यशवंत कोठारी का व्यंग्य - चुनाव में खड़ा कवि

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ताज़ा व्यंग्य

चुनाव में खड़ा कवि

यशवंत कोठारी

कवि ने कविताई करनी छोड़ दी मंच को राम राम कह दिया और चुनाव मैदान में कूद पड़ा। चुनाव रुपी समंदर में पहले ही काफी गंदगी थी कवि के कूदने से गंदगी और भी बढ़ गयी। चुनावी बिसात के लिए कवि नया था मगर मंच के पीछे की राजनीति का उसे गहरा अनुभव था,इसी अनुभव के भव के सहारे वो इस कीचड़ में कूद पड़ा था। कवि -प्रिया और कवि -पुत्र कवि के इस निर्णय से दुखी हेरान परेशान थे मगर कवि का मूड पक्का चुनाव लड़ने का था। कवि को खिड़की और छत से चिल्लाने का अनुभव था। उसे पिछले दरवाजे से घुसने और अगले दरवाजे से निकलने का भी अनुभव था। कवि जनपथ पर चिल्लाता रहता था। वो राज पथ में घुसना चाहता था। वो राज पथ से कविता को देखना और समझना चाहता था। लोकसभा में हर कर वो राज्यसभा जीतना चाहता था यदि राज्य सभा में नहीं तो राज भवन या दूतावासों का चक्कर चलाना चाहता था। उसे पता था कि पद्मश्री का रास्ता पार्टी दफ्तर से होकर जाता हे सो उसने आपने आपको चुनाव के समंदर में फेक दिया .

कवि ने दिमाग दौड़ना शुरू किया कविता का क्या कभी भी लिख लेगे चुनाव का मोका बार बार थोड़े ही मिलता हे इस बार को छोडो और चुनाव में टूट पड़ो। कवि कभी अपने आपको खालिस कवि मानता था साल में एक दो कविता लिखता था उसे यार दोस्तों में बांटता था और खुश रहता था मगर इस बार उसने कविता के बजाय मत दाता का मूड भांपने का गहरा निर्णय ले लिया . उसने गया हो सोचा रोज रोज नारे लिखने से अच्छा है कि खुद ही चुनाव लड़ लो।

कवि को मंच पर कविता से कुस्ती लड़ने का गहरा अनुभव था। मंच पर अंडे ,डंडे खाने का भी अनुभव था। कवि ने डंडे खाये तो उसे पण्डे और हथकंडे याद आये उसने मंच के हथकंडे चुनाव में चलने कि सोची , मगरचुनाव के नज़ारे नारे और इशारे सब अलग चाल के थे।

कवि राजनीति करे तो साहित्य कि करले मगर ये चुनाव कि राजनीति शायद आर्य पुत्र के बस कि नहीं हे यह सोच कर कविप्रिया ने कहा -नाथ। आर्य। आप कविता रुपी प्रेयसी को छोड़ कर इस चुनावी रन में क्यों कूदें ?जमानत कि राशि भी डूब जायेगी। इस राशि से हीरे कि एक अंगूठी खरीदी जा सकती थी।

अरे भागवान यदि चुनावी रण जीत गया तो कई कवि मेरे नाम से कविता लिख लिख कर मुझे समर्पित करेंगे।

और यदि हर गए तो ?

तो जमानत डूब जायेगी और क्या ?

लेकिन आप को ये क्या सूझी

तुम नहीं समझोगी . जिस तरह मेरी कविता कोई नहीं समझ रहा हे उसी प्रकार कभी कोई सामान धर्मा आएगा और मुझे और मेरी राजनीती को समझेगा

तब तक क्या करे ?

तब तक कम से कम तुम तो मेरा साथ दो।

चुनाव में हथकंडे चलाओ

क्या करू नाथ सब कार्यकर्ता ऐसी कार शराब शबाब कि मांग कर रहे हे।

मांग करने से क्या होता हे।

तो इन कार्यकर्ताओं का क्या करे

करना क्या हे , चुनाव के बाद कही फिट कर देंगे।

मगर ये मुंगेरी लाल के हसीं सपने कब पूरे होंगे ?

कवि और कवि प्रिया चुनावी रंग में रंग चुके हे। वे चुनाव प्रचार में लग चुके हे कविपुत्र भी साथ दे रहे हे। वे निराश नहीं हे। उनको जीत कि उम्मीद हे लेकिन कविप्रिया को दुःख है कि जमानत कि राशि से एक अंगूठी खरीदी जा सकती थी।

कविप्रिया ने चुनाव परिणाम का इंतजार करने के बजाय एक अंगूठी का आदेश दे दिया।

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यशवंत कोठkरी 86 y{eh नगर ब्रह्मपुरी जयपुर-३०२००२ - 

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6 टिप्पणियाँ "यशवंत कोठारी का व्यंग्य - चुनाव में खड़ा कवि"

  1. चुनाव के इस मौसम में यशवंत जी का व्यग्य प्रभावशाली लगा .

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  2. -सुंदर रचना...
    आपने लिखा....
    मैंने भी पढ़ा...
    हमारा प्रयास हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना...
    दिनांक 14/04/ 2014 की
    नयी पुरानी हलचल [हिंदी ब्लौग का एकमंच] पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...
    आप भी आना...औरों को बतलाना...हलचल में और भी बहुत कुछ है...
    हलचल में सभी का स्वागत है...

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  3. समीचीन लेख और व्यंग्य

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  4. बहुत बढ़िया सामयिक व्यंग ..

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  5. उत्तम व्यंग्य रचना के लिए बधाई...प्रमोद यादव

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