सोमवार, 31 मार्च 2014

मंजरी शुक्ल की कहानी - चाँदनी

चाँदनी 

डॉ. मंजरी शुक्ल

जब ईश्वर जरुरत से ज्यादा झोली में गिर देता हैं तो वह भी मनुष्य के लिए अहंकार और पतन का कारण बन जाता हैं I ऐसा ही कुछ हुआ चाँदनी  के साथ..सभ्य, सुशील और बेहद महत्वकांशी चाँदनी को जब महात्मा गाँधी के आदर्शों पर जीवन पर्यन्त चलने वाले ईमानदार और अकेले बाबूजी ने उसे पहली बार सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल के पद पर कार्य करने के लिए भेजा तो मानों कई सतरंगी इन्द्रधनुष उनकी आँखों झिलमिल वर्षा के साथ मुस्कुरा उठे I उसकी माँ की मौत के बाद बाबूजी ने अकेले होते हुए भी उसकी सारी ज़िम्मेदारियाँ माँ भी बनकर बिना किसी शिकन या परेशानी के उठाई I जहाँ आस पड़ोस के मर्द घर में घुसते ही एक गिलास पानी के लिए भी अपनी घरवाली को चीखते हुए बुलाते वहीँ दूसरी ओर पसीने में लथपथ बाबूजी आँगन में आते ही उसे प्यार से गोद में उठाकर जी भर के दुलार करने के बाद भीगी आँखों से  सूखी गीली लकड़ियों को चूल्हे में जलाने के लिए कवायद शुरू कर देते और उसे गोदी में लेकर खाना बनाने के लिए जुट जाते I

"संस्कार" बस इसी शब्द के बीज वो उस नन्ही  बच्ची के  मन मस्तिष्क में बो देना चाहते थे I सारी दुनियाँ देखने के बाद उनकी अनुभवी आँखें ताड़ गई थी कि पैसे से खरीदी गई इज्जत  मजबूरीवश सिर्फ शरीर ही देता हैं I अगर किसी के मन का मालिक बनना हो तो पहले खुद गुणी बनना पड़ेगा I शायद ये बाद चाँदनी  भी महात्मा गाँधी, महाराणा प्रताप, भगत सिंह और लाल बहादुर शास्त्री जैसे अनेक महान और अपने सिद्धान्तों पर अडिग रहने वाले व्यक्तियों के बारे में जानकर समझ गई थी I अपने बाबूजी के सपनों को पूरा करने के लिए उसने भी सारी दुनियादारी को ताक पर रखकर लालटेन की रोशनी में अपने जीवन के वो सुनहरे साल  किताबों की काली स्याही में डुबो दिए, जिनमें उसकी हमउम्र सहेलियां सावन के झूलों में झूलते हुए अठखेलियाँ करती थी I वर्षों बाद बाबूजी की वो सारी कहावतें चरितार्थ होते हुए एक दिन डाकियें के हाथों से नियुक्ति पत्र के रूप में उसके पास आ गई और आँसुओं ने हँसते हुए बाबूजी के  तकलीफों में गुज़रे हुए हजारों पलों को एक ही झटके में अलविदा कह दिया I उसकी तमाम मनुहार और उलाहनों के बाद भी बाबूजी उसके साथ शहर नहीं गए और उसे आशीर्वाद देते हुए उसकी बचपन की खट्टी-मीठी   यादों के साथ आँसू पोंछते हुए उस मिट्टी के घरोंदें के अन्दर चले गए I

चाँदनी को वहाँ पर हर नए प्रिंसिपल की तरह स्कूल के सारे स्टाफ ने हाथों हाथ लिया I जब उसके हाथों से होती हुई लक्ष्मी से कई घरों का चूल्हा जलता था तो ज़ाहिर था कि उन ज़ुबानों में भी सदा चाशनी ही लिपटी रहती थी I स्कूल के गेट के अन्दर घुसते ही मानों वह महारानी बन जाती I गेटकीपर से लेकर बच्चें और बच्चों से लेकर प्रत्येक टीचर की झुकी हुई गर्दन शुरू में तो उसे संकोच से मानों ज़मीन में दो फीट अन्दर गाड़  देती थी पर पता नहीं कब हौले से उसके साथ अहंकार भी अदृश्य रूप में कदम से कदम मिलाते हुए चलने लगा  I इसका पता उसे तब चला, जब एक दिन स्कूल के बूढ़े गेटकीपर ने अपनी ऐनक पोंछते हुए उसे नहीं पहचान पाने के कारण सेल्यूट  नहीं मारा I इतनी गहरी चोट तो उसे तब भी नहीं लगी थी जब मास्टरजी ने उसे फ़ीस नहीं भर पाने की वजह से  डंडे से मारते हुए हथेलियाँ नीली कर दी थी I ग़ुस्से से आग बबूला होते हुए, गोरे चेहरे को लाल करके और पैर पटकते हुए उसने अपने कमरे से ना जाने कौन सा फ़ोन मिलाया कि बेचारा गरीब बूढ़ा गेटकीपर रिटायर होने से पहले ही आँखों में आँसूं भरे उसकी तरफ़ बेबस नज़रों से देखते हुए चुपचाप बिना एक शब्द कहे वहाँ से चला गया और शायद वहीँ से बाबूजी की सारी कहानियाँ उसके दिलों दिमाग से विलुप्त हो गई I

अब वह ज़माने के हिसाब से सुर ताल मिलकर चलने लगी I महँगे कपड़ों से अपनी अलमारी को विभिन्न प्रकारों के आभूषणों से सजाती   हुई, कई बैंकों के लगातार खातें खुलवाती वह अब एक मकान की भी स्वामिनी हो चुकी थी I   कई सांसारिक लोगों की मदद से उसने बहुत ही कम समय में सामाजिक माँ प्रतिष्ठा भी पा ली थी जो धन और वैभव के अनुरूप प्रदान की जाती हैं I  उसने अब सभी देवी देवताओं को दरकिनार करते हुए अब अपना इष्टदेव कुबेर को मान लिया था I  अचानक एक दिन दोपहर में अपने स्कूल का मुआयना करते हुए बच्चों को मिड डे मिल खाते देख कर उसके मन में एक विचार क्रोंधा , जिसे उसके साथ चल रहे चालबाजी के गुरु मिस्टर वर्मा , जो की वहाँ बरसों से अकाउंटेंट  थे, उन्होंने तुरंत ताड़ लिया I बस फिर क्या था ....आँखों से ही चाँदनी  ने स्वीकृति दे दी और ख़ुशी के मारे पान का पीक भी निगलते हुए दूसरे ही दिन से कर्त्तव्यनिष्ठ वर्मा जी ने मिड डे मिल का तीन चौथाई अनाज आस पास की दुकानों पर पहुँचाना  शुरू कर दिया और वहाँ से कीड़ो वाला पुराना अनाज स्कूल लाकर बनवाना   I खाना बनाने वाले अब केवल  कागज़ पर थे I उनकी कमियाँ निकालकर स्कूल की काम वाली बाईयों और चौकीदारों से  ही खाना बनवाना शुरू कर दिया I कुछ दिन तो बच्चों ने कोई शिकायत नहीं की पर जब खाने में रोज ही  कीड़े मिलने लगे और खाना गले के नीचे से उतरना बंद हो गया तो बेचारे अपने घर से ही रूखी सूखी लाकर खाने लगे I ये देखकर चाँदनी  को बहुत सुकून मिला I

हर बात में सरकार को कोसते हुए वो सबकी नज़रों में बेदाग़ बनी रही मानो सरकार कोई एक आदमी हो जो कहीं दूर से बैठा ये सब तमाशा करवा के खुश हो रहा हो I उधर बाबूजी चाँदनी की याद में बहुत बैचेन हो रहे थे I अचानक जब मन की पीड़ा मौन से भी मुखर हो उठी तो वो चल दिए अपना झोला उठाए चाँदनी  के पास I कही उनकी ईमानदार कामकाजी बिटियाँ  अपने स्कूल का कामधाम छोड़कर ना दौड़ी चले आये ,  सोचकर उन्होंने अपना परिचय केवल चाँदनी  के गाँव के पड़ोसी होने का दिया I उस समय मालती बैंक में पैसा जमा कराने गई हुई थी I पहले तो बाबूजी  बैठे  , फिर घूमते टहलते उस ओर जाकर खड़े हो गए जहाँ पर बच्चों का खाना बन रहा था I वे मन ही मन अपनी जीवन भर की तपस्या को फलीभूत होते देखकर ख़ुशी से रो पड़े कि आज उनकी लड़की इस योग्य हैं कि ना जाने कितने नन्हे मुन्ने  बच्चों  को भोजन करवा रही हैं I जिन बच्चों के घर में एक समय का भी खाना छीना झपटी के साथ खाया जाता था  वो बेचारे उस खाने के इंतज़ार में बैठे थे जिन्हें दूसरे बच्चें देखना भी पसंद नहीं करते थे  I अचानक खाने बनाने वाली बुढ़िया अम्मा  फुसफुसाकर चौकीदार से बोली -" हमका लागत हैं दो ठौ छिपकली ई दाल में  गिर गई हैं I "

चौकीदार ने चमचे से हिलाकर देखा तो दो काली छिपकलियाँ  अभी भी दाल के अन्दर तड़प रही थी  I उसने इधर-उधर देखते हुए चुपचाप भगोने को तश्तरी से ढकते हुए धीरे से कहा -" अभी मुझे चाँदनी  मैडम के घर पर बर्तन मांजने भी जाना हैं I अगर छिपकली निकालकर दूसरा दाल का पतीला चढाऊंगा       तो चार घंटे ओर लगेंगे I तुम नाहक ही परेशान मत हो I हमें तो कीड़ों से भरा खाना दिया ही जाता रोज बनाने के लिए ...तो दो छिपकली में कौन सी आफत हुई गई हैं  I "

और अम्माँ ने भी माथे का पसीना पोंछते हुए चुप्पी साध ली I

जब खाना बच्चों को दिया जाने लगा तो बाबूजी के पसीने से तरबतर कुर्ते और पोपले मुँह को देखकर अम्मा को दया आ गई I.वह समझी कि स्कूल में ही कोई नया आदमी काम पर लगा हैं I उन्होंने एक प्लेट खाना उनके आगे भी रख दिया I बाबूजी अन्न का निरादर कर नहीं सकते थे इसलिए वे बिना कुछ कहे खाने बैठ गए I अभी आधा खाना ही खाया था कि सभी बच्चों के साथ साथ उनकी भी हालत बिगड़ने लगी I थोड़ी ही देर में सभी को उल्टी- चक्कर आने लगे I ये देखकर चपरासी और अम्माँ दर के मारे वहाँ से सर पर पैर रखकर ऑफिस कि ओर भागे I पर तब तक चाँदनी वापस लौट कर आ चुकी थी और अपने कमरे में बैठकर पेपर पढ़ रही थी I जैसे ही हाँफते काँपते वर्मा जी और बाकी लोगों ने उसे इस घटना से अवगत कराया तो वह हस्पताल का नाम सुनकर ही बिदक उठी I डॉक्टरों की रिपोर्ट, अधिकारियों का निरीक्षण और बाबूजी की इज्जत का भी आज अचानक उसे पता नहीं कैसे ध्यान आ गया I उसने सभी लोगों को रोजमर्रा में ली जाने वाली दवाइयों को देने के लिए कहा और घर की ओर चल दी I

उधर बाबूजी की हालत बिगडती ही जा रही थी I चाँदनी  को चार बार संदेशा भिजवाया गया की एक बूढ़े आदमी की तबियत भी बहुत खराब है ,पर वो नहीं आई I आखिर रात में बाबूजी ने चाँदनी  का नाम अपने मन में लेते हुए आखिरी साँस ली और उससे बिना मिले ही इस दुनियां से चले गए I अब तो आखिर मालती को बडबडाते हुए आना ही पड़ा I जैसे ही उसकी नज़र जमीन पर गठरी जैसे  पड़े हुए बाबूजी पर पड़ी वह जैसे चेतना शून्य हो गई I उसने काँपते हाथों से बाबूजी का निर्जीव पड़ा ठंडा हाथ पकड़ा I वो बोलना चाह रही थी पर ज़ुबान जैसे तालू में चिपक कर रह गई थी I उसके हाथ, पैर, आँखें,कान जैसे सभी इन्द्रियों ने एक साथ काम करना बंद आकर दिया था I वो बस बाबूजी की ठंडी पड़ी दुबली पतली देह से एक अबोध शिशु की तरह चिपटी पड़ी थी I अचानक वह उठी और पागलों की तरह ठहाका मारकर हँसने लगी और एक-एक करके  अपने सारे गहने वही फेंककर नंगे पैर स्कूल के बाहर जाने लगी I सब मूर्ति की तरह अपलक निहार रहे थे  और कुछ भी नहीं समझ पाने के कारण मानों पत्थर के बेजान बुतों की भांति एक दूसरे को फटी हुई आँखों से देख रहे थे I आख़िरकार वर्मा जी भागे और चाँदनी  के पास जाकर हकलाते हुए धीरे से बोले-' मैडम, आप इतनी रात में कहाँ जा रही हैं ?"

चाँदनी  ने उन्हें भरपूर नज़रों से देखते हुए कहा -" थाने "

और स्याह होती चाँदनी  सोई हुई काली सड़क के अन्धेरे में कहीं गुम हो गई 

3 blogger-facebook:

  1. सुंदर ! छिपकली को भी लगता है पता होता है कहाँ जा कर गिरना है !

    उत्तर देंहटाएं
  2. अखिलेश चंद्र श्रीवास्तव7:50 am

    मंजरीजी आपकी कहानी बहुत ही प्रभावशाली मर्मस्पर्शी और भावुक है पढ़ते पढ़ते आंसू निकल पड़े इतनी सुन्दर
    कहानी के लिये हमारी बधाई और आशीर्वाद

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------