रविवार, 27 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की लघुकथा श्रृंखला–आत्मघाती कहानियाँ

आत्मघाती कहानियां

(1)

एक आदमी ने दूसरे के पेट में चाकू मार दिया और बोला, ‘ये ले चाकू, तू भी किसी के मार देना’। दूसरे आदमी ने चाकू ले लिया और तीसरे आदमी के पेट में घोंप दिया। परम्परा को निभाते हुए दूसरे आदमी ने तीसरे को चाकू भी भेंट किया ताकि वह चौथे क साथ वहीं कर सके जो उसके साथ हुआ है। अब पूरे देश के पेट में चाकू का घाव है और हर आदमी के हाथ में एक-एक चाकू है जो वे एक-दूसरे के पेट में घोंप रहे हैं। उनको कोई रोकने की कोशिश करता है तो कहते हैं-‘‘यह हमारी आस्था का सवाल है। हमें मत रोको। हमारी भावनाएं आहत होती हैं।’’

(2)

विस्फोटकों की आवाज से पूरा देश थर्रा गया। सैकड़ों लोगों के परखच्चे उड़ गए। खून की नदियां बहने लगीं, जख्मियों से अस्पताल पट गए। हर तरह का हाहाकार मच गया। हर तरफ लाशें और रोते बिलखते लोग।

प्रधान मंत्री ने टी.वी. पर बयान दिया-‘‘हम इस अमानवीय, घृणित आतंकवादी घटना की निन्दा करते हैं। सरकार आतंकवादियों के सामने कभी नहीं झूकेगी। इस आतंकवाद की मुंहतोड़ जवाब देंगे...अपराधी हर कीमत पर सजा पाएंगे...सरकार हर मरने वालों को पांच पांच लाख मुआवजा देगी...और हर मारने वाले को दो-दो-लाख रुपया...’’

प्रधानमंत्री के यह कहते ही हो-हल्ला मच गया। प्रधानमंत्री हैरान हो गए। उन्होंने कैबिनेट सेक्रेटरी से पूछा, ‘‘क्या मैंने कोई नई बात कह दी क्या ऐसा पहले नहीं होता रहा’

(3)

अखबार में खबर छपी कि शान्ति देवी की मूर्ति स्थापित करते हुए पचास शान्तिदूत विस्फोट में मारे गए।

बताया जाता है कि शान्ति देवी की मूर्ति स्थापित होने के बाद इतनी जोर से फटी कि पूरा शहर हिल गया। कई मोहल्ले उड़ गए।

शान्ति देवी की मूर्ति आत्मघाती आतंकवादी था।

(4)

अखबार के सम्पादक को दो तरह के समाचार ही पसन्द आते थे। या तो वह बलात्कार की खबरें छापता था या बम बिस्फोटों की खबरें पकाशित होती थीं।

सम्पादक ने अपनी बेटी की शादी की खबर उस वक्त तक नहीं छापी जब तक शादी में बम नहीं फटा और उसमें सम्पादक के चीथड़े नही उड़े।

(5)

रामदीन आतंकवादियों से बहुत डरता था। उनसे बचने के लिए उनकी पूजा करता है। रोज सुबह उनकी आरती उतारता है, दंडवत प्रणाम करता है और आंतक चालीसा पढ़ता ऑफिस जाता है पर रामदीन शाम को लौट नहीं पाता। घर से जाता तो रामदीन है, पर आता कोई और हैं।

(6)

आतंकवादी सरकार ने आतंकवादी को अपने पास बुलाया और उसके सिर में गाली मार दी। वह गिरकर तड़पने लगा और मर गया।

आंतकवादी की पत्नी रोती-बिलखती आई और सरदार से पूछा कि उसके पति को क्यों मार डाला

सरदार बोला-वह दूसरों से मिलने लगा था।

सरदार बोला-वह सवाल पूछने लगा था।

सरदार बोला-ले जा इसकी लाश।’’

आतंकवादी की पत्नी लाश घसीटने लगी तो

सरदार बोला-मुझसे अकेले नहीं जाएगी...अपने बच्चों को भी बुला ला।

(7)

एक धर्म प्रचारक कह रहे थे कि धर्म, प्रेम, सेवा और भाई-चारे का सन्देश देता है। यह सुनकर एक लड़के ने धर्म प्रचारक के मुंह पर थूक दिया।

‘‘मैंने क्या गलत कहा था,’’ धर्म प्रचारकि ने पूछा।

‘‘मेरे मां-बाप को आतंकवादियों ने उड़ा दिया था।’’

धर्म प्रचारक ने रिवाल्वर निकाला। लड़के को गोली मार दी। वह मर गया। धर्म प्रचारक फिर अपने काम में जुट गया।

(8)

हर धर्म और जाति वालों की अपनी अलग-अलग सेनाएं हैं। ये सभी सेनाएं भारतीय सेना से युद्ध करती रहती हैं। भारतीय सेना अकेली हैं। ये सेनाएं बहुत हैं। लड़ते-लड़ते एक दिन भारतीय सेना हार गई। उसने इन सेनाओं के सामने हथियार डाल दिया।

उस दिन राजधानी ‘भारत विश्व शक्ति है’ सेमीनार का उद्घाटन करने के बाद ‘रैंपशो’ में जा रहे थे।

संसद का रात्रिकालीन अधिवेशन चल रहा था और तिरंगे झंड के तीनों रंग फड़फड़ा रहे थे।

(9)

आत्मघाती आतंकवादी अब पुराने नेताओं के मेकअप में आते हैं। एक बार एक आतंकवादी गांधी जी के मेकअप में आ गया। वह संसद के सत्र में जाना चाहता था। उसे भला कौन रोकता। लोग नोटों पर छपी उसकी तस्वीर के कारण ही उसे बड़ा आदमी समझते थे। वह सीधा धड़धड़ाता हुआ संसद में चला गया और मुख्य हॉल में पहुंचा। अपने सीने पर बंधे बमों का स्विच ऑन करने से पहले उसने इधर उधर नजर दौड़ाई तो देखा सदन में कोई नहीं है पर कार्यवाही चल रही है।

आतंकवादी देश की दुर्दशा पर इतना लज्जित हुआ कि उसने बमों का स्विच ऑन कर दिया।

(10)

पूरी दुनिया के बन्दर बहुत नाराज हैं। उनमें बहुत गुस्सा है। उनकी बात कोई नहीं सुन रहा। उन्होंने कई बार अखबारों को बयान दिए हैं, टी.वी. वालों को इंटरव्यू दिए हैं। समाचार एजेन्सियों को अपने बयान थमाए हैं, पर कुछ

नहीं हो रहा है। उन्हें बदनाम करने की कोशिश लगातार हो रही है।

बन्दरों की यू.एन. में बड़ी गर्मागर्म बहस जारी है, सब अपनी-अपनी बा रख रहे हैं। एक जुगादरी बन्दर बोला कि अब तो डूब मरने की नौबत आ गई। हमें इतना बदनाम किया जा रहा है कि हम शायद जिन्दा न रह सकें। भारत के अखबार और नेता बार-बार एक दूसरे पर आरोप लगाते हुए बन्दर-बॉट’ कहते हैं जिसका हम सख्त विरोध करते हैं।

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