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सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा की लघुकथा - हमदर्दी

लघुकथा

हमदर्दी

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

" क्या हुआ , तेरा चेहरा क्यों उतरा हुआ है ? "

" अरे कुछ नहीं .....!"

" पर तेरे चेहरे पर तो बारह बज रहे हैं ? "

" यार आज पूरा एक हफ्ता हो गया , यह बाबू हर रोज मेरे डाक्युमेंट्स में कोई न कोई गलती निकाल कर मेरा आफर - लेटर देने से मना कर देता है ."

" पर इसने औरों को तो आफर लेटर दे दिए हैं ."

" हाँ ! वह तो मुझे भी पता है तभी तो लगातार आ रहा हुं ."

" अब क्या होगा ? यह तो गलत बात है ."

" होगा क्या ,जैसे औरों ने लिया है वैसे ही मैं भी लूँगा पर ....."

" पर क्या ........?"

" भाई उसे रिश्वत के रूप में रूपये चाहिए , तू मेरी मद्त कर दे .मैं तुझे बाद में वापिस कर दूँगा ."

" कितने लगेंगे ?"

" हराम का पिल्ला हजार से कम नहीं लेगा ."

" यह तो हम दोनों के लिए ही किसी बोझ से कम नहीं है ."

" भाई , यह बोझ तो सहना ही पड़ेगा और कोई चारा ही नहीं है ."

" ठीक है , ले एक हजार रूपये और अपना काम निकाल ."

" बहुत - बहुत शुक्रिया मेरे प्यारे दोस्त . मैं तेरा एहसान ज़िन्दगी भर नहीं भूलूँगा और पहली सैलेरी मिलते ही सबसे पहले तेरे पैसे वापिस करूंगां ."

" ठीक है - ठीक है , जा अपना काम करवा और नौकरी का जुगाड़ कर ."

" वह झटपट बेईमान बाबू के पास गया . चुपचाप उसे पाँच सौ का एक नोट थमाया और तैयार पड़ी चिठ्ठी लेकर बाहर आ गया ."

" भाई ,आफर लैटर तो मिल गया . नोटों में बड़ा चमत्कार होता है . चल अब कुछ चाय - पानी लेते हैं ."

दोनों दोस्त चाय वाले की दूकान पर आकर बैठ गये . चाय कि चुस्कियों के बीच पाँच सौ का दूसरा नोट , उसकी जेब में गर्मीं पैदा कर रहा था और मन ही मन वह सोचने लगा ," लगता है यह नौकरी उसे खूब फलेगी . इसने तो शुरुआत से पहले ही अपनी महक बिखेर दी है .”

चाय खत्म हुई तो वह मित्र से बोला , भाई चाय के दस रूपये भी मेरे हिसाब में लिख लेना . पहली सैलेरी मिलते ही सारा हिसाब चुकता कर दूँगा .”

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

डी-184, श्याम आर्क एक्सटेंशन साहिबाबाद, उत्तरप्रदेश- 201005

E.Mail arorask1951@yahoo.com

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