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सुशांत सुप्रिय की कहानी - क़िस्मत

क़िस्मत

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--- सुशांत सुप्रिय

रेलगाड़ी ने एक लम्बी सीटी दी और धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ ली। प्लेटफ़ार्म पीछे छूट गया। फिर दोनों ओर झुग्गी-झोंपड़ियों की लम्बी क़तार दिखने लगी। मैंने बाहर देखना बंद करके डिब्बे के भीतर का जायज़ा लिया। मेरे ठीक सामने की सीट पर बैठे एक सज्जन कोई धार्मिक किताब पढ़ रहे थे। चालीस-पैंतालीस की उम्र। आँखों पर मोटा चश्मा। उनके बगल में दस-ग्यारह साल का एक लड़का बैठा था जो चलती गाड़ी की खिड़की से बाहर के दृश्य देख रहा था।

मैंने अपने बैग से ' शुक्रवार ' की साहित्य वार्षिकी निकाल ली और उसमें छपी कविताएँ - कहानियाँ पढ़ने में तल्लीन हो गया।

अगले स्टेशन पर मैं पानी पीने के लिए गाड़ी से नीचे उतरा। जब मैं वापस आया तो मेरे सामने बैठे सज्जन बगल में बैठी महिला के बच्चे का हाथ देख रहे थे। मैं अपनी सीट पर बैठ गया। सज्जन बच्चे की हथेली का मुआयना करते रहे। फिर महिला से कहने लगे -- " इसकी भाग्य-रेखा, फ़ेट-लाइन बड़ी प्रबल है। अच्छी क़िस्मत का मालिक होगा। जीवन में यश, सुख, समृद्धि, सब पाएगा। "

महिला ध्यान से सुनती रही।

" इसके जन्म की तारीख़ कौन-सी है ? " सज्जन ने पूछा।

" एक अप्रैल। " महिला बोली।

गाड़ी ने सीटी दी और धीरे-धीरे आगे खिसकने लगी।

" इसका मूल अंक ' एक ' है। इस अंक का स्वामी ग्रह सूर्य है। बेटे को सिखाइए कि प्रात: उठते ही सूर्य के दर्शन करे। जब कभी यह परेशान हो तो जो मंत्र मैं लिख कर दे रहा हूँ उसका 108 बार जप करे। परेशानी तुरंत दूर हो जाएगी।"

सज्जन ने काग़ज़ पर एक मंत्र लिखकर दे दिया और बोले -- " मंत्र है : ऊँ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नम:। आपके बेटे को इसका जप करना चाहिए। साथ ही इसे रविवार के दिन कम-से-कम पाँच रत्ती का माणिक, जिसे रूबी भी कहते हैं , सोने की अँगूठी में जड़वा कर अनामिका उँगली में पहनाइए। ध्यान रहे कि रत्न इसकी उँगली को स्पर्श करता रहे। "

आस-पास बैठे लोगों की उत्सुकता यह सब देख-सुन कर बढ़ने लगी। देखते-ही-देखते सज्जन से हाथ दिखाने वालों का ताँता लग गया। डिब्बे में आगे-पीछे बैठे लोग भी यहीं आने लगे। भीड़ में दो तरह के लोग थे। बुज़ुर्गों और महिलाओं में सज्जन के प्रति श्रद्धा और विश्वास का भाव झलक रहा था जबकि भीड़ में मौजूद युवक उन्हें शंका की दृष्टि से देख रहे थे।

" ज़रूर कोई फ़्रॉड है। ऐसे ज्योतिषाचार्य बहुत देखे हैं ! सीधे-सादे लोगों को उल्लू बना कर पैसे ठगना ही इनका असली मक़सद होता है। " भीड़ में खड़ा एक युवक बोला। कुछ अन्य लोगों ने उसकी हाँ-में-हाँ मिलाई।

सज्जन पर इसका कोई असर नहीं हुआ। वे पहले की तरह ही लोगों के हाथ देखते जा रहे थे और उन्हें सुझाव देते जा रहे थे।

" आपने बचपन में बहुत कष्ट सहे हैं। आपका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। चिंताएँ सताती रहती हैं। मन उद्विग्न रहता है।" सज्जन अब एक अधेड़ व्यक्ति का हाथ देख रहे थे। उस व्यक्ति ने सज्जन की बात सुनकर हामी भरी।

" आप सोमवार के दिन प्रात: स्नान करके गाय के कच्चे दूध में मून-स्टोन डुबो कर ग्यारह बार ' ऊँ चंद्राय नम: ' का जप करते हुए मून-स्टोन को दाहिने हाथ की कनिष्ठिका उँगली में धारण कीजिए। आपके मन की उद्विग्नता और चिंताएँ दूर होंगी। " सज्जन ने कहा।

डिब्बे में मौजूद महिलाएँ, बच्चे , बुज़ुर्ग और यहाँ तक कि युवक भी -- सभी बारी-बारी से उन्हें अपना हाथ दिखाते जा रहे थे। और संतुष्ट भाव से उनसे सुझाव लेते जा रहे थे। कुछ लोगों को वे काग़ज़ पर मंत्र लिख कर भी दे रहे थे। और साथ ही उन्हें अंक-ज्योतिष से जुड़ी बातें भी बताते जा रहे थे।

सुनहरे फ़्रेम का चश्मा और गले में सोने की चेन पहने एक व्यक्ति ने सज्जन को हाथ दिखाने के बाद उन्हें पाँच सौ का नोट देना चाहा। उन्होंने शालीनता से इंकार कर दिया।

" यह मेरा शौक़ है , पेशा नहीं। मैं हाथ देखने के पैसे नहीं लेता।" वे बोले।

मैं देख रहा था कि धीरे-धीरे डिब्बे में अधिकांश लोग हस्त-रेखाओं और अंक-ज्योतिष के उनके ज्ञान से प्रभावित होते जा रहे थे। शंकालु लोगों की संख्या अब बहुत कम रह गई थी।

" आपका मूल अंक ' तीन ' है। इसलिए आपके लिए सौभाग्यशाली रत्न पुखराज है। यह पाँच रंग का होता है परन्तु आप पीले रंग का पुखराज ही सोने की अँगूठी में जड़वा कर बृहस्पतिवार को धारण करें। और जब भी आप परेशान और उद्विग्न हों तो केवल ' ऊँ बृहस्पतये नम: ' मंत्र का जप करें। इससे आपको शीघ्र ही शांति का अनुभव होगा। " सज्जन अब एक महिला को बता रहे थे।

एक लम्बी सीटी के साथ के साथ गाड़ी अपने अंतिम स्टेशन पर पहुँच कर धीमी होने लगी। लोगों की भीड़ सज्जन को नमस्कार करके छँटने लगी। सब यात्री अपना-अपना सामान समेटने लगे। सज्जन ने अपने बगल में बैठे लड़के की बाँह थपथपा कर उसे उठने का इशारा किया। फिर वे उँगलियों और हाथों के इशारे से उसे कुछ समझाने लगे।

लड़के ने मुँह से ' ऐ...ऐ...' जैसा स्वर निकाला। मैंने हैरानी से सज्जन की ओर देखा।

" मेरा बेटा है। बेचारा जन्म से ही गूँगा-बहरा है। " वे उदास स्वर में बोले।

गाड़ी एक झटके के साथ प्लेटफ़ार्म पर रुक चुकी थी। हमने अपना-अपना सामान उठाया और डिब्बे के दरवाज़े की ओर बढ़े।

" आपने इसका इलाज नहीं करवाया ? " प्लेटफ़ार्म पर उतर कर मैंने पूछा।

" बहुत इलाज करवाया पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। किस्मत का लिखा कौन टाल सकता है।" उन्होंने आहत स्वर में कहा।

फिर ' नमस्कार ' कह कर , बेटे का हाथ पकड़ कर वे आगे बढ़ गए। मैं उन्हें भीड़ में जाते हुए काफ़ी दूर तक देखता रहा। पता नहीं , अंक-ज्योतिष और हस्त-रेखाएँ उनके बेटे के बारे में क्या कहती थीं।

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प्रेषकः सुशांत सुप्रिय

मार्फ़त श्री एच.बी.सिन्हा ,

5174, श्यामलाल बिल्डिंग ,

बसंत रोड, ( निकट पहाड़गंज ) ,

नई दिल्ली -110055

ई-मेल: sushant1968@gmail.com

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