शनिवार, 1 मार्च 2014

राजीव आनंद की 2 लघुकथाएं - श्राद्ध का रिहर्सल तथा सफलता की कीमत

   सत्य घटना पर आधारित
                                                 श्राद्ध का रिहर्सल
          
    मेरे लिए किसने क्या किया यह मरने के बाद थोड़े ही देख पाएगें और आज के व्यस्ततम जिंदगी में किसे फुर्सत है कि इतनी धूमधाम से किसी का श्रा़द्ध करे. मेरा तो मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में हर उतरादायित्व पूरी कर लेनी चाहिए जिसमें श्राद्धकर्म भी एक उतरादायित्व है, यह कहना था श्याम कुमार जैन का जिन्होंने अपने चास निवास पर 11.12.13 को अपना श्राद्ध खुद ही कर डाला.
अपने श्राद्ध में लोगों को निमंत्रित करने के लिए श्याम बाबू ने बकायदा निमंत्रण पत्र छपवाया था. अपने सगे-संबंधियों, मित्रों एवं समाज के परिचित लोगों के बीच अंतिम विदाई समारोह का निमंत्रण पत्र बांटा मानो श्राद्ध न होकर विवाह का निमंत्रण हो. आम तौर पर लोग श्राद्ध में शामिल होने से कतराते हैं लेकिन श्याम बाबू के श्राद्ध में लोगों ने जिज्ञासा मिश्रित उत्साह के साथ भाग लिया. हर शख्स की इच्छा थी कि श्याम बाबू उसके टेबुल पर बैठकर भोजन ग्रहण करें. जैसे मरने वाले की आखिरी इच्छा पूरी की जाती है उसी तरह श्याम बाबू ने भोज खाने वाले अतिथियों के टेबुल पर जा-जा कर सभी की इच्छा पूरी की और अपने श्राद्ध का भोजन खुद ग्रहण किया. श्याम बाबू शायद विश्व के पहले व्यक्ति है जो जीवित रहते ही अपना अर्पण और तर्पण कर डाला.
श्राद्ध पर श्याम बाबू के घर पहली बार जा रहा प्रत्येक व्यक्ति उनके घर का पता पूछ रहा था. ठेले-खोमचे वाले श्याम बाबू के आवास के इर्द-गिर्द मेला समझ कर दुकान सजाकर बैठे थे. किन्नरों का एक झूंड श्याम बाबू के इस अनोखे श्राद्ध में पहुंच गया था. आमतौर पर पैसों के लिए किचकिच करने वाले किन्नर भी बिना एक पैसा लिए पूरे दिन श्याम बाबू के आवास पर नाचते गाते रहे मानो कोई जन्मोत्सव मनाया जा रहा हो.


श्याम बाबू अपनी पत्नी सुमित्रा के साथ सुबह सात बजे से दस बजे तक जैन मंदिर में पूजा-अर्चना करते रहे. सवा दस बजे घर आकर णमोकार मंत्र का जाप किया. इसके पश्चात दोपहर बारह बजे से किन्नरों के साथ काफी देर तक नृत्य किया. नृत्य के बाद दोपहर दो बजे पंड़ितों को भोजन कराया और शाम छह बजे से देर रात तक अपने रिश्तेदारों और मित्रों को भोज कराया.


नही-नहीं श्याम बाबू न ही सनकी है और न ही पागल. उन्होंने तो बस यही सोचा कि आज के व्यस्ततम जिंदगी में अपने रिश्तेदारों, मित्रों को श्राद्ध का रिहर्सल दिखा दें जिसे श्याम बाबू एक उतरादायित्व मानकर पूरा कर दिया और अपना श्राद्धकर्म खुद कर अपने पीछे छोड़ जाने वालों को श्राद्धकर्म करने से मुक्त कर दिया. है न आश्चर्यजनक बात पर सच है.
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सफलता की कीमत

श्वेता पूनम पांडेय को अपना रोल मॉडल मानती हुई विज्ञापन की दुनिया में छोटे-छोटे कपड़े पहनते हुए बड़ी-बड़ी मंजिलें तय कर रही थी. अब श्वेता की नजर फिल्‍मी दुनिया पर थी जहां हाल ही में उसने दस्‍तक दे दी थी और कम कपड़े पहनने की आदत के कारण श्वेता को फिल्‍म में भी ब्रेक मिल गया था. डेब्‍यू फिल्‍म में ही श्वेता ने कम कपड़ों के साथ तहलका मचा दिया था.

आज उसका टीवी पर इंटरव्‍यू आ रहा था. छोटे-छोटे कपड़े में देखकर श्वेता की माँ को इतनी शर्म आ रही थी कि पुरोहित रहे अपने पति से नजर भी नहीं मिला पा रही थी. पुरोहित पिता अपनी बेटी को इस हालत में देखकर शिवःशिवः कहते भाग खड़े हुए टीवी वाले कमरे से. पर माँ नजरें नीची किए श्वेता की बात सुन रहीं थी.

इंटरव्‍यू लेने वाले ने पूछा, हाँ तो श्वेता जी आपके इतने कम उम्र में सफलता के पीछे आपके माता-पिता का कितना हाथ है ?

श्वेता ने तपाक से कहा, मेरी सफलता के पीछे मेरे माता-पिता का कोई हाथ नहीं है क्‍योंकि मेरे माता-पिता मर चुके है.

श्वेता की माँ टीवी पर यह सुनकर गश खाकर जमीन पर गिर पड़ी थी, गिरने की आवाज सुनकर श्वेता के पिता दौड़े आए और श्वेता की माँ को उठाते हुए पूछा, क्‍या हुआ श्वेता की माँ ?

श्वेता की माँ उठने की कोशिश करते हुए कहा, कुछ नहीं हुआ बस यूं ही पांव फिसल गया था.

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंड़ा
गिरिडीह-815301
झारखंड़

2 blogger-facebook:

  1. wah ji ! achhi kahaniyan hain|
    Manoj 'Aajiz'

    उत्तर देंहटाएं
  2. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव1:36 pm

    राजीव जी की लघु कथाएं हमारी सामाजिक व्यवस्थाओं
    पर भरपूर कटाक्ष हैं नाम के लिये माँ बाप को मृत बताना
    और श्राद्ध पर से युवा पीढ़ी का विश्वास न होना जीवित
    रहते हुवे अपने श्राद्ध को विवश करता है उत्तम लेखन पर
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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