शनिवार, 22 मार्च 2014

कुबेर की लघुकथाएँ

कुबेर

लघुकथाएँ

1. परंपरा

रात मरहाराम ने एक सपना देखा। एक व्यक्ति काफी दिनों से बीमार था। बचने की उम्मीद नहीं थी। संयोग से उसके घर एक सिद्ध पुरूष का आगमन हुआ। उन्होंने उसे एक औषधि दिया। उस औषधि के सेवन से वह स्वस्थ हो गया। औषधि की कृपा से उस समय उसने मौत को जीत लिया था। औषधि पर श्रद्धा हो जाना स्वाभाविक था। वह उसकी पूजा करने लगा।

मरते वक्त उसने अपने पुत्र से कहा कि इस औषधि को वह संभाल कर रखे, पता नहीं कब आवश्यकता पड़ जाय। पुत्र ने पिता की परंपरा का निर्वाह किया। वह जीवन भर उसकी श्रद्धा पूर्वक पूजा करता रहा। बीमार पड़ने पर भी उसने उस औषधि का सेवन नहीं किया। उनके बच्चों ने भी उसकी परंपरा का निर्वाह किया। अगली पीढ़ी को बस इतना ही पता था कि यह एक दिव्य वस्तु है। पूर्वज इसकी पूजा करते आये हैं इसलिये इसकी पूजा करन उनका भी धर्म बनता है। इससे पुण्य लाभ होता है।

एक बार उस परिवार का मुखिया उसी रोग से पीड़ित हो गया जिससे कभी उसका पूर्वज ग्रसित हुआ था। जिस दिव्य वस्तु की वह रोज पूजा करता था, उसके सेवन से वह रोग मुक्त हो सकता था, परंतु उसने ऐसा नहीं किया। दिव्य वस्तुएँ पूजा के लिए होती हैं, सेवन करने के ीिए नहीं। वह कालकवलित हो गया।

उस औषधि का नाम था, ईश्वर।

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2. छठवाँ तत्व

उस दिन सतसंग में पंडित जी कह रहे थे - ’’क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा .. मनुष्य का शरीर पाँच तत्वों से बना होता है। यह शरीर नाशवान है। मृत्यु होने पर ये पाँचों तत्व अपने-अपने मूल में वापस समा जाते हैं।’’

मरहा राम भी सतसंग लाभ ले रहा था। उसकी अड़हा बुद्धि के अनुसार पंडित जी के इस कथन में उसे कुछ घांच-पाँच लगा। उसने कहा- ’’पंडित जी! हजारों साल पहले लिखी यह बात उस समय जरूर सत्य रही होगी। अब इसकी सत्यता पर मुझे संदेह होता है।’’

पंडित जी ने कहा - ’’हरे! हरे! घोर पाप! कैसा जमाना आ गया है। धर्मग्रंथों में लिखी बातों के ऊपर संदेह? ऐसी बातें कभी असत्य हो सकती हैं?’’

’’मैं भी तो यही कह रहा हूँ पंडित जी’’, मरहा राम ने कहा - ’’अब तत्वों की संख्या बढ़ गई होगी, वरना पाप कहाँ से पैदा होता?’’

’’अरे मूरख! पाप-पुण्य कब नहीं था। उस समय भी था अब भी है।’’

’’लेकिन भ्रष्टाचार और अनाचार तो नहीं रहे होंगे न?’’

’’मरहा राम! ये सब भी पहले थे, फरक केवल मात्रा का है। अब कम का जादा और जादा का कम हो गया है।’’

’’लेकिन पडित जी,’’ मरहा राम ने कहा - ’’लोग कहते हैं, आज का आदमी जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं। और जैसा होता है, वैसा दिखता नहीं। मुझे लगता है, नहीं दिखने वाला यही तत्व पहले नहीं रहा होगा। नहीं दिखने वाला तत्व मतलब अदृश्य तत्व, डार्क मैटर। कही यही तो छठवाँ तत्व नहीं है।’’

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3. मिठास का अभाव

दाऊ जी अभी भी यही समझते हैं कि उनके घर परिवार की अंदरूनी बातें आँगन के बाहर नहीं जाती। पर यह सच नहीं है। दौलत की वह मोटी दीवार अब न रही, जिसके बाहर गाँव वालों को दाऊ परिवार की बातें गर्व व महिमा के विषय जान पड़ते थे। अब तों हर बात अबाधित रूप से बिना छने ज्यों की त्यों बाहर तक चली आती है।

पर गाँव वालों में तमीज अभी भी बाकी है, और वे दाऊ जी के विश्वास को कायम रखने के लिये न सुनने का अभिनय करते रहते हैं।

पँद्रह दिन हो चुके हैं, दाऊ जी के घर से लड़ाई-झगड़े की आवाजंे नहीं आई हैं, जैसे युद्ध-विराम लगा हो।

बाई साहिबा की मुसीबत है। रसोई के खाली डिब्बों की सूचना दाऊ जी को दे तब भी, न दे तब भी, जली-कटी तो सुनना ही पड़ता है। एक तरफ कुआँ है, तो दूसरी ओर खाई है। उन्होंने मुँह न खोलना ही बेहतर समझा है। जिस दिन चूल्हा नहीं जलता, दाऊ जी खुद समझ जाते हैं।

लेकिन कल त्यौहार है। चुप रहने से काम नहीं बनेगा। बाई साहिबा ने खाली झोला चुपचाप दाऊ जी के सायकिल के हेंडिल पर लटका दिया। वह भी जानती है, बाजार में कोई भी दुकानदार उधार देने वाला नहीं है। पहले का बाकी जो है। यही हाल गाँव-पड़ोस का भी है, पर क्या करे?

शाम को दाऊ जी काम पर से वापस लौटे। झोला भरा हुआ था। बाई साहिबा ने राहत की सांस ली। भला हो भगवान का, त्यौहार तो मन जायेगा।

पर दूसरे ही छण दाऊ जी की अपमानित आँखें देख कर बाई का मन कड़ुवाहट से भर गया। न जाने किन-किन लोगों के आगे हाथ फैलाना पड़ा होगा, गिड़गिड़ाना पड़ा होगा।

गरीबी दुनिया में सबसे कड़ुवी चीज होती है।

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4. संत

मरहा राम आजकल धार्मिक व्यक्ति हो गया है। गाँव में उत्तर वाले किसी पहुँचे हुए संत का प्रवचन चल रहा था। नियम-व्रत का पालन करते हुए पिछले पाँच दिनों से वह सत्संग-लाभ ले रहा है। वह संत जी के वचनों को हृदय में बसाता भी है और बुद्धि से तौलता भी है। खाली समय में वह संत जी के पास जाकर बैठ जाता है, अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त करने के लिए।

संतों का लक्षण बताते हुए प्रवचनकार संत जी आज ही अपने प्रवचन में कह रहे थे - ’’संत वह है जो मीठा खाता है और मीठा बोलता है। मीठा खाने का मतलब मीठा सुनना।’’

संत जी की बातों ने मरहा राम के हृदय को छू लिया। उसने कहा - ’’भगवन! संतों के बारे में आप ठीक ही कहते हैं। नेता जी जब भी आते हैं, मीठा-मीठा ही बोलते हैं।’’

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Kuber

Email - kubersinghsahu@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. लघुकथाएँ अच्छी बन पड़ीं हैं.

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  2. laghukatha achchhi hai.. sunil kumar sajal sunil.sajal12@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं

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