शनिवार, 26 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की 3 लघुकथाएँ - कुत्ते, शेर तथा डंडा

कुत्ते

शहर में जब कुत्तों ने गड़बड़ करनी शुरू की और वहां भौंकने लगे जहां उन्हें दुम हिलानी चाहिए थी तो पाया कि कुत्तों से मुक्ति पाने का यहीं तरीका है कि उनके खिलाफ भी उसी तरह अभियान छेड़ दिया जाये जैसा इससे पहले मच्छरों के खिलाफ छेड़ा गया था। मच्छरमार दवा बनाने वाली कंपनी ने घोषणा की कि उसने कुत्तामार दवा भी बना ली है और उन लोगों ने, जो प्रत्येक वर्ष कुत्तों की प्रदर्शनी लगाया करते थे, कुत्तों को पकड़ने का ठेका लेने की दरखास्त में लिखा है कि चूंकि वे इससे पहले भी कुत्तों को पकड़ने का काम करते थे, हालांकि लक्ष्य दूसरा होता था, पर लक्ष्य में परिवर्तन आ जाने के बावजूद कुत्ते फंसाने का उनको इतना अभ्यास है कि ठेका उन्हीं को मिलना चाहिए। बात सही भी है। कुत्ते पकड़ना एक कला है और कला कुछ दिनें का काम नहीं, निरंतर अभ्यास जो उसके लिए दरकर होता है, उनके पास था और उन्होंने उसका अच्छा इस्तेमाल किया।

ऐसी बात नहीं कि कुत्तों को इसकी खबर नहीं थी। खबर थी, पर वे कुत्ते थे और सामान्य फैशन के अनुसार उन्हें सिर्फ भौंकना सिखया गया था और लगातार न काटने से उनके दांत झड़ गए थे, यहां तक कि नए पैदा हुए पिल्लों के तो दांत ही न थे, यह बात दूसरी है कि वे, जहां जी चाहता, टांग उठाकर मूत देते।

एक कुत्ता, जिसे कई बार खाज हुई थी और बिना किसी दवा-इलाज के ठीक हुई थी, फटी-फटी आंखें, खरखराती हुई पीठ और चार गज लंबी जबान वाला यतीम था। ‘कुत्तों से शहर को बचाओ’ अभियान वाले जब उसके पास पहुंचे तो उसे पकड़ने में बड़ी परेशानी हुई। हुआ यह कि वह कहने लगा कि वह कुत्ता ही नहीं है।

जब पूछा गया कि वह क्या है तो उसने कहा कि वह आदमी है। कुत्ते के अपन-आपको अदमी कहने पर कुत्ता पकड़ने वालों में यह बहस छिड़ते-छिड़ते बची कि कुत्ते का अपने-आपको आदमी कहना कुत्तों के लिए अपमानजनक है या आदमियों के लिए। अगर यह बात छिड़ जाती तो इसका कोई अंत न होता। आखिरकार किसी बुद्धिमान ने सुझाया कि कुत्ते और आदमी के फरक को समझने के लिए डॉक्टरी परीक्षा ही एकमात्र रास्ता है।

उसे अस्पताल ले जाने से पहले यह बहस भी हुई कि उसे जानवरों के अस्पताल ले जाया जाए या आदमियों के। फिर सर्वसम्मति से तय पाया कि कोई फरक नहीं पड़ता और वे उसे अस्पताल ले गए।

डॉक्टर ने गंभीरता से परीक्षा के बाद निर्णय किया कि वह न अदमी है और न कुत्ता। डॉक्टरों के इस निर्णय के कारण ‘शहर को कुत्तों से बचाओ’ अभियान वालों ने डॉक्ट के पीछे यह शक किया कि डॉक्टर भी आदमी नहीं है और वे छिपकर डॉक्टर की निगरानी करने लगे। आख़िर एक दिन पता नहीं अपने हैलुसिनेशन के कारण या वास्तव में, उन्होंने एकांत में डॉक्टर को भौंकते हुए पाया और समझ गए कि डॉक्टर भी कुत्ता था। अगले दिन कुत्ते और उस कुत्ते को, जो कुछ दिन पहले डॉक्टर था, ‘शहर को कुत्तों से बचाओ’ अभियान वाले पकड़कर ले गए। लेकिन डॉक्टर के कुत्ता साबित होने से श्हर में सनसनी फैल गई। ‘शहर को कुत्तों से बचाओ’ अभियान वाले सोचने लगे कि कुत्ते की पहचान, कुत्ता ही होना नहीं है।

शेर

मैं तो शहर से या आदमियों से डरकर जंगल इसलिए भागा था कि मेरे सिर पर सींग निकल रहे थे और डर था कि किसी-न-किसी दिन कसाई की नजर मुझ पर जरूर पड़ जाएगी।

जंगल में मेरा पहला ही दिन था जब मैंने बरगद के पेड़ के नीचे एक शेर को बैठे हुए देखा। इससे पहले चूंकि चित्रों में आंखें बरगद के पेड़ के नीचे गौतम बुद्ध को देखने की आदी थीं इसलिए पहली नजर में शेर गौतम बबुद्ध नजर आया। लेकिन शेर का मुंह खुला हुआ था। शेर का खुला मुंह देखकर मेरा जो हाल होना था, वही हुआ, यानी मैं डर के मारे एक झाड़ी के पीछे छिप गया।

मैंने देखा कि झाड़ी की ओट भी गजब की चीज है। अगर झाडियां न हों तो शेर का मुंह-ही-मुंह हो और फिर उससे बच जाना बहुत कठिन हो जाए। कुछ देर के बाद मैंने देखा कि जंगल के छोटे-मोटे जानवर एक लाइन से चले आ रहे हैं और शेर के मुंह में घुसते चले जा रहे हैं। शेर बिना हिले-डुले, बिना चबाए, जानवरों को गटकटता जा रहा है। यह दृश्य देखकर मैं बेहोश होते-होते बचा।

अगले दिन मैंने एक गधा देखा जो लंगड़ाता हुआ शेर के मुंह की तरफ चला जा रहा था। मुझे उसकी बेवकूफी पर सख्त गुस्सा आया और मैं उसे समझाने के लिए झाड़ी से निकलकर उसके सामने आया। मैंने उससे पूछा, ‘‘तुम शेर के मुंह में अपनी इच्छा से क्यों से क्यों जा रहे हो,’’

उसने कहा, ‘‘वहां हरी घास का एक बहुत बड़ा मैंदान है। मैं वहां बहुत आराम से रहूंगा और खाने के लिए खूब घास मिलेगी।’’

मैंने कहा, ‘‘वह शेर का मुंह है।’’

उसने कहा, ‘‘गधे, वह शेर का मुंह जरूर है, वह वहां है हरी घास का मैंदान।’’ इतना कहकर वह शेर के मुंह के अन्दर चला गया।

फिर मुझे एक लोमड़ी मिली। मैंने उससे पूछा, ‘‘तुम शेर के मुंह में क्यों जा रहे हो’

उसने कहा, ‘‘शेर के मुंह के अंदर रोजगार का दफ्तर है। मैं वहां दरख्वास्त दूंगी, फिर मुझे नौकरी मिल जाएगी।’’

मैंने पूछा, ‘‘तुम्हें किसने बताया।’’

उसने कहा, ‘‘शेर ने।’’ और वह शेर के मुंह के अंदर चली गई।

फिर एक उल्लु आता हुआ दिखाई दिया। मैंने उल्लू से वही सवाल किया।

उल्लू ने कहा, ‘‘शेर के मुंह के अंदर स्वर्ग है।’’

मैंने कहा, ‘‘नहीं, यह कैसे हो सकता हैं।’’ उल्लू बोला, ‘‘नहीं, यह सच है और यही निर्वाण का एकमात्र रास्ता है’’ और उल्लू भी शेर के मुंह में चला गया।

अगले दिन मैंने कुत्तों के एक जुलूस को देखा जो कभी हंसते-गाते थे और कभी विरोध में चीखते-चिल्लाते थे। उनकी बड़ी-बड़ी जीभें निकली हुई थीं, पर दुम सब दबाए थे। कुत्तों का यह जुलूस शेर के मुंह की तरफ बढ़ रहा था। मैंने चीखकर कुत्तों को रोकना चाहा, पर वे नहीं रुके और उन्होंने मेरी बात अनसुनी कर दी। वे सीधे शेर के मुंह में चले गए।

कुछ दिनों के बाद मैंने सुना कि शेर अहिंसा और सह-आस्तित्ववाद का बड़ा जबर्दस्त समर्थक है इसलिए जंगली जानवरों का शिकार नहीं करता। मैं सोचने लगा, शायद शेर के पेट में वे सारी चीजें हैं जिनके लिए लोग वहां जाते हैं और मैं भी एक दिन शेर के पास गया। शेर आंखें बंद किये पड़ा था और उसका स्टाफ आफिस का काम निपटा रहा था। मैंने वहां पूछा, ‘‘क्या यह सच है कि शेर साहब के पेट के अंदर रोजगार का दफ्तर है’

बताया गया कि यह सच है।

मैंने पूछा, ‘‘कैसे’

बताया गया, ‘‘सब ऐसा ही मानते हैं।’’

मैंने पूछा,‘‘क्यों, क्या प्रमाण है’

बताया गया,‘‘प्रमाण से अधिक महत्त्वपूर्ण है विश्वास’

मैंने कहा, ‘‘और यह बाहर जो रोजगार का दफ्तर है’

बताया गया, ‘‘मिथ्या है।’’

मैंने कहा, ‘‘तुम लोग मुझे उल्लू नहीं बना सकते। वह शेर का मुंह है। शेर के मुंह और रोजगार दफ्तर का अंतर मुझे मालूम है। मैं इसमें नहीं जाऊंगा।’’

मेरे यह कहते ही गौतम बुद्ध की मुद्रा में बैठा शेर दहाड़ कर खड़ा हो गया और मेरी तरफ झपट पड़ा।

डंडा

बहुत दूर तक फैले गड्ढे में हाथी दौड़ा रहा था, चीख-चिघाड़ रहा था और गड्ढे के किनारे पर खड़ा आदमी, जिसने हाथी फंसाया था, खड़ा मुस्करा रहा था। हाथी गुस्से से पागल हो रहा था। बाहर आना चाहता था। अपना सिर टकरा रहा था, लेकिन घेराबंदी इतनी पक्की थी कि उसका बाहर निकल पाना असंभव लग रहा था। गड्ढा इतना बढ़ा और फैला हुआ था कि उसमें जरूरत के वे सब काम किये जा सकते थे जो हाथी फंसाने वालों की नजर में हाथी के लिए जरूरी थे।

कुछ देर बाद वह आदमी एक मोटा-सा डंडा ले आया और डंडा उसने हाथी की दुम के नीचे घुसेड़ दिया। हाथी बहुत जोर से चिंघाड़ा और भागकर गड्ढे के दूसरे कोने में चला गया। इस आदमी ने डंडा लिफाफे में बन्द करके रख लिया। फिर उसने मुझे बताया कि पन्द्रह दिन तक हाथी को खाने के लिए कुछ नहीं दिया जाएगा।

मैंने कहा, ‘‘इसका मतलब यह है कि सधने तक हाथी मर जाएगा!’’

उसने कहा, ‘‘हाथी मरने पर भी सवा लाख टके का होता है।’’

पन्द्रह दिन बाद हाथी काफी कमजोर हो गया था। कुछ देर बाद वही आदमी आया और उसने हाथी के डंडा कर दिया। हाथी उछलकर खड़ा हो गया। चीखने और फिर जोर-जोर से रोने लगा और डंडे की पहुंच से दूर भाग गया। उसे आदमी ने कहा, ‘‘तुम जहां भी जाओगे डंडा मिलेगा। यह मत समझो कि डंडा छोटा है। यह बड़ा भी हो सकता है, मोटा भी हो सकता है, अदृश्य भी हो सकता है, पर रहेगा डंडा ही। इससे तुम बच नहीं सकते।’’ हाथी को फिर पूरे महीने भूखा रखा गया। अब हाथी पीला पड़ चुका था। उसकी आंखों में उदासी और हार जैसे घर कर गई थी। वह चुपचाप उल्टा लेटा सिसकियां ले रहा था। वह आदमी फिर आ गया और उसने हाथीके डंडा कर दिया। हाथी ने सिसकी ली, लेकिन कमजोरी के कारण वह न हिल सका और न चीख सका। वह आदमी काफी देर तक हाथी के डंडा करता रहा और हाथी चुपचाप पड़ा कराहता रहा।

कोई चार-पांच महीने के बाद जब वह मैं उधर से गुजरा तो मैंने देखा कि हाथी सध चुका है और उसे पुरातत्त्व विभाग में नौकरी मिल गई है। वह अपनी मेज पर बैठा काम कर रहा था। मैंने उससे पूछा कि आप कैसे हैं तो उसने काफी सलीके से मुस्कुराकर मुझे सामने पड़ी कुर्सी पर बैठने के लिए कहा और घंटी बजाकर चपरासी को चाय लाने के लिए बुलाया फिर बोला-‘‘ठीक हूं।’’

मैंने पूछा, ‘‘पत्नी और बच्चे’

बोला, ‘‘सब ठीक हैं।’’

मैंने पूछा, ‘‘मोहल्ले पड़ोस में’

कहने लगा, ‘‘सब कुशल मंगल हैं।’’

हम चाय पी रहे थे कि वही आदमी आ गया जो हाथी के डंडा किया करता था उसने फिर डंडा कर दिया। मैं देखकर हैरान रह गया कि डंडा होने पर हाथी वैसी ही हंसी हंसने लगा जैसी हंसी हम सब रोज हंसते हैं।

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