुओं से परिचित कराती यह
कथा प्रेम में बंध कर भी तृष्णा की विडम्बना को दर्शाती है। प्यार अंधा
होता है। वो किसी बंधन-अवरोध को नहीं जानता। धनवान शांता निर्धन गोपाल से
प्रेम करती है, परिवार की इच्छा के खिलाफ दोनों शादी कर लेते हैं। विवाह
बाद गोपाल पत्नी को छोड शहर चला जाता है। दिनों बाद होली के त्योहार पर
घर पर लौटा है, रंगों की दुनिया में अपना कोई रंग तलाशने । पत्नी से रंग
खेलने की हट में होली के रंग उस पर डाल कर नाराज़ कर देता है । रंगों के
त्योहार में कपडा खराब हो जाने का ख्याल बहुत कम रहता है। इस डर में खेली
होली बेरंग सीमाओं को तोड नहीं पाती। कीमती साडी खराब होने पर शांता काफी
नाराज़ है, वह गोपाल को दो टूक कहती है ‘जब आप कीमती साडी खरीद नहीं
सकते,फ़िर इसे खराब करने का अधिकार भी नहीं होता’। शांता के व्यवहार से
पीडित ‘गोपाल’ तिरस्कार का बोध लिए घर छोड देता है । पर वह यह नहीं समझ
पाया कि शांता ने उसका अपमान क्यूं किया होगा, पत्नी के खराब व्यवहार की
वजह जाने बिना वो चला गया। दरअसल बेटी की बेमेल शादी से दुखी माता-पिता
को खुश करने के लिए शांता ने यह नाटक किया था। लेकिन इस कोशिश में पति
खफा हो गया। कपडा भले ही बहुत कीमती रहा हो लेकिन पति-पत्नी के रिश्ते से
कीमती नही था। वो अपने प्रेम पर कायम रह सकती थी…उससे एक गलत निर्णय की
भूल हो चुकी है।

फागुन महीना जिसमें ‘होली’ का त्योहार आता है, वही फाग़ शांता-गोपाल की
ज़िंदगी से ‘रंग’ जाने की त्रासद पीडा है। सालों बाद भी शांता खराब
व्यवहार का दंश से पीडित अकेला-बेरंग जीवन जी रही है। बिटिया दामद उसके
जिंदगी के साथ एडजस्ट करने की कोशिश नहीं करना चाहते, ऐसे में उस असहाय
की जिंदगी में बदलाव मुश्किल नजर आता है । होली जो कि जीवन में ‘रंग’ का
प्रतीक है, शांता के लिए बेरंग विडम्बना की निशानी बन चुका है । उसे
स्मरण है कि बरसों पहले आज ही के दिन गोपाल नाराज़ होकर चला गया था ।
कीमती साडी पर ‘रंग’ डालने के लिए उसने जो पति का तिरस्कार किया था, जब
भी होली आई उस दिन के साथ आई । जीवन को पलट देने वाले काले दिन की याद
बरकरार रही। कह सकते हैं कि होली का रंग शांता को काफी तकलीफ देता था।
फाग़ ने उससे बैर कर रखा था।जीवन की उमंगों से महरूम होकर जीना एक तपस्या
समान होता है। पति के चले जाने बाद वह एकांत व असहाय सी हो गई, उसके जीवन
का स्वरूप मझधार में जी रहा जीवन था। शांता के अकेलेपन को बिटिया- दामद
भी नहीं बांटना चाहते। जीवन की संध्या बेला पर वह किसी सहारे की जरूरत
महसूस करती है, कोई होता जिसको हम अपना कह लेते! भाव में शांता को पति की
कमी खटकती रही । फागुन का रंग जिंदगी को अपराधबोध में जीने को छोड गया
था।

जीवन की संध्या बेला में गोपाल अपने परिवार के पास लौट आता है। शांता की
कहानी से हम समझ पाते हैं कि किसी अपने के बिना ‘होली’ ही नहीं बाक़ी
जिंदगी भी निस्सवाद हो सकती है । कहानी में फागुन व होली को बेकग्राउंड
थीम रखा गया। होली पर्व पर घटी एक साधारण घटना कथा को विस्तार देती है।
जीवन में परस्पर निर्भरता स्वाभाविक बात है। कह सकते हैं कि जिंदगी अकेली
गुजारी नहीं जा सकती। सारा जीवन अकेले होकर भी व्यक्ति किसी सफर का हमसफर
हो सके तो जीना बेमानी नहीं लगता। शांता की कहानी से हमें संदेश मिला कि
फाग़ हरेक की जिंदगी में रंगों का सुखद स्वरूप लेकर नहीं आता। बेरंग
जिंदगी की टीस होली के समय सबसे ज्यादा होती है।

होली के त्योहार में रंगों की प्रतिक्षा सबसे अधिक होती है।उस दिन के बाद
शांता को हर फाग़ में गोपाल का इंतजार रहा,लेकिन वो बरसों तक लौट कर नहीं
आया। गोपाल के नजरिए से इस कहानी को देखें तो उसे भी खुशी नहीं मिली।
तिरस्कार का बोध लिए वो जीवन के आनंद से दूर रहा। पत्नी का खराब व्यवहार
उसे सहन ना हो सका,क्या वो पीडा इस कद्र गंभीर रही कि बरसों दिल में थी?
गोपाल के लिए वो शायद गंभीर थी। पति-पत्नी की पीडा में समानता पीडा की
वजह में देखी जा सकती है। दुख का धागा दो अलग जिंदगियों को एकाकार कर रहा
था। कहानी के प्रकाश में शांता का हिस्सा ज्यादा त्रासद रुप में व्यक्त
हुआ है। साहित्य से सिनेमा में आए राजेद्र सिंह बेदी जीवन की एक विडम्बना
को तलाश कर लाए थे। फाग के साए में पल रही लेकिन रंग की प्रतिक्षा में
बुनी एक कहानी। होली के रंग में बाक़ी जीवन निस्सवाद जीने को विवश कहानी।
फागुन की बेला जिंदगी में रंग लेकर आती है। शांता-गोपाल के सिलसिले में
ऐसा हो ना पाया। होली हरेक की जीवन में खुशियों के रंग लेकर नहीं आती।
फागुन का हर रंग खुद में एक दुनिया समेटे हुआ करता है। कहानी के
परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि जिंदगी रंगों के बिना मुकम्मल नही
है।

----------
सैयद एस. तौहीद
विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget