रविवार, 27 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की कहानी–तमाशे में डूबा देश

तमाशे में डूबा देश

मैं पहले कहानियां लिखा करता था। अब मैंने कहानियां लिखना छोड़ दिया है क्योंकि कहानी लिखने से कोई बात नहीं बनती। झूठे सच्चे पात्र गढ़ना, इधर-उधर की घटनाओं को समेटना, चटपटे संवाद लिखना, अपनी पढ़ी हुई किताबों की जानकारियों और अपने ज्ञान की कहानी में उलट देने से क्या होता है मैं अपने दूसरे कहानीकार मित्रों को सलाह देता हूं कि वे कहानी-वहानी लिखने का काम छोड़ दें। हमारे इस देश में जहां रोज, हर पल, हर जगह कहानी से ज्यादा निर्मम घट रहा हो वहां कहानी लिखना बेकार की बात है। अपने चारों तरफ निगाह उठाकर देखिए आपको बिखरी पड़ी कहानियां देखकर अपने कहानीकार होने पर शर्म आएगी जो मुझे आ चुकी है और मैंने कहानियां लिखना बंद कर दिया है, लेकिन चूंकि लिखने की आदत पड़ चुकी है और लिखे बिना चैन भी नहीं आता इसलिए सोचा है मैं कहानियां न लिखकर ‘वाक्या’ लिखा करूंगा। ‘वाक्या’ उर्दू का शब्द है जिसका मतलब ‘घटना’ निकाला जा सकता है लेकिन शायद यह बात पूरी बनेगी नहीं। ‘वाक्या’ किसी ऐसी सच्ची घटना का विवरण कहा जा सकता है जो रोचक नाटकीय और मनोरंजक हो। केवल घटनामात्र न हो। अगर मैं आपको सिर्फ घटनाएं सुनाने लगूंगा तो उसमें कुछ मजा न आएगा और आप मुझे बेवकूफ और मूर्ख समझकर पढ़ना बन्द कर देंगे। हो सकता है यह काम आप ‘वाक्या’ सुनने के बाद भी करें लेकिन मुझे अब भी उम्मीद है कि और कुछ करें या न करें ‘वाक्ये’ को सुन लेंगे। यह सच्चा वाक्या हे बहरहाल सच्चाई तो वैसे भी सामने आ जाएगी। मेरे कहने से न सच झूठ हो सकता है और न झूठ सच हो जाएगा।

हमारे ही देश के एक शहर में एक आदमी गायब हो गया और दो कुत्ते के पिल्ले गायब हो गए। मैं शहर का नाम नहीं बताऊंगा क्योंकि वाक्यानिगार होने का यह मतलब नहीं है कि मैं लोगों का दिल दुखाऊं और अपना जीवन हराम कर लूं। आप जानते ही हैं कि आज हमारे अहिंसक देश में हर तरह की हिंसा तरक्की पर है। पहले जो बात तू-तू-तू मैं-मैं पर खत्म हो जाती थी वह अब हत्या का कारण बन जाती है। अब तो हत्यारों का सम्मान होता है। मैं जिस इलाके का रहने वाला हूं वहां जिसने जितनी हत्याएं की होती हैं उसका उतना ही सम्मान होता है। यही कारण है कि आज तक मेरे इलाके में मेरा सम्मान नहीं हो सका है क्योंकि मैं मक्खी मारने लायक भी नहीं हूं। सम्मान के मानदंड बदल गए हैं। इसे साबित करने के लिए मिसाल के लिए एक और वाक्या भी है। विधानसभा के चुनाव हो जाने के बाद कुछ नेतागण विधायक कैंटीन में बैठे बातचीत कर रहे थे और सब एक दूसरे से पूछ रहे थे कि आपने कहां से ‘कन्टेस्ट’ करने की बात कर रहे थे। सबने बताया कि उन्होंने कहां-कहां से ‘कन्टेस्ट’ किया है। एक आदमी से पूछा गया तो उसने कहा कि मैंने कहीं से ‘कन्टेस्ट’ नहीं किया है। सब उसे देखकर हैरत में पड़ गए और कहा, जाहए जाकर काउंटर से छः चाय ले आइए।

अब बात लोकतंत्र की शुरू हो गई तो एक वाक्या और सुनते चलिए। विधानसभा के सामने किसी मुद्दे पर अनिश्चितकालीन अनशन जारी था। किसी सामाजिक सरोकार के मुद्दे पर किसी संस्था की ओर से प्रतिदिन एक आदमी अनशन पर बैठता था। मैं उधर से गुजर रहा था। मैंने देखा कि अनशन पर बैठा आदमी तो पम्मी शर्मा है। मैं उसे जानता हूं। वह उभरता हुआ नेता है और उसने अपने लिए सभी पार्टियों के दरवाजे खुले रखे हैं। मैंने सोचा क्यों न पम्मी शर्मा से मिल लूं, ऐसी कठिन घड़ी में मेरे दो शब्द उसे ताकत देंगे और फिर पम्मी से कोई काम पड़ा तो उसे याद रहेगा कि मैंने कठिन क्षणों में उससे कुछ अच्छे शब्द कहे थे। गरज है कि मैं उसके पास गया। वह मुझे देखकर इतना खुश हो गया जितना पहले न होता था। उसने बताया कि अनशन चालीस दिन से चल रहा है, मुझे अपने देश के विकसित लोकतंत्र पर गर्व हुआ। मैंने उसकी तारीफ की। उसने कहा-‘‘यार एक दिन के लिए तुम भी अनशन पर बैठ जाओ।’’

मैं पहले तो चोंका, कुछ घबराया पर उसने कहा-‘‘यार एक दिन की तो बात है, सुबह बैठोगे... शाम को खत्म हो जाएगा।’’

मैं तैयार हो गया। सोचा ठीक है यार देश की लोकतांत्रिक ताकतों को मजबूत करने के लिए इतना तो करना चाहिए।

मैं अगले दिन सुबह ही सुबह वहां पहुंच गया। वहां सात आठ लोग चा पी रहे थे। पम्मी शर्मा भी था। उसने मुझे गद्दी पर बैठाया। गले में गेंदे के फूलों की माला डाली। तिलक लगाया। मेरा अनशन जारी हो गया। मैं अपनी आत्मा को उत्फुल्ल महसूस करने लगा। थोड़ी देर में पम्मी मेरे पास आया और बोला-‘‘किसी आदमी का इंतजाम कर लेना।’’

मैं हैरत से उसकी तरफ देखने लगा। वह समझ गया था कि मैं अभी तक नहीं समझ पाया हूं।

वह बोला-‘‘जो अनशन से हटेगा... उसे टेंटवाले का, चायवाले का, जूसवाले का, माली का ‘पेमेंट’ करना होगा।’’

मेरे तो पैरों तले से जमीन निकल गई। मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा-‘‘यार उस संगठन के लोग कहां हैं जिन्होंने अनशन कराया है’

उसने कहा-‘‘वे तो सब अपने घर चले गए हैं... तुम्हें कुछ नहीं करना बस एक आदमी का इंतजाम कर लो... और सुनो...’’ वह जाने से पहले बोला-‘‘शाम को जूसवाले से जूस मंगा लेना, उसके यहां भी हिसाब चल रहा है।’’ पम्मी चला गया।

पम्मी ने अपनी टोपी मेरे सिर में फिट कर दी थी। मैं अब समझा कि यही है हमारा लोकतंत्र। अब मेरे साथ क्या हुआ यह मैं आपको नहीं बताऊंगा, बस यह समझ लीजिए कि अब मैं उस शहर नहीं जाता जहां अनशन पर बैठा था। क्योंकि टेंटवाला, चायवाला, जूसवाला, माली सब मुझे तलाश कर रहे हैं। पम्मी से मैंने जब यह बताया था कि यार टेंटवाले, चायवाले वगैरा मुझे खोज रहे हैं तो वह लापरवाही से बोला था-‘‘खोजने दो सालों को, इस देश में यही हो रहा है। किसी न किसी को कोई खोज रहा है और किसी को कोई नहीं मिलता। तुम आराम से अपने लिखने-पढ़ने के काम में लग जाओ।’’

मैं पम्मी की सलाह पर लिखने-पढ़ने के काम में लगा हूं, तब ही यह वाक्या लिख रहा हूं।

माफ कीजिएगा मैंने बात शुरू की थी, एक शहर में एक आदमी और कुत्ते के पिल्ले के गायब होने से लेकिन होते हुआते मैं देश के लोकतंत्र पर आ गया। दरअसल वाक्यानिगारें की यही कमी होती है, वो बात शुरू तो कर देते हैं पर जानते नहीं कि बात कहां पहुंचेगी।

तो जनाब एक शहर में एक आदमी गायब हो गया। उसकी पत्नी पता चलाने पुलिस के पास गई तो पुलिस ने कहा कि अभी तक कोई सिरकटी लाश नहीं मिली है, जैसे ही मिलेगी उसे बता दिया जाएगा। आदमी की पत्नी यह सुनकर डर गई। पुलिस ने कहा-‘‘इस देश में मौत से डरोगी तो रह नहीं सकती, हम लोग मौत से नहीं डरते। आत्मा पर हमारा विश्वास है। मौतें तो इस देश में ऐसे आती हैं जैसे दूसरे देशों में बहार आती है। देखों दस पांच हजार औरतें तो जला दी जाती हैं, दस बीस हजार सड़कों पर कुचल कर मर जाती हैं, पता नहीं कितने दंगों में मार दिए जाते हैं, अकाल और बाढ़ की तो पूछो ही मत। नाकरी पाने के इच्छुक गोली खाकर मर जाते हैं। आतंकवादी हजारों को मार डालते हैं तो देश क्या है बूचड़खना है। अब काजल की कोठरी में रहकर काला होने से क्या डरना... शुक्र कर तेरे आदमी की अभी लाश नहीं मिली है। हो सकता है अपहरण हो गया हो। फिरौती के लिए चिट्ठी या फोन आए।’’

औरत बोली, ‘‘दरोगा जी हमारे पास क्या है जो कोई फिरौती के लिए अगवा करेगा! दो टाइम खाने को नहीं जुटता।’’

‘‘तब तो अपहरण की ट्रेनिंग लेने वालों ने अभ्यास के तौर पर तेरे पति का अपहरण कर लिया होगा।’’

‘‘ये क्या होता है दरोगा जी।’’

‘‘देख, देश में बहुत से प्राइवेट स्कूल कॉलेज खुल गए हैं। अपहरण उद्योग के रिटायर्ड लोगों ने मिलकर ‘अपहरण कॉलेज’ खोल दिया है। अच्छी फीस लेते हैं... वे अपने छात्रों से कहते हैं कि नमूने के तौर पर किसी का अपहरण करके दिखाओ... वे लोग तेरे पति को छोड़ देंगे... बशर्तें कि... पुलिस वाला बोलते-बोलते रुक गया।

‘‘क्या बशर्ते कि दरोगा जी।’’ औरत ने पूछा।

‘‘देख यह भी हो सकता है कि अपहरण के प्रयोग के बाद उन्होंने तेरे पति को किस दूसरे स्कूल में पहुंचा दिया हो।’’

‘‘क्या मतलब दरोगा जी।’’

‘‘देख हत्या करना, गोली मारना, गला काटना आदि-अदि सिखाने के भी तो स्कूल खुले हैं न।’’

औरत रोने लगी। पुलिस बोली-‘‘रो मत, हो सकता है मानव अंगों ककी तस्करी करने वाले किसी गिरोह ने पकड़ लिया हो। तेरा पति आ तो जाएगा पर ये समझ ले एक गुर्दा न होगा, या एक आंख न होगी, या मान ले...’’ औरत रोने लगी। पुलिस ने कहा, ‘‘अब यहां थाने में न तो। यहां औरतें रोती हैं तो लोग जाने क्या-क्या समझते हैं। यहां से तो तुझे हंसते हुए जाना चाहिए।’’

ये तो हुई आदमी के गुम हो जाने की बात। अब सुनें कुत्ते के पिल्लों की गुमशुदगी की दास्तान। दरअसल जो कुत्ते के पिल्ले खोए हैं उन्हें कुत्ते का पिल्ला कहने से भी डर रहा हूं। उसकी वजह है। आपको मालूम ही है कि कुछ साल पहले अमेरिका के राष्ट्रपति जब अपने दल-बल के साथ दिल्ली आए थे तो उनके साथ कुत्ते भी थे। उनके कुत्तों की प्रतिष्ठा, गरिमा, पद आदि के बारे में पता न होने के कारण एक भारतीय अधिकारी ने उन्हें कुत्ता कह दिया था। इसी बात पर उस अधिकारी के खिलाफ कुत्तों की मानहानि का दावा कर दिया गया था। अदालत में अमरीकी सरकार के प्रतिनिधि ने कहा था ये कुत्ते नहीं हैं-इनके नाम और पद हैं। एक का नाम जैक जॉनी है और वह मेजर के पद पर है। दूसरे का नाम स्टीव शॉ है जो कैप्टेन है। तीसरी कुतिया का नाम लिंडा जॉन्स है जिसने अभी-अभी ज्वाइन किया है और वह सेकंड लेफ्टिनेंट है। अदालत ने इन अधिकारियों की मानहानि करने के सिलसिले में संबंधित अधिकारी को सजा सुनाई थी और यह आदेश दिया था कि भविष्य में इन कुत्तों को कुत्ता नहीं कहा जाएगा, यही वजह रही कि राजधानी के समाचार-पत्र बड़े आदर और सम्मान से, कुत्ते के नाम और पद छापते रहे। आप हम सब जानते हैं कि वैसे भी हमारे समाचार-पत्र कुत्तों का कितना ध्यान रखते हैं क्योंकि उससे लाभ-हानि जुड़ी होती है।

बहरहाल हुआ यह कि एक रात दो बजे मंत्री-पुत्र के घर से थाने फोन आया। थाने की नींद उड़ गई। मंत्री-पुत्र ने डांटा और कहा कि तुम सोते रहते हो और चोर चोरी करते रहते हैं। तुम्हें पता है बेबी रतन और बेबी गौरी का अपहरण हो गया है। थाने में तुरंत कार्यवाही की बात उठी। पर सब जानते थे कि मंत्री-पुत्र अभी तक अविवाहित है और उसने कसम खाई हुई है कि जब तक स्वयं मंत्री नहीं बन जाएगा शादी नहीं करेगा। ऐसी हालत में बेरी रतन और बेबी गौरी कहां से आ गए। इस सवाल का जवाब कोई न दे सका तो हवालात में बंद एक अपराधी ने दिया। उसने बताया, बेबी रतन और बेबी गौरी मैडम लूसी और सर जॉनसन की औलादें हैं जिन्हें मंत्री-पुत्र यू.एस. से खरीदकर लाए थे और अनजाने तथा अनाड़ी इन्हें कुत्ते के पिल्ले कह उठे थे जिस पर उसी समय उनकी जुबान खिंचवा ली गई थी।

रतन और गौरी के अपहरण की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। स्थानीय पत्रकारों के बाद टी.वी. चैनल वाले धमक पड़े और पूरा थाना कैमरों, लाइटों, कटरों से भर गया। कुछ टी.वी. वाले मंत्री-पुत्र की कोठी पर पहुंच गए। सबसे पहले यह ‘ब्रेकिंग न्यूज’ ‘जल्सा चैनल’ ने दी। उसके बाद यह ब्रेकिंग न्यूज ‘समकुल चैनल’ पर शुरू हुई। उसके बाद तो घमासान शुरू हो गया। हर चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज स्टोरी चलने लगी, रतन और गौरी के ‘स्टिल्स’ और ‘फुटेज’ की मांग इतनी बढ़ गई कि प्रोडक्शन हाउसों वाले पागल हो गए।

चैनलें में तूफान मच गया। एक रिपोर्टर की नौकरी इसलिए चली गई कि वह रतन की फोटो नहीं ला सका। दूसरे चैनल में किसी का प्रोमोशन हो गया कि वह मंत्री-पुत्र की ‘बाइट’ ले आया। एक पत्रकार को पीटा गया, क्योंकि उसने मंत्री-पुत्र के कुत्ताघर, जिसे अंग्रेजी में सब ‘केनल्ल’ कहते थे, में घुसने की कोशिश की थी। दो पुलिसवाले सस्पेंड हो गए क्योंकि चार घंटे हो गए थे और उन्होंने रतन और गौरी का पता नहीं लगाया था। डी.एम. का ट्रांसफर होते-होते बचा और एस.पी. का ‘कारण बताओ’ नोटिस दे दिया गया।

चैनलवालों ने पुलिस को पटाने का काम शुरू किया। वे चाहते थे कि इस पूरे ऑपरेशन में जिसे पुलिस ने ‘ऑपरेशन ट्रुथ’ का नाम दिया था, वे लगातार पुलिस के साथ रहे। ‘जल्वा’ चैनल वालों ने पुलिस को यह समझा कर पटाया कि ‘आपरेशन ट्रुथ’ के बाद चैनल पुलिस का इंटरव्यू दिखाएगा। यह बात ‘चैनल फोर फाइव सिक्स’ वालों को पता चल गई। उन्होंने पुलिस को पच्चीस हजार नकद देने का वायदा किया। कहा यह कि ‘जल्वा’ वालों की जगह उन्हें पूरे ‘ऑपरेशन ट्रुथ’ में साथ रखा जाए, यह बात ‘मून चैनल’ वालों को पता चली तो उन्होंने गृह मंत्रालय के एक सीनियर ऑफिसर से फोन कराया और आदेश दिया गया कि पुलिस ‘मून चैनल’ वालों को प्राथमिकता दे। बात इतनी ऊपर पहुंच चुकी थी कि पुलिसवाले डरने लगे। डी.एम. को लगने लगा कि कल कहीं प्रधानमंत्री सचिवालय से फोन न आ जाए।

पुलिस ने छापे मारने शुरू किए। चा टीमें बनाई गईं और रात-दिन रतन और गौरी की तलाश का काम शुरू हो गया। इसी दौरान मंत्री-पुत्र के पास फोन आया कि फलां-फलां जगह पचास करोड़ रुपया न पहुंचाया गया ता रतन और गौरी की हत्या कर दी जाएगी। अब स्टोरी का एक नया ‘ऐंगिल’ निकल आाया। चैनल विशेषज्ञों को बुलाकर उनसे बहस कराने लगे। सुखद यह रहा कि चैनल वालों को इस मसलजे में विशेषज्ञ बदलने नहीं लड़े। दो-चार आदमी जो राजनीति, समातज, वनस्पतिशास्त्र और खगोलशास्त्र के विशेषज्ञ थे और हर तरह के कार्यक्रमों में टी.वी. पर आया करते थे वही गौरी और रतन वाले मामले में भी आए और दर्शक यह सोचकर अचंभे में पड़ गए कि राजनीति के मर्मज्ञ कुत्तों के बारे में भी पूरी जानकारी रखते हैं। चैनल वाले गर्व से कहते थे कि विशेषज्ञता और ‘प्रोफेशनलिज्म’ के जमाने में हमने ऐसे लोग खोज रखे हैं जो संसार की किसी भी समस्या, ज्ञान-विज्ञान के किसी भी क्षेत्र में, लोक-परलोक की किसी भी घटना के बारे में विद्वतापूर्ण ढंग से विचार व्यक्त कर सकते हैं।

ईश्वर का करना कुछ ऐसा हुआ कि पुलिस, सी.आई.डी., आई.बी. रॉ. और दूसरी खुफिया एजेंसियों ने मिलकर रेड डालने शुरू किए और आखिरकार पता चला कि एक जगह शहर के बाहर एक फार्म हाउस में रतन और गौरी को रखा गया है। अपहरणकर्ता पूरे असलहे से लैस हैं। उनके पास बोफोर्स तोपों से लेकर ‘एंटी एयरक्राफ्ट गन’ तक मौजूद है। अब तो सेना से मददलेने की जरूरत पड़ी। गृह मंत्रालय ने सुरक्षा मंत्रालय से निवेदन किया और एक ले. जनरल के साथ ब्रिगेड भेज दी गई।

टी.वी. चैनलों पर बहस का मुद्दा यह था कि इस ‘ऑपरेशन ट्रुथ’ में रतन और गौरी सलामत निकल आएंगे या नहीं। यह भी जानकारी मिली कि अपहरणकर्ताओं ने मार्केट से दो सौ टन टी.एन.टी. भी खरीदी है और उसका जखीरा भी उनके पास है। टी.वी. चैनलों के वही विशेषज्ञ जो वनस्पति विज्ञान से लेकर सुपरसोनिक जेटों तक के विशेषज्ञ थे, कहने लगे इतना ‘एक्सप्लोसिव मैटीरियल’ तो पूरे फार्म हाउस को ज्वालामुखी की तरह उड़ा देगा और जाहिर है उसमें नन्हें-मुन्ने रतन और गौरी के बचने की क्या उम्मीद होगी। तब कहा गया कि यह दरअसल मनोवैज्ञानिक लड़ाई है। इसे भारत अकेलेि नहीं लड़ सकता। इसमें तो जब तक अमेरिका का सपोर्ट नहीं होगा यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती। अमेरिका से कहा गया तो वहां से बड़ा सार्थक और उत्साहवर्धक जवाब आया। अमेरिका ने कहा है कि वह तो संसार के हर कोने में शांति स्थापित करने के लिए दृढ़संकल्प है। जहां भी शांति भंग होने, मानव अधिकारों के हनन का सवाल उठता है अमेरिका उठ खड़ा होता है। और अब चूंक भारत में ऐसी स्थति आ गई है इसलिए अमेरिका अवश्य ही आएगा। यह भारत की सभ्यता है कि वह अमेरिका को आमंत्रित कर रहा है। यदि न भी कर रहा होता तो अमेरिका आता क्योंकि वह विश्व में शांति स्थापित करना चाहता है और यह उसके ‘एजेंडे’ का एक और पहला मुद्दा है। यही नहीं, अमेरिका ने घोषणा कर दी कि उसकी सेनाएं ध्वनि से तेज चलनेवाले विमानों पर बैठकर भारत के लिए रवाना हो चुकी हैं। हिंद महाागर में अमेरिकी बेड़ों को भारत की तरफ कूच करने का आदेश दे दिया गया है। औ यह भी कहा गया कि भारत को चाहिए कि सेनाओं के पहुंचने से पहले कोकाकोला और पेप्सीकोला का पर्याप्त भंडार कर ले। मैक्डानाल्ड हैम्बर्गर, अंकिल चिप्स, कनटकी चिकन, एफ.टी.जे. वगैरा की जितनी ज्यादा दुकानें खोलीि जा सकती हों खुलवा दे क्योंकि अमरीकी सैनिक जाहिर है दाल रोटी नहीं खाएंगे। चूंकि यह आदेश था इसलिए इंतजाम पूरा हो गया। बड़ी-बड़ी अमेरिकी बाजारें खुल गईं जहां सुई से लेकर हवाई जहाज तक उपलब्ध था।

ऐसी तैयारी का नतीजा भी अच्छा निकला। लेज़र बम से रतन और गौरी के अपहरणकर्ता को मार गिराया गया। दूसरा एक तहखाने में छिप गया था। उसने दाढ़ी बढ़ा ली थी, उसे पकड़ा गया। अमेरिकी सैनिकों ने कहा कि हम इसे अमेरिका ले जाऐंगे और चिड़ियाघर में बंद कर देंगे ताकि विश्व शांति भंग करने वालों के लिए एक सबक हो।

चूंकि अमेरिकी सैनिकों के लिए पेप्सी, कोला, बीयर, हैम्बर्गर आदि का एक बड़ा स्टॉक था इसलिए उन्हें वापस जाने की जल्दी नहीं थी। उन्होंने कहा कि हम तो आपके देश से विश्वशांति भंग करने वाली सभी शक्तियों को नष्ट करके ही जाएंगे। उनके इस विचार का स्वागत किया गया और वे यहां पेप्सी पी-पीकर मोटे होने लगे।

जिस दिन थाने में रतन और गौरी पहुंचे उसी दिन वहां सक सिरकटी लाश भी पहुंची। रतन और गौरी के मिल जाने से थाने के चारों तरफ दफा 104 लगा दिया गया था, क्योंकि ओ.बी. वैनों से रास्ता बंद हो गया था और दर्शकों का सैलाब था जो अमेरिकी सैनिकों और रतन, गौरी को देखने के लिए उमड़ पड़ा था। कई बार लाठी चार्ज हो चुका था पर दर्शक काबू में नहीं आ रहे थे। वे जय-जयकार कर रहे थे। खुशी के मारे आपे से बाहर हुए जा रहे थे।

इसी बीच मैली-कुचैली धोती बांधे, तीन बच्चों को संभाले किसी तरह गिरती-पड़ती एक औरत थाने पहुंची। उसे पता लग गया था कि आज एक सिरकटी लाश थाने लाई गई है। किसी न किसी तरह वह औरत थाने के अंदर आ गई। वहां टी.वी. चैनल वाले भरे पड़े थे और अमेरिकी सैनिकों के साथ सिगरेट पी रहे थे। एकाध बीयर की घूंट भी मिल जाती थी।

टी.बी.सी. चैनल की राधिकारमन ने देखा कि एक औरत सिरकटी लाश के पास खड़ी उसे पहचानने की कोशिश कर रही है। उसके साथ तीन छोटे-छोटे बच्चे भी खड़े हैं। राधिका ने अपने बॉस सत्यकाम से कहा, ‘‘सर ये देखिए कितनी अच्छी स्टोरी है। सिरकटी लाश को यह औरत पहचानने की कोशिश कर रही है। तीन बच्चे पास खड़े हैं। इसे शूट करें सर’

सत्यकाम बिग़कर बोला, ‘‘क्या चाहती हो चैनल बंद हो जाए।’’

‘‘नहीं सर... लेकिन क्यों’ राधिका ने कहा।

सत्यकाम बोले, ‘‘इस औरत, बच्चों और लाश का ‘विजुअल’ देखकर सी.ई.ओ. मिस्टब्र मेहरा मेरी तो छुट्टी कर देंगे।’’

‘‘क्यों सर’

सत्यकाम बोले, ‘‘ओ माई गॉड... तुम्हें ये भी बताना पड़ेगा अरे हमारे चैनल पर ‘ऐड’ आते हैं, विज्ञापन समझीं’

‘‘हां सर।’’

वो विज्ञापन किनके लिए होते हैं कौन यह सामान खरीदता है यह क्या देखना... ‘‘चलो चलो कैमरा लगाओ... रिफ्लेक्टर... साउंड...’’ चैनल का संवाददाता चिल्लाने लगा क्योंकि थाने के अंदर बड़े खूबसूरत मंच पर रतन और गौरी को लाया जा रहा था। उनके पछे-पीछे मंत्री-पुत्र, कमल का फूल बना, आ रहा था। पीछे अधिकारी, सेना के पदाधिकारी आदि थे। संगीत बज रहा था। कबूतर और गुब्बारे हवा में छोड़े जा रहे थे। आतिशबाजी आसमान पर रंग-बिरंगे करिश्मे दिखा रही थी। पूरी इमारत जतगमगा रही थी। लगता था आज छब्बीस जनवर या पंद्रह अगस्त है। चारों तरफ उल्लास, मस्ती विजय का भव्य प्रदर्शन व्याप्त था।

उस औरत ने सिरकटी लाश पहचान ली थी। यह उसका पति ही था। औरत रो रही थी, पर मौज, मस्ती, आनंद, उल्लास, जश्न, गीत-संगीत के माहौल में उसकी आवाज केई नहीं सुन रहा था।

उसके बच्चे अपने फटे-ज्पुराने कपड़ों में सहमे, सिकुड़े मुंह खोले मंच पर होनेवाले तमाश में डूबे हुए थे। वे न अपनी मां को देख रहे थे, न बाप की सिरकटी लाश को।

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